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Tuesday, March 25, 2014

81म सगर राति‍ दीप जरए देवघरमे 22 मार्च 2014केँ पठि‍त वि‍हनि‍ कथा ''आन्‍हर''

आन्‍हर
 


हाइ स्‍कूल, झंझारपुर, केजरीवालमे पढ़ै छी। बेसी वि‍द्यार्थी कौमर्स पढ़ैए। हम अर्थशास्‍त्र पढ़ै छी। 
इन्‍द्रपुजाक हलहोड़ि‍मे माएसँ ठकि‍ कऽ पचास रूपैआ लऽ लेलौं। खेबो-पीबो केलौं, रामहि‍लोरोपर चढ़लौं मुदा कदमक झूला छूटि‍ गेल। पाइए सठि‍ गेल। होटलो की आब ओ होटल रहल जे छअ आनामे भरि‍ पेट दालि‍ अल्‍हुआ भेटैत।
पचासो रूपैआक हि‍साब माए बाबूकेँ दऽ देलकै। साँझमे जखनि‍ मलड़ैत गामपर एलौं आकि‍ बाबू पुछलनि‍-
कोन-कोन कि‍ताप लेलँह?”
बाबू लग झूठ नै बजै छी, मुदा ई नै बुझै छी जे सतो-सभटा बजले जेतै। जेना-जेना खर्च केलौं खोलि‍ कऽ कहि‍ देलि‍यनि‍। तमसेला नै मुदा तमसाएल बात कहला-
 “आन्‍हर छेँ, अन्‍हारमे अनहेर होइ छै। ओइ अनहेरमे परमेँ तँ अनेरे अन्‍हरा जेमे। कान पकड़ि‍ ले।mmm

अखिलेश कुमार मण्‍डल
बेरमा, मधुबनी।

श्री ओम प्रकाश झा आयोजि‍त 81म सगर राति‍ दीप जरए देवघरमे पठि‍त कथा ''गंगा लाभ''

