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Friday, May 31, 2019

बुढ़ भेलौं तँ दुइर गेलौं_Jagdish Prasad Mandal_बेरमा, मधुबनी_सम्पादन एवम् संकलन- Umesh Mandal


बुढ़ भेलौं तँ दुइर गेलौं
ओछाइनपर सँ उठले रही कि जीबछ भाय दरबज्जाक आगूमे खखास केलैन। ओना, खखाससँ नहि बुझि पेलौं जे जीबछ भाइक खखास छिऐन मुदा घ्वनिसँ बुझि पड़ल जे अकासक उड़ैत टिटहीक छी, तँए केतौ बिसाएत..! मुदा लगले ईहो भेल जे अकासक टिटहीक अबाज दोसर रंग होइ छै से तँ छी नहि। मने-मन गुनधुनाइतो रही आ डेगे-डेग ससैर कऽ बाहरो एलौं। जीबछ भायपर नजैर पड़िते बजलौं-
जीबछ भाय! भोरे-भोर अहाँक दर्शन भेल, औझुका दिन शुभ रहत।
जीबछ भाय अपनाकेँ शुभदाता बुझि विचारलैन आकि शुभ घटनाक आबाही बुझि से तँ जीबछ भाय जनता, मुदा एतबे बजला-
बौआ, कमरसाइरसँ घुमैतकाल राधेश्याम काका भेँट भेला। दरबज्जेपर बैसल रहैथ, देखते सोर पाड़लैन। असथिरसँ लगमे जा पएर छुबि गोड़ो लगलयैन आ मुहोँसँ बजलौं।
तइ समयमे राधेश्याम काकाकेँ ब्लड-पेसरक झोंक एलैन आकि ओहिना अपन मन धधकलैन से राधेश्यामे काका ने जनता। मुदा एतबे बजला-
बुढ़ भेलौं तँ दुइर गेलौं।
कहि चुप भऽ गेला। की जवाब दैतिऐन। जिनगी भरि पोथी-पुराणक बीच जिनगी गुजारलैन ओ आ कौल्हुका छौंड़ा भऽ कऽ की जवाब दैतिऐन। मुदा चुल्हिमे जहिना मिझाएल-पझाएल आगिकेँ खोंरनीसँ बाहर निकालि चुल्हिमे जारन देलासँ जहिना आगिक बढ़बारि होइए तहिना बजलौं-
काकाजी!”
काकाजीसुनि राधेश्याम कक्काक मन जेना ठमकलैन। मुदा व्यग्रताक उग्रता जे मनमे पजैर गेल छेलैन ओ ओहिना लहलहा रहल छेलैन। बजला-
बौआ, एकटा विचार पुछै छिअ।
राधेश्याम कक्काक विचार सुनि मनमे भेल जे हम कहियाक विचारी हिनकर रहलौं जे हमरासँ विचार पुछता? फेर मनमे भेल जे विचारक माने एतबे नइ ने होइए जे कोनो गम्भीरे विषयक विचार हुअए, ओ तँ साधारण नून-तेलक जे दाम बढ़ैए तेहनो होइए।
विचार बुझैक मन बना राधेश्याम काका दिस नजैर उठेलौं। नजैर-मे-नजैर मिलिते राधेश्याम काका बजला-
हमर की गति हएत?”
हमर की गति हएतराधेश्याम काका सन लोकक मुहेँ सुनि मनमे पथराएल चोट जकाँ झाँइ-दे लगल। की राधेश्यामे काकाटा एहेन परिस्थितिमे फँसि गेल छैथ आकि समाजमे हिनका सन-सन आरो लोक छैथ? हमर की गति हएत, गतिक माने समयसँ लगौल जाइए जे दिशा भेल। मुदा दिशाक दशा जे अछि सेहो तँ हेबे करत किने। ओना, ई बुझल अछिए जे राधेश्याम काका अढ़ाइ-तीन घन्टा पूजापर सेहो बैसनिहार छथिए। भलेँ पूजाक सामग्री जुटबैमे तबाही किए ने होइत होनु, ई दीगर भेल...।
विचारकेँ सानि-बाटि बजलौं-
काका, अपना केने थोड़े किछु होइए, सभ ऊपरकाक हाथमे छैन। जाइ छी। हुनकर जेहेन मरजी रहतैन तेहने ने अरजियो लेता।
ओना, हम अपन जान छोड़बैत निकलए चाहै छेलौं मुदा राधेश्याम काका गम्भीर भऽ गेला।
जीबछ भाइक विचारमे डुमए लगलौं। जेते डुमैत जाइ तेते जेना इजोत भेटल जाए..! बजलौं-
भाय! भिनसुरका समय छी, अखने सुति कऽ उठलौं हेन। अहाँ बहन्ने हमरो पत्नी बिस्कुटो खुऔती। चाह पीब लिअ।
ओना, जीबछ भाइक मनक तनतनीसँ बुझि पड़ि रहल छल जे बजैक इच्छा जोर मारि रहल छैन। चाहक नाओं सुनि जीबछ भाय बजला-
पहिने एक गिलास पानि पीआबह, पछाइत चाह पीब।
जहिना सबहक पत्नी पतिक गप-सप्पक कनसोह लइए आकि अतिथि-अभ्यागतक आगमन देख खिड़की लग ठाढ़ भऽ सुनैए तहिना पत्नी एक गिलास पानि सुनि लगले नेने पहुँचली। हाथमे पानि देखते पत्नीकेँ कहलयैन-
एक लोटा हमरो दऽ जाएब। कुर्ड़ो कऽ लेब आ पीबियो लेब।
ओना, मने-मन पत्नी कुड़बुड़ेली मुदा मुँह खोलि बजली किछु ने। अपने तँ पत्नीक कुड़कड़ाएब कनी-मनी बुझियो गेलौं मुदा जीबछ भाय बुझला कि नइ बुझला से तँ वएह जनैथ। अपनाकेँ निर्बल-निश्चल बनबैत जीबछ भाय बजला-
बौआ, अपन हारल आ बोहुक मारल बुड़िबकहा तँ बकि लइए मुदा काबिल लोक थोड़े मुँह खोलि बजता। ओ तँ कहबे करता किने जे सभ बात सभठाम नइ ने बाजल जाइए। आ जँ सएह भेल तँ बुड़िबक-काबिलमे अन्तरे की भेल।
जीबछ भाइक बात सुनि मनमे जेना उत्कंठा जगल तहिना भेल। बजलौं-
से की भाय साहैब?”
संजोग बनल, पत्नी चाह नेने पहुँचली। जीबछ भाय आ अपनो पानि पीबिये नेने छेलौं। जीबछ भाइक मन जेना उड़ी-बिड़ी लगल होनि तहिना बुझि पड़ल। मुदा तैबीच चाह हाथमे चलि आएल रहैन। एक घोँट चाह मुँहमे लइते बजला-
बौआ, राधेश्याम काका बड़-बड़ लीला राज मोरंगमे केने छैथ..!”
