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Thursday, June 7, 2012

बाबी


दुर्गापूजा शुरू होइसँ एक दिन पहिने घर छछाड़ै आ दियारी बनबैले सिरखरियावाली बुढ़िया गाछीक मटि-खोभसँ मनही छिट्टामे चिक्कनि माटि नेने अंगना अबैत छलीह। रस्ते कातक चौमासक टाटपर बाबी करैला तोड़ैत रहथि आकि सिरखरियावालीक नजरि पड़लै। नजरि पड़िते ओ एक हाथे छिट्टा पकड़ने आ दोसर हाथे चाइनिक घाम आंगुरसँ काछि कऽ फेकि बाबीकेँ कहलनि- “बाबी, छठिक कते दिन छै?”
बाबीक नजरि जुआइल आ सड़ल करैलापर छलनि। किएक तँ अजोह करैला तीतो बेसी आ सुअदगरो कम होइ छै। ततबे नहि, पकैयोक डर। सड़ल करैला ऐ दुआरे लत्तीकेँ बिहिया-बिहिया तकैत जे जँ ओकरा तोड़ि नहि लेब तँ दोसरोकेँ सड़ाओत। सिरखरियावालीक अवाज सुनि बाबी रस्ता दिस देखि पुनः करैला ताकए लगलीह। किएक तँ माथपर भारी देखि गप-सप्‍प करब उचित नहि बुझलनि। एक तँ भरल छिट्टा माटि तइपर खुरपी गाड़ल देखलखिन। मने-मन सोचलनि जे छठिक अखन मासोसँ बेसिये हेतै तखन एहेन कोन हलतलबी बेगरता भऽ गेलै। जँ महीना, परव तीथि जोड़ि कऽ कहए लगब तँ अनेरे देरी हेतै। जते देरी लगतै तते भारियो लगतै। तँए बाबी आँखि उठा कऽ देखि, बिना किछु कहनहि, नजरि निच्चाँ कऽ लेलनि। मुदा ओहो रगड़ी। मनमे होइ जे अखन नहि बूझि लेब तँ फेर बिसरि जाएब। जँ बिसरि जाएब तँ किछु नहि किछु छुटिये जाएत। अखन तँ मटि खोभामे मन पड़ल जे पौरुका दशमियेक मेलामे तीनटा कोनियाँ, एकटा सूप आ एकटा छिट्टा कीनि नेने रही। जइसँ छठि पावनि केलौं। बाबीक नजरि निच्चाँ केने देखि सिरखरियावाली दोहरा कऽ बाजलि- “गरीब-दुखियाक बात आब थोड़े बाबी सुनै छथिन, जे सुनतिहीन।
सिरखरियावालीक बात बाबीक करेजकेँ छुबि देलकनि। मुदा क्रोध नहि भेलनि सिनेह उमड़ि गेलनि। एकाएक बाबी अपन बोली बदलि लेलनि। चौवन्निया मुस्की दैत कहलखिन- “कनियाँ, मनमे आएल जे चारिटा करैला तोरो तरकारी ले दिअह। तँए हाँइ-हाँइ करैला ताकए लगलौं। कनिये ठाढ़े रहह?”
सिरखरियावाली- “जे पुछलियनि से कहबे ने करै छथि आ करैला दऽ कऽ फुसलबै छथि।
विचित्र अन्तर्द्वन्द बाबीक मनकेँ घोर-मट्ठा करए लगलनि। एक दिस माथपर भारी देखथिन आ दोसर दिस आइसँ छठि धरि जोडै़क समए। तहूसँ उकड़ू बूझि पड़ैन जे सोझ मासक सवाल नहि अछि। दू मास बीचक बात छी। सेहो एहेन मास जे लुंगिया मिरचाइक घौंदा जकाँ पावनिक घौंदा अछि। जाधरि सभ सोझरा कऽ नहि कहबै ताधरि अपनो मन नहि मानत आ ओहो नहि बूझत। ताल-मेल बैसबैत कहलखिन- ““कनियाँ, अखन जाउ। हमहूँ तीमनक ओरियानमे लगल छी आ अहूँक माथपर भारी अछि।
सिरखरियावालीक मनमे होइ जे छठि सन पाबनि, जे हिसाबसँ ओरियान नहि करैत जाएब तँ कैकटा चीज छुटिये जाएत। आन पावनि जकाँ तँ छठि हल्लुक नहि अछि। बड़ ओरियान बड़ खर्च। बाजलि- “दसमी मेलामे जे कोनियाँ, सूप छिट्टा कीनि नेने रहै छी, तँ बुझै छिऐ जे एते काज अगुआएल रहैए।
बाबी- “कनियाँ, एकटा काज करु। छिट्टाकेँ निच्चाँमे राखि दियौ जे अहूँक देह हल्लुक भऽ जाएत आ हमरो हिसाब जोड़ि-जोड़ि बुझबैमे नीक हएत।
सिरखरयावाली बाजलि‍- “बाबी, भारी उठबैत-उठबैत तँ माथ सुन्न भऽ गेल अछि। ई माटि कते भारिये अछि।
बाबी- “कनियाँ, बहुत हिसाब जोड़ि कऽ बुझबए पड़त।
सिरखरियावाली- “ओते अखन नै कहथु। खाली छठिये टा कहि देथु। गोटे दिन निचेनसँ आबि कऽ सभ बूझि लेब।
आंगुरपर बाबी हिसाबो जोड़ैत आ ठोर पटपटा कऽ बजबो करथि- “आइ आसिनक अमवसिये छी। आइये भगवतीकेँ हकारो पड़तनि आ बघा-सँपहाक निमित्ते खाइयोले देल जेतै। काल्हि कलशस्थापनसँ दुर्गा पूजा शुरू हएत, जे नओ-दस दिन धरि चलत। दसमी तिथिकेँ यात्रा हएत। तेकर पाँचे दिन उत्तर कोजगरा हएत। कोजगरा परातसँ कातिक चढ़त। कातिक अमावश्याकेँ दियाबाती.... लक्ष्मी पूजा.... कालीपूजा। परात भेने गोधन पूजा, दोसर दिन भरदुतिता आ चित्रगुप्तो पूजा। भरदुतिया परातसँ छठिक विधि शुरू भऽ जाएत। पहिल दिन माछ-मड़ुआ बारल जाएत.... दोसर दिन नहा कऽ खाएल जाएत.... तेसर दिन खरना.... चारिम दिन छठिक सौंझुका अर्घ। पाँचम दिन भिनसुरका अर्घ भेलापर उसरि जाएत। आंगुरपर गनैत-गनैत बाबी बजलीह- “कनियाँ, सवा मास करीब छठिक अछि।
सिरखरियावाली- “सवा मास कते भेलै बाबी?”
“दू बीसमे तीन दिन कम।
“हम तँ सभ बेर दशमिये मेलामे कोनियाँ, सूप, छिट्टा कीनि लै छी। तकरा कै दिन छै?”
“सात पूजाकेँ भगवतीकेँ आँखि –डिम्भा पड़लापर मेला शुरू भऽ जाइत छै। जेकरा आठ दिन छै। मुदा एकटा बात पूछै छिअह जे एते अगता किअए कीनै छह? ताबे ऐ पाइसँ दोसर-दोसर काज करबह से नै। जखन पावनि लगिचा जेतै तखन कीनि लेबह?”
“पहिने किनलासँ दू-पाइ सस्तो होइए आ एकटा चीजोसँ निचेन भऽ जाइ छी। एक बेर एहिना नञि किनलौं तँ भेबे ने कएल। आब की करितौं तँए पुरने कोनियो-सूपो आ छिट्टोकेँ चिक्कनसँ धो देलिऐ आ ओहीसँ पावनि कऽ लेलौं।
सिरखरियावालीक बात सुनि बाबी व्यवहार दिस बढ़लीह। मने-मन बुदबुदेलीह- छठि पावनिक महात्म्य बहुत बेसी अछि। खास कऽ किसानक लेल। एक दिस पूर्वजक मिठाइ-पकवान तँ दोसर दिस डोमक बनाओल कोनिया, सूप, छिट्टा। तेसर दिस कुम्हारक बनाओल कूड़ -बिनु मोड़ल कान, पनिभरा घैलमेमे मोड़ल कान होइत, जहिमे चौमुखी दीप जरैत। ढकना, सरबा। तँ चारिम दिस अपन उपजाओल फल-फलहरी, तीमन-तरकारीक वस्तुक संग मसल्लोक वस्तु। बहुतो अछि। तइपर सँ डुमैत सूर्यक पहिल अर्घ। मने-मन बिचारि बाबी चुप्पे रहलीह। मनमे भेलनि जे ई तँ ओइ इलाकाक छी जहि इलाकाक स्त्रीगण रौद-बसातकेँ गुदानिते ने अछि। खेतक काज करैमे भुते। भगवानोकेँ हारि मनबैवाली। बाँबीक मनमे होन्‍हि‍ जे चुप भऽ गेलौं तँ बेचारी चलि जाएत।
मुदा ले बलैया, ई तँ काग-भुसुण्डी जकाँ डूबि गेल। भानसकेँ अबेर होइत जाइत देखि बाबीकेँ अकच्छ लगनि। जखन कि हेजाक मरीज जकाँ। सिरखरिया बालीकेँ पियास बढ़ले जाइत। अचता-पचता कऽ बाबी पुछलखिन- “कनियाँ, बेटी सबहक हालत की छह?”
बेटी नाम सुनिते सिरखरियावाली किछु मन पाड़ि बाजलि- “बाबी, हिनकासँ लाथ कोन। तीनूक हालत हमरासँ नीक छै। भगवान गरदनि कट्टी केलनि तँए ने, ने तँ की हमही एहिना रहितौं।
बाबी- “भगवान केकरो अधला थोड़े करै छथिन जे तोरा केलखुन?”
सिरखरियाबाली- (मुड़ी डोलबैत) “तँ केलनि नै। हमरा पँच-पँच बरीसपर बच्चा देलनि। पाँच बरिसपर देलनि से नीके केलनि जे जखन एकटा छँटि जाइत छल तखन दोसर होइत छल। मुदा अगता तीनू बेटिये जे देलनि से गरदनि कट्टी नै केलनि। जँ अगता तीनू बेटा रहैत, नञि तँ मेलो-पाँच कऽ, तँ अखन ई भारी काज अपने करितौं की पुतोहु करितए। पचता बेटा भेल, जे अखन लिधुरिये अछि।
बाबी- “जेठकी बेटीक सासुर कतऽ छह?”
सिरखरियाबाली- “उत्तर भर। खुटौना टीशन लग। बेचारीकेँ खेत तँ कम्मे छै मुदा सभ तुर मेहनतिया अछि। एक जोड़ा बड़द रखने अछि। दूटा महींस लघरि‍ खुट्टापर छै आ तीनटा पोसियो लगौने अछि। अन्नो-पानि तते उपजा लइए जे साल-माल लगिये जाइ छै।
बाबी- “नाति-नातिन छह की ने?
सिरखरियावाली- “हँ, तीन टा अछि। तीनू लिधुरिये अछि। तंग-तंग बेटी रहैए। तीनूक नेकरम करैत-करैत तबाह रहैए। तइपरसँ घर-गिरहस्तीक काज।
बाबी- “दोसर बेटीक सासुर कत्तऽ छह?”
सिरखरियावाली- “पूब भर। कोसी कात।
बाबी- “कोसी कात किअए केलह?”
सिरखरियावाली- “बाबी जानि कऽ कहाँ केलिऐ। गाम तँ नीके रहए मुदा कत्तऽ सँ ने कत्तऽ सँ कोसी चलि एलै। कोशियो एलै तँ अन्न-पानिक कोनो दुख नै होइ छै। मुदा अपना सभ जकाँ चिष्टा नहि। गाममे महींस बेसी छै, जइ सँ रस्ता-पेरा हेँक-हेँक भेल रहै छै।
बाबी- “छोटकी?”