गंगा लाभ


बि‍सहरि‍यामे नवाह-कीर्तनक आयोजन भेल। हमहूँ भड़ैत कीर्तनीयाँ छीहे। दि‍नक एक बजेसँ रामधून शुरू हएत। कमसँ कम पनरहो मि‍नट पहि‍ने उपस्‍थि‍ति‍ दर्ज जँ नै कराएब तँ टाटा फैक्‍ट्रीक कम्‍प्‍यूटर थोड़े छोड़त, ओ तँ पकड़ि‍ए लेत। जखनि‍ गामसँ जेबे करब तखनि‍ अगि‍ला-पछि‍ला घरक काज नै सम्‍हारि‍ लेब तँ खगबो करत कि‍ने। चाह पीला, तमाकुल खेला पछाति‍ काज ठेकि‍नेलौं। ठेकानपर कि‍छु चढ़बो कएल, कि‍छु नहि‍योँ चढ़ल। मुदा एकटा वि‍चार चढ़ि‍ गेल ओ चढ़ल जे अनेरे कि‍ए ढोलक-झालि‍क संग बौआएल फि‍ड़ै छी। बड़ बेसी हएत तँ शास्‍त्रीय धून धरि‍ पहुँचब। मुदा ओ जुग-जमाना थोड़े रहल जे घंटाक घंटा भूमि‍के बान्‍हब। आब थुक फेकैत तँ लोककेँ पलखति‍ए ने छै आ हाथ-पएर मारि‍ घंटो-घंटा के बैसत? मनमे घुरि‍यौठ शुरू भेल। घुरि‍यौठ ई जे कीर्तनमे जाइ आकि‍‍ नै जाइ। गछि‍ नेने छि‍ऐ, नै जेने दोखी हएब। दोखी जे हएब से तँ हेबे करब मुदा दस दि‍न नरम दाना, पाँचो टुक वस्‍त्र आ तीन हजार तँ देखि‍ले डाँढ़ लगत। मनक सभ कि‍छु हेरा गेल। वि‍चार पक्का कऽ लेलौं जे कीर्तनमे जेबे करब। अथबल जकाँ बैसल देखि‍ पत्नी आबि‍ चरि‍यबैत पुछली-
भरि‍ दि‍न अपने बौनाएल रही छी। धि‍या-पुता नरवस्‍त्र भेल जा रहल अछि‍। से केकरा भरोसे छी, हमरा गुदानैए?”
जहि‍ना जेठुआ बाढ़ि‍ एने गामक लोक धारक मुँह बान्‍हि‍ खेत पटबैक जोगार करैए तहि‍ना मनक बान्‍ह घेरा गेल। पानि‍ चकभौड़ कटलक। गंगो लाभ तँ भाइए गेल। तीन साल पहि‍ने पि‍ता जीक कि‍रि‍या-कर्म काइए नेने छेलौं, मास दि‍न पहि‍ने माइओसँ उद्घार भाइए गेलौं। अपने दुनू परानी ने ऐ घरकेँ सम्‍हारि‍ कऽ लऽ चलब। नै तँ के केकरा देखै छै। गंगा सन धारकेँ तँ लोक देखबे ने करैए जे केना अकासगंगा बनि‍ बि‍नु धरतीएक बोहैए। केतौ माटि‍पर सँ ससरैत हि‍मालयक कैलाशपर चढ़ि‍ भोलो बाबासँ ऊपर चलि‍ जाइए, केतौ बेटीक बि‍आहोपरान्‍त आबि‍ जाइए, केतौ माए-बापक कि‍रि‍या-कर्म भेला पछाति‍ आँखि‍क सोझ अबैए तँ केतौ माघक ठाढ़ पानि‍मे डुमकीओ लगा उद्घार करैए। यएह भेल गंगा लाभ। थकथकाएल देखि‍ पत्नी दोहरबैत बजली-
सि‍मरि‍या घाट जकाँ जे पछि‍ला पीढ़ी (माता-पि‍ता) पाछू पड़ि‍ गेला। अखनि‍ सनमुख तँ अपने दुनू गोरे भेलि‍ऐ। आगू भेल धि‍या-पुता जे अखनि‍ बाले-बोध अछि‍। साँझ-परात जे ओकरा सभकेँ दू अछर पढ़ा देबै तँ की‍ ओ बि‍सरि‍ जाएत जे बाबू नै पढ़ौलनि‍?”
एक तँ ओहि‍ना पहि‍लके झटहा तेना टाँगमे लगल जे नेग्‍राइत रहौं तैपर सँ जुड़शीतलक नढ़ि‍या जकाँ गदागद पड़ि‍ए रहल छल। बेथाइत-बेथाइत मन एते बेथा गेल जे थकथका गेलौं। थकथाकाइते खापरि‍क तीसी जकाँ मन चनचना उठल-
माए, मन पड़ि‍ गेल तँए मन थकथका गेल छल।
माए सुनि‍ते पत्नीक नजरि‍ जेना चढ़ए लगलनि‍। मुदा मुँहमे ताला लगौने रहली। जहि‍ना जहलक भि‍तर मन औनाए लगै छै तहि‍ना पत्नीक मन औनए गेलनि‍। पि‍ताक (ससूर) मृत्‍युक पछाति‍ माइक (सासु) हाथमे परि‍वार आएल। बाहरसँ कमा-कमा आनि‍ हाथमे दइ छेलनि‍। पोता-पोतीकेँ ननुआगर बना बि‍गाड़ि‍ लेलनि‍। अपन हि‍तकेँ अहि‍त होइतो देखि‍ मुँहमे ताला लगौने रहली। हराएल-थोथि‍याएल-थहि‍याएल-मरि‍याएल बटोही जकाँ पुछलि‍यनि‍-
आब उपए?”
मुँह नीक जकाँ बन्नो ने भेल छल आकि‍ मचकीक झुलि‍नि‍हार जकाँ दोसर डारि‍ पकड़ि‍ मेचैत बजली-
जखने जागी तखने परात।
सँझुके तारा जकाँ घँसाइत-मेटाइत-सुतैत-जगैत भोरक भुरूकबा जहि‍ना सुर्जकेँ पकड़ि अनैत तहि‍ना हमरो अनली।¦¦¦

सगर राति‍क गोष्‍ठीक दीर्घयात्रापर वि‍चार व्‍यक्‍त केलनि‍ श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल

81म सगर राति‍ श्री ओम प्रकाश झाजीक संयोजकत्‍वमे आयोजि‍त छल जइमे अध्‍यक्षीय भाषणमे नि‍म्नलि‍खि‍त चर्चा केलनि‍ श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल....