एक दिस जीबछ भाइक चेहराक उदासी नजैरसँ देख पड़ैत रहए आ दोसर दिस मनचोभिया नाचक साजक संग अबाज दऽ रहला अछि! जरूर किछु रहस्यमय विचारमे छैन। मुदा से टोकचाल केने बुझबामे गड़बड़ा जाएत। किए तँ कोन विचार जीबछ भाइक मनमे रहस्यपूर्ण भरल छैन, से अपने केना बुझब। बकटेँट जकाँ किछु-सँ-किछु बाजि देब जेकर जवाब दइमे जीबछ भाय लगि जेता, जइसँ अपन मनक बात मनेमे गराएल रहि जेतैन। पोचारा दैत बजलौं-
भाय साहैब। अहॉं सभतरहेँ श्रेष्ठ छी, अखने किए जिनगी भरि अहाँ सोझहामे हम बाले-बोध बनल रहब। अहाँ पढ़लो-लिखल बेसी छी, घुमबो-फीरबो बेसी करै छी आ काजो बेसी केनहि छी। तैसंग अपन एते नमहर कारोबार सम्हारिये रहल छी।
अपन इमनदार-जिनगीक बात सुनि आकि हमरा मुँहक सत् बात सुनि जहिना पहाड़क झरनाक झहरैत पानि धरतीमे उतैर धीरे-धीरे निर्बल-निश्चल हुअ लगैए तहिना जीबछ भाय निश्चल होइत बजला-
बौआ, राधेश्याम काकाकेँ हम तीन पुस्तसँ जनै छिऐन। साधारण किसान गौरी बाबा छला। माने राधेश्याम कक्काक पिता। जहिना सबहक मनमे अपन अपन-अपन अराधक प्रति आराधना होइए तहिना गौरी काका मनमे बेटाकेँ सज्ञान बनबैक आराधना अराधि एम.ए. पास करौलैन। बेटाकेँ पढ़बैत-पढ़बैत बीघा भरि खेतो बिका गेल छेलैन। मनमे आशाक मोटरी बन्हले छेलैन जे बेटा पढ़ि-लिख लेत तँ अपन जिनगी अपना ढंगे जीबैक लूरि-बुधि भइये जेतइ। तइले अनकर आशा थोड़े रहतै। ओ तँ ओतबे काल अछि जेत्तेकाल नइ भेल अछि।
बजैत-बजैत जीबछ भाय चुप भऽ गेला। अपना बुझि पड़ल जे भरिसक जीबछ भाय किछु बात बिसैर रहला अछि, जनु तेकरे मन पाड़ैले बीचमे रूकला अछि। बजलौं-
भाय साहैब, एकबेर आरो चाह पीब?”
चाहक नाओं सुनि जीबछ भाय बजला-
बौआ, चाहे ने चाह पैदा करैए ओत्ते चाह मनमे बैसले अछि जे कोन रूपे तोरा बुझा सकब, सहए ने मन थीर भऽ रहल अछि।
अपनो मन कनी-मनी अकछाए लगल। बजलौं-
भाय साहैब, शॉर्ट-कटमे कहियौ।
जीबछ भाय बजला-
राधेश्याम काका प्रगतिशील विचारक लोक छैथ, अपना पाँचो बेटाकेँ अपना जकाँ संस्कृत विद्यालयसँ नहि जोड़ि अंग्रेजी विद्यालयसँ जोड़लैन। अपन उठाइन सेहो भेलैन। विद्यालयक उठाइन भेने, परिवारो आ बालो-बच्चाकेँ पढ़बै-लिखबैमे कहियो कोनो अभाव नइ भेलैन। पाँचो बेटामे एकटा डॉक्टर, दूटा इंजीनियर आ दूटा अफसर बनि जहाँ-तहाँ नोकरी करै छैन। पाँच बरख पहिने विद्यालयसँ रिटायर भेला। अपन कीनल जमीन, तइमे लगौल आमक गाछी, अपन खुनौल दस कट्ठाक पोखैर, तैसंग अपन बनौल दू-मंजिला घर वस्तु-जातसँ सजौनहि छैथ भलेँ समाजक बीच समाजिकता नहियेँ सजौलैन, से छोड़ि बेटाक संग रहैमे असोकर्ज छैन्हे। तँए टिटही जकाँ दुनू परानी रहै छैथ। शरीर घटने रंग-रंगक बिमारीक दाब जहिना पड़ि रहल छैन तहिना करताइतिक अभावे कष्ट सेहो भइये रहल छैन।
जीबछ भाय जेत्ते बजला तेते तँ अपने नइ बुझल छल मुदा किछु-किछु देखल-सुनल तँ अछिए। मन थकथका गेल जे की बाजूँ।
जीबछ भाय दोहरबैत बजला-
राधेश्याम काका जे कहला बुढ़ भेलौं तँ दुइर गेलौं’, से अपने ने जनबो करता जे भोगबो करता। बुढ़ भेलौं तँ दुइर गेलौं आकि बुइड़ गेलौं। से तँ अपने मन ने कहैत हेतैन।
q शब्द संख्या : 1086, तिथि : 04 मार्च 2019

धुआ साड़ी_Jagdish Prasad Mandal_बेरमा, मधुबनी_सम्पादन एवम् संकलन- Umesh Mandal


धुआ साड़ी
जिनगीक पचपनम बर्खमे आइ कीर्त्तिनाथ स्वाधीन-जिनगीक साँस लेलैन। पाँच बजे भोरक समय, कीर्त्तिनाथक नीन टुटि गेल छेलैन मुदा ओछाइनेपर पड़ल छला। नीन टुटिते अनायास मनमे अपन स्वाधीन-जिनगीक भविसक विचार खसलैन। ओछाइनपर सँ उठला पछाइत जिनका जे जीवन क्रिया सबहक रूप मनमे अबैए, कीर्त्तिनाथकेँ से नइ एलैन, ओछाइनपर पड़ले-पड़ल अखन धरिक जिनगी मनमे धमैक उठलैन। धमैकते मन कहलकैन, ‘आइ समाजमे हम ओहन बेकती छी जे समाजकेँ सभ दिन सेवा करैत एलौं, मुदा से केते लोक बुझि रहल छैथ। रंग-बिरंगक लोकक बीच बनल समाज अछि, समाजमे जहिना समाजक एक टुकड़ी लेल नीक सेवा तहिना दोसर लेल नीक कुसेबो भइये जाइए, तैठाम समाजक बीच आड़ि-मेड़ तँ पड़िये जाइए आ मुँह फुल्ला-फुल्लीसँ लऽ कऽ केस-मोकदमा, मारि-पीट, गारि-गरौवैल सेहो होइते रहैए। तँए नीक-बेजाए-क बीच जीबैले मजबूरन लोक बाध्य भइये जाइए..!’
कीर्त्तिनाथक मन समाजक रमझौआसँ आगू बढ़ि अपन भविसक राम-धाम दिस विदा भेलैन। जिनगीक अन्तिम पड़ाव तकक कुघट सीढ़ीक अन्तिम सीढ़ी कीर्त्तिनाथ काल्हि टपि गेला। काल्हि तकक जिनगी जे अनेको छान-बान्हमे पड़ल छेलैन, रसे-रसे ओ सभटा मनसँ पड़ा गेलैन। माने, पैंतीस साल पूर्वमे भेल अगिलग्गी केस[i]क फैसला काल्हि भेल। ओइ केसक जे मुद्दइ छैथ ओ एकटा विधवा हरिजन, जनिक उम्र अस्सी बर्खसँ ऊपर छैन। ओना, कीर्त्तिनाथकेँ खाली बुझलेटा छेलैन जे एक खण्ड धुआ साड़ी रंगिया लेत तखन ओ कोर्टमे अपन विचार नकारत। सएह भेबो कएल। ओछाइनेपर पड़ले-पड़ल कीर्त्तिनाथ मनमे रोपि नेने छला जे घरसँ निकलला पछातिक पहिल काज यएह भेल जे रंगियाकेँ पुछबै- अपन जे जिनगी गमेलौं से तँ गमेबे केलौं, जे अनको कम रगड़ा नइ देलिऐ मुदा तइसँ भेटल की?’