सिरखरियावाली- “पछिम भर, पाही। ई हम्मर रानी बेटी छी। जते दिन ऐठाम रहैए रंग-बिरंगक तीमन-तरकारी खुआबैए। भानस करैक एहेन लूरि दुनूमे केकरो नै छै। जहिना भानस-भात करैमे, तहिना बोली वाणी। गीतो-नाद जे गबैए, से होइत रहतनि जे सुनिते रही। तहिना चिष्टो चर्या ओढ़बो-पहिरब।
बाबी- “बड़ बेर उठलै। आब तोहूँ जा।
सिरखरियावाली- “आइ हमरा गंजन लिखल अछि। विचारने छलौं जे माटि आनि कऽ धान काटि आनब। गरमा धान से नहिये भेल। काल्हि फेर घरे-अंगना नीपैमे लगि जाएब।
गामक सभ बाबीकेँ मेह बुझैत। छथियो। जँ केकरो मन खराब वा कोनो आफत-असमानी होइत तँ बाबी सभसँ पहिने आबि सेवा-टहलमे लगि जाइत। तहिना जँ कहियो बाबीक मन खराब होइत तँ गामक लोक जी-जानसँ लगि जाइत। किएक तँ सबहक मनमे ई अंदेशा बनल जे बाबीक मुइने गामक बहुत विधि-व्यवहार समाप्त भऽ जाएत। ओन बाबी पढ़ल- लिखल नहि, चिट्ठिओ पुरजी नहि पढ़ल होइत छन्‍हि‍। जरुरतो नहि। किएक तँ सालो भरिक पावनि आ ओकर विधि, संग-संग मांगलिक काज उपनयन, बि‍आह इत्यादि विधि कंठस्थ। कोन गीत कोन अवसरपर गाओल जाएत, सभ जीभपर राखल। तहिना पूजाक आराधनासँ लऽ कऽ आरती धरिक।
सभ कुछ रहितौं बाबीक मनमे एकटा कचोट समरथाइयेसँ लगल रहि गेलनि। ओ ई जे एकटा बेटा भेलाक बाद दोसर सन्ताने नहि भेलनि। अपन इच्छा रहनि जे एकटा बेटा, एकटा बेटी हुअए। मुदा बेटा तँ भेलनि बेटी नहि। जे कचोट सभकेँ कहबो करथिन। कहथिन जे सृष्टिक विकास लेल पुरुष नारी दुनूक जरुरत अछि। नहि तँ विकास रुकि जाएत। ने एकछाहा पुरुषेसँ काज चलत आ ने एकछाहा नारियेसँ।
भरदुतियाक परात बाबी माछ-मड़ुआ बाड़लनि। काल्हि नहा कऽ खेतीह। परसू खरना करतीह। खरना दिनले बाबी सतरिया धानक अरबा चाउर सभ साल रखैत छथि। किएक तँ पनरहे घरक टोलक खरनासँ लऽ कऽ घाटपर हाथ उठबै धरिक काज बाबीएक जिम्मा। मुदा खरना दिन गज-पट भऽ जाइत छन्‍हि‍। किएक तँ कियो मेहीका धानक अरबा चाउर आ गुड़ दैत छन्‍हि‍ तँ कियो मोटका धानक अरबा चाउर आ गुड़। अरबा तँ अरबे छी। मोटका-मेहीकाक भेद नहि। तँए बाबीकेँ खीर रन्हैमे पहपटि भऽ जाइत छन्‍हि‍। फुटा-फुटा कऽ केना करतीह। तँए सबहक अरबा चाउरकेँ खाइले रखि लै छथि आ अपन सतरिया चाउरक खरना करै छथि। खाली खरने नहि करै छथि, मनमे इहो रहै छन्‍हि‍ जे परिवारक हिसाबसँ एत्ते खीर घुमा दिअए जे घरमे चुल्हि नै चढै़।
षष्ठी। आइ सौझुका अर्घ होएत। तड़गरे बाबी सूति उठि कऽ पावनिक ओरियानमे लगि गेलीह। बहुत चीज भेबो कएल आ बहुत बाकियो अछि। मुदा भरि दिन तँ ओरिअबैक समए अछि। तइ बीच डेढ़ियापर सँ बाबी, बाबी सुनलनि।
मुदा टाटक अढ़ रहने बोली नहि चीन्हि सकलीह। मनमे भेलनि जे आइ पावनि छी
तँए कियो किछु पुछैले आएल होएत। ओसारेपर सँ कहलखिन- “के छिअहुँ। अंगने आउ।
पथियामे दूटा नारियल, पान छीमी केरा, दूटा टाभ नेबो, दूटा दारीम, दूटा ओल, दूटा अड़ुआ, दूटा टौकुना, दूटा सजमनि, एक मुट्ठी गाछ लागल हरदी, एक मुट्ठी आदी नेने रहमतक माए आंगन पहुँचि बाबीक आगूमे रखि बाजलि- “बाबी, अपनो डाली ले आ हिनकोले नेने एलिएनिहेँ।
पथियासँ सभ वस्तु निकालि ओसारपर रखि निङहारि-निङहारि बाबी देखए लगलीह। बच्चेमे रहमत बीमार पड़ल, ओकरे कबुला माए केने रहथि। तँए पान सालसँ ओहो छठि पावनि करैत। जे बात बाबियोकेँ बुझल। ओना बाबी अपने आंगनमे भुसबा, ठकुआ बनबैत। मुदा तेकर दाम रहमतक माए दऽ दन्हि। पथिया लऽ रहमतक माए बिदा हुअए लगली की बाबी कहलखिन- “कनियाँ, कनी ठाढ़ रहू। रौतुका खरनाक नेवैद्य नेने जाउ।
घरसँ केरा पातपर खीर आनि रहमतक माएकेँ दऽ देलखिन। हाथमे नेवैद्य अबिते रहमतक माएक मन खुशीसँ नाचि उठल। बेटाकेँ निरोग जिनगी जीबैक आशा सेहो भऽ गेलनि। मने-मन दिनकरकेँ गोड़ लागि बिदा भेल। अंगनासँ निकलिते छलि की एक पाँज कुसियारक टोनी नेने परीछन पहुँचि गेल। एक टोनी बाबीकेँ आ एक टोनी रहमतक माएकेँ दैत सुरसुराइले निकलि गेल। किएक तँ अंगनेमे सभले टोनी बना नेने छल। बाबीकेँ कुसियारक टोनी दैत रहमतक माए कहलकनि- “हमरा आइ हाट छी बाबी, तँए कनी देरीसँ घाटपर आएब।
बाबी- “हम तँ छीहे कनियाँ, तइले तोरा किअए चिन्ता होइ छह। दिनकर-दीनानाथ केकरो अधलाह करै छथिन जे तोरा करथुन। अपन भरि निअम-निष्ठा रखैक चाही।
रहमतक माए चलि गेल। बाबी फुटा-फुटा सभ वस्तु रखए लगलीह। तइ काल दछिनबरिया अंगनामे हल्ला सुनलखिन। ओसारपर सँ उठि डेढ़ियापर ऐली की सुनलखिन जे खुशिया बेटा केराक घौरसँ एकटा छीमी तोड़ि कऽ खा गेलै तइले माए चारि-पाँच खोरना मरलकै। बेटाकेँ कनैत देखि खुशिया घरवालीपर बिगड़ए लगल। तेकरे हल्ला। अपने डेढ़ियापरसँ बाबी कहलखिन- “पावनिक दिन छिऐ। तखन तूँ सभ भोरे-भोर हल्ला करै छह। दुधमुँहा बच्चा जँ एक छीमी केरा तोड़ि कऽ खाइये गेलै तइले एते हल्ला किअए करै छह।
बाबीक बात सुनि दुनू बेकती खुशिया तँ चुप भेल मुदा छौड़ा हिचुकि-हिचुकि कनिते रहल। तही बीच सोनरेवाली आबि बाबीकेँ कहलकनि- “बाबी, नीक की अधला तँ हिनके कहबनि की ने। देखथुन जे पाइक दुआरे ने छिट्टा भेल ने कोनियाँ।
सोनरेवालीक बात सुनि बाबी गुम्म भऽ गेलीह। कने काल गुम्म रहि कहलखिन- “नै पान तँ पानक डंटियोसँ काज चलैत अछि। जेकरा छै ओ सोना-चानीक कोनियाँमे हाथ उठबैए आ जेकरा नञि छै ओ तँ बाँसेक सुपतीसँ काज चलबैए। तइले मन किअए ओछ केने छह। सभकेँ की सभ कुछ होइते छै। जेकरा जते विभव होइए ओ ओते लऽ कऽ पावनि करैए। तँए की दिनकर केकरो कुभेला करै छथिन।
तइ बीच दीपवाली पाँच बर्खक बेटाकेँ हाथ पकड़ने घिसिअबैत पहुँचि कहलकनि- “बाबी, देखथुन जे ई छौड़ा तेहेन अगिलह अछि जे हाथीकेँ पटकि देलकै। ई तँ गुण भेल जे एक्केटा टाँग टुटलै, नै तँ टुकड़ी-टुकड़ी भऽ जाइत।
मुस्की दैत बाबी कहलखिन- “देखहक कनियाँ, ई सभ दिखाबटी छिऐ। मनुक्खक मनमे श्रद्धा हेबाक चाही। ऐ ले बच्चाकेँ किअए दमसबै छहक। छोड़ि दहक।
सूर्य उगले सभ घाटपर पहुँचि डाली पसारलक। नवयुवती सभ गीत गाबए लगलीह। हाथ उठौनिहारि पानिमे दुनू हाथ जोड़ि ठाढ़ भेलीह। एक्के तालमे ढोलिया ढोल बजबए लगल। पोखरिक चारु महार दीपसँ जगमगा गेल। परदेशियो सभ छठि पावनि करए गाम आएल। एक गोटेकेँ नाच कबुला रहै ओ नाच करबै लगल। ताबे दूटा छौड़ा दारु पीबि फटाका फोेेड़ए लगल। दुनू बेमत। एक गोटेक फटाकामे कम अवाज भेलै की दोसर पिहकारी मारि देलक। अपन डुमैत प्रतिष्ठाकेँ जाइत देखि ओ पिहकारी देनिहारक कालर पकड़लक। दुनू अपन-अपन परदेशिया भाषामे गारि-गरौबलि शुरू केलक। गारि-गरौबलिसँ मारि फँसि गेलै। दुनू दुनूकेँ खूब मारलक।
दोसर दिन भिनसुरका अर्घ। खूब अन्हरगरे सभ घाटपर पहुँचल। हाथ उठौनिहारि पानिमे पैसिलीह। चौमुखी दीपसँ सौंसे प्रकाश पसरि गेल। सूर्योदय होइते दीपक ज्योति मलिन हुअए लगल। हाथ उठै लगल।
बच्चा-बुच्चीक संग रहमतक माए पोखरिक मोहारपर आँचर नेने दुनू हाथ जोड़ि बाबीपर आँखि गड़ौने। तइ काल मुसबा गिलासमे दूध नेने पहुँचल। किनछरिमे पैसि एक ठोप, दू ठोप दूध सभ कोनियाँमे दिअए लगल।
हाथ उठा बाबी पानिसँ निकलि, साड़ी बदलि, छठिक कथा कहए लगलखिन। कथा कहि अंकुरी छीटि पावनिक विसर्जन केलनि।
अखन धरि जे ढोलिया एक तालमे ढोल बजबैत छल ओ समदाउनिक ताल धेलक। नटुओ समदाउन गाबए लगल।
सभ अपन-अपन कोनियाँ समेटि छिट्टामे रखि, ढोलियाकेँ एकटा ठकुआ एक छीमी केरा दऽ दऽ बिदा भेल।

डाक्‍टर हेमन्‍त


सभ दिन चारि बजे उठैबला डाॅक्टर हेमन्त आइ छअ बजे उठल। अबेरे कऽ नीन टुटलनि। एना किअए भेलनि? एना ऐ दुआरे भेलनि जे आन दिन परिवारसँ लऽ कऽ अस्पताल धरिक चिन्ता दबने रहैत छलनि। तँए कहियो भरि-भरि राति जगले रहि जाथि तँ कहियो-कहियो लगले-लगले निन्न टुटि जाइन। कोनो-कोनो राति अनहोनी-अनहोनी सपना देखि चहा-चहा कऽ उठैत तँ कोनो-कोनो राति पत्नीसँ झगड़ैत रहि जाइत। छअ बजे नीन टुटिते हेमन्त घड़ी देखलनि। मुदा अबेरो कऽ निन्न टुटने मनमे एक्को मिसिया चिन्ता नहि। मन हल्लुक, एकदम फुहराम। जना मनमे चिन्ताक दरस नहि। आन दिन ओछाइनेपर ढ़ेरो चिन्ता घेरि लेनि। अनेको समस्या, अनेको उलझन मनकेँ गछारि देनि। केसक की हाल अछि, बेटाकेँ नोकरी हएत की नहि। क्लीनिकमे कप्पाउण्डरक चलैत रोगी पतरा रहल अछि। चोट्टा सभ दारु पीबि-पीबि अन्ट-सन्ट करैत रहैत अछि आ पाइयेक भँाजमे पड़ल रहैत अछि। जइसँ मुँह-दुबर रोगी सबहक कुभेला होइ छै। अस्पतालोसँ बेर-बेर सूचना भेटैत अछि जे ड्यूटीमे लापरवाही करै छिऐ। बातो सत्य छै मुदा की करब? केस छोड़ि देब तँ पिताक अरजल सम्पत्ति बहि जाएत। क्लीनिकमे कम्पाउण्डर सभकेँ जँ किछु कहबै तँ क्लीनिके बन्न भऽ जाएत। जइसँ जेहो आमदनी अछि सेहो चलि जाएत। पुरान कम्पाउण्डर सभ अछि। सभ दिन छोट भाए जकाँ मानैत एलिऐ तेकरा किछु कहबै सेहो उचित नहि। मुदा हमही टा तँ डाॅक्टर नहि छी, बहुतो छथि। रोगीकेँ की, जैठाम नीक सुविधा हेतइ तइ ठाम जाएत। ओझड़ाएल जिनगी हेमन्तक। तँए सोझ-साझ बिचार मनमे अबिते नहि। मुदा आइ अबेर कऽ उठनौं मनमे कोनो ओझरी नहि। किएक तँ काल्हिये कोर्टमे लिखि कऽ दऽ देलखिन जे हमरा पिताक सम्पतिसँ कोनो मतलब नहि अछि, तँए केससँ अलग कएल जाए। दोसर बेटोकेँ नोकरी भऽ गेलनि जे ज्वाइन करै काल्हिये माए आ स्त्रीक संग गेल। पिताक देल सम्पतिक लड़ाइमे अपनो बीस बर्खक कमाइ गेल रहनि। मुदा प्राप्तिक नामपर जान बचा लड़ाइसँ अलग भेलाह। हेमन्तक मनमे उठलनि जे जहिना पिताक सम्पतिमे किछु नहि प्राप्त भेल तहिना तँ रमेशोकेँ हमरा अरजल सम्पतिमे नहि हेतै। मुदा हमरा आ रमेशमे अन्तर अछि। हम तीन भाइ छी, जहिक बीच विवाद भेल मुदा रमेश तँ असकरे अछि। ओना हेमन्तक मनक चिन्ता काल्हिये समाप्त भऽ गेल रहनि मुदा काजक व्यस्तता मनकेँ असथिर हुअए नहि देलकनि। एक्के बेर आठ बजे रातिमे असथिर भेलाह। तेकर बाद पर-पखाना करैत, हाथ-पएर धोइत, खाइत नअ बजि गेलनि। भरि दिनक झमारल तँए ओछाइनपर पहुँचते नीन अबए लगलनि। रेडियो खोलि समाचार सुनए चाहलनि, सेहो नहि भेलनि। रेडियो बजिते अपने सूति रहलाह।
नीन टुटिते डाॅक्टर हेमन्तकेँ चाहक तृष्णा एलनि। मुदा घरमे कियो नहि। असकरे। नोकर ऐ दुआरे नहि रखने जे काल्हि धरि पत्नी, बेटा-पुतोहु सभ रहनि। जे सभ घरक काज सम्हारैत। ओना चाहक सभ समचा घरेमे मुदा बनौनिहारे नहि। बिछान परसँ उठि नित्य-कर्म केलनि। मनमे एलनि जे चाह पीब। मुदा चाह आओत कतऽ सँ। से नञि तँ पहिने दाढ़िये बना लै छी आ क्लीनिक जाए लगब तँ रस्तेमे चाह पीबि लेब। मुदा भोरे-भोर चाहक दोकानपर तँ ओ जाइत, जेकरा घर-परिवार नञि रहै छै। हमरा तँ सभ कुछ अछि। ओह, से नञि तँ अपने चाह बना लेब। चाह बना, कुरसीपर बैसि चाह पीबए लगलाह। फाटक परसँ आवाज आएल- “डाॅक्टर सहाएब, डाॅक्टर सहाएब।
टेबुलपर कप रखि, फाटक दिस बढ़ैत डाॅ. हेमन्त कहलखिन- “हँ, अबै छी।
फाटकक बाहर डाकिया कन्हामे झोरा लटकौने हाथमे दूटा लिफाफ आ रसीद नेने ठाढ़। डाकियाकेँ देखि मुस्की दैत हेमन्त पुछलखिन- “भोरे-भोर कोन शुभ-सन्देश अनलौंहेँ?”