उदय-प्रलय शाश्वत सत् जहि‍ना छै तहि‍ना जि‍नगीओ आ जि‍नगीक कि‍रि‍या-कलाप सेहो छै। मैथि‍ली साहि‍त्‍याकाशमे बीसम शताब्‍दीक आठम दशक ओहने ऊर्जावान साहि‍त्‍यकारक टोली छल जेहेन वर्षातक पछाति‍ ओस-पाला, गर्दा-धूरासँ स्‍वच्‍छ वायुमंडलक संग अकास रहैए। एक संग हरि‍मोहन बाबू (हरि‍मोहन झा), तंतर बाबू (तंत्रनाथ झा), मधुपजी (काशीकान्‍त मि‍श्र ‘मधूप’), कि‍रणजी (काञ्चीनाथ कि‍रण), मणि‍पद्मजी (ब्रज कि‍शोर वर्मा ‘मणि‍पद्म’), शेखरजी (शुधांशु शेखर चौधरी), योगाबाबू (योगानन्‍द झा), राघवाचार्यजी, (बोध नारायण झा), बहेड़जी (राधाकृष्‍ण झा ‘बहेड़’) आ राधाकृष्‍ण चौधरीजी सन मैथि‍ली साहि‍त्‍यकाशमे दुनि‍याँक सभ दि‍शा देखि‍नि‍हार छला। दार्शनि‍क रहि‍तो हरि‍मोहन बाबूकेँ मैथि‍ली साहि‍त्‍य हास्‍यसँ आगू नै बढ़ए देलकनि‍! एकैसम शदीक मांग अछि‍ जे हुनक समीक्षा मि‍थि‍लाक चि‍न्‍तनधारा, अध्‍यात्‍म दर्शनक कसौटीपर हुअए। तहि‍ना राधाकृष्‍ण जीक इति‍हासक मूल तत्‍वक सेहो। चौधरी जीक इति‍हास समाजमे पाठकक बीच एक नव सोच आ नव दृष्‍टि‍ दैत अछि‍ तँए ओइ दृष्‍टि‍सँ हुनका देखल जाए। भऽ सकैए कि‍छु पोथी हाथ नै पड़ल होन्‍हि‍, मुदा इति‍हासो तँ इति‍हासे छी। जे अखनि‍ तक रज-रजवारासँ आगू नै बढ़ल अछि‍, तैठाम इति‍हासक पूर्णता देखब उचि‍त नै। दुर्भाग्‍य रहल अछि‍ जे अखनि‍ धरि‍क इति‍हास सामाजि‍क ताना-बानाकेँ नीक जकाँ नै ताकि‍ सकल अछि‍। अखनो मि‍थि‍लाक खान-पान आ घर-दुआर अपन आदि‍म स्‍वरूपकेँ बँचौने अछि‍। मात्र देखैक नजरि‍क जरूरत अछि‍। जे मधुपजी पोरो सागकेँ देखि‍ सकै छथि‍ ओ साग खेनि‍हारकेँ नै देखि‍ पबि‍तथि? रहस्‍यमय अछि‍। कि‍रणजी तँ सहजे मैथि‍लीक कि‍रणे छला‍। कठही पैडि‍लक साइकि‍लपर शतरंजी चौपेतले रहै छेलनि‍। शरदक चान जकाँ चमकैत सोभाव। मात्र चाहपर अभ्‍यागती! बीचमे एकटा प्रश्न उठैए, ओहेन टोली आइ कि‍ए ने? साहि‍त्‍यजगतमे जागरण छल, समाजक बीच जि‍ज्ञासा छल जे कि‍ साहि‍त्‍य हमरो छी। कि‍रण जीक स्‍पष्‍ट कहब छेलनि‍, जहि‍ना बजै छी तहि‍ना लि‍खू, जहि‍ना समाजकेँ देखै छि‍ऐ तेहने वि‍षय बनाउ, वएह भेल साहि‍त्‍य। जेहने वि‍चार कि‍रण जीक रहनि‍ तेहने वि‍चार राहुल सांकृत्‍यायन जीक सेहो रहनि‍। हुनको कहब छन्‍हि‍ अपन बात आन आ आनक बात अपने नीक जकाँ बूझि‍ जाइ, वएह भेल ओइ भाषाक व्‍याकरण। भाषाक धाराक अंग भेल शब्‍द। भाषाक धारा ओइसँ वृहत अछि‍। आन भाषा केना आन भाषामे प्रवेश करैए ओ अलग प्रक्रि‍या भेल। मणि‍पद्मजी, सचमुच साहि‍त्‍यक मर्म बूझि‍नि‍हार मणि‍पद्म भेला। ओना अपनो जि‍नगीक अनुभव आ दरभंगा जि‍लाक पुबरि‍या हि‍स्‍साक अखनो कि‍ गति‍ अछि‍ ओइ अनुकूल हुनक सृजन छन्‍हि‍। बेछप साहि‍त्‍यकार। एकभग्‍गू कवि‍ए मात्र नै छला, लोकगाथाक मर्म बुझि‍नि‍हारो छला। आठम दशक उर्वर होइक कारण यएह सभ छला। जहि‍ना आठम दशकक उर्वरता छल तहि‍ना नअम दशक उसराह बनैत गेल, बनि‍येँ गेल। मुदा तैयो साहि‍त्‍यक धार बहि‍ते रहल अछि‍। एकटा बात आरो, आठम दशक ओहेन रहल, जइमे गाम-गाममे हराएल-भुति‍आएल कि‍छु साहि‍त्‍यकार सेहो भेटला। मुदा अखनो बहुत हराएल छथि‍। कि‍छु हेराएलो गेला।
सगर राति‍ दीप जरए, कथा गोष्‍ठीक आयोजनक अवधारणाक जनम कि‍रण जीक जयन्‍तीक अवसरि‍पर लोहना (धर्मपुर)मे एकत्रि‍त साहि‍त्‍यकारक बीच भेल। मुदा साकार भेल प्रभास कुमार चौधरी जीक माध्‍यमसँ। एकटा बात बीचमे, कि‍रणजी सन खोद-बेद केनि‍हारक अवसरि‍ दोसर प्रभासजीक स्‍थापना। बेछप जि‍नगी, बेछप सोच, बेछप सृजन, बेछप नजरि‍ प्रभास जीक। असीम जि‍ज्ञासाक संवेदना रग-रगमे रमल छेलनि‍। जेकर परि‍चए जीवंत रचना अखनो दाइए रहल छन्‍हि‍। साहि‍त्‍यकारक बीच सहमत बनल जे जहि‍ना पंजाबी सहि‍त्‍यमे ‘दीवा जले सारी रात’ कथा गोष्‍ठी भरि‍ राति‍क होइए, तहि‍ना मैथि‍लीओमे हुअए। नव उत्‍साह नव जि‍ज्ञासाक संग प्रभास भाय डेग उठौलनि‍। मनमे छेलनि‍ जे साहि‍त्‍यि‍क धारा समाजक संग चलए। मुदा कि‍छुए साल पछाति‍ मरि‍ गेला।