अपन विचारकेँ कर्मक दिशामे बढ़िते कीर्त्तिनाथक मनमे खुशीक लहर लहैर उठलैन। बदलैत-बदलैत कीर्त्तिनाथक विचार तेना बदलए लगलैन जे अपन जिनगीक हर रूपमे बदलावक झलकी उठए लगलैन।
ओछाइनपर सँ उठि कीर्त्तिनाथ अपन नित्य-कर्म दिस बढ़ैत पत्नीकेँ कहला-
बहुत काज सभ अछि तँए चाह ओतेकालमे जरूर बना लिअ जेतेकालमे हम मुँह-हाथ धोइत नित्यकर्मसँ निवृत्त हएब।
ओना, अखन धरि कीर्त्तिनाथकेँ जेहेन प्रेमस्वरुप पत्नीक बेवहार हेबा चाही तइमे कमी जरूर रहलैन, जे बात कीर्त्तिनाथ तहेदिलसँ बुझितो छैथ मुदा ऐगला उलझनक आगू पत्नीक बेवहारकेँ गौण बुझि मनमे दाबि कऽ रखने रहला। एकाएक उगैत समस्याकेँ देख कीर्त्तिनाथक मन हरहरा कऽ ठमकए लगलैन। एकर कारण भेल जे बाहर निकलैसँ पूर्व सभसँ पहिने परिवार आ परिवारक समस्या आगू अबैए, मुदा तोहूसँ पहिने अपन मन-बुधिक अनुकूल अपन वैचारिक समस्या सेहो रहिते अछि। माने भेल जे कीर्त्तिनाथक मनमे रंगियासँ जे पुछैक विचार छैन तइसँ पहिने पत्नीक जे अखन धरिक बेवहारक कमी आँखिक सोझमे रहलैन, नजैर तैपर पड़लैन।
पत्नीक बेवहारपर नजैर दौड़बैसँ पहिने कीर्त्तिनाथ अपनापर अपने नजैर नजरौला तँ अपनो दोख ओहिना बुझि पड़लैन जहिना आन-आनमे देख रहल छला। एकाएक मनमे हरहरा कऽ अखन धरिक सभ किछु हारल-हारल सन बुझि पड़लैन। सभठाम जखन दोखे-दोख अछि, तैठाम दुख बाँटब कि मेटब बाल-बोधक खेल थोड़े छी। तलावक तलावमे आकि धारक मोनिमे बसैबला गोहिक मुँह जहिना गहुआएल रहैए तहिना ने सभठाम सभमे अछिए..!
कीर्त्तिनाथक मनमे अपन जिनगी अपना अनुकूल जीबैक संकल्प जगलैन। तेकर कारण ई भेल जे जइ स्तरसँ समाजकेँ नजैरमे रखि सेवा भावना जगेलौं ओइ स्तरक समाज वैचारिक रूपमे नइ छल। ओना, एहनो होइते अछि जे परती-परात जमीनकेँ खिलतोड़ होइते ओइमे ठेकानोक वा बेठेकानोक जँ कोनो बीआ छीटबै तँ ओ धुधुआ कऽ जनैमते अछि, समाजोक बीच तहिना तँ होइते अछि।
नव जागरणक भोर, कीर्त्तिनाथक छैन्हे तँए अपन जिनगीक मोड़ केतए-केतए छैन आ पत्नीक बीच केतए छैन, ओइ मोड़केँ मोड़ैक की उपाय अछि इत्यादि-इत्यादिपर नजैर दौड़ए लगलैन। जे कीर्त्तिनाथ आजुक पहिल काज रंगियासँ पुछैक विचार मनमे केने छला ओ मनेमे दबा गेलैन आ पत्नीक पैछला जिनगीक बेवहारपर नजैर दौड़ैक उपक्रम करए लगलैन। मुदा पत्नीपर नजैर दौड़बैसँ पहिने कीर्त्तिनाथ अपनापर दौड़ौलैन तँ बुझि पड़लैन जे दोख अपनो अछि। पत्नीक मनकेँ कहियो अपना मनमे पूर्णरूपेण मिलए नहि देलिऐन जइसँ सभ दिन खण्डित रहली। की जानिकऽ नहि मिलए देलिऐन आकि परिस्थितिवश बधो छल..? समाजक बीच फँसल परिवर्त्तनक रणक्षेत्र, जइमे समाज दू फाँक भऽ दुनूकात ठाढ़ भऽ गेल! तैठाम अपन की दायित्व बनैए? एहेन परिस्थितिमे परिवार अभावग्रस्त हेबे करत, जे पति-पत्नीक मनक दूरी बनबैक मूल कारण सेहो बनबे करत किने। खाएर जे भेल ओ काल्हि धरिक जे परअधीनक जीवनमे छेलौं तँए भेल। आइ स्वाधीन-जिनगीक सीमापर ठाढ़ छी, तँए विचारशील बाट पकैड़ चलैक अछि। अन्हा-गाहींस जँ जिनगीकेँ चलाएब तँ ओ कहियो थीड़ी-थमन नइ हएत।
नव भोरक नव विचारक फुलवाड़ी दिस कीर्त्तिनाथ विदा भेले छैथ तँए अपन पछुआएल जिनगीक हारि-जीतक झोराकेँ कन्हासँ उतारि, नव संकल्पक संग अपन जिनगीकेँ संकल्पित बनबए लगला।
अखन धरि नमहर-नमहर काजक संकल्पकथा कीर्त्तिनाथक मनमे उगडुम करिते छेलैन। परिवारक बीच क्रियाशीलता अनैमे पहिने अपन समैयक क्रियाशीलतासँ जोड़ए पड़ै छइ। कीर्त्तिनाथक मनमे एकाएक उठलैन- ओछाइनसँ उठि पहिल डेगक बीच छी, जहिना पत्नीकेँ चाह बनबैक काजमे बान्हि देलिऐन तहिना अपनो चाह बनबैक समय बुझिते छी, तेतबे समय ने अपनो अपन नित्य कर्मसँ निवृत्त हेबाक भेल। तैबीच जँ अपने मुँह तकैत पत्नीक डेग-डेगकेँ गिनए लगब तखन अपन जिनगीक क्रिया की भेल? खाएर जे भेल से भेल, ओ तँ पति-पत्नियेँक बीचक बात भेल किने, तँए नान्हिटा भेबे कएल। किएक तँ दुनू गोरे मड़बापर बैस आगि-पानि छुबि शपथ खेनहि छी जे दुख-सुख काटि ता-जिनगी संगे रहब। देखते छी, तीन दिनक संगी जे कोनो रस्ता-बाटक होइए तइमे तँ लोक हेरा-फेरी करि रक्का-टोकी करबे करैए जे तूँ चोर ते तूँ चोर मुदा तइयो–कहितो-कहितो–तँ संग मिलि रस्ता कटिते अछि। ऐठाम तँ सहजे अपन घरक बात भेल। ओना, पत्नियोँ कनसोहवाली छथिये। कोर्टमे केसक फैसला होइसँ पहिनहि बुझि गेल छेली जे केस हमहीं सभ जीतलौं। माने हमरे पार्टी जीतल। एकर गदगदी मनमे रहबे करैन, जइसँ कोर्ट-कचहरीक हवा-पानिमे पत्नीक विचार फँसले रहैन तँए पतिक आदेशकेँ ओही रूपमे क्रियान्वित केलैन।
