आन्हर

हाइ स्कूल, झंझारपुर,
केजरीवालमे पढ़ै छी। बेसी विद्यार्थी कौमर्स पढ़ैए। हम अर्थशास्त्र पढ़ै
छी।
इन्द्रपुजाक हलहोड़िमे
माएसँ ठकि कऽ पचास रूपैआ लऽ लेलौं। खेबो-पीबो केलौं, रामहिलोरोपर चढ़लौं मुदा
कदमक झूला छूटि गेल। पाइए सठि गेल। होटलो की आब ओ होटल रहल जे छअ आनामे भरि पेट
दालि अल्हुआ भेटैत।
पचासो रूपैआक हिसाब माए
बाबूकेँ दऽ देलकै। साँझमे जखनि मलड़ैत गामपर एलौं आकि बाबू पुछलनि-
“कोन-कोन किताप लेलँह?”
बाबू लग झूठ नै बजै छी, मुदा
ई नै बुझै छी जे सतो-सभटा बजले जेतै। जेना-जेना खर्च केलौं खोलि कऽ कहि देलियनि।
तमसेला नै मुदा तमसाएल बात कहला-
“आन्हर छेँ, अन्हारमे अनहेर होइ
छै। ओइ अनहेरमे परमेँ तँ अनेरे अन्हरा जेमे। कान पकड़ि ले।”mmm
अखिलेश कुमार मण्डल
बेरमा, मधुबनी।
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