पहि‍ल कथा गोष्‍ठीक आयोजन मुजफ्फरपुरमे भेल। ओतए प्रभासजी नोकरी करै छला। रेणु जीक अध्‍यक्षतामे गोष्‍ठी भेल। रेणुजी सेहो समाजकेँ नि‍ष्‍पक्ष ढंगसँ देखै छला। तइ दि‍नसँ अखनि‍ धरि‍क कथा गोष्‍ठी मैथि‍ली साहि‍त्‍यक धरोहर पूजी छी। एक तँ कथा गोष्‍ठी दोसर साहि‍त्‍यक मुख्‍य वि‍धा। तँए पहि‍ल संतोनो कहल जा सकैए।
पहि‍ल कथा गोष्‍ठी जनवरी १९९० इस्‍वीमे भेल। पहि‍ल गोष्‍ठीमे कथापाठ केने रहथि‍, रमेशजी- “थाक”, श्रीनि‍वासजी (शि‍व शंकर श्रीनि‍वास)- “वसातमे बहैत लोक”, वि‍भूति‍ आनन्‍दजी- “अन्‍यपुरुष”, अशोक जी- “पि‍शाच”, सि‍याराम सरस जी- “ओहि‍ साँझक नाम”, प्रभासजी- “खूनी”, रवि‍न्‍द्र चौधरीजी सेहो कथा पाठ केलनि‍। तैबीच डा. नन्‍द कि‍शोर जे एल.एस. कौलेजक नीक शि‍क्षक, हि‍न्‍दीमे कथा पाठ केलनि‍। मुदा दुर्भाग्‍य ईहो जे ओ मैथि‍लीभाषी रहि‍तो हि‍न्‍दीमे पाठ केलनि‍। समीक्षको छथि‍। कथाक समीक्षक रूपमे कथाकरक संग रमानन्‍द झा ‘रमण’जी, भीम भाय (भीमनाथ झा), मोहन भारद्वाजजी, जीवकान्‍त, कथा पाठ जीवकान्‍त केलनि‍ आकि‍ नै से जनतबमे नै अछि‍। इत्‍यादि‍ समीक्षकक संग कि‍छु दर्शको रहबे करथि‍।
तेसर कथागोष्‍ठीसँ पोथीक लोकार्पण शुरू भेल, जे बढ़ैत-बढ़ैत दरभंगा गोष्‍ठी शीर्षपर पहुँच गेल। एक संग पौंतीस-चालि‍सटा पोथीक लोकार्पण। निर्मली कथा गोष्‍ठीसँ पूर्व धरि‍ शीर्षपर रहल। निर्मली गोष्‍ठीमे पैंतालि‍‍स-पचासटा पोथीक लोकार्पण भेल। कथा गोष्‍ठीसँ कथाधारामे एक गति‍ आएल, नव-नव रचनाकारक प्रवेश गोष्‍ठीमे होइत रहल, गोष्‍ठी आगू बढ़ैत रहल। मुदा गोष्‍ठीक बीच एकरूपता नै रहल, केतौ एहेन आयोजन भेल जे साँझसँ भोर भेलो पछाति‍ कथाकारक कथा रहि‍ जाइ छन्‍हि‍ तँ केतौ अधरति‍येमे बेवस्‍थापक चाह-पान समेटि‍ लइ छथि‍, खैर जे भेल। साहि‍त्‍य गोष्‍ठी साहि‍त्‍यकारक मंच छी। जइ मंचपर सभकेँ अपन वि‍चार रखैक हक छन्‍हि‍। जखनि‍ सभ कि‍यो मि‍थि‍लाक वि‍कास चाहै छी तखनि‍ मत-मतान्‍तर कि‍ए? कथा गोष्‍ठीक संग कथा-वि‍चार मंचोक तँ जरूरति‍ अछि‍ए। लि‍खैक मानदण्‍ड, समीक्षाक मानदण्‍ड के बनौत? समयानुकूल दृष्‍टि‍ए तँ समसामयि‍के ने जि‍म्मा भेल। समसामयि‍क रचनाकारक रचनाकेँ स्‍तरानुसार सि‍लेबसमे स्‍थान आवश्‍यक अछि‍।     
दुनि‍याँमे पैघ-पैघ शि‍क्षण संस्‍थान जनसहयोगसँ चलि‍ रहल अछि‍, की अपना ऐठाम नै चलि‍ सकैए? एकटा वि‍श्ववि‍द्यालय अछि‍, रेडि‍यो स्‍टेशन अछि‍, ओ केना नीक जकाँ बढ़ि‍ सकए, सबहक जि‍म्‍मा भेल। एकटा वि‍श्ववि‍द्यालय अछि‍, जे सोलहन्नी सरकार दि‍स तकैए, तहूमे लूटि‍क बाढ़ि‍ छइहे, तइसँ केते आशा कएल जा सकैए। मि‍थि‍लामे पाइबला शि‍क्षण प्रेमी नै छथि‍, सेहो बात नै अछि‍। गजेन्‍द्र जीक (गजेन्‍द्र ठाकुर) सम्‍पादनमे नागेन्‍द्र जीक (नागेन्‍द्र झा, श्रुति‍ प्रकाशन) सहयोगसँ केते पोथी प्रकाशि‍त भेल अछि‍ ओ अपने-आपमे एकटा उदाहरण अछि‍। ओना बेक्‍तीगत रूपमे गजेन्‍द्रजीकेँ केना बि‍सरल जाए जे टैगोर पुरस्‍कारमे एँड़ी-चोटी एक केने छथि‍। कोंचि‍न जाइकाल पटना एयरपोर्टपर अपन गाड़ीसँ पहुँचा सभ कि‍छु देखा-सुना दुर्गानन्‍द मण्‍डलक संग वि‍दा केलनि‍। स्‍पष्‍ट सोच छन्‍हि‍ जे आर्थिक दृष्‍टि‍ए कमजोर रचनाकार लोकनि‍क रचना प्रकाशि‍त करब। से करबो केलनि‍ आ करि‍तो छथि‍।
Rounded Rectangle:  अन्‍तमे, बेवस्‍थापक ओम बाबू (ओम प्रकाश झा) निर्मली गोष्‍ठीमे अपन गजल संग्रह नेने लोकार्पण करबए पहुँचला। ओना कि‍छु-कि‍छु पहि‍नौंसँ बूझल छल मुदा चेहरा देखि‍ झुझुआ गेलौं। कि‍छु करैक जि‍ज्ञासा तँ मनमे छन्‍हि‍हेँ। अगि‍ला बात आगू, अखनि‍ तँ अशे धरि‍। अन्‍तमे, अन्‍हरा-अन्‍हरी माए-बापकेँ कन्‍हेठ जहि‍ना श्रवणकुमार चारू धाम देखबए वि‍दा भेला तही आशाक संग अपन दू शब्‍दमे वि‍राम लगबै छी। धैनवाद! जय मैथि‍ली।mmm