चाह पीब कीर्त्तिनाथ जखने घरसँ विदा भेला कि अपन इतिहासक संग पैछला समाजोक इतिहास आँखिक सोझमे एलैन। रंगिया गामक बेटी छी, मात्र दूटा सन्तान भेला पछाइत वेचारी विधवा भऽ गेल। पाँच हाथक हरगर-लमगर देह-दशा छेलइ। बुधिसँ रंगिया ओत्तै छल जेतए जिनगी भरि बकरी चरौनिहार-चरौनिहारिक रहै छइ।
पैंतीस-चालीस बर्ख पूर्व मिथिलांचलमे जमीन्दारीक जाल-फाँस तोड़ैक जोरदार हवा बहल। जइसँ विचारक संग बेवहारोमे बदलाव आएल। सभ गाममे सभ रंगक जमीन्दारीक जाल-फाँस छेलैहे। ओही जमीनक जालक लड़ाइ गाममे भेल। जमीन्दार दिससँ अगिलग्गी केस ठाढ़ कएल गेल। ठाढ़ करैक उदेस ई छेलै जे समाजक (गामक) ओइ शक्तिकेँ तेना मसैल दिऐ जे समाजक नव रूप दिस आँखि नइ उठतै। पैंतीस आदमीपर अगिल्लगी मुकदमा कएल गेल जइमे रंगियाकेँ खेबो-पीबोक आ खेतो-पथारक लोभ देल गेलइ। बिनु लिखा-पढ़ीक तत्काल किछु जमीन देलो गेलइ। अबूझ रंगिया, अगिलग्गी केसक मुद्दई बनि ठाढ़ भऽ गेली।
आइ अगिलग्गी केसक एक दिसक जेतेक कर्त्ता-धर्त्ता माने जमीन्दारसँ लऽ कऽ भाँज-भजैत पुरनिहारक संग केसक सभ गवाहो सभ छल ओ मरि गेल आ तैसंग मुद्दालह दिससँ सेहो पाँच बेकती मरि गेला मुदा बँचल तीस बेकती जे जीबै छैथ ओ तँ अपन ऐतिहासिक रूप देखिये रहल छैथ किने।
अथबल दुआरे सवारियेसँ रंगिया कोर्ट गेल छेली। कोर्टसँ आबि रंगिया दरबज्जाक एकचारीमे ओछाइनपर पड़ल मृत्युक बाट देख रहली अछि...।
कीर्त्तिनाथक मनमे जे प्रश्न छेलैन ओ मनक फुलवाड़ीसँ फलवाड़ीमे केतौ नुका गेलैन। रंगियाकेँ देखते कीर्त्तिनाथ बजला-
रंगिया..!”
अपन टुटैत जिनगीक बीच रंगिया कनैत बाजल-
भैया, तोरे सबहक देल धुआ साड़ी पहिर जाबे जीबै छी ताबे पहिरबो करब आ मरैकाल अहीमे लटपटाएल मरबो करब।
कीर्त्तिनाथ रंगियाक मुँह दिस टकटक देखैत रहला।
q शब्द संख्या : 1132, तिथि : 06 मार्च 2019


[i] सेशन केस

राजरोग_Jagdish Prasad Mandal_बेरमा, मधुबनी_सम्पादन एवम् संकलन- Umesh Mandal


राजरोग
जेठ मासक दस बजेक समय। एक्के-दुइये रस्तापर दच्छिनसँ उत्तर-मुहेँ लोक सभकेँ रामसरूप भाय जाइत देख रहल छला। अखन धरि बिहड़िया छोटो-छीन हाल[i] नइ भेल छल तँए समयमे तापक तेजपनो बेसी आ तीखपनो-झड़कपन छेलैहे।
रामसरूप भाय अपन खेतमे रामझिमनी तोड़िये रहल छला कि रौदक झड़कसँ मनमे तेना झड़कबाहि उठलैन जे कम्मे काजरामझिमनी तोड़ब–शेष छेलैन तैयो छोड़ि कऽ ठण्ढाएब नीक बुझि पड़लैन। मुदा ऐ भाग-दौड़क दुनियाँमे जेते काज निपैट जाइए, माने सम्पन्न भेल जाइए ओते भाग-दौड़क रस्तो तँ कमबे करैए, ई सोचि रामसरूप भाय काजकेँ छोड़ि जाइयो नइ चाहै छला। मने-मन विचार केलैन जे जहिना जट्ठर पानिकेँ गर्म होइमे आगिक ताउक संग समैयो बेसी लगैए तहिना जँ किछु समय आमक गाछतर ठण्ढाए लेब तँ पछाइत जे शेष काज सम्पन्न करब ओइसँ मनो ने अकछाएत आ कम्मे समयमे काजो भऽ जाएत।
यएह सोचि रामसरूप भाय खेतक काज छोड़ि रस्ता परहक आमक गाछक निच्चाँमे छहराइले पहुँचला। रस्ताक किनछैरमे आमक गाछक जड़ि अछि मुदा ओ सौंसे रस्ताक–माने रस्ताक चौड़ाइ भरि–अकासोमे पसरल अछि आ निच्चाँमे छाहैरियो करिते अछि।
आमक गाछक निच्चाँमे बैसल रामसरूप भाइक मन जेना-जेना जीराए लगलैन तेना-तेना विचारक[ii] नव-नव रूप मनमे सेहो उठए-बैसए लगलैन।
जिड़ाइत-जिड़ाइत–ठण्ढाइत-ठण्ढाइत–जखन रामसरूप भाइक मन पानि-पानि भेलैन तखन ऐगला काज–माने रामझिमनी तोड़ब–केँ सम्पन्न करैक विचार एकाएक जोर मारलकैन।
विचारक जोरसँ काजक जोर मने-मन जोड़ाए लगलैन। जोड़ाइत-जोड़ाइत रामसरूप भाइक मन जिनगीक धारमे पहुँच गेलैन। काजेक बाधा जिनगीक बाधा बनि सबहक जिनगीक गतिकेँ बाधित करैए जइसँ ओकर जिनगी राइ-छित्ती होइत राइ-छित्ती भाइये जाइए...। तहीकाल सड़कपर एक्के-दुइये लोककेँ दच्छिनसँ उत्तर-मुहेँ लफड़ल अबैत लोक सभकेँ रामसरूप भाय देखलैन। लोकक चालिसँ रामसरूप भायकेँ बुझि पड़लैन जे ई चालि नियमित चालि नहि, कोनो खास अवस्थाक चालि छी..! मनमे उठलैन जे भरिसक केतौ-किछु भेल हेन तँए लोक देखए जा रहल अछि।