मुदा डाकिया किछु बाजल नहि। खाँखी शर्टक उपरका जेबीसँ पेन निकालि, रसीदो आ पेनो बढ़ा देलकनि। दुनू रसीदपर हस्ताक्षर कऽ दुनू लिफाफ नेने फेर कुरसीपर बैसि चाहक चुस्की लेलक। एकटा लिफाफकेँ टेबुलपर रखि, दोसरकेँ खोलि पढ़ए लगलाह। सरकारी पत्रमे लिखल- “पत्र देखिते डेरा छोड़ि दिअ। बाढ़िसँ बहुत अधिक जान-मालक नोकसान भेल अछि, तँए आइये लछमीपुर पहुँचि‍ जएबाक अछि। तहिमे जँ कोनो तरहक आनाकानी करब तँ पुलिसक हाथे पठाओल जाएब। एक काॅपी पुलिसोक थानामे भेज देल गेल अछि।
पत्र पढ़िते हेमन्तकेँ ठकमूड़ी लगि गेलनि। मने-मन सोचए लगलाह जे घरमे असकरे छी। केना छोड़ि कऽ जाएब। समए-साल तेहेन भऽ गेल अछि जे दिनो-देखार डकैती होइत अछि। कतौ डकैती तँ कतौ चोइर, कतौ अपहरण तँ कतौ हत्या सदिखन होइते रहैए। एहना स्थितिमे घर छोड़ब उचित हएत। मुदा जखन नोकरी करै छी तँ आदेश मानै पड़त। जँ से नहि मानब तँ जहिना बीस बर्खक कमाइ कोट-कचहरीक ईंटा गनैमे गेल तहिना जे पाँच बरख नोकरी बचल अछि ओहो ससपेंड, डिस्चार्जमे जाएत। कहियो जिनगीमे चैन नहि। घोर-घोर मन होइत जाइत। चाहो सरा कऽ पाि‍न भऽ गेल। गुन-धुन करैत दोसर पत्र खोललनि। पत्रमे लिखल- “डाॅक्टर हेमन्त। काल्हि चारि बजे, पछबरिया पोखरिक पछबरिया महारमे जे पीपरक गाछ अछि, ओइ गाछ लग पहुँचि हमरा आदमीकेँ दू लाख रुपैया दऽ देबै। नञि तँ परसू ऐ दुनियाकेँ नहि देखि सकब।
पत्र पढ़िते केराक भालरि जकाँ हेमन्तक करेज डोलए लगलनि। सौंसे देहसँ पसीना निकलै लगलनि। थरथराइत हाथसँ पत्र खसि पड़लनि। मनक बिचार विवेक दिस बढ़ए लगलनि। जहिना कियो सघन बनमे पहुँचि जाइत आ एक दिस बाघ-सिंहक गर्जन सुनैत तँ दोसर दिस सुरुजक रोशनी कम भेने अन्हार बढ़ैत जाइत, तहिना हेमन्तकेँ हुअए लगलनि। खाली मन छटपटा गेलनि। की करब, की नै करब, बुझबे ने करथि। जहिना भोथहा कोदारिसँ सक्कत माटि नहि खुनाइत तहिना हेमन्तोक विचार समस्याकेँ समाधान नहि कऽ पबैत। रस्तेमे विलीन भऽ जाइत। कियो दोसर नहि! जे मनक बात सुनैत, जइसँ मन हल्लुक होइतनि। तइ काल एकटा अस्पतालक कम्पाउण्डर रिक्शासँ आबि गेटपर पहुँचि बाजल- “डाॅक्टर सहाएब....।
कम्पाउण्डरक अवाज सुनि धरफड़ा कऽ उठि हेमन्त गेट दिस बढ़लाह। गेटपर रिक्शा लागल। रिक्शापर दूटा कार्टून लादल। कम्पाउण्डरो आ रिक्शोबला रिक्शासँ हटि, बीड़ी पिबैत। डाॅक्टर हेमन्तपर नजरि पड़िते कम्पाउण्डर हाथक बीड़ी फेकि, आगू बढ़ि प्रणाम करैत कहलकनि- “लगले तैयार भऽ चलू, नञि तँ पुलिस आबि कऽ बेइज्जत करत। बेइज्जत तँ हमरो करैत मुदा पुलिस अबैसँ पहिने हम कार्टून रिक्शापर चढ़बैत रही। तँए किछु ने कहलक। रस्तामे अबै छलौं तँ मोहनबाबूकेँ गरिअबैत सुनलियनि। तँए देरी नञि करु। नबे बजे गाड़ी अछि। सवा आठ बजैए। अपना दुनू गोटे एक टीममे छी।
जहिना जूड़िशीतलमे मुइलो नढ़ियापर लाठी पटकैत तहिना कम्पाउण्डरक बात सुनि हेमन्तकेँ होन्‍हि‍। मिरमिराइत स्वरमे बजलाह- “दिनेश, हमरा तँ रातिये सँ तते मन खराब अछि जे किछु नीके ने लगैए। एक्को मिसिया देहमे लज्जतिये ने अछि। होइए जे तिलमिला कऽ खसि पड़ब।
कम्पाउण्डर- “दवाइ खा लिअ। थोड़बे कालमे ठीक भऽ जाएब।
हेमन्त- “देहक दुख रहैत तखन ने, मनक दुख अछि। ओ केना दवाइसँ छुटत।
हेमन्तक मन आगू-पाछू करैत देखि कम्पाउण्डर कहलकनि- “एक तँ ओहिना मन खराब अछि......।
कम्पाउण्डरक बात सुनि हेमन्तक मन आरो मौला गेलनि। मनमे अनेको प्रश्न उठए लगलनि। देरी हएत तँ जबाबो देमए पड़त। मुदा घरो छोड़ब तँ नीक नहि हएत। जखने घर छोड़ब तखने उचक्का सभ सभटा लुटि-ढ़गेरि कऽ लऽ जाएत। अपने नै रहने क्लीनिको नहिये चलत। अखन जँ रमेशोकेँ अबैले कहबै, सेहो केना हएत? काल्हिये तँ ओहो ज्वाइन केलकहेँ। अगर जँ ओकरा माइयेकेँ अबैले कहबनि तँ ओहो जपाले। किएक तँ रोज देखै छिऐ अपहरणक घटना। हड़बड़बैत कम्पाउण्डर कहलकनि- “अहाँ दुआरे हमहूँ नै मारि खाएब। हम जाइ छी।
अधमड़ू भेल हेमन्त- “दू मिनट रुकह। कपड़ा बदलै छी।
हाँइ-हाँइ कऽ हेमन्त कपड़ा बदलि, बैगमे लुंगी, गमछा, शर्ट, पेन्ट, गंजी रखि बिदा भेलाह। रिक्शापर चढ़िते रहथि आकि पुलिसक गाड़ी पहुँचि‍ गेल। तते हड़बड़ा कऽ बिदा भेल रहथि जे मोबाइल, घड़ी, दाढ़ी बनबैक वस्तु छुटिये गेलनि। पुलिसक गाड़ी देखि जे हड़बड़ा कऽ रिक्शापर चढ़ैत रहथि आकि चश्मा गिरि पड़लनि। जेकर एकटा शीशो आ फ्रेमो टूटि गेलनि। पुलिसक गाड़ीकेँ घुमैत देखि मनमे शान्ति एलनि। रिक्शापर चढ़ि थोड़े आगू बढ़ला आकि डाॅक्टर सुनीलकेँ बच्चा सबहक संग बजारसँ डेरा जाइत देखलखिन। सुनील बाबूकेँ देखि कम्पाउण्डरसँ पुछलखिन- “सुनीलबाबू सभकेँ ड्यूटी नहि भेटिलनि अछि, की?”
कने काल चुप रहि कम्पाउण्डर कहलकनि- “नीक-नहाँति तँ नञि बुझल अछि मुदा बूझि पड़ैए जे, जे सभ अस्पतालमे बेसी समए दइ छथिन हुनका सभकेँ छोड़ि देल गेलनि अछि।
कम्पाउण्डरक बात सुनि डाॅ. हेमन्तकेँ अपनापर ग्लानि भेलनि। मन पड़लनि सुनील बाबूक परिवार आ जिनगी। सुनील बाबू सेहो डाॅक्टर। दू भाँइक भैयारी। पितो जीविते। चारि बहि‍न। जे सभ सासुर बसैत। बहि‍न सबहक सासुर देहातेमे। जइ ठाम पढ़ै-लिखैक नीक बेवस्था नहि। ओना अपनो सुनीलबाबू गामेमे रहि पढ़ने रहथि। डाॅक्टरी पास केलापर गाम छोड़लनि। भाँइयो दरभंगेक हाइ स्कूलमे शिक्षक। परिवारो नमहर। किएक तँ माए-बापक संग दुनू भाइक पत्नी आ बच्चा। तइ परसँ चारु बहि‍नक पढ़ै-लिखैबला बच्चा सभ। सुनीलबाबूक जिनगी आन डाॅक्टरसँ भिन्न। मात्र दू घंटा अपन क्लीनिक चलबैत। आठ घंटा समए अस्पतालमे दैथि। अपना क्लीनिकमे चारिटा कम्पाउण्डर आ जाँच करैक सभ यंत्र रखने। जाँच करैक पाइमे सभ कम्पाउण्डरकेँ परसेनटेज दैथि। जइसँ काजो अधिक होइत। कम्पाउण्डरोकेँ नीक कमाइ भऽ जाइत तँए इमानदारीसँ श्रम करैत। ओना सभ काज कम्पाउण्डरे कऽ लैत मुदा हिसाब-बाड़ी आ जाँचक चेक अपनेसँ करैत। जइसँ अस्पतालोक जाँच करौनिहार दोहरा कऽ अबैत। आ आन-आन प्राइवेट खानगी जाँच घरक काज सेहो पतराएल। ततबे नहि डाॅ. सुनीलक चरचा सीतामढ़ी, दरभंगा, सुपौल आ समस्तीपुर जिलाक गाम-गामक लोकक बीच होइत। जहिना धारक पानि शान्त आ अनबरत चलैत रहैत, तहिना सुनीलक परिवार। कोनो तरहक हड़-हड़ खट-खट परिवारमे कहियो नै होइत। डाॅक्टर सुनीलक परिवारक संबंधमे सोचैत-सोचैत डाॅक्टर हेमन्त अपनो परिवारक संबंधमे सोचए लगलाह। मन पड़लनि पिता। जे बंगालसँ डाॅक्टरी पढ़ि गामेमे प्रैक्टीश शुरू केलनि। किएक तँ सरकारी अस्पताल गनल-गूथल। मुदा रोगीक कमी नहि। कमी इलाज आ इलाज कर्ताक। नमहर इलाका। दोसर डाॅक्टर नहि। गाम-घरमे ओझा-गुनी, झाँड़-फूँक, जड़ी-बुट्टीसँ इलाज चलैत। ओना हेमन्तक पिता डाॅक्टर दयाकान्त सभ रोगक जानकार, मुदा तीनिये तरहक रोगक टुटल हाथ-पएरक पलस्तर, साँपक बीख उताड़ब आ बतहपन्नीक इलाजसँ पलखति नहि। तँए ओझो-गुनीक चलती पूर्ववते। कमाइयो नीक। जइसँ दू महला मकानो आ पचास बीघा खेतो किनलनि। तीनू बेटोकेँ खूब पढ़ौलनि। जेठका वकील, मझिला डाॅक्टर आ छोटका प्रोफेसर। जाधरि दयाकान्त जीबैत रहलखिन ताधरि गामो आ इलक्कोमे सुसभ्य आ पढ़ल लिखल परिबारमे गिनती होन्‍हि‍। तीनू भाँइयोक बीच अगाध सि‍नेह। जेठ-छोटक विचार सबहक मनमे। जइसँ माइयो-बाप खुशी। ओना माए पढ़ल-लिखल नहि मुदा परम्परासँ सभ बुझैत। जखन कि पिता आधुनिक शिक्षा पाबि आधुनिक नजरिसँ सोचैत। तीनू भाँइक मेहनति देखि पिताकेँ ई खुशी होइत जे परिवारक गाड़ी आगू मुँहे नीक जकाँ ससरत। बेटा सबहक बिआह इलाकाक नीक-नीक परिवारमे पढ़ल-लिखल लड़कीक संग केलनि। दहेजो नीक भेटलनि।
दयाकान्त मरि गेलखिन मुदा स्त्री जीविते। तीनू भाँइ अपन-अपन जिनगीमे ओझराएल। अपन-अपन परिवारक संग रहैत, घरपर खाली माइये टा। तीनू भाँइक परिवारक गारजनी स्त्रीक हाथमे। एक-दोसरसँ आगू बढ़ैक सदिखन प्रयास करैत। जइसँ गामक संपतिपर नजरि जाइ लगलनि। गामक सम्पति अधिकसँ अधिक हाथ लगए ऐ भाँजमे बौद्धिक व्यायाम नीक-नहाँति करैत। मुकदमा बाजी शुरू भेल। एकटा कोठरी आ दू बीघा खेत माएकेँ कोटसँ भेटलनि। बाकी घरो आ खेतो जब्त भऽ गेल। एक सए चौवालीस लगि गेलै। पुलिसक ड्यूटी भऽ गेलै। बीस बर्खक बाद डाॅक्टर हेमन्त लिखि कऽ कोर्टमे दऽ देलखिन जे हमरा ऐ सम्पतिसँ कोनो मतलब नहि।
दरभंगा प्लेटफार्मपर डाॅ. हेमन्त देखलनि जे दर्जनो डाॅक्टर जा रहल छी। दरजनो कम्पाउण्डरो छै। मुदा सबहक मुँह लटकल। एक्को मिसिया मुँहमे हँसी नहि। जहिना ठनका ठनकलापर सभ अपने-अपने माथपर हाथ रखि साहोर-साहोर करैत तहिना बाढ़िक इलाकाक ड्यूटीसँ सबहक मनपर भारी बोझ, जइसँ सभ मने-मन कबुला-पाती करैत। हे भगवान, हे भगवान करैत। कियो-केकरो टोकथि नहि। आँखि उठा कऽ देखि फेर निच्चा कऽ लेथि।
निरमली जाइवाली गाड़ी पहुँचल। गाड़ी पहुँचिते सभ हड़बड़ करैत, अपनो आ समानो सभ उठा-उठा गाड़ीमे चढ़ौलनि। हेमन्तो चढ़लाह। कम्पाउण्डरकेँ बीड़ीक तृष्णा लगलै। ओ दुनू कार्टून समान चढ़ा उतरि कऽ पानक दोकान दिस बढ़ल। तइ काल पनरह-बीसटा तरकारीबाली आबि, डिब्बामे कियो छिट्टा चढ़बैत तँ कियो मोटा। तेसर यात्री सभ, तरकारीवालीक काँइ-कच्चर सुनि-सुनि आगू बढ़ि जाइत। कम्पाउण्डरो हाँइ-हाँइ कऽ चारि दम बीड़ी पीबि, दौगल आबि बोगीक आगूमे ठाढ़ भऽ गेल। तरकारीवाली सबहक झुण्ड देखि कम्पाउण्डरकेँ मनमे हुअए लगलै जे हमरा चढ़िये ने हएत। चुपचाप निच्चाँमे ठाढ़। गाड़ीक भीतर बैसल एकटा पसिन्जर उठि कऽ आबि एकटा मोटाकेँ निच्चाँ धकेल देलक। जइ तरकारीवालीक मोटा खसल रहै ओ ओइ आदमीक गट्टा पकड़ि निच्चा उतारल। निच्चा उतरिते घोरन जकाँ सभ तरकारीवाली लुधकि गेल। गारियो खूब पढ़लक आ मारबो केलक। बोगीक मुँह खाली देखि कम्पाउण्डर चढ़ि गेल। गाड़ीकेँ पुक्की दइते सभ हाँइ-हाँइ कऽ चढ़ए लगल मुदा झगड़ा नै छुटलै। गारि-गरौबलि होइते रहल। जते हल्ला सौंसे गाड़ीमे, लोकक बजलासँ होइ ओते खाली ओइ एक्के डिब्बामे होइ। अकछि कऽ डाॅक्टर हेमन्त सीट परसँ उठि समान रखैबला उपरकापर जा कऽ बैगकेँ सिरमामे रखि सूति रहलाह। ओंघराइते अपना जिनगीपर नजरि गेलनि। मने-मन सोचै लगलाह जे पिताजी तँ हमरे सबहक सुखले ने ओते सम्पति अरजलनि। मुदा की हमरा सभकेँ ओइ सम्पतिसँ सुख होइ अए? अपनो कमाइ तँ कम नहि अछि। मुदा चौबीस घंटाक दिन-रातिमे चैनसँ कते समए बीतैत अछि? जहिना खाइ काल फोन अबै अए तहिना सुतै काल। की यएह छी सुखसँ जिनगी बिताएब? मुदा ऐ प्रश्नक उत्तर सोचमे ऐबे ने करनि। फेर मन उनटि कऽ जिनगीक पाछू मुँहे घुरलनि। मनमे एलनि जे, जे माए धाकड़ सन-सन तीन बेटाक छी, बेचारीकेँ कियो एक लोटा पानि देनिहार नहि। किएक नहि बेचारीक मनमे उठैत हेतनि जे ऐ बेटासँ बिनु बेटे नीक? हमरो ऐना नै हएत, तेकर कोन गारंटी।
गाड़ी घोघरडिहा पहुँचल। यात्री सभ उतरबो करए आ बजबो करए जे किसनीपट्टीसँ आगू लाइन डूबि गेल छै, तँए गाड़ी आगू नै बढ़त। कम्पाउण्डर उठि कऽ हेमन्तक पाएर डोलबैत बाजल- “डाॅक्टर सहाएब, नीन छिऐ।
“नै
“सभ उतरि रहल अछि। गाड़ी आगू निरमली नञि बढ़त। उतरि जाउ?”