Monday, March 24, 2014

मैथिलीमे नव ब्रााह्मणवादपर पहिल बेर समधानि कऽ प्रहार कऎल गेल अछि, यएह कारण अछि जे "राड़केॅ सुख बलाय"क लेखक आ साहित्यिक चोरक (http://esamaad.blogspot.in/2014/02/blog-post_6.html) चमचागिरी करबाक आवश्यकता प्रदीप बिहारी, श्याम दरिहरे आ रमानन्द रमणकेॅ पड़लन्हि।प्रदीप बिहारी, श्याम दरिहरे आ रमानन्द रमणक नव ब्राहम्णवादी षड्यंत्रक शिकार आरती कुमारी पहिने भेली, तइसँ प्रदीप बिहारी, श्याम दरिहरे आ रमानन्द रमणक मोन बहसि गेल।http://sagarraatideepjaray.blogspot.in/2014/02/blog-post_7982.html

मैथिलीमे नव ब्रााह्मणवादपर पहिल बेर समधानि कऽ प्रहार कऎल गेल अछि, यएह कारण अछि जे "राड़केॅ सुख बलाय"क लेखक आ साहित्यिक चोरक (http://esamaad.blogspot.in/2014/02/blog-post_6.html) चमचागिरी करबाक आवश्यकता प्रदीप बिहारी, श्याम दरिहरे आ रमानन्द रमणकेॅ पड़लन्हि।प्रदीप बिहारी, श्याम दरिहरे आ रमानन्द रमणक नव ब्राहम्णवादी षड्यंत्रक शिकार आरती कुमारी पहिने भेली, तइसँ प्रदीप बिहारी, श्याम दरिहरे आ रमानन्द रमणक मोन बहसि गेल।http://sagarraatideepjaray.blogspot.in/2014/02/blog-post_7982.html