रामसरूप भाइक मनमे आने सभ जकाँ भेलैन जे केकरो पुछि दिऐ जे केतए सभ जा रहल अछि वा अहाँ केतए जाइ छी।मुदा लगले अपने मन रोकलकैन जे हो-न-हो जँ कोनो एहेन घटना गाम-समाजमे भेल हुअए, जइ आगू अपन काज[iii] महत्-हीन बुझि पड़ए, तखन तँ अपन काज बाधित करइ पड़त। लोको लाज तँ किछु छी। जँ से नइ छी तँ पति-पत्नीक बीचक प्रेमलीला सार्वजनिक जगहपर किए ने होइए। तैसंग मनमे ईहो उठैत रहैन जे जँ दुनियाँक गति-विधिसँ सम्बन्ध-सरोकार नइ राखब तखन तँ दुनियाँ आगू बढ़ि जाएत आ अपने पाछूमे टिटियाइत रहब।
असमंजसमे पड़ल रामसरूप भाइक मनमे भेलैन जे गाछक निच्चाँमे सड़कपर बैसले छी आ जे कियो जा रहल अछि सबहक मुहसँ अवाज सेहो निकलिये रहल अछि...।
जेना थाकल-ठेहियाएल लोक हवा आ छाँह पेबिते अलिसा जाइए तहिना आँखि बन्न करि साधक जकाँ कानक दरबज्जा खोलि रामसरूप भाय गाछक जड़िक भागमे ओङ्गैठ गेला। तहीकाल टिटही आ कोइलीकेँ गप-सप्प करैत आभास पौलैन। आँखि खोलि देखबो केला। दुनू गोरे रस्ता टपि रहल छेली। ओना, टिटहियो आ कोइलियो दुनू गोरेक उपनाम छिऐन। असल नाओं छिऐन- तेतरी आ मधुरिया।
प्रेमी-प्रेमिकाक बात थोड़े छी जे कियो फुसराहैट करत। गामक बात छी तँए अपन-अपन जीवन्त आचार-विचारक हिसाबे बजबे करत। टिटही टाँहि दैत बजली-
बहिन, लोको अखज होइए..! कहू जे पनरह दिन पहिनहि सुनलौं जे राघोकाका अस्पतालेमे मरि गेला आ आइ सुनलौं हेन जे निरोग भऽ कऽ एला हेन।
तीन मास पहिनहि राघोकाका पटना अस्पतालमे भर्ती भेल छला, के-ने-के हवामे उड़िया देलक जे राघोकाका इलाजेक दौड़मे मरि गेला।
सामंजस करैत कोइली बाजल-
बहिन! लोककेँ मरैत तँ देखलिऐ हेन मुदा मरल लोककेँ जीबैत नइ देखने छेलौं, से तँ कम-सँ-कम देख लेब किने।
गप-सप्प करैत दुनू–टिटही-कोइली–आगू बढ़ि गेल, जइसँ रामसरूप भाइक मनक पह फटलैन। राघोकाका ऐठाम सभ जा रहल अछि, से स्पष्ट भऽ गेलैन।
गाछक छाहैरसँ उठि रामसरूप भाय मने-मन विचारलैन जे अखन देखबैयाक ढबाहि लगले अछि, हाँइ-हाँइ कऽ अपन काज सम्हारि पाछू-पाछू चलि जाएब। यएह ने बेसी-सँ-बेसी हएत जे पाछू जाएब तँ पैछला बात सुनब, मुदा एक्के-दुइयेक मुहसँ तँ सेहो ने एक्के-दुइये पैछला बात निकलबो करबे करत।
राघोकाका सुभ्यस्त परिवारक छैथ। ओना, सुभ्यस्तक अनेको रूप अछि, जेना पढ़ल-लिखल सुभ्यस्त, धन-सम्पैतिक सुभ्यस्त, समांगक सुभ्यस्त इत्यादि-इत्यादि। मुदा ऐठाम से नहि, राघोकाका धन-सम्पैतिक सुभ्यस्त लोक छैथ। ओना, धनोक सुभ्यस्त-परिवार दू रंगक सेहो होइते अछि। पहिल श्रम-सँ-श्रमित धनक सुभ्यस्त आ दोसर होइए बिनु-श्रम-सँ-श्रमित सम्पैतिक सुभ्यस्त। राघो कक्काक सम्पैत बिनु-श्रमित छेलैन। नोकर-चाकरक बीच राघो कक्काक जीवन शुरू भेलैन। नोकरी करैक रहैन नहि, तँए पढ़ैमे बेसी मेहनतक बेगरतो नहियेँ छेलैन। बैसारीक जिनगी, तँए बैसारी काज दिस राघोकाका झुकला। खाइ-पीबैक कमी कहियो ने भेलैन। पिताक परोछ भेला पछाइत जखन राघोकाकाकेँ अपना ऊपर भार पड़लैन तखन एक-एक करि पिताक देल सम्पैत टुटए लगलैन। टुटैत-टुटैत ओतेक टुटि गेलैन जे भीख मंगैक नौबत राघोकाकाकेँ बनि गेलैन।
ओना, दू रंगक गुण अखनो राघोकाकामे छैन्हे। पहिल, सभ साजो बजबैक (पुरान साज, जेना- हारमोनियम, तबला इत्यादि) आ चित्रकलाक ज्ञान सेहो भरपूर छैन्हे। सभ दिसक दरबारी ठाठ-बाठ रहने केतौ जाइक जरूरत नहि रहलैन, जइसँ अछैते गुणे निर्गुन बनि गेला...। तही बीच उत्तरसँ दच्छिन-मुहेँ अगिलबहान भाय पास करैत रहैथ। ओना, रामसरुपो भाय आँखि ताकि चुकल छला मुदा काज करै दिस बढ़ल नहि छला। अगिलबहानक माने रघुवीर भाय, अगिलबहान गाममे लोक अही दुआरे रघुवीर भायकेँ कहै छैन जे गामक कोनो घटनाक समाचारकेँ ओ अपन विचारानुकूल प्रचारित-प्रसारित करै छैथ। भगत भगतैक जे रूप हुअए मुदा अगिलबहान भाय ओकरा समाजिक नजैरसँ देखै छैथ, जइसँ समाजक समरूप सदिकाल हिनक ठोरपर रहिते छैन। रामसरूप भाय सेहो बुझै छैथ जे अगिलबहान भायसँ सभ बात गहराइसँ बुझि लेब। ...रामसरूप भाय बजला-
भायजी, किमहर-किमहर टहैल रहल छी?”
कहबियो छै जे गाए-गौरुक मिलान तँ ठेहुनो पानि दुहान, तहिना भेल। रामसरुपो भायकेँ लोकक ढबाहिक बात बुझब छेलैन आ दोसर दिस अगिलबहानो भायकेँ अधिक-सँ-अधिक लोक तक विचार पहुँचाएब छैन्हे।
रामसरूप भाइक विचारक नॉंगैर पकैड़ अगिलबहान भाय बजला-
किमहर-किमहर की टहलब जे गामे लोकक तेहेन चकरचालि[iv] देखै छी जे अछैते औरुदे सभ मरैले करमान लगल अछि।
अगिलबहान भाइक विचार रामसरूप भाय नीक जकाँ नहि बुझि पेला तँए अपनाकेँ संयमित करैत बजला-
से की, भाय साहैब?”