कम्पाउण्डरक बात सुनि हेमन्तक मनमे अस्सी मन पानि पड़ि गेलनि। मुदा उपाए की? अधमड़ू जकाँ उतरलथि। प्लेटफार्मपर रिक्शाबला, टमटमबला हल्ला करैत जे कोसीक पछबरिया बान्हपर जाएब।
एकटा रिक्शाबलाकेँ हाथक इशारासँ कम्पाउण्डर सोर पाड़ि पूछलक- “हम सभ लछमीपुर जाएब। तोरा बुझल छह?”
रिक्शाबला- “हमरो घर लछमियेपुर छी। बाढ़िक दुआरे ऐठाम रिक्शा चलबै छी।
कम्पाउण्डर- “ऐ ठीनसँ कना-कना रस्ता हेतै?”
रिक्शाबला- “ऐ ठीनसँ हम बान्हपर दऽ आएब। ओइ ठीनसँ नौ भेटत, जे लछमीपुर पहुँचा देत। ऐ ठीनसँ हम नेने जाएब आ अपने भाइयक नौपर चढ़ा देब।
कम्पाउण्डर- “बड़बढ़िया, कार्टून चढ़ाबह।
सभ कियो रिक्शापर चढ़ि बिदा भेल। पुबरिया गुमती लग, जइठाम चाउरक बड़का मिलक खंडहर अछि, पहुँचि रिक्शावलाकेँ हेमन्त पुछलखिन- “लछमीपुर केहेन गाम अछि?”
रिक्शाबला- “बड़ सुन्दर गाम अछि। सन्मुख कोसीसँ मील भरि पछिमे अछि। गामक सभ मेहनती। बाढ़िक समएमे हम सभ रिक्शा चलबै छी आ जखन
पानि‍ सटकि जाइ छै तखैन जा कऽ खेती करै छी। गाइयो-महींस पोसने छी। कते गोरे नौ चलबैए आ कते गोरे मछबारि करैए। हमरा गामक लोक पंजाब, डिल्ली
नञि जाइए। आन-आन गाममे तँ पंजाब, डिल्लीक धरोहि लागि जाइ छै। से हमरा गाममे नञिए। माछक नाम सुनिते कम्पाउण्डर पुछलक- “तब तँ माछ खूब सस्ता हेतह?”
“हँ, कोनो की जीरा रहै छै। सभ अनेरुआ। एहेन सुअदगर माछ शहर-बजारमे थोड़े भेटत। शहर-बजारक माछ तँ सड़ल-सुड़ल पानिक डबरा महक रहैए।
कोसीक पछबरिया बान्हपर पहुँचते रिक्शाबला अपन भाइयक घाटपर रिक्शा लऽ गेल। भाइयक रिक्शा देखिते भागेसर नाव परसँ बान्हपर आएल। दुनू भाँइ दुनू कार्टून नावपर रखलक। अधा नावपर तख्ता बिछौने आ अधा ओहिना। तख्तापर पटेरक पटिया बिछाओल। नावपर बैसि हेमन्त पूब मुँहे तकलनि तँ बूझि पड़लनि जे समुद्रमे जा रहल छी। सौंसे देह सर्द भऽ गेलनि। मनमे डर पैसि गेलनि जे केना ऐ पानि‍मे जाएब। मन पड़लनि दरभंगाक पीच परक कार। मुदा एक्सिडेंट तँ ओतौ होइ छै। ओतौ लोक मरैत अछि। फेर मनमे एलनि जे महेन्द्रूक नाव जकाँ नावमे इंजनो नै छै। जँ कहीं बीचमे लग्गी छुटि-टुटि जेतै तँ भसिये जाएब। कतऽ जाएब कतऽ नहि। अनायास मनमे एलनि जे अखन धरि कम्पाउण्डरकेँ नोकर जकाँ बुझै छेलिऐ ओ उचित नहि। ई तँ छोट भाइक तुल्य अछि। नव विचार मनमे उठिते कम्पाउण्डरकेँ कहलखिन- “बौआ, धन्य अछि ऐठामक लोक। जे सचमुच देवीक पूजो करैत अछि आ लड़बो करैत अछि। किएक ने जिबठगर हएत।
नौ खुगलै, मांगि सोझ कऽ नञिया –नाविक कमलेसरीक गीत उठौलक। नञियाक लग्गी उठबैत आ पानि‍मे रखैत देखि हेमन्त मने-मन सोचए लगलाह जे एहेन मेहनति केनिहारकेँ कोन जरुरत दवाइ आ व्यायामक छैक। मन पड़लनि रामेश्वरम। समुद्रक झलकैत पानि। जहिमे लहरि सेहो उठैत। तहिना तँ ओहूठाम पानिक लहरि अछि। फेर मन पड़लनि जेसलमेरक बाउल। एहिना उज्जर धप-धप कतौसँ कतौ बाउल। कमलेसरीक गीत समाप्त होइते नाविक कोसीक गीत उठौलक। अजीब साजो। जहिना नावमे खट-खटक अवाज तहिना लग्गीक। लग्गीक पानि‍ देहोपर खसै मुदा तँए की ओकर पसीना निकलब रुकलै।
डाॅ. हेमन्तक मन फेर उनटलनि। मिलबै लगलाह समुद्रक लहरि आ कोसीक धाराक। समुद्र रूपी समाजमे सेहो समुद्र जकाँ लहरियो उठैत अछि आ धारक बेग जकाँ सेहो रहैत अछि। कहियो काल समुद्रक लहरि जकाँ सेहो लहरि समाजमे उठैत अछि मुदा ओ धीरे-धीरे असथिर भऽ जाइत अछि। मुदा कोसीक धार जकाँ जे बेग चलैत ओ पैघसँ पैघ पहाड़केँ तोड़ि धारो बना दैत आ समतल खेतो। पुरानसँ पुरान गामक अधला परम्पराकेँ तोड़ि नवमे बदलि दैत। जहिना मौसम बदललापर गाछक पुरान पात झड़ि नव पातसँ पुनः लदि जाइत, तहिना। असीम विचारमे डुमल हेमन्तक मुँह अनायास नाविककेँ पुछलक- “कते दूर अहाँक गाम अछि?”
नञिया- “छअ कोस।
“कते समए जाइमे लागत?”
“भट्ठा दिस जाएब। तँए जलदिये पहुँचि‍ जएब।
जल्दीक नाम सुनि हेमन्तक मनमे आशा जगल। मुदा ओ आशा लगलेमे जाए लगलनि। किएक तँ सौंसे पाइनिये देखथि, गाम-घरक कतौ पता नहि। चिन्तित भऽ चुपचाप भऽ गेलाह। अपना सुइढ़मे नञिया गीत गबैत। मनमे कोनो विकारे नहि। मुदा हेमन्तकेँ कखनो गीत नीको लगनि आ कखनो झड़कबाहियो उठनि। तइ काल एकटा मुरदा भसल जाइत। सबहक नजरि ओइ मुरदापर पड़ल। मुरदा देखि हेमन्तक नजरि अस्पतालक मुरदापर गेलनि। मुदा दुनूक दू कारण। एकक जिनगीक अंत रोगसँ तँ दोसराक बाढ़िसँ। नब-नब समस्या उठि-उठि हेमन्तक मनकेँ घोर-मट्ठा कऽ देलकनि। मनक सभ विचार हराए लगलनि। तइ बीच एकटा किलो चारिएक रौह माछ कुदि कऽ नावमे खसल। माछ देखि हेमन्तोक आ कम्पाउण्डरोक मन चट-पट करए लगलनि। लग्गीकेँ मांगिपर राखि भागेसर माछकेँ पकड़ि, पानि उपछैबला टीनमे रखलक। माछकेँ टीनमे रखि नञिया बाजल- “अहाँ सबहक जतरा बनि गेल।
नञियाक शुभ बात सुनि हेमन्तक मन फेर ओझरा गेलनि। मनमे उठए लगलनि जे यात्रा केकरा कहबै। घरसँ बिदा भेलौं, तकरा कहियै आकि कार्यस्थल तक पहुँचैकेँ कहियै आकि काज सम्पन्न कऽ घर पहुँचलापर, तकरा। तहूसँ आगू जे काजक बीचोमे नव काज उत्पन्न भऽ जाइत। फेर नञियाकेँ पुछलखिन- “आब कते दूर अछि?”
हाथ उठा आंगुरसँ दछिन दिस देखबैत कहलकनि- “वएह हमर गाम छी। गोटे-गोटे जमुनीक गाछ देखै छिऐ। अधा कोस करीब हएत।
अधा कोस सुनि कम्पाउण्डर चहकि कऽ बाजल- “डाॅक्टर सहाएब, पाँच बजैए। अधा घंटा आरो लागत। साढ़े पाँच बजे तक पहुँचि जाएब।
भने सबेरे-सकाल पहुँचि जाएब। मुदा अकासमे चिड़ै सभ नहि उड़ैत। किएक तँ चिड़ै ओइठाम उड़ैत जहि ठाम रहैक ठौर होइत। मुदा से तँ नहि। सौंसे बाढ़िये पसरल। मुदा तैयो गोटे-गोटे मछखौका चिड़ै जरुर उड़ैत। लछमीपुर दिस अबैत नावकेँ देखि गामक धियो-पुतो, स्त्रीगणो आ गोटे-गोटे पुरुखो घाटपर ठाढ़ भऽ एक दोसरसँ कहैत।
“चाउर-आँटाबला छिऐ।
“नुओ-बसतर हेतै।
“तिरपालो हेतै।
“बड़का हाकीम सभ छिऐ।
घाटपर आबि नाव रुकल। मुदा पेंट-शर्ट पहिरने डाॅक्टर आ कम्पाउण्डरकेँ देखि जनिजाति सभ मुँह झापए लागलि। मरद सभ सहमि गेल। घीया-पुता डरा गेल। नावकेँ बान्हि नञिया सुलोचनाकेँ कहलक- “गै सुलोचना डाकडर सैब सभ छथिन। बक्सामे दवाइ छिऐ। हम दवाइ उताड़ै छी तूँ टीन उतार। टीनमे एकटा नमहर माछ छौ। खूब नीक जकाँ माछकेँ तरि डाकडर सहैबकेँ खुआ दहुन।
माछ उतारि सुलोचना अंगना लऽ गेल। टीन रखि बाड़ीक कलपर आबि हाथ धोए, आँचरसँ हाथ पोछि, इसकूलक ओछाइन झाड़ि बिछबै लागलि। बिछान बिछा, दौड़ि कऽ आंगनसँ बड़का जाजीम आ दूटा सिरमा आनि लगौलक। हेमन्तो आ दिनेशो आगूमे ठाढ़। मुदा ओते लोकक बीच हेमन्तोक आ दिनेशोक नजरि सुलोचनेक देह आ काजपर नचैत। बिछान बिछा सुलोचना हेमन्तकेँ कहलकनि- “डाॅक्टर सहाएब, बिछान बिछा देलौं, आब आराम करु।
दिनेश चुप्पे। मुदा हेमन्त बजलाह- “बुच्ची, देह भारी लगैए। ओना नावपर आरामेसँ एलौं। मुदा तैयो देह भरिआएल लगैए। पहिने नहाएब।
“बड़बढ़ियाकहि सुलोचना आंगन बाल्टी-लोटा अानए गेलि। आंगनसँ बाल्टी-लोटा नेने कलपर पहुँचल। दुनूकेँ माटिसँ माँजि, बाल्टीमे लोटा रखि, पानि‍ भरि, हेमन्तकेँ कहलक- “डाॅक्टर सहाएब, नहा लिअ।
चहारदेबालीसँ घेरल टंकीपर नहाइबला डाॅक्टर हेमन्त खुला धरती-अकासक बीच नहाइले जएताह। तँए किछु सोचै-बिचारैक प्रश्न मनमे उठि गेलनि। मुदा बहुत सोचैक जरुरत नहि पड़लनि। अपना-अपना उमरबला सभकेँ डोरीबला पेंट तइ परसँ केकरो लुंगी तँ केकरो चारि हत्थी तौनी पहिरने देखलखिन। ओहो सएह केलनि। मुदा बारह बर्खक सुलोचना कल परसँ हटल नहि। मातृत्वक दुआरिपर पहुँचल सुलोचनामे फुलक टूस्सी जरुर अबि गेल छलै। मुदा हेमन्तोक मनमे डाॅक्टरक विचार। ओना डाॅक्टर हेमन्त शरीरक सभ अंगक गुण-धर्म बुझैत मुदा एहनो तँ वस्तु अछि जे गर्म हवाक रूपमे रहैत। जहिमे आनन्द आ सृजनक गुण होइत। सुलोचनोमे फूलक कोढ़ीक जे सुगंधक वाल्यावस्थामे प्रस्फुटित होइत, महमही हवामे। एक लोटा माथपर पानि ढारलाक बाद हेमन्तक मनमे आएल जे अखन हम दुनियाक ओइ धरतीपर छी जहि ठाम जीवन-मरण संगे रहैत अछि। मुदा तहिठाम एहेन सौम्य, सुशील अल्हड़ बाला कते खुशीसँ चहचहा रहल अछि।
तीन साल पहिलुका बात छिऐ। जहि बाढ़िमे कतेक गाम, कतेको मनुष्य आ कतेको सम्पति नष्ट भेल छल। तँए की? जे बचल अछि ओ ओइ गामकेँ छोड़ि देत। कथमपि नहि। मुदा बाढ़ि अनहोनी नै रहै। बरेजक फाटक खोलल गेलै। फाटको खोलैक मजबुरी रहै। किएक तँ बरेजक उत्तर तते पानिक आमदनी भऽ गेलै जे दुर्दशाक अंतिम शिखरपर पहुँचि‍ सकैत छलै। मुदा सुदूर गाममे जानकारीक साधन नहि। ने बँचैक उपए। कोसीक दुनू बान्हक बीच समुद्र जकाँ पानि पसरि गेलै। थाहसँ अथाह धरि। कुनौलीसँ दछिन, कोसी धारक कातमे एकटा गाम। ओइ गामक सुलोचना। जेकर सभ कुछ मनुखसँ घर धरि दहा गेलै। मुदा सुलोचना जे बँचल से पढ़ैले कुनौली गेल छलि। स्कूलसँ घर जाइ काल बाढ़िक दृश्य देखलक। दृश्य देखि बान्हेपर बपहारि कटए लागलि। तइ काल लछमीपुरक चारि गोटे, बजारसँ समान खरीद नाव लग अबैत रहए। सुलोचनाकेँ कनैत देखि जीयालाल पुछलकै- “बुच्ची, किअए कनै छेँ?”
कनैत सुलोचना- “बाबा, हम पढ़ैले गेल छेलौं। तै बीच हमर गामे दहा गेल। आब हम कतऽ रहब?”