श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल जीक लघुकथा ''चैन-बेचैन''। स्‍व. मायानन्‍द मि‍श्र आ स्‍व. जीवकान्‍त केर स्‍मृतमे समरपि‍त 81म ''सगर राति‍ दीप जरए'' (सगर अज्ञानीमे ज्ञानक दीप जरौ) कथा गोष्‍ठी देवघरमे ऐ कथाक पाठ कएल गेल। पाठ करैत फोटो संलग्‍न अछि‍ जइमे मैथि‍लाक अनुपम बेकती श्री ओम प्रकाश झा सेहो छथि‍। फोटो, इन्‍टरनेशनल ई जनरल वि‍देह के सम्‍पादकक वालसँ साभार... -उमेश मण्‍डल।

श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल जीक लघुकथा ''चैन-बेचैन''। स्‍व. मायानन्‍द मि‍श्र आ स्‍व. जीवकान्‍त केर स्‍मृतमे समरपि‍त 81म ''सगर राति‍ दीप जरए'' (सगर अज्ञानीमे ज्ञानक दीप जरौ) कथा गोष्‍ठी देवघरमे ऐ कथाक पाठ कएल गेल। पाठ करैत फोटो संलग्‍न अछि‍ जइमे मैथि‍लाक अनुपम बेकती श्री ओम प्रकाश झा सेहो छथि‍। फोटो, इन्‍टरनेशनल ई जनरल वि‍देह के सम्‍पादकक वालसँ साभार... -उमेश मण्‍डल।


नव हवाक वेगमे गौआँ सभकेँ मन फुड़फुडेलनि‍। फुड़फुड़ेबोक चाही। फुड़फुड़ेलनि‍ ई जे वृन्‍दावनमे गीताक जानकार ज्ञानी दास छथि‍, हुनकासँ पनरह दि‍न प्रवचन करौल जाए। गामक धर्मक काज तँ गौंएक भेल तँए सबहक भागीदारी होइ। अद्रा नक्षत्रक मेघ जकाँ समाजमे हुमरल। ओना ज्ञानी दास भागवतो आ गीतो-रामायण कहि‍ते छथि‍ तँए हुनके आनल जाए। चंदाक गुम-गुमी चलि‍ते छल आकि‍ एक गोटे बाजि‍ गेला-
“सोलहन्नी खर्च देब, अहाँ बेवस्‍था करैक भार लि‍अ।”

मुदा प्रस्‍तावपर सहमत नै बनल ‘जेकर चून तेकर पून’ भऽ जाएत। तखनि‍ ई हुअए जे ‘चंदा सौंसे गामसँ हुअए आ जे घटतै ओ देथुन।’
मुदा बि‍च्‍चेमे दोसर प्रश्न उठि‍ गेल जे घटतै तखनि‍ ने ओ देथुन मुदा जँ बढ़ि‍ जाए। घमरथन शुरू भेल, होइत-हबाइत फेरि सहमत बनल जे धर्मोक काजक कि‍ कमी छै, फेरि‍ दोबरा कऽ भऽ जाएत।
ज्ञानी दासक आगमन भेलनि‍। प्रवचन शुरू करैसँ पहि‍ने सामूहि‍क रूपे सभकेँ पूछि‍ लेलनि‍ जे भागवत सुनैसँ पहि‍ने गीता सुनि‍ लेब नीक हएत। ज्ञानी दासक प्रश्नपर घौंचाल शुरू भेल। घौंचाल ई जे नीक-अधला तँ वएह ने बूझि‍ सकैए जे दुनूकेँ जनैत होइ। जइ गाममे कहि‍यो भेबे ने कएल, तइ गाममे नीक-अधला कथी हएत। नीक हएत जे हुनकेपर माने ज्ञानीए दासपर छोड़ि‍ दि‍यनु, जड़ि‍सँ कहथि‍न।
कौलेजमे पढ़ैत रमेशकेँ इन्‍टरनेशनल वेपारी जकाँ बेसी लाभ बूझि‍ पड़ल। बेसी बुझैक कारण जे गीताक कर्म-ज्ञान जोगक बात घरे बैसल बूझि‍ लेब, सेहो समाजक बीचमे, तहूसँ नीक जँ परि‍वेशक अनुकूल प्रवचन होइ तँ सभसँ नीक। स्‍कूल-कौलेजक वि‍द्यार्थी जकाँ रमेश प्रवचन शुरू होइसँ दस मि‍नट पहि‍ने पहुँच गेल। पहि‍लुके प्रवचन सुनि‍ रमेशक मन जि‍नगी जीबैले तेना उताहुल भऽ गेलै जे नअ बजे राति‍मे जखनि‍ घरपर घुमती अबै छल तइ बि‍च्‍चेमे तीन बेर सप्‍पत खेलक। पहि‍ल सप्‍पत सुनि‍ते काल खेने छल जे ‘आइसँ जीवन-पद्धति‍ बदलि‍ लेब।’
घरपर आबि‍ रमेश मने-मन संकल्‍पो अजमाबै आ खाइओ ले गेल। गुम-सुम। जहि‍ना संकल्‍पी खेबा काल नै बजै छथि‍ तहि‍ना तीत-मीठक बात रमेश कि‍छु ने बजैत।
जहि‍ना कोयला-पानि‍ इंजनमे पड़ला पछाति‍ शक्‍ति‍क संचार हुअए लगैत तहि‍ना रमेशोक मनमे हुअए लगल। बि‍नु लछनक अनेको वि‍चार बर्खाक बुलबुला जकाँ उठै आ फुटै। दुनि‍याँ दि‍ससँ सूत ससारि‍, जलि‍वाहक जाल जकाँ, पत्नीपर एकाग्र केलक। साल भरि‍ पहि‍ने दुरागमन भेल। जेते काल पीढ़ीपर बैसि‍ भोजन करै छी जँ तेतबो काल दुनू परानी बैस वि‍चारी जे भोजनक कि‍‍ प्रयोजन जि‍नगीमे अछि‍, केना जुटा पएब? मुदा से कहाँ होइए। बुझलो बात, परि‍वारक हि‍साबसँ सि‍दहा लगै, जँ खेला-पीला पछाति‍ समगम भऽ जाए तँ नीक-बेजाए पुछैक प्रयोजने की? अधला जँ बनल रहैत तँ खेनि‍हारेक काजसँ ने पता चलि‍ जाइत। एक तँ अहुना चाहक दोकान जकाँ उलझल अछि‍ जहि‍ना एक केतलीमे बनल चाह एक रंग हएत, मुदा पीनि‍हार रंग-रंगक, तैबीच नीक-अधला बनबे करत। कि‍यो मीठगर पीबैए, तँ कि‍यो गाढ़ लीकर। तहि‍ना परि‍वारोमे अछि‍ए, कि‍यो मीठ नोन खेनि‍हार तँ कि‍यो नोनगर। वि‍चारक वि‍रामो नै भेल छेलै आकि‍ दोसर वि‍चार रमेशक मनमे उठि‍ गेलै। उठि‍ गेलै जे पुरुख सवल होइ छथि‍ आ नारी अवल। एहेन स्‍थि‍ति‍मे अवलकेँ केना सवल बनौल जाए? मुदा अवल सवल बनै-बनबैसँ पहि‍ने सवल अवलक बाट देखए पड़त। केना अवल आ केना सवल मानल जाए। रंग-रंगक अवलो होइए आ रंग-रंगक सवलो होइए। ज्ञान, धन, जन, मन सेवा तँ बीचमे अछि‍ए। पानि‍-मक्‍खन मि‍लल दूध घोड़ाएल घोड़ जकाँ रमेशक मन घोर-घोर भऽ गेल। बाजल कि‍छु ने चुपचाप खा कऽ ओछाइन ि‍दस बढ़ल।
ओछाइनपर अबि‍ते रमेशक मन रमेशकेँ पुछलक-
“जीवन पद्धति‍ की?”