दिलखोलि अगिलबहान भाय बजला-
बौआ, हम ओहो दिन राघो कक्काक देखने छिऐन, जखन रण्डी नचबै छला आ ईहो दिन देखलौं जे बेटा सभकेँ ने स्कूल देखा सकला आ ने सेवे कऽ सकला। बचकानीए उमेरमे ओ सभ दिल्ली धऽ लेलकैन। रोडक काज–सड़क बनबैक काज–सँ जीवन शुरू केलक। कम कमाइ तँए कम्मे रूपैआ घर पठबै।
बिच्चेमे रामसरूप भाइक मुहसँ निकललैन-
बाह बेटा..!”
अगिलबहान भाय विचारकेँ मोड़ैत बजला-
औझुके बेटा ने काल्हि बापो होइए, राघोकाका की भेला?”
प्रश्न भारी बुझि पड़लैन आकि की अगिलबहान भाइक ऐगला विचार बुझै दुआरे, रामसरूप भाय बकर-बकर मुँह देखैत चुपे रहला। अगिलबहान भाय बजला-
कियो-ने-कियो राघोकाकाकेँ कहि देलकैन जे बेटा सभ तेते कमाइए जे फ्लैट कीनत। यएह गरमी हुनका मनमे तेना उठि गेलैन जे पहिलुका सभ केलहा-खेलहा मन पड़ि गेलैन।
अगिलबहान भाइक मुँहक बात केलहा-खेलहासुनि रामसरूप भाय बिच्चेमे टोकि देलखिन-
से की भाय साहैब?”
अगिलबहान भाय मुस्की मारि मुस्कियाइत रामसरूप भाय दिस नजैर गड़ा मुस्की मारए लगला।
रामसरूप भाय टोकलैन-
भाय साहैब, अपने गुड़-चाउर खाइ छी आ हमरा सुदामा जकाँ सुखलो चाउर नहि!”
जहिना कोनो विचार वा काजकेँ जड़ि-मूलक बोध बनाएबे ओकर रस लेब होइए तहिना रसिक बनि अगिलबहान भाय बजला-
तीन मास पहिने राघोकाका ओछाइनेपर पड़ल खूब जोर-जोरसँ कानए लगला। दिल्लीसँ दुनू बेटा आबि पटना लऽ गेलैन। पाँच घन्टा धरि लगातार परीक्षणक पछाइत डॉक्टर बुझि गेला जे शारीरिक रोग तँ तेहेन नइ छैन मुदा मानसिक रूपेँ जवानी डिरिआइ छैन।
जवानी डिरिआइ छैन सुनि रामसरूप भाय बिच्चेमे टोकैत बजला-
जवानी डिरिआएब की भेल?”
रामसरूप भायकेँ बुझबैत अगिलबहान भाय बजला-
अखन दोसर बात चालबह तँ पहिलुका तर पड़ि जाएत। तँए सरकारी ऑफिसक फाइल जकाँ नहि करह, अखन राघो कक्काक बात सुनह।...डॉक्टर जवाब देलकैन जे अहाँकेँ कोनो रोग नहि अछि। अपने बाजू जे की सभ होइए।
तैपर राघोकाका कहलखिन-
डाक्टर सहाएब, पचीस बर्ख पहिने एकटा डाक्टर कहि देने छेला जे अहॉंकेँ राजरोग भऽ गेल अछि, तँए पथ्य-पानि ठीक राखब।
राघो कक्काक बात डॉक्टर साहैब बुझि गेला। बजला-
तीन मासक बेडरेस्टो आ बेडफूडोक ओरियान करि दइ छी।
आशा हारि आकि आशा जीत राघोकाका बजला-
बड़बढ़ियाँ।
वएह तीन मासपर पटनासँ गाम एला अछि।
q शब्द संख्या : 1274, तिथि : 10 मार्च 2019


[i] बर्खाक-पानिक
[ii] कार्यगत विचार
[iii] रामझिमनी तोड़ब
[iv] कएल जिनगी

संकल्प_Jagdish Prasad Mandal_बेरमा, मधुबनी_सम्पादन एवम् संकलन- Umesh Mandal


संकल्प
कोनो अविकसित वा अर्द्धविकसित देशो आ गाम-समाजक संग परिवारो आ बेकतियोक बीच बेरोजगारियो आ पछुपनो रहिते अछि। अपनो समाज आ देशोमे अछिए। कियो जानि-बुझि एहेन परिस्थितियो आ परिवेशोक सामना करैत अपन जीवनकेँ संचालित करै छैथ आ कियो कखनो अपनो, कखनो परिवारोकेँ आ कखनो देशो-दुनियाँकेँ दोख लगा मन शान्त करिते छैथ। विचारपुर गाममे रामलाल एहने एक किसान परिवारक बेकती छैथ जे सइयो समस्या, सइयो छान-वान आ खगल बेर-बेगरताक बीच अपनाकेँ ठाढ़ केने डेगे-डेग ससैर रहल छैथ। जहिना एक दिस रामलाल अनेको बेर-बेगरताक अभावमे खगल जिनगीक गाड़ी खिंच रहल छैथ तहिना विचारक दुनियाँमे ईहो जानि-मानि रहल छैथ जे जइ देशमे उपजाऊ भूमि-सम्पदाक बाहुल्य अछि तइ देशक किसानमे ओहन अपरिमित शक्ति सेहो अछिए जे किसानी जिनगीकेँ जिनगीक रूपमे जीवाइये सकैए।
रस्तेकातमे रामलालक अँगनो-घर छैन आ दरबज्जा तँ सहजे रस्ते कातमे, रस्तेक रूखिये सेहो छैन्हे। जइसँ जेते अपन दुआर-दरबज्जाक लज्जैत बनौने छैथ तेते रस्तोक बनौनहि छैथ। ओना, गामक केतेको लोक ई उपराग दइते छैन जे जेते फुलक गाछ रामलाल अपन दरबज्जापर नइ लगौने छैथ तइसँ बेसी रस्तापर–सार्वजनिक भूमिमे–रोपने छैथ। मुदा तइ सभ बातकेँ रामलाल ने कहियो कान-बात देलैन आ ने बाते कानमे धेलैन। किएक तँ अपनो मन कहिते छैन जे फुलक गाछ भलेँ हम रोपने छी मुदा देवी-देवताक पूजा करैले आनो-अपन अपने रोपल जकाँ तोड़ियो कऽ आ बीछियो कऽ लइये जाइ छैथ, तइले हम किनको मनाहियो तँ नहियेँ करै छिऐन। तखन ओ सबहक भेल आकि हमरेटा...।
आइ ओही रस्ता परहक फुलक गाछक जड़िकेँ निहारि-निहारि रामलाल देख रहल छला जे हालक[i] अभावमे एना भेल कि कोनो कीड़ाक आगमन भेलै जे एना दिनो-दिन गाछक बढ़बारिक बदला घटबाहि भेल जा रहल अछि...। गाछक जड़िकेँ खोदि कऽ देख रामलाल मुड़ी उठा मने-मन विचारए लगला कि रस्तापर एक गोरेकेँ अबैत देखलैन।
अनगौंआँ रहने रामलाल चिन्ह नहि सकला। ओना, मनुख तँ मनुखे भेला जे एकरूपिया देवियो-देवताकेँ चीन्हब कठिन अछिए। किएक तँ कखन देवी दुर्गा बनि जेती आकि लछमिये-सरस्वती, से जानब तँ कठिन अछिए।
मनक विकारकेँ रामलाल विचारि-विचारि सुविचार बनबैले मन ओरियेबिते छला कि ओ आदमी आगूमे आबि ठाढ़ भऽ गेलैन। रामलाल चीन्हि नहि सकला। ओना, कखनो-कखनो चिन्हारो अनचिन्हार भइये जाइए, मुदा अनगौंआँ तँ सहजे अनचिन्हार जगहक भेबे केला तँए अनचिन्हार सोभाविके...। दरबज्जाक आगूक रस्ताक विचार करैत रामलाल जखन पाछू उनैट ओइ आदमी दिस तकलैन तँ किछुओ परेखमे नहि एलैन जे ओ पीड़ित अवस्थामे छैथ आकि बेपीड़ित अवस्थामे। तैबीच अपन संक्षिप्त परिचय दैत ओ बेकती अपने बजला- हम बगले गाम रहै छी, किसुनलाल नाम भेल।
परिचय सुनि रामलाल विचार कइये नहि पेब रहल छला जे किसुनलाल ऐठाम आबि रूकि कऽ चुपचाप ठाढ़ किए भेला। गाछक जड़िक जँ जानकार रहितैथ तँ किछु विचार दइतैथ, नहि जँ किछु जानए चाहितैथ तँ सेहो किछु बजितैथ मुदा से दुनूमे सँ किछु ने..!