जीयालाल- “हमरा संगे चल। जहिना बारहटा पोता-पोतीकेँ पोसै छी तहिना तोरो पोसबौ।
जीयालालक विचार सुनि सुलोचनाक हृदएमे जीवैक आशा जगल। कानब रुकि गेलै। मुदा कखनो-काल हिचकी होइते। नावपर सभ समान रखि चारु गोटे बान्हपर आबि चीलम पीबैक सुर-सार करए लगल। एक भागमे सुलोचनो किताब नेने बैसलि। बटुआ खोलि रघुनी चीलम, कंकड़क डिव्वा आ सलाइ निकालि बीचमे रखलक, एक गोटे चीलमक ठेकी निकालि, चीलमो आ ठेकियोकेँ साफ करए लगल। दोसर गोटे डिब्बासँ कंकड़ निकालि तरहत्थीपर औंठासँ मलए लगल। चीलम साफ भेलै। ओइमे ठेकी दऽ कंकड़बला हाथमे देलक। कंकड़बला चीलममे कंकड़ बोझि दुनू हाथसँ चीलमक पैछला भाग पकड़ि मुहमे भिरौलक। मुँहमे भिरबिते रघुनी सलाइ खरड़ि कंकड़मे लगबै लगल। दू-चारि बेर मुँहक इंजनसँ प्रेशर दैते चीलम सुनगि गेल। चीलमकेँ सुनगिते तते जोरसँ दम मारलक जे धुआँक संग-संग धधरो उठि गेलै। मुदा चीलमक दुषित हवासँ धधरा मिझा गेल। बेरा-बेरी चारु चीलम पीबि मस्त भऽ नाव दिस बिदा भेल। साँझू पहरकेँ जहिना गाए-महींस बाधसँ घर दिस अबैत। जेकरा पाछू-पाछू छोट-छोट नेरु पड़ड़ू झुमैत, लुदुर-लुदुर मगन भऽ चलैत, तहिना सुलोचना लछमीपुरबला सबहक संगे पाछू-पाछू नावपर पहुँचल। नावपर चढ़िते लग्गा चलौनिहार कोसी महरानीक दुहाइ देलक। सुलोचनो बाजलि- “जय।
नाव खुगल। लछमीपुरक चारु गोटेक मन सुलोचनाक जिनगीपर। मुदा सुलोचनाक परिवारक बिछोह दुखसँ सुख दिस जाए लगल। जे सुलोचना गाम आ परिवारक कतौ अता-पता नञि देखलक, ओइ सुलोचनाक मनमे उठए लगल जे गाम-घर भलहि‍ं दहा गेल मुदा माए-बाप जरुर जीवैत हएत। किएक तँ मनुक्ख निर्जीव नहि सजीव होइत। बुधि‍-विवेक होइत। तँए ओ दुनू गोटे जरुर कतौ जीबैत हएत। जे आइ नै काल्हि जरुर मिलबे करत। तँए मनमे जिनगी भरिक दुख नहि, किछु दिनक
दुख अछि। जे कहुना नहि कहुना कटिये जाएत। नाव लछमीपुर पहुँचल। जीयालालक बारहोटा पोता-पोती दौड़ि कऽ नाव लग आइल। पोता-पोतीकेँ देखि जीयालाल कहलक- “बाउ, तोरा सभले एकटा बहि‍न नेने ऐलियह। सुलोचना पोता-पोती सबहक पहुन भऽ गेलि। दोसर दिन जीयालाल एकटा घर बना, सुलोचनाकेँ गामक बच्चा सभकेँ पढ़बैले कहलक। गामक बच्चा सभकेँ सुलोचना पढ़बै लागलि। वएह सुलोचना।
हेमन्तो दिनेशो नहाएल। नहाकेँ जाबे हेमन्त कपड़ा बदलि, केश सरिया, तैयार भेलाह ताबे सुलोचनो आ जीयालालक जेठकी पोती कमलियो चूड़ा भूजि, माछ तड़ि लेलक। दूटा थारीमे चूड़ाक भुजा आ तड़ल माछ साँठि दुनू बहि‍न दुनू थारी नेने हेमन्त लग पहुँचि आगूमे रखि देलक। बड़का फुलही थारी तइमे चूड़ाक उपरमे माछक नमहर-नमहर तड़ल कुट्टिया पसारल। थारी रखि कमली पानि‍ अानए गेलि। सुलोचना आगूमे बैसि गेलि। दुनू गोटे खाइत-खाइत दसो माछक कुट्टिया आ थारियो भरि चूड़ा खा लेलनि। शुद्ध आ मस्त भोजन। पानि पीबि ढकार करैत दिनेश बाजल- “डाॅक्टर सहाएब, आइ धरि हम एते नञि खेने छलौं।
हेमन्त- “से तँ हमरो बूझि पड़ैए।
सुलोचना- “डाॅक्टर सहाएब, चाहो पीबै?”
हेमन्त- “पीबै तँ जरुर मुदा दू घंटाक बाद। ताबे किछु काज करब। ओना साँझ पड़ि गेल मुदा जाबे फरिच छै ताबे दसो-पाँचटा रोगी जरुर देखि लेब।
सुलोचना- “अच्छा, अहाँ तैयार होउ, हम रोगीसभकेँ बजौने अबै छी।
कम्पाउण्डर कार्टून खोलि, दवाइ निकालि पसारि देलक। रोगी अाबए लगल। रोगी देखि-देखि हेमन्त कम्पाउण्डरकेँ कहैत जाथिन आ कम्पाउण्डर दबाइ दैत जाए। अस्पताल जकाँ तँ सभ रंगक रोगी नहि। किएक तँ बाढ़िक इलाका तँए गनल-गूथल रोग। दवाइयो तेहने। तीनिये दिनमे सौंसे गामक रोगीकेँ देखि डाॅक्टर हेमन्त निचेन भऽ गेलाह। मुदा सात दिनक डयूटी। तहूमे कठिन रास्ता। मुदा पानि‍ टुटए लगलै। पाँचम दिन जाइत-जाइत रास्ता सूखि गेल। मुदा थाल-खिचार रहबे करै।
आठम दिन भोरे हेमन्त सुलोचनाकेँ कहलखिन- “बुच्ची, आइ हम चलि जाएब।
सुलोचना- “ई तँ मिथिला छिऐ डाॅक्टर सहाएब, बिना किछु खेने-पीने कना जाएब?”
कहि सुलोचना चाह बनबै गेलि। एकटा दोस्तसँ भेँट करए कम्पाउण्डर गेल। असकरे हेमन्त। मने-मन सोचै लगलथि जे सात दिनक समए जिनगीक सभसँ कठिन आ आनन्दक रहल। ई कहियो नै बिसरि सकै छी। बिसरैबला अछियो नहि। आइ धरि एहेन जिनगीक कल्पनो नञि केने छलौं, जे बीतल। एहेन मनुक्खक सेवो करैक मौका पहिल बेर भेटल। मौके नहि भेटल, बहुत किछु देखैक, भोगैक आ सीखैक सेहो भेटल। आइ धरि हम रोगीक, सचमुच जेकरा जरुरत छै, सेवा नञि केने छलौं, खाली पाइ कमेने छलौं। गाम-घरमे जेकरा पाइ छै वएह ने दरभंगा इलाज करबै जाइत अछि। जेकरा पाइ नञि छै ओ तँ गामेमे छड़पटा कऽ मरैत अछि।
तइ बीच सुलोचना चाह नेने आइलि। कप बढ़बैत बाजलि- “मन बड़ खसल देखै छी, डाॅक्टर सहाएब।
हेमन्त- “नहि! कहाँ। एकटा बात मनमे आबि गेल तँए किछु सोचै लगलौं।
सुलोचना- “ऐ ठीन केहेन लगै अए डाॅक्टर सहाएब?”
सुलोचनाक प्रश्नक उत्तर नहि दऽ हेमन्त चुप्प रहलाह।
हेमन्तकेँ चुप देखि सुलोचना बाजलि- “हम तँ बच्चा छी डाॅक्टर सहाएब तँए बहुत नै बुझै छी। मुदा तैयो एकटा बात कहै छी। जहिना चीनी मीठ होइत अछि आ मिरचाइ कड़ू। दुनूमे कीड़ा फड़ै छै आ ओइमे जीवन-यापन करैत अछि। मुदा चीनीक कीड़ाकेँ जँ मिरचाइमे दऽ देल जाए तँ एको क्षण नञि जीवित रहत। उचितो भेलै। मुदा की मिरचाइक कीड़ा चीनीमे देलाक बाद जीवित रहत? एकदम नञि रहत। तहिना गाम आ बाजारक जिनगी होइत।
सुलोचनाक बात सुनि डाॅक्टर हेमन्त मने-मन सोचए लगलथि जे बात ठीके कहलक। अहिना तँ मनुक्खोमे अछि। मुदा ओ हएत कना। जाबे समाजिक जीबनमे समरसता नञि आओत ताबे एहिना होइत रहत।
दस बजे भोजन कऽ दुनू गोटे -हेमन्त आ दिनेश- लुंगी, गंजी पहीरि सभ कपड़ो आ जूत्तोकेँ बैगमे रखि, पाएरे बिदा भेलाह। हेमन्तक बैग सुलोचना आ दिनेशक बैग कमली लऽ पाछू-पाछू चललि। किछु दूर गेलापर हेमन्त कहलखिन- “बुच्ची, आब तों सभ घुरि जा।
हेमन्तक बात सुनि सुलोचनाक आँखि नोरा गेल। डाॅक्टर हेमन्तकेँ बैग पकड़बैत बाजलि- “अंतिम प्रणाम, डाॅक्टर सहाएब।
एकाएक हेमन्तक हृदएसँ प्रेमक अश्रुधारा प्रवाहित हुअए लगलनि। मुँहसँ प्रणामक उत्तर नञि निकललनि। मूड़ी निच्चाँ केने आगू बढ़ि गेलाह। मुदा किछुए दूर आगू बढ़लापर बूझि पड़लनि जे चारिटा तीर -सुलोचना आ कमलीक आँखि- पाछूसँ बेधि रहल अछि। पाछू उनटिकेँ तकलनि तँ देखलखिन जे दुनू गोरे ठाढे़ अछि। मन भेलनि जे हाथक इशारासँ जाइले कहि दिअए मुदा अपना रूपपर नजरि पड़ि गेलनि। खाली पाएर जाँघ तक समटल –उलटा कऽ मोड़ल- लुंगी, देहमे सेन्डो गंजी, माथक केश फहराइत। तइ परसँ थालक छिटका घुट्ठीसँ लऽ कऽ माथ धरि पड़ल। हाथक इशारासँ सुलोचनाकेँ सोर पाड़लखिन। दुनू -सुलोचनो आ कमलियो- हँसैत आगू बढ़ल। लगमे देखि हेमन्तोक हृदएमे हँसी उपकल। मुस्की दैत हेमन्त- “बुच्ची, हम अपन दरभंगाक पता कहि दइ छिअह। अबिहह।
सुलोचना- “हम तँ शहर-बजारमे हराइये जाएब डाॅक्टर सहाएब। अहाँ जाबे हमरा गाममे छेलौं ताबे बूझि पड़ैत छल जे दरभंगा अस्पताल गामेमे अछि।
कहि पाएर छुबि घुरि गेल।
बान्हपर आबि दुनू गोरे थाल-कादो धोए, पेन्ट-शर्ट पहीरि स्टेशन दिस बढ़लाह। गाड़ी पकड़ि दरभंगा पहुँचि गेलथि।

पछताबा :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल


इंजीनियरिंगक रिजल्ट निकलिते रघुनाथ संगी-साथीक संग नोकरी करए अमेरिका जेबाक तैयारी कऽ नेने छल। सासुरसँ गाम आबि पिताकेँ कहलनि- “बाबू, आइये रौतुका गाड़ी पकड़ि चलि जाएब। परसू दस बजे, सुभाषचन्द्र एयरपोर्टसँ जहाज फ्लाइ करत।
जहिना पाकल आम तोड़ै लेल कियो गाछपर चढ़ैत अछि आ आम तोड़ैसँ पहिनहि खसि पड़ैत अछि, तहिना शिवनाथोकेँ भेलनि। अचंभित होइत कहलखिन- “किए? तोरा जोकर काज अपना ऐठाम नहि छै?”
पिताक बात सुनि कनेकाल गुम्म भऽ रघुनाथ बाजल- “ओइठाम अधिक दरमाहा दैत अछि। संगहि अपना ऐठामक रूपैयासँ ओतुका रुपैइयो महग छैक।
अमेरिकाक संबंधमे शिवनाथ किछु नहि जनैत खाली एतबे जनैत जे ओहो एकटा देश छी। किछु काल गुम्म रहि कहलखिन- “तइसँ की? हम ओइ वंशक छी जे देशक गुलामी मेटबए लेल गोली खाए स्वतंत्र देशक उपहार-भार देलनि। तोरा सन-सन पढ़ल-लिखल जँ देशसँ चलि जाएत तँ तोहर सनक काज के करत, केना हएत?”
पिताक बातकेँ अनसून करैत गोर लागि, बैग लऽ ओ चुपचाप विदा भऽ गेल। शिवनाथ दुनू परानीक नजरि ताधरि रघुनाथक पीठपर रहलनि जाधरि ओ गाछीक अढ़ नहि भऽ गेल। अढ़ होइते दुनूक मन ऐ रुपे चूर-चूर भऽ गेलनि जहिना अएनापर पाथरक लोढ़ी खसलासँ होइत अछि। अखन धरि दुनूक मनमे पैघ-पैघ अरमान पैघ-पैघ सपना छलनि जे एकाएक फुटल बैलूनक हवा जकाँ वायुमंडलमे मिलि गेलनि। बाढ़िक पानिमे डुमल खेतमे जहिना पानि सुखिते नव-नव पौधाक अंकुर उगए लगैत अछि तहिना शिवनाथोक मनमे नव-नव विचार उगए लगलनि। अखन दुनियाँ भलहि‍ं गामे-घरक रूपमे कि‍एक नहि बूझि पडै़त हुअए मुदा बापो बेटाक दूरी हजारो कोस हटि रहल अछि। की हम सभ फेर गुलामीक रस्ता पकड़ि रहल छी आकि आजादीक रस्ता धऽ चलि रहल छी। एक दिस‍ मातृभूमिक लेल पिताक तियाग आ दोसर दिसि बेटाक भटकल रस्ता अछि। भलहीं बेटाक आशा हुअए मुदा एहनो लोक तँ छथि जनिका बेटा नहि छन्हि। मन पड़लनि पिताक ओ बात जे मृत्युसँ चौबीस घंटा पहिने मृत्यु-सय्यापर कहने रहथिन - “बाउ, हमर खून वीरक खून छी जे भारतमाताकेँ चढ़ौलिएनि। भलहि‍ं अखन लड़ाइक दौड़ अछि मुदा ओ खून स्वतंत्रता लइएकेँ छोड़त। तोँ सभ स्वतंत्र देशक स्वतंत्र मनुष्य हेबह। तँए अपन देशकेँ परिवार बूझि सभकेँ भाए-बहि‍न जकाँ इमानदारीसँ सेवा करैत रहिहऽ। जइसँ हमर आत्मा अनबरत प्रसन्न रहत। सेवाक मतलब खाली एतबे नहि होइत जे देशक सीमाक रक्षा करैत अछि बल्कि ईहो होइत जे माथपर ईंटा उघि सड़क बनबैत आ हर-कोदारिसँ अन्न उपजबैत अछि।
पिताक बात मन पड़िते शिवनाथक हृदय तरल पानिसँ ठोस पाथर बनए लगलनि। नव-नव विचार मनमे जागए लगलनि। पत्नीक खसल मन देखि कहलखिन- “अहाँ, एते सोगाएल किए छी?”