जहि‍ना रोगक घरमे, अगि‍लगुआ घरक, पेटजरूआक नीन पड़ा जाइ छै तहि‍ना रमेशक नीन पड़ा गेल। पानि‍क बुलबुलामे इन्‍द्रधनुषी रंग देखैत मुदा लगले फुटि‍ गेने छि‍ड़ि‍या जाइ। कछ-मछ करैत ओछाइनपर लगले-लगले कर फेड़ैत। नीन अबैक केतौ दरस नै। फेर ज्ञानी दासक प्रवचनपर पहुँचल। आइसँ जीवन बदलत? मुदा जँ नीने अबैबेर नीन नै औत, आ जगै बेर नीन चलि‍ आैत तखनि‍ जागब केना? दस बजेक समए भऽ गेल, बारह बजे राति‍क पछाति‍ दि‍नक आगमन भऽ जाइ छै। करि‍याएल-कजड़ाएल अन्‍हारमे सुरूजक रोशनीक प्रवेश हुअए लगै छै। जि‍नगी बदलैक पाछू समए तँ पकड़ए पड़त। जँ से नै पकड़ाएत तँ जि‍नगी केना पकड़ाएत। राति‍क बारह बाजल। देवालमे टाँगल घड़ीकेँ देखि‍ते रमेश उठि‍ कऽ बैस गेल। घड़ीक सुइया नाचि‍ रहल छै। बारहक अन्‍त भऽ गेल मुदा रमेशकेँ अन्‍हारमे कि‍छु देखि‍ए ने पड़ैत जे की करत? अन्‍हार-अनहेरसँ भरल दुनि‍याँ। कोठरीक बीच लालटेनक टि‍मटि‍माइत इजोतमे रमेशकेँ कि‍छु सुझि‍ए ने रहल अछि‍ जे डेग केमहर उठौत। समैक संग घड़ीक सुइया नाचि‍‍ रहल अछि। घंटा-डेढ़ घंटा बीति‍ गेल मुदा रमेशकेँ कि‍छु फुड़ाएल नै! घरसँ बाहर कि‍छु करैक अनुकूल नै अछि‍ घरक भीतर काज नै अछि‍ तखनि‍? अतस-बि‍तस करैत वि‍चारलक, जे इजोत अछि‍ तेहीमे ने कि‍छु करैक जगहो अछि‍। ठमकि‍ते मनमे उठलै- लीढ़ वा समाढ़सँ भरल पोखरि‍मे केना स्‍नान कएल जाए? सोचैत-वि‍चारैत तँइ केलक जे जेते पानि‍क जरूरति‍ अछि‍ तेते दूरक घाटक लीढ़-केचली-समाढ़ हटा देने तँ नहाइक काज भाइए सकैए। मनमे आशा जगलै, आशा जगि‍ते वि‍चारल, जाबे‍ सुरूज धरतीपर देखाइ नै देत ताबे तक लालटेनेक इजोतमे पढ़बो करब आ पढ़लाहाक रस नि‍चोड़ि‍ लि‍खबो करब। काजक नक्‍शा बनि‍ते रमेशक मन प्रसन्न भेल।
पोथी खोलि‍ रमेश पढ़ब शुरू केलक। एक तँ जगरनाक आँखि‍-मन तैपर वि‍षयक गंभीरता, चाह पीबैक मन भेलै। बढ़ैत-बढ़ैत मन छुछुअए लगलै जे कखनि‍ चाह भेटत जे पीब। जहि‍ना बाढ़ि‍क पानि‍ नि‍च्‍चाँ दि‍स एकमुहरी बहए लगैए तहि‍ना चाहक भुख एकमुहरी भऽ गेलै। मुदा एते राति‍मे चाह औत केतएसँ। जँ पत्नीकेँ उठा चाह बनबए कहि‍यनि‍ तँ ओ रपटि‍ कऽ कहबे करती जे चाह कोन नीक पेय छी जे एती राति‍मे पराण छुटैए। पराण तँ नै छुटैए मुदा काजो तँ आगू नहि‍येँ कऽ पाइब सकै छी।
असोथकि‍त भऽ रमेश निर्णए करैत बाजल-
“काजक दौरमे जइ-जइ वस्‍तुक जरूरति‍ होइए ओकर ओरि‍यान शुरू करैसँ पहि‍ने जँ कऽ नेने रहब तखने ओइ काजकेँ बि‍सवासू बना सकै छी। नै तँ अभावगक आगि‍ मनकेँ थीरे ने हुअए देत।”