अपनाकेँ सम्हारि रामलाल बजला-
चलू, दरबज्जापर।
दरबज्जापर चलू कहैत रामलाल उठि कऽ ठाढ़ भेला। रामलालकेँ ठाढ़ होइते किसुनलाल बजला-
किछु संकल्पक संग हम घरसँ निकलल छी, तँए..!”
संकल्पक संग घरसँ निकलल छीसुनिते रामलालक मन, अकासमे उड़ैत नमहर चिड़ै जकाँ चकभौर लेलकैन। संकल्पक विकल्प तँ दुनू दिस अछि। केहेन विकल्प, केहेन संकल्पवान बनबैक दिशामे बढ़ौत आ केहेन संकल्पक समाधानक केहेन विकल्प हएत? असमंजसमे पड़ल रामलाल पुन: बजला-
जेतेकाल ऐठाम रूकि गप करब तेतेकाल किए ने दरबज्जेपर बैस गप-सप्प करब?”
ओना, नव पीढ़िक पढ़ल-लिखल किसुनलाल तँए मनमे उठि चुकल छेलैन जे  सार्वजनिक पथ–माने गामक रस्ता–पर मान-अपमानक प्रश्न नहि रहैए ओ तँ अधिकार-कर्तव्यक बीच बास करैए। मुदा दरबज्जा तँ से नहि, ओ तँ बेकती-विशेषक भऽ जाइए। ओना, दरबज्जाक सेहो सार्वजनिको रूप अछि आ बेकती-विशेषक सेहो अछिए। खाएर जे अछि तइसँ रामेलाल आकि किसुनेलालकेँ कोन मतलब छैन। भाय किछु छी, मनुख तँ छीहे किने। जँ मनुख विचारक आदान-प्रदान नइ करता तखन तँ मनुखक आकार रूप भऽ सकता मुदा मानव मानब तँ कठिन भइये जाएत।
एकाएक किसुनलालक मनमे पाइनिक बेग जकाँ विचारक बेग उठलैन। उठलैन ई जे आन जीव-जन्तु अपन सुख-दुखकेँ भोगि सकैए मुदा केकरो कहि तँ नइ सकैए। ओना, कहब जे अधिकसँ अधिक दुखकेँ अपने-आपमे अङ्गेजब महानता भेल, मुदा ऐठाम से नहि, ऐठाम बस एतबे जे जाबे अपन दुख आन लग नइ बाजब ताबे जँ ओ सुखदातो होथि तँ बुझता केना जे हमरा चलैत दोसरकेँ एते कष्ट भऽ रहल छैन...।
किसुनलाल सहर्ष बजला-
भाय साहैब! अपनो पियास लगल अछि, चलू एक गिलास पानियोँ पीब।
किसुनलालकेँ अगुएने रामलाल दरबज्जापर पहुँच चौकीपर बैसबैत बजला-
अहाँ बैसू, हम पानि नेने अबै छी।
आँगन दिस रूखि करिते रामलालक मनमे उठलैन जे ई तँ मिथिला छी। ऐठाम अतिथि-अभ्यागतक सेवा जहिना अनिवार्ये नहि धरमो मानल जाइत अछि तहिना निमाहबो तँ कठिन अछिए। हमरा हाथक पानि हाथमे लइसँ पहिने जँ किसुनलाल बाजि जाथि जे केहेन पियास बुझबैक पानि छी, तखन तँ कठिन परीक्षाक घड़ी आबिये जाएत..! भाय, परिस्थिति केहनो किए ने हुअए मुदा मनुखो तँ रगड़ी होइते छैथ किने, किछु-ने-किछु समाधानक बाट ताकिये लइ छैथ, भलेँ ओ सुफाँइट हुअए कि कुफाँइट।
रामलाल मन सक्कत केलैन। पानि नेने दरबज्जापर किसुनलाल लग आबि बजला-
पहिने किछु अन्न ग्रहण करितौं तेकर पछाइत जँ पानि पीबितौं तँ बेसी नीक होएत।
अन-पानिपर किसुनलालक मन नइ रीझल मुदा अपन मनक संकल्प अपने विचारकेँ फोड़ैत निकलल-
आने-आन पढ़लो-लिखल आ बिनु पढ़लो-लिखल युवक जकाँ हमहूँ पढ़ल-लिखल युवक छी। बी.ए. केला सात बर्ख भऽ गेल, नोकरीक पाछू वौआइत रहलौं। आइ घरसँ संकल्पित भऽ कऽ निकलल छी जे चाहे जे काज हुअए, बिना अपनौने घुमब नहि।
एक तँ नोकरीक संकल्प, तोहूमे घर छोड़ि घुड़मुड़िया..! रामलालक मन बिहुसलैन। बिहुसते बजला-
संकल्प तँ सक्कत अछि मुदा अछि भरिसक नरकक ठेलम-ठेल जकाँ..!”