आँचरक खूँटसँ दुनू आँखिक नोर पोछि रुक्मिणी कपैत अबाजमे बजलीह- “की सपना मनमे रहए आकि देखि रहल छी। जँ से बुझितिऐक तँ एत्ते देहकेँ किए धौजनि करितौं। नढ़िया-कुकुड़ जकाँ अनेर छोड़ि दैतिऐक।
पत्नीक व्यथा सुनि शिवनाथक हृदय पसीज गेलनि। मुदा अपन व्यथाकेँ मनमे दबैत मुस्कुराइत कहलखिन- “अखन धरिक जे जिनगी रहल ओ कर्तव्यनिष्ठ रहल। अपन कर्तव्य इमानदारीसँ निमाहलौं। सभकेँ अपना-अपना आशापर अपन जिनगी ठाढ़ कऽ जीबाक चाही। जहिना बरखाक एक-एक बुन्न रस्ता धए चलैत-चलैत अथाह समुद्रमे पहुँचि‍ जाइत अछि तहिना अपनो सभ अपन काजकेँ परिवारसँ आगू बढ़ा समाज रूपी समुद्रमे फेटि दी। बेटा अछि तँए बेटापर अपन भार देमए चाहैत छलौं मुदा जनिका अपना बेटा नहि छन्हि ओ केकरापर अपन भार देथिन। तँए अपनो सभ वएह बुझू! बाबूजी एते अरजि कऽ दऽ गेलथि जे इज्जतक संग हँसैत-खेलैत जिनगी जीबैत रहब।
सन् १९४२क असहयोग आन्दोलनसँ सुनगति-सुनगति सौंसे देश पजरि गेल। जइमे मिथिलांचलोक योगदान केकरोसँ कम नहि अछि। दसकोसी लोकक मन एत्ते उत्साहित भऽ गेलनि जे चान-सूर्जमे आजादीक झंडा फहराइत देखथि। सुतली रातिमे ओछाइनपर सँ चहा कऽ उठि नारा लगबैत सड़कपर आबि जाइत छलाह। जे मिथिला याज्ञवल्क्य, गौतम, नारद सन-सन ऋषि पैदा केलक ओ पंचानन झा आ पुरन मंडल सन वीर अभिमन्यु सेहो पैदा केने अछि। दसकोसीक वीर सिपाही माथमे कफन बान्हि, लाठीमे झंडा फहरा झंझारपुर सर्कल, रेलवे स्टेशन आ पोस्ट आफिसमे आगि लगबैक संग-संग रेल-लाइन तौड़ै लेल सर्कलक मैदानमे एकत्रित भेलाह। अंग्रेज पलटनक केन्द्र सर्कल छलैक। आन्दोलनकारीकेँ एकत्रित होइत देखि ओहो सभ अपन बन्दूकमे गोली भरि-भरि तैयार भऽ गेल। आन्दोलनकारी भारत माताक नारा जगबैत आगू बढ़ल। अनधुन गोली पलटन सभ चलौलक। एक नहि अनेक गोली पंचानन आ पुरनक छातीमे लगलनि। दुनू गोटे नारा लगबैत दम तोड़ि देलनि। सिर्फ दुइये टा गोटेकेँ गोली नहि लागल छलनि, अनेको गोटे गोलीसँ घाएल भेलाह। ओइ घाएलमे शिवनाथक पिता देवनाथो छलाह। दहिना जाँघमे गोली लागल छलनि। गोली तँ जांघक माँस, चमराकेँ कटैत हड्डी तोड़ैत निकलि गेलनि। मुदा घाइल भऽ ओहो खसि पड़लाह। पितिऔत भाए हुनकर लटकल जांघक माँसकेँ तौनीसँ बान्हि, पीठपर उठा घरपर अनलकनि। चिकित्साक समुचित व्यवस्था नहि, तइपर गामे-गाम सिपाही दमन शुरू केलक। गामक-गाम आगि लगौलक। मर्द-औरतकेँ पकड़ि-पकड़ि बन्दूकक कुन्दा आ पएरक बूटसँ मारि-मारि बेहोश केलकनि। ओछाइनपर पड़ल देवनाथक हृदयमे आगि धधकैत रहनि मुदा किछु करैक तँ शक्ति नहि रहि गेलनि। जीवन-मृत्युक बीच लटकल रहथि। तीसम दिन प्राण छूटि गेलनि।
दस बर्खक शिवनाथ १५ अगस्त १९४७ ई. केँ आजादीक समए पनरह बर्खक भऽ गेल। पतिक मुइने शिवनाथक माए राधाक मन टुटलनि नहि बल्कि आगिमे तपल सोना जकाँ आरो चमकए लगलनि। पाकल आमक आंठी जकाँ करेज आरो सक्कत भऽ गेलनि। गुलामीसँ मिझाइल दीपकेँ आजादीक नव तेल-बत्ती भेटलैक, जइसँ नव-ज्योति प्रज्वलित भेल। अखन धरिक अव्यवस्थित परिवारकेँ दुनू माए-बेटा मिलि सुढ़िअबए लगलथि, व्यवस्थित बनबए लगलथि। अढ़ाइ बीघा खेतकेँ अपन दुनियाँ आ कर्मक्षेत्र बूझि दुनू माए-बेटा जी-जानसँ मेहनत करए लगलथि, जइपर परिवार नीक नहाँति ठाढ़ भऽ गेलनि। ओना शिवनाथक बिआह बच्चेमे भऽ गेल छलैक मुदा दुरागमन पछुआएल रहैक। परिवारक बढ़ैत काज देखि बेटाक दुरागमन माए करा लेलनि।
देश आजाद होइते गामे-गाम स्कूल बनए लगल। ओना पढ़लो-लिखल लोक कम छलाह मुदा जतबे छलाह ओ ओइ रुपे विद्या-दानमे भीड़ि गेलाह, जइसँ सभ गाममे तँ नहि मुदा अधिकांश गाममे लोअर प्राइमरी स्कूल ठाढ़ भऽ गेल। कतौ-कतौ मिड्लो स्कूल आ हाइयो स्कूल बनल। कतौ-कतौ कओलेजो ठाढ़ भऽ गेल। अखन धरि जे स्कूल ठाढ़ भेल ओ सामाजिके स्तरपर, सरकारी स्तरपर बहुत कम बनल। स्कूल खोलैक पाछू लोकक मनमे धर्मस्थानक बुझब छलैक। गुरुओजी ओहने रहथि जे मात्र भोजनपर सेवा करैत रहथि। शनीचरा मात्र जीविकाक आधार छलनि। पाइ लऽ कऽ पढ़ाएब पाप बुझल जाइत छलैक। ओना मिड्ल स्कूल, हाइ स्कूल आ कओलेजमे महिनवारी फीस लगैत छल, जे संस्थागत सहयोग छल। स्कूल-कओलेज खुजने विद्याक ज्योति प्रज्वलित भेल मुदा अंडी तेलमे जरैत डिबियाक इजोत जकाँ, जखनकि जरुरी अछि हजार वोल्ट बौलक इजोत जकाँ। ओना ठाम-ठीम संस्कृत विद्यालय सेहो अछि, मुदा.....।
दुरागमनक तीन साल बाद शिवनाथकेँ बेटा भेलनि। रघुनाथक जन्म
होइते राधाक हृदय खुशीसँ सूप सन भऽ गेलनि। मनमे नचए लगलनि बाँसक ओ बीट जइमे दिनानुदिन बेसी बाँसोक जन्म होइत आ नमगर, मोटगर सुन्दर-सुडौलौ होइत। मनक खुशीसँ दुनियाँ फुलवारी सदृश बूझि पड़ए लगलनि। बाधक-बाध धानक फूल, गाछीक-गाछी आमक मंजर, जामुन, लताम इत्यादिक फूलसँ सजल ई दुनियाँ सोहनगर लगए लगलनि। मुदा जहिना आसिन मास अकासकेँ करिया मेघ झँपने रहैत अछि आ कतौ-कतौ मेघक फाटसँ सूर्यक इजोत निकलैत अछि आ सेहो गाछे-बिरीछपर अॅटकि जाइत अछि, तहिना। धरती-जमीन ओहिनाक-ओहिना अन्हार रहि जाइत अछि।
छबे मासक रघुनाथकेँ राधा अपन मुँह चमका-चमका दा-दा-दा सिखबए लगलीह। दादामे देवनाथक ओ रूप देखैत छलीह जे माथपर वीरक मुरेठा बान्हि, हरोथिया लाठीमे लाल झंडा टांगि, हँसैत गोली खेने रहथि।
चारि बर्ख टपिते शिवनाथ रघुनाथक नाओं गामक स्कूलमे लिखा देलखिन साले-साल टपैत रघुनाथ गामक स्कूल टपि गेल। मिड्ल स्कूल टपि साइंस राखि रघुनाथ केजरीवाल हाइ स्कूल झंझारपुरमे नाओं लिखौलक। जहिना विज्ञान विषए पढ़ैमे नीक लगै तहिना अंग्रेजिओ। जइसँ ठाकुर बाबू आ लत्ती बाबू बेसी मानथिन। चारि बर्खक बाद प्रथम श्रेणीमे मेट्रिक पास केलक। बाढ़ि-रौदिक द्वारे उपजो-बाड़ी नीक नहि होइ जइसँ परिवारो लड़खड़ाइते चलैत। बाहर जा कऽ आगू पढ़ब असंभव जकाँ रहैक। मुदा संजोग नीक रहलैक जे जनतो कओलेजमे साइंसक पढ़ाइ शुरू भेलैक। रघुनाथो कओलेजमे नाओं लिखौलक।
रघुनाथकेँ कओलेजमे नाओं लिखेलाक सालभरि उत्तर राधा -दादी- मरि गेलीह। पिताक श्राद्ध तँ शिवनाथ केनहि नहि रहथि मुदा माएक श्राद्ध नीक जकाँ केलनि। जइसँ पाँच कट्ठा खेतो बिका गेलनि। तइ लेल मन मलिन नहि भेलनि। किएक तँ भोजमे खूब जस भेलनि। दू सालक बाद रघुनाथ फस्ट डिविजनसँ आइ.एस.सी. पास केलक। सत्तरि प्रतिशतसँ उपरे नम्बर रहैक। आइ.एस.सी.क रिजल्ट सुनि शिवनाथकेँ बेटाक पढ़बैक उत्साह बढ़लनि। खेत बेचब अधलाह नहि बुझेलनि। मनमे अएलनि जे रघुनाथ पढ़ि कऽ नोकरी करत आकि खेती करत। तखन खेतक जरुरते की रहतैक। संगहि हमहूँ समाजकेँ एकटा सक्षम मनुष्य देबैक।
इंजीनियरिंग, डॉक्टरी पढ़बैमे केहेन खर्च होइत छैक से तँ नीक जकाँ
बुझथि नहि। मनमे होन्‍हि‍ जे पाँच-दस कट्ठा जमीन बेचि बेटाकेँ पढ़ा देबैक। मनमे उत्साह रहबे करनि तँए महग बूझि घराड़ि‍येमे सँ दू कट्ठा बेचि इंजीनियरिंग कओलेजमे बेटाक नाओं लिखा देलनि। नाओं लिखौलाक डेढ़ बर्ख बीतैत-बीतैत अदहा जमीन बिका गेलनि। आगूक अढ़ाइ बर्ख बाकी देखि चिन्ता घेरए लगलनि। मन मानि गेलनि जे सभ खेत बेचनौं पार नहि लागत। सोचैत-बिचारैत तँइ केलनि जे पढ़ैक खर्चपर रघुनाथक बिआह करा देबै। बिआह भेनौं ओकरा पढ़ैमे बाधा थोड़े हेतैक, पाँच बर्खक बादे दुरागमन कराएब। समस्याक समाधान होइत देखि मनमे खुशी अएलनि। फेर मोनमे उठलनि जे समयो बदलि रहल अछि। पहिने माए-बाप बेटा-बेटीक बिआहकेँ अपन कर्तव्य बुझैत छलाह तँए पुछब जरुरी नहि बुझैत छलाह। मुदा आब पूछब
जरुरी भऽ गेल अछि। परिस्थिति देखि रघुनाथो बिआह करब मानि लेलक मुदा
शर्त एकटा लगौलकनि जे लड़की रंग-रूपमे सुन्दर हुअए। जँ गुणवानक शर्त रहितनि तहन तँ ओझरा जएतथि। मुदा से नहि भेलनि। बिआहक चर्चा शिवनाथ चला देलखिन।
इंजीनियर वर तँए कथकियाक ढबाहि लागि गेलनि। मुदा कोनो गाम अधलाह बूझि पड़नि तँ कोनो परिवारक कुल-गोत्र। कतहु लड़की दब तँ कतौ उमरगर लड़की भाँज लगनि। होइत-हबाइत एकठाम कथा पटि गेलनि। गाम तँ नीक नहि मुदा लड़कीयो गोर आ पढ़ैक खर्चो गछि लेलकनि। बि‍आह भऽ गेलैक। बि‍आहक बाद दुनू समधि बिचारि लेलनि जे सालो भरि जे भार-दौरक फेरीमे पड़ब से नीक नहि। तँए भार-दौरक बेवहार छोड़िए दियौक। दुनू गोटे सएह केलनि।
इंजीनियरिंगक अंतिम परीक्षा दऽ रघुनाथ सभ सामान लऽ सासुर आबि गेल। ओना दुरागमन बाकिये मुदा सासुर तँ सासुरे छी, तँए चलि आएल। रिजल्ट निकलैमे तीन मास लागत। काजो तँ अखन किछु नहिए अछि, तँए निश्चिन्तसँ सासुरमे रहैक विचार रघुनाथ कऽ लेलक। दसे दिनक बाद विदेशमे इंजीनियरक भेकेन्सी खूब भेलैक। सभसँ बेसी अमेरिकामे भेलैक। नव टेकनोलौजी अएने नव युगक आगमन भेल। नव मशीन नव इंजीनियरकेँ जन्म देलक। मुदा पुरना तकनीको आ इंजीनियरो, अछैते औरदे, फाँसीपर लटकए लगलाह। जहिना गामक-गाम हैजासँ मरैत अछि तहिना इंजीनियरक जमात पटपटाए लगलाह। मुदा दवाइक करखन्ने नहि जे दवाइ बनाओत।
परीक्षाक पेपर रघुनाथक नीक भेल तँए फेल करैक अन्देशे नहि रहैक। हाइये स्कूलसँ अमेरिकाक उन्नतिक, सुख-मौजक संबंधमे किताबो-पत्रिकामे पढ़ने आ लोकोक मुँहे सुनने रहए। तँए मनमे गुदगुदी लगैत रहै। ई भिन्न बात जे आठ मासमे अस्सीटा बैंक अमेरिकामे दिवालिया भेल।
रघुनाथ फस्ट डिवीजनसँ पास केलक। एक तँ फस्ट डिवीजन रिजल्ट, तइपर अमेरिकाक नौकरी। खुशीसँ रघुनाथक मन उड़िया गेलै। आवेदन केलाक आठे दिन पछाति चिट्ठी भेटलैक। स्त्रीक गहना बेचि ओ दुनू परानीक टिकट बनबौलक। ससुर पढै़ धरिक खर्चा गछने रहनि तँए टिकटक खर्च दइसँ इन्कार केलकनि।
मिशिगन राज्यक राजधानीक शहर लानसिंग। ठंढ़ इलाका। ने अपना सभ जकाँ छह ऋतुक मौसम बनैत आ ने ओकर हास-परिहास होइत। ने रंग-बिरंगक गाछ-बिरीछ अपना सभ जकाँ होइत। लानसिंगक सत्तरह तल्लाक छोट-छोट तीन कोठरीक आंगन। जहिमे ने सभ दिन सूर्यक रोशनी अबैत अछि आ ने भोरे कौआ आबि ओसारपर बैसि सारि-सरहोजिक समाचार सुनबैत अछि। रहैत-रहैत दुनू परानी रघुनाथकेँ पनरह बर्ख बीत गेलनि। जवानीक सभ सपना मने-मन गुमसड़ि रहल छलनि।
रघुनाथकेँ अमेरिका गेने शिवनाथक जिनगीक गाछ मौलायल नहि, चतरि कऽ पाखरिक गाछ जकाँ झमटगर भऽ गेलनि। दुनू बेकतियोक विचार सुधरलनि। वंशगत संबंध क्षीण होइत-होइत सुखि गेलनि, सामाजिक संबंध मोटा कऽ जुआएल गाछक सील जकाँ बनि गेलनि। जहिना कोनो समांगकेँ मुइलापर परिवारक लोक आस्ते-आस्ते बिसरि जाइत अछि, तहिना रघुनाथोकेँ दुनू प्राणी शिवनाथ सोलहन्नी बिसरि गेलाह। साल भरिक छाया आ सैएक-सए बरिसक बरखी करैक खगते नहि रहलनि। वंश अंत हएत सदः आँखिसँ शिवनाथ देखैत छलाह। स्वतंत्र देशक गुलाम बुधि‍। केना नहि बिसरितथि? ने कहियो एक्कोटा पत्र लिखि मन राखए चाहलनि आ ने कोनो मनोरथ मनमे संयोगि कऽ रखने रहथि। पढ़ल-लिखल तँ शिवनाथ नहि मुदा “हरिवंश पुराण कथा, गप-सप्‍पक क्रममे बेसी काल दोसराक मुँहे सुनैत छलाह।
स्वतंत्रताक उपरान्त विकासपुरक लोकोक विचार सुधरलनि। केना नहि सुधरितनि? बूढ़-बच्चा छोड़ि गामक सभ लाठी-झंडा लऽ झंझारपुर सर्कल आगि लगबए जे गेल रहथि। आँखिसँ सभ किछु देखने रहथि। ओना हजार बीघा रकबाक गाम विकासपुर, जइमे साढ़े चारि सए परिवार हँसी-खुशीसँ कताक पुस्तसँ एकठाम रहैत आएल छलाह। स्वतंत्राक पूर्व मलिकाना -जमीनदारक- गाम रहए। मालगुजारीक लेन-देनमे सबहक जमीन निलाम भऽ जमीनदारक हाथमे चलि गेल छलैक। कियो अपन खेतक दखल तँ हुनका नहि देलकनि मुदा बटेदार बनि उपजा बाँटि-बाँटि दिअए लगलनि। जागल गामक लोक देखि जतबे-तेतबे दाम लए मालिक खेत घुमा देलकनि। अपन खेतकेँ स्थायी पूँजी बूझि श्रमक पूँजी जोड़ि जिनगीकेँ ठाढ़ करए लगलथि। बाढ़ि-रौदीक प्रकोप सालो-साल होइते रहैत छलैक मुदा विचार आ कर्म बदलने ओहो अभिशाप नहि वरदान बनि गेलैक। बाढ़ि देखि माथपर हाथ लऽ नहि बैसि, ओकर प्रतिकार करैक रस्ता अपनौलनि। तहिना रौदियोक प्रति केलनि। जइसँ बाढ़ि-रौदीसँ बचैक उपाए कऽ लेलनि। सबहक एहेन धारणा बनि गेलनि। जे बाढ़िक उपद्रव मात्र साओनसँ कातिक चारि मास होइत अछि बाकी बारह मासक सालमे आठ मास तँ बचैत अछि। जे आठ मास जमि कऽ मेहनत कएल जाए तँ बारहो मास हँसी-खुशीसँ गुजर चलि सकैत अछि। ततबे नहि, पानियो तँ आगि नहि छी जे सभ किछुकेँ जरा देत। पानियो तँ उत्पादित पूँजी छी, तँए जरुरत अछि ओकर उपयोग करैक। तहिना रौदियोक संबंधमे धारणा बनौने रहथि। खेतमे रंग-बिरंगक अन्न, फल, तरकारी अछि। ने सभ अन्नेक लेल एक रंग पानिक जरुरत होइत अछि आ ने फले-तरकारीक लेल। अधिक वर्षा भेने अधिक पनिसहू फसल होइत अछि आ कम वर्षा भेने कम पनिसहू हएत। तइ पर थोड़ेक सुविधा सरकारो देलक। नब्बे प्रतिशत अनुदानमे बोरिंग आ पचास प्रतिशत अनुदानमे पम्पसेट देलक। जइसँ पर्याप्त बोरिंग-पम्पसेट गाममे भऽ गेलैक। किसानक हाथमे पानि चलि आएल। समाजक किसानक कान्हमे कान्ह मिला शिवनाथो चलए लगलाह। कम खेत रहितौं हुनका अन्न-पानि उगरिये जाइत छन्हि।
छह बजे भोरे रघुनाथ धीपल-सराएल पानि मिला अधा-छिधा नहा, कपड़ा पहीरि, चाह-बिस्कुट खा ड्यूटी चलि जाथि। असकरे श्यामा डेरामे रहि जाइत छलीह। ने अंग्रेजी भाषाक बोध छन्हि जे दोकानो-दौरीक काज कऽ सकितथि आ दोसरोसँ गप-सप्‍प करैत समए बितबितथि। ओना बगलेक फ्लेटमे आरो-ओरो भारतीय -इंडियन- सभ रहैत अछि। मुदा ओहो कियो केरलक तँ कियो मद्रासक छथि। भाषाक दूरी देखि श्यामा मने-मन सोचए लगलीह जे मनुष्यसँ नीक पशु होइत अछि जे अपन स्वभावसँ एक-दोसरासँ मेलो रखैत अछि। मनुक्ख तँ मनुक्खे छी जे बोलेसँ राजा बनि जाइत अछि। जहिना पिजराक सुग्गा अकासमे उड़ैत सुग्गा देखि कनैत अछि तहिना कोठरीमे बैसलि श्यामा मने-मन कुही होइत छलीह। मनमे होइत छलनि कोन जनमक पाप कएल अछि जे एहेन गति भऽ गेल अछि। नैहरसँ सासुर धरिक सभ किछु हेरा गेल।
भिनसरे डेरासँ निकलि रघुनाथ कार्यालय पहुँचि जाइत छथि। कार्यालयेमे खाइ-पीबैक व्यवस्था सेहो छैक। मशीनेक संग-संग रघुनाथ बारह घंटा बितबैत छथि। बुधि‍सँ लऽ कऽ हाथ धरि मशीनेक संग भरि दिन रहैत-रहैत मशीन बनि गेलनि। संवेदनशून्य मनुष्य। जइमे दया, श्रद्धा, प्रेमक कतौ जगह नहि। मुदा आइ रघुनाथकेँ कार्यालय पहुँचते मनमे उड़ी-बीड़ी लगि गेलनि। काजक दिसि एको-मिसिया ध्याने नहि जाइत छलनि। छुट्टीक दरखास्त दऽ कार्यालयसँ डेरा बिदा भेलाह। डेरा आबि, देहक कपड़ा आ जुत्ता बिनु खोलनहि पलंगपर, चारु नाल चीत भऽ ओंघरा गेला। जहिना जेठ मासक तबल धरतीपर बिहरिया बरखाक बुन्न खसिते गरमी-सरदीक बीच घनघोर लड़ाइ शुरू भऽ जाइत अछि तहिना रघुनाथक मनमे वैचारिक संघर्ष हुअए लगलनि। एहेन जोर वैचारिक बिहारि मनमे उठि गेलनि जे बुधि‍ चहकए लगलनि। चहकैत बुधि‍सँ अनायास निकलए लगलनि- “हमरासँ सइओ गुना ओ नीक छथि जे अपना माथपर पानिक घैल उठा मातृभूमिक फुलवारीक फूलक गाछ सींचि रहल छथि। अपन माए-बाप, समाजक संग जिनगी बिता रहल छथि। आइ जे दुनियाँक रूप-रेखा बनि गेल अछि ओ किछु गनल-गूथल लोकक बनि गेल अछि। जिनगीक अंतिम पड़ावमे पहुँचि आइ बूझि रहल छी जे ने हमरा अपन परिवार चिन्हैक बुधि‍ भेल आ ने गाम-समाजक। दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर चुबि गालपर होइत पलंगपर खसए लगलनि।
शिवनाथ हँसैत ओछाइनपर सँ उठि पत्नीकेँ सोर केलखिन- “कत्तऽ छी, कने एम्हर आउ?”
मुस्की दैत लग आबि रुक्मिणी बजलीह- “भोरे-भोरे की रखने छी जे सोर पाड़लौं।
“मनमे आबि रहल अछि जे अपन दुनू प्राणीक श्राद्ध कइये लइतौं। जँ हम पहिने मरि जाएब तँ अहाँक श्राद्ध हएत की नहि। नहि जँ पहिने अहीं मरि जाएब तँ हमर श्राद्ध हएत की नहि।
“अखन हम थोड़े मरैबाली भेलौंहेँ, जे मरब।
“अपन बिआह बिसरि गेलिऐक? जखन अहाँ छह बर्खक रही आ हम सात बर्खक रही तहिये ने बिआह भेल रहए। मन अछि आकि नहि जे खरहीसँ नापि कऽ जोड़ा लगौल गेल रहए।
किछु काल गुम्म रहि रुक्मिणी बजलीह- “अपन बिआह-दुरागमन आ माए-बाप जँ लोक बिसरि जाएत तँ ओहो कोनो लोके छी।
मुस्की दैत शिवनाथ कहलखिन- “हमरा आँखिमे अहाँ वएह छी जे दुरागमन दिन झाँपल पालकीमे बैसि नैहरसँ सासुर आएल रही। अहीं कहू जे हमरा किए ने अहाँक चूड़ीक खनखनीक अबाजमे स्वर लहरी आ माथक सेन्नुरमे जिनगीक मधुर फल देखि पड़त। पचहत्तरि पार कऽ अस्सीक बर्खक बीच दुनू गोटे पहुँचि‍ चुकल छी तँए खुशी अछि। आँखिक सोझमे देखैत छी जे बि‍आहक पाँचे दिनक बाद चूड़ियो फूटि जाइत छैक आ माथो धुआ जाइत छैक। तइठाम हम-अहाँ भाग्यशाली छी की नहि?”
पतिक बात सुनि रुक्मिणी मुस्कुराइत पतिक आँखिमे अपन आँखि गाड़ि पाछूसँ आगू धरिक जिनगी देखए लगलीह।

घरदेखि‍या :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल


नीन्न टुटिते लुखियाक नजरि दिन भरिक काजपर पड़लनि। काज देखि मनमे अबूह लागए लगलनि। असकता गेलीह। मुदा तैयो हूबा कऽ कऽ उठए चाहलनि आकि आँखि पुबरिया घरक छप्परपर गेलनि। बिहाड़िमे मठौठ परक खढ़ उड़िया गेल छलैक। हड्डी जकाँ बाती झक-झक करैत। मनमे अएलनि जे “की कहत बड़तुहार?” कहत जे मसोमातक घर छिऐ तेँ मठौठ उजड़ल छैक। खौंझ उठलनि। ठोर पटपटबैत- “जेहने नाशी डकूबा बिहाड़ि तेहने झड़कलहा कारकौआ। जुट बान्हि-बान्हि आओत आ लोलसँ खढ़ उजाड़ि-उजाड़ि छिड़िऔत।नजरि निच्चाँ होइते दछिनबरिया टाटपर पड़लनि। बरसातमे टाटक आलन गलि कऽ झड़ि गेल छलैक। मात्र कड़ची-बत्ती टा झक-झक करैत। जइसँ ओहिना दछिनबरिया बँसबिट्टी देखि पड़ैत। बेपर्द आंगन। मन खिन्न हुअए लगलनि। मनमे अएलनि जे पुरना साड़ी टाटमे टांगि देबै। मुदा बड़तुहारक आँखिमे की कोनो गेजर भेल रहतै जे नहि देखत। तहूमे साड़ीसँ कते अन्हराएत। ओहिना सभ किछु देखत। आरो मन निच्चा खसैत जाइत। बाप रे की कहत बड़तुहार? नागेसर दिओरपर तामस उठै लगलनि। कोन जरुरी छलनि जे कौल्हुके दिन दऽ देलखिन। घर-अंगना चिक्कन कऽ लइतौं तहन अबैक दिन दैतऽथिन। कोनो की हमर बेटा बाढ़िमे दहाइल जाइत छलए। पाँच दिन आगुएक दिन भेने की होइतै? तामस बढ़लनि। तइ बीच आँखि टाट परसँ निच्चा उतरलनि। नजरि पड़लनि अंगनाक पनिबटपर। झक-झक करैत झुटका। उबड़-खाबड़ सौंसे आंगन। तहूमे जे झुटका सरिआममे अछि ओ तँ नहि मुदा जे अलगल अछि ओ तँ चुभ-चुभ गरैत अछि। सौंसे अंगना सरिअबैमे कमसँ कम, दस छिट्टा माटि लागत। दस छिट्टा माटि उघि, ढ़ेपा फोड़ि, सरिया कऽ पटबैमे तँ भरि दिन लगि जाएत। तखन आन काज केना हएत? काजक तरमे दबाए लगलीह। तामस आरो लहरै लगलनि। अबूहो लगनि। ओछाइनेपर पड़ल-पड़ल भारसँ दबैत जाएत। दुइये माए-पूत की सभ करब? तहूमे आइ ऐ छौड़ाकेँ केना किछु करैले कहबै। ओकरे देखैले ने घरदेखिया आओत। छौड़ाकेँ तँ अपने मारिते रास काज हेतै। कानी छटौत। अंगा-घोती खीचत। आइरन करबैले गंजपर जाएत। गमकौआ साबुनसँ नहाएत। तेल लेत। बाबरी सीटत। तेहेन ठाम कोदारि-खुरपी चलबैले केना कहबै। लोहे छिऐ जँ किनसाइत लागिये जाए। तखन तँ आरो पहपटि हएत। कथकिया जे हाथ-पएरमे पट्टी बान्हल देखतै तँ की कहत? मनक तामस निच्चाँ मुँहे ससरए लगलनि। तामस उतरि‍ते नजरि घरदेखियाक खेनाइ-पीनाइपर पहुँचलनि। आन काज तँ रहियो-सहि कऽ भऽ सकैत अछि मुदा दूध तँ एक दिन पहिने पौड़ल जाएत। जँ से नहि पौड़ब तँ दही केना हएत। शुभ काजमे जँ दहिये नहि होएत तँ काजक कोन भरोस। एक तँ महींसबला सभ तेहेन अछि जे दूधसँ बेसी पानिये मिला दैत छैक। नबका मटकुरियो ने अछि, जे पानियो सोखि लइतैक। मनमे खौंझ उठए लगलनि। मुदा नजरि चाउर-दालि दिस बढ़ि‍ते तामस दबलनि। बेटाक घरदेखिया आओत, हुनका केना खेसारी दालि आ मोटका चाउरक भात खाइले देबनि। लोको दुसत आ अपनो मन की कहत। कियो किछु कहऽ वा नहि मुदा कुल-खानदानक तँ नाक नहि ने कटा लेब। जँ इज्जतिए नहि तँ जिनगिये की? मन पड़लनि घैलमे राखल कनकजीर चाउर। कनकजीर चाउरक भात आ नवका कुटुम मनमे अबिते लुखियाक हृदए पघिलल केरा जकाँ पलड़ए लगलनि। मने-मन भातक प्रेमी दालिक मिलान करए लगलीह। मेही भातमे मेही दालिक मिलान नीक हएत। मुदा खेरही-मसुरी दालि तँ भोज-काजमे नहि होइत। होइत तँ बदाम-राहड़िक। मुदा राहड़ि तँ घरमे अछि नहि। बोङमरना बाढ़ियो तेना दू सालसँ अबैत अछि जे एक्को डाँॅट राहड़ि नहि होइत अछि। तत्-मत् करैत फेर मन झुझुआ गेलनि। बिना आमिले राहड़िक दालि केहेन हएत? आमक मास रहैत तँ चारि फाँक कँचके आम दऽ दितिऐ। सेहो नहि अछि। फेर मन आगू बढ़लनि, पहिल-पहिल समैध-समधीन बनब आ एगारहो टा तरकारी खाइले नहि देबनि से केहेन हएत। गुन-धुन करए लागलीह। गुन-धुन करिते बर-बरी-अदौरी मन पड़लनि‍। एक्के दिनमे केना ओरियान हएत? घाटिये-बेसन बनबैमे तँ तीन दिन लागत। तखन केना होएत? फेर तामस पजरए लगलनि। मन फेर खौंझा गेलनि। बजै लागलीह- “ई सभटा आगि लगौल नगेसराक छी। जाबे ओकरा छितनीसँ चानि नहि तोड़ब ताबे ओकरा बुधि‍ नहि हेतै। तमसाइले नागेसरक आंगन दिस बजैत बढ़लीह। पुरुख छी आकि पुरुखक झड़। जहि पुरुखकेँ काजक हिसाबे नहि जोड़ए आओत ओहो कोनो पुरुखे छी। ओइसँ नीक तँ मौगी।
नागेसर नदी दिस गेल छलाह। नागेसरकेँ नहि देखि लुखिया डेढ़िये पर अनधुन बजए लागलि। मुदा नागेसरक पत्नी भुरकुरिया चुप-चाप सुनैत। किछु बजैत नहि। किएक तँ मने-मन सोचैत जे दिओर-भौजाइ बीचक बात छी, तइ बीच हम किएक मुँह लगबी। बजैत-बजैत लुखियाक पेटक बात सठलनि। बात सठिते तामसो उतरलनि। बोलीक गरमीकेँ कमैत देखि भुरकुरिया बाजलि- “अंगना चलथु दीदी। बीड़ी पीबि लेथु, तखन जइहथि।
घरसँ बीड़ी-सलाइ निकालि दुनू गोटे ओसारपर बैसि गप-सप्‍प करए लागलि। सलाइ खरड़ैत भुरकुरिया बाजलि- “दीदी, आब पीहुओकेँ जुआन होइमे देरी नञि लगतनि। कंठ फूटि गेलै।
भुरकुरियाक बात सुनि लुखिया हरा गेलीह। जुआन बेटाक सुख मनमे नचए लगलनि। लुखियाकेँ आनन्दित होइत देखि पुनः भुरकुरिया बाजलि- “भइयोसँ बेसी भीहिगर जवान पीहुआ हेतनि।
खुशीसँ लुखियाक हृदए बमकि गेलनि, बजलीह- “कनियाँ, खाइ-पीबैमे छौड़ाकेँ की कोनो कोताही करै छिऐ। एक तँ भगवान नउऐं-कउऐं कऽ एकटा बेटा देलनि। तेकरो जँ सुख नै होए तँ एते खटबे केकरा लेल करै छी। बापक मन तँ परुँके बिआह करैके रहै मुदा तइ बीच अपने चलि गेल। आब साल लगलै तँ ऐबेर जेना-तेना बिआह कइये देबै।
कहि आंगन दिस बिदा भेलीह। अंगनासँ निकलिते मन नागेसरपर गेलनि। सोचए लागलीह, नागेसर बेचाराक कोन दोख छैक। ओहो की कोनो अधलाह केलक। हुनको मनमे ने होइत हेतनि जे झब दे पुतोहु घर आबनि। अखन तँ वएह ने बाप बनि ठाढ़ छथिन। मुदा काज अगुताइल केलनि। गरीब छी, तेकर माने ई नहि ने जे इज्जति नहि अछि। इज्जति कऽ तँ बचा कऽ राखै पड़ैत छैक। नव कुटुमैती भऽ रहल अछि। नव कुटुम्ब दुआरपर औताह। हुनका जँ पाँच कौर खाइयो ले नहि देबनि से केहेन हएत। स्वागत की कोनो धोतिये-टाका टा सँ होइत छैक? आकि दूटा बोल आ दू कौर अन्नोसँ होइत छैक। जेहेन पाहुन रहताह तेहने ने बेवहारो करए पड़त। फेर मनमे तामस उठए लगलनि। एहेन पुरुखे की जिनका धियो-पुतोक बिआह करैक लूरि नहि होन्‍हि‍। तइ बीच मन पड़लनि चाह-पान। चाहो-पानक ओरियान तँ करए पड़त। एहेन नहि ने हुअए जे एक दिस करी आ दोसर दिस छुटि जाए। चाहे-पानटा किअए, बीड़ीओ-तमाकुलक ओरियान करए पड़त ने। ई की कोनो शहर-बजार छिऐ जे लोक एक्के- आधे टा अम्मल रखैत अछि। ई तँ गाम छिऐक, ऐठाम तँ एक-एक आदमी पनरह-पनरहटा अमल डेबैत अछि। अपनहि विचारमे लुखिया ओझरा गेलीह। किछु फुड़बे ने करनि। बुकौर लगै लगलनि। आँखिमे नोर ढबढ़बा गेलनि। मनमे उठए लगलनि जे घर तँ पुरुखेक होइत छैक। एते बात मनमे अबिते लुखिया बाटपर आबि नागेसरक बाट देखए लगलीह। नदी दिससँ अबैत नागेसरपर नजरि पड़लनि। नजरि पड़िते बजलीह- “काल्हि घरदेखिया औताह आ अहाँ निचेनसँ टहलान मारै छी।
नागेसर- “अच्छा चलू। बैसि कऽ सभ विचारि लैत छी।
दुनू गोटे आंगन दिस बढ़ल। ओचाओन खरड़ैत पीहुआकेँ देखि नागेसर कहलखिन- “अखन तू ऐंठार चिक्कन करै छेँ की जा कऽ बाबरी छँटा अयमे? काजक अंगना छियौ तेँ पहिने बाहरक काज समेटि लेमे की घरे-अंगनाक काज करै छेँ। जो, जल्दी जो।
खरड़ा राखि पीहुआ बिदा भेल। लुखियाक नजरि बदललनि। जहिना चश्माक शीशाक रंग दुनियाँक रंगकेँ बदलि दै छै, तहिना लुखियाक नजरि नागेसरक बदलल रूपकेँ देखलक। बदलल रूप देखिते सिनेह उमड़ि पड़लनि। सिनेहसँ बजलीह- “एते लगक दिन किअए देलिऐ? चारि दिन आगूक दितियनि। भरिये दिनमे सभ काज सम्हारल हएत?”
लुखियाक समस्याकेँ हल्लुक बनबैत नागेसर कहलखिन- “आइ पहिल दिन घरदेखिया घर-बर देखए औत आकि खाइन-पीउन करै ले? पसिन्न हेतनि तँ खेता-पीताह, नहि तँ अपना घरक रस्ता धरताह। अखन तँ ओ बटोही बनि कऽ औताह। तेँ हमरो ओते सुआगतक ओरियान करैक जरुरत नहि अछि। जखन पीहुआ पसिन हेतनि, बिआह करब गछताह, तखन ने किछु, आकि समधीन बनैले बड़ अगुताइल छी? होइए जे कखैन समैधिक संग होरी खेलाइ?”
समधिक संग होरी खेलाएब सुनि लुखियाक मन उड़िऐ लगलनि। बजलीह- “हम की कोनो समैधिये भरोसे फगुआ रखने छी, दिअर कोन दिनले रहत?”
लुखियाक मनसँ चिन्ता पड़ा गेलनि। मुस्की दैत बजलीह- “बाटो-बटोही जँ दुआरपर औताह तँ एक लोटा पानियो नहि देबनि?”
नागेसर- “से तँ देबे करबनि। यएह इज्जति तँ हमरा सबहक बाप-दादाक देल अमोल धरोहर छी।
खुशीसँ भसिआइत लुखिया कहलनि- “पुरुषक थाह हम नहि पाएब।
नागेसर- “कनी कालमे बजार जाएब। जे सभ जरुरीक बस्तु अछि से सभ कीनि आनब। तइले एते माथा-पच्ची करैक कोन जरुरी। अतिथिक सुआगत मात्र नीक-निकुति खुऔनहि होइत? आकि प्रेम-पूर्वक तुकपर खुऔने होइत। बैसैक लेल चद्दरि साफ केलौं? सिरमो खोल खीचि लेब।
“सिरमामे खोल कहाँ अछि? ओहिना पुरना साड़ीक बनौने छी। ओहूले दूटा खोल किनने आएब।
“बड़बढ़ियाँ।
दोसर साँझ आंगनमे बैसि नागेसर पीहुआकेँ पुछलक- “तोरा जे नाम पुछथुन्ह तँ की कहबुहुन?”
पीहुआ- “से की हमरा नाम नइ बुझल अछि। बउओक, माइयोक आ गामोक नाम बुझल अछि।
“ओते नै पुछै छियौ। अपने टा नाम बाज?”
“पीहुआ
“धुर बुड़िबक। पीहुआ नहि पुहुपलाल कहिहनु।
“से हमर नाम पुहुपलाल कहाँ छी। पहिने सभ कहैत रहए आब तँ सभ पीहुए कहैत अछि। एहिना ने लोकक नाम बदली होइत रहै छै।
मुँह बिजकबैत लुखिया कहलक- “हँसी-चौलमे लोक तोरा पीहुआ कहै छौ आकि जनमौटी नाओँ छियौ।
छठियार राति, दाइ-माइ पुहुपलाल नामकरण केलखिन। जखन ओ आठ-दस बर्खक भेल, तखन जाड़क मास बाधमे फानी लगबै लगल। गहींर खेत सभमे सिल्लियो आ पीहुओ आबि-आबि धान चभैत। जेकरा ओ फानी लगा-लगा फँसबैत। अपनो खाइत आ बेचबो करैत। कछु दिनक बाद स्त्रीगण सभ पीहुआबला कहै लगलैक। फेर किछु दिनक पछाति भौजाइ सभ पीहुआ कहए लगलैक। मुदा तेकर एक्को मिसिया दुख ने पीहुएकेँ होइत आ ने पीहुआ माये-बापकेँ। तेँ पुहुपलाल बदलि पीहुआ भऽ गेल।
मने-मन नागेसर बिचारलनि जे ई पीहुआ एना नहि सुधरत। अखन सिखाइयो देबै तैयो बजै कालमे बाजिये देत। से नहि तँ दोसर गरे काज लिअए पड़त। लुखियाकेँ कहलखिन- “मोटरी खोलि सभ समान मिला लिअ।
दुनू दिओर-भौजाइ सभ समान मिलबए लगल। धोती देखि दुनूक बीच मतभेद भऽ गेलनि। कन्यागतक विदाइक लेल एक्के जोड़ धोती नागेसर कीनि कऽ अनने छलाह। किएक तँ बुझलनि जे बेटीबला धोती नहि पहिरैत अछि। मुदा से बात लुखिया बिसरि गेल छलीह। तेँ बजलीह- “दू गोटे औताह, तखन एक जोड़ धोतीसँ की हएत? कमसँ कम तँ जोड़ो कऽ केँ करबनि। जेकरा बेसी रहै छैक ओ पाँचो टूक कपड़ा बिदाइ करैत अछि।
सामंजस्य करैत नागेसर- “हमरो सासुरक धोती रखले अछि। काज पड़त तँ दऽ देबनि।
 “गुलाबिये रंगमे रंगल अछि। एकरो गुलाबियेमे रंगि लेब। रंगो कीनि कऽ नेनहि आएल छी।
दोसर दिन, सवेरे सात बजे कन्यागत दुनू बापुत पहुँचलाह। कन्यागतकेँ
अबैसँ पहिनहि नागेसर एकचारीमे बिछान बिछा, तैयार केने छलाह। नबका खोलक सिरमो सिरा दिस देने छलाह। कन्यागतकेँ अबिते नागेसर ठेेंगा-छत्ता रखि पएर धोएले लोटा बढ़ौलकनि। चाह-पान आनए लुखिया पछुआरे बाटे लफड़ल चौक दिस बिदा भेल। जाधरि दुनू बापुत डोमन हाथ-पएर धोए कुशल-क्षेम करैत, बिछानपर बैसलाह ताधरि लुखियो चौक परसँ चाह-पान कीनि अनलक। नागेसरक दुनू आँखि दुनू दिस। तेँ देखि लेलनि जे चाह आबि गेल। पीहुआकेँ कहलनि- “बौआ, चाह नेने आबह?”
पीहुआ- “पानो।
“पहिने चाह लाबह। पछाति पान अनिहह।
पीहुआक बोली डोमन सुनि लेलनि। तेँ नाम-गाम पुछैक जरुरते नहि रहलनि। दोहारा नमगर देह। मने-मन डोमन लड़िका पसन्द कऽ लेलनि। आँखिक इशारासँ डोमन बुचनकेँ पुछलखिन। आँखिएक इशारासँ बुचन सेहो स्वीकृति दऽ देलकनि। दुनू बापूतक मुँहमे हँसी नाचि गेलनि। मुदा लगले डोमनक मनमे एकटा शंका पैसि गेलनि। शंका ई जे मरदा-मरदी परिवार नहि अछि तेँ हो ने हो कोनो छोट-छीन बाधा ने बीचमे आबि भंगठा दिअए। चाह पीबि पान खा डोमन नागेसरकेँ कहलखि‍न- “समैध, जाधरि भानस होइत अछि ताधरि बाध दिससँ घुमि अबैले चलू। हँ, एकटा बात तँ कहबे ने केलौं, तीमन-तरकारी बेसी नै करब। सात-आठ दिनसँ लगातार माछ खेलौं, पेट गड़बड़ भऽ गेल अछि। गाममे रहितौं तँ मड़बज्झू भात आ केेरा चाहे भांटाक सन्ना संगे खइतौं। मुदा से तँ ऐठाम नहि हएत। तेँ दालि-भात एकटा तरकारी-सजमनि चाहे झिंगुनीक- बना लेब। तहूमे बेसी मसल्ला नै देबैक।
बीड़ी-सलाइ गोलगलाक जेबीमे रखि नागेसर लुखियाकेँ कहए आंगन गेलाह। ओना टाटक अढ़सँ लुखियो सुनि लेने छलीह। तेँ जबाब दैले मन उबिआइत रहनि। अवसर पाबि लुखिया बजलीह- “एते रास जे तीमन-तरकारीक ओरिआन केने छी से की हएत। अपने नै खेताह तँ आंगनवालीले मोटरी बान्हि देबनि।
अपिआरीमे फँसैत माँछ जकाँ लड़िकाक माएकेँ फँसैत देखि डोमन बजलाह- “तइले की हेतैक, हिनको मोटरी बान्हि कन्हापर नेने जेबनि।
आँखि दाबि नागेसर लुखियाक बोली रोकै चाहलनि। मुदा लुखिया मुँहक बात बरतुहार दिस नहि बढ़ि नागेसरे दिस खसलनि- “बड़ बुधियार छथि। बुझब जे बेटाक बिआह केलौं तँ गामो-घर आ समधियो नीक भेटलाह। तेँ जेना-तेना कुटमैती कइये लेब।
लुखियाक बात सुनि नागेसरक मन हल्लुक भेलनि। लुखिया अपन भार दऽ बाधा हटौलक। नहि तँ बेर-बेर बाता-बाती होइत। समए पाबि डोमन जोरसँ बजलाह- “समधीने लग नुड़िआइल रहब आकि चलबो करब?”
लुखियाक मन भीतरसँ चप-चप होइत। बजैक लेल लुस-फुस करैत। डोमनक बात