दोसर दि‍न जानिए कऽ प्रवचन सुनए रमेश नै गेल। अपने मन धि‍क्काड़ैत रहै जे जेतबो सुनि‍-बूझि‍ करैले डेग बढ़ेलौं, से तँ समहरि‍ए ने रहल अछि‍ आ तैपर सँ आरो सुनि‍ माथकेँ भरि‍याएब नीक नै।¦¦¦

रचनाक अंति‍म रूप ०९ मार्च २०१४

82म “सगर राति दीप जरय” कथा गोष्ठीक हकार

हकार
82म “सगर राति दीप जरय” कथा गोष्ठीक आयोजन मेंहथमे 31 मइ 2014 शनि दिन भऽ रहल अछि। ई आयोजन मेंहथमे 31 मइ 2014 संध्या ५ बजे सँ शुरू भऽ कऽ 01 जून 2014 भोर धरि हएत। ई विशुद्ध रूपसँ बाल कथा (विहनि आ लघु कथा) विशेषांक रहत। संयोजक- गजेन्द्र ठाकुर। अहाँ सभ कथाकार बाल कथा (विहनि आ लघु कथा)क संग सादर आमंत्रित छी।- आयोजक – गजेन्द्र ठाकुर

Sunday, March 23, 2014

८१म सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठीक आयोजन देवघरमे २२ मार्च २०१४ शनि दिन संध्यासँ २३ मार्च २०१४ रवि दिन भोर धरि सम्पन्न। ई आयोजन देवघरमे बमपास टाउन स्थित "बिजली कोठी" नम्बर ३ मे श्री ओम प्रकाश झा जीक संयोजकत्वमे सम्पन्न भेल। ८२ म सगर राति ३१ मइ २०१४ केँ मेँहथ गाममे हएत। ई विशुद्ध रूपसँ बाल कथा (विहनि आ लघु कथा) विशेषांक रहत। संयोजक- गजेन्द्र ठाकुर।

८१म सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठीक आयोजन देवघरमे २२ मार्च २०१४ शनि दिन संध्यासँ २३ मार्च २०१४ रवि दिन भोर धरि सम्पन्न। ई आयोजन देवघरमे बमपास टाउन स्थित "बिजली कोठी" नम्बर ३ मे श्री ओम प्रकाश झा जीक संयोजकत्वमे सम्पन्न भेल।
८२ म सगर राति ३१ मइ २०१४ केँ मेँहथ गाममे हएत। ई विशुद्ध रूपसँ बाल कथा (विहनि आ लघु कथा) विशेषांक रहत। संयोजक- गजेन्द्र ठाकुर।