रामलाल बजला एतबे, मुदा मनमे ईहो बात रहैन जे एक तँ परतंत्रक जिनगी अङ्गेजब, सेहो लाखक-लाख घूस दऽ कऽ।
ओना, किसुनलालक चेहरा भीतरसँ जहिना चमैक रहल छेलैन तहिना बाहरसँ दमैकियो रहले छेलैन। चमकै-दमकैक कारण किसुनलालक मनमे ई छेलैन जे जहिना अपन जिनगीक बुड़ैत नैयाक नाह देखै छला तहिना संकल्पित जिनगीक कटिवद्धता सेहो छेलैन्हे।
तैबीच रामलालक पत्नी–सुकन्या–चाह नेने पहुँचली। सुकन्याकेँ देख किसुनलालक छाती दड़कए लगलैन। पत्नीक संग जीवन-यापनक की पैघ-पैघ अरमान मनमे छल आ आइ की भऽ रहल अछि..! मुदा अपन पीड़ा पीड़ितसँ जरिते किसुनलालक मनसँ नोकरीक संकल्पक बुलबुला, बरखाकालक पानिक बुलबुला जकाँ धीरे-धीरे फुटि-फुटि पानिमे विलीन हुअ लगलैन आ जिनगी जीबैक संकल्प मनमे उठए लगलैन जइसँ दुनू गोरेक बीच चुपा-चुपी पसैर गेलैन।
चुपा-चुपी देख रामलालक मन कछमछेलैन। बजला-
पहिने चाह पीबू, पछाइत जे टुट-नफाक गप अछि ओ होइत रहत।
अदहा कप चाह किसुनलाल पीब नेने छला मुदा रामलाल अतिथि आग्रह देख चौथाइयोसँ कम्मे चाह पीने रहैथ। तैबीच किसुनलाल बजला-
ऐगला जिनगी-ले..?”
बिच्चेमे किसुनलालक बोली थकथका गेलैन। थकथकाएबो सोभविके छल, की तँ सात बर्खसँ धाँगल-टुटल जिनगीक ने भुक्तभोगी रहि चुकल छैथ।
थकमकाइत-धकमकाइत किसुनलालकेँ देख रामलाल बजला-
अखन अहाँ नवयुवक छी! ओना, किछु समय बीचक जरूर नष्ट भऽ गेल मुदा जखने जागी तखने परात।  
जखने जागी तखने परात सुनि किसुनलालक मन सुगबुगेलैन। सुगबुगाइक कारण भेलैन जे एक तँ पढ़ल-लिखल नौजवान, दोसर सात बर्खसँ देश-समाजक बाढ़िक थपेड़सँ नीक जकाँ थपड़ा सेहो गेले छला जइसँ मनुखक चतुर्दिक जिनगीक रूप-रंग सेहो बहुत किछु अनुभव कराइये देने रहैन। सुगबुगाइत किसुनलालक मनमे सभसँ बेसी गाम-घरक खेतिहर किसानक जिनगी जोर मारलकैन। खेतिहर किसानक वृत्ति किसुनलालक मनमे अबिते अपने फुटलैन-
वाह रे खेतिहर किसान! एक दिस पढ़ि-लिखि खेतीकेँ हँसियापर बैसा छोड़ि-छोड़ि परतंत्रक नोकरी पाछू बेहाल छैथ आ दोसर दिस कृषि-वृत्तिकेँ स्वतंत्र जिनगीक इज्जत-धर्म सेहो मानियेँ रहल छैथ..!”
किसुनलालक विचार सुनि रामलालक मनमे विचारक सुप्रभात झलकी देलकैन। मुदा विचारो-विचारक बीच जे खाँच अछि ओकरा समतल बनबैमे किछु कठिनाइयो आ बाधा सेहो अछिए। तँए विचारक जड़ि दिस रामलालक मन बढ़िये रहल छेलैन कि दोहरी बाट नजैरपर चढ़लैन। बजला-
किसुनलालजी, मनुखकेँ सभसँ पहिने अपन ओकातिक अनुभव करक चाही, पछाइत ओइपर जिनगी केना ठाढ़ हएत तइ दिस नजैर बढ़ेबाक चाही। जखने से हएत तखने मनुखकेँ कोनो-ने-कोनो रस्ता भेटबे करत।
रामलालक विचार किसुनलाल नीक जकाँ नहि बुझि पेला मुदा एहेन तँ आशा मनमे रहबे करैन जे जँ नीक विचार एक बेरे नहि बुझी तँ दोहराइयो-तेहराइयो कऽ बुझैक कोशिश जरूर करी। जखने मनक विचार सोझरा जाएत तखने हाथ-पैरक काज सेहो रस्ता पकड़बे करत...।
मुँह फोड़ि किसुनलाल बजला-
नीक जकाँ नहि बुझि पेलौं।
कोनो विचार जखन अपन विचाररूपमे चलैए आ राही-बटोहीक बीच ओझल हुअ लगैए तखन एक नहि अनेको उदाहरणसँ जहिना ओकरा फरिछाएल जाइ छै तहिना रामलाल बजला-
अपना ऐठाम समर्पणक विचार खाली[ii] विचार नहि जिनगी जीबैक मूल तत्त्व सेहो छी। तँए अपनाकेँ...।
किसुनलाल- की समर्पण?”
ओना, शॉर्ट-कटमे रामलाल बाजि गेला जे अपनाकेँ अपने-आपमे समर्पण मुदा किसुनलालक चेहराक सुर्खीमे कोनो सुखपन नहि अबैत देख रामलाल फरिछबैत पुछलखिन-
अपन बपौती सम्पैत की सभ अछि?”
ओना, सात बर्ख पहिने तक किसुनलाल बपौती सम्पैतिक अर्थ खाली खेते-पथार आ धने-सम्पैतटा केँ बुझै छला, मुदा सात बर्खक जिनगीक हिलकोरसँ विचारोमे थोड़ेक हिलकोर आबिये रहल छैन जइसँ बपौती सम्पैतिक माने खाली जमीने-जायदादटा नहि, परिवारिक-समाजिक सम्बन्धक संग बेकतीगत जवाबदेही सेहो जुड़ल अछि, से किछु-किछु बुझिमे आबए लगलैन। तँए किसुनलाल धकमकाइत बजला-
बपौती सम्पैत तँ केतेको रंगक अछि।
किसुनलालक विचार रामलाल बुझि गेला। तँए लगले हाथ फरिछबैत बजला-
अखन जइ तरहक समस्या बेरोजगारीक अछि मात्र ओतबेपर विचार करू। अपना केते खेत-पथार अछि?”
किसुनलाल बजला-
पाँच बीघा।
रामलाल-
 भैयारी केते छी?”
किसुनलाल-
 दू भाँइक भैयारी अछि।
रामलाल-
अपन देश कहियौ कि राज्य आकि गामे कहियौ, खेतक कुल सम्पदा आ लोकक कुल सम्पदाकेँ एकठाम हिसाब जोड़ियो तँ...।
किसुनलालक मन विचारक घाटसँ जेना लगले असनान करिकऽ निकलल होनि, तहिना पवित्र सेहो भइये गेल छेलैन। मुदा अन्तक अन्तिम बात जे अपना विचारसँ नोकरीक संकल्प लऽ कऽ निकलल छला आ रस्तामे कियो वौस कऽ घुमेनिहारो ने होनि सेहो केहेन हएत...।
किसुनलाल बजला- आब की करी?”
रामलाल- गामक रस्ता पकड़ू।
किसुनलाल- सहए।
रामलाल- हँ तँ आरो की...। 
q शब्द संख्या : 1520, तिथि : 12 मार्च 2019


[i] नमीक
[ii] सिर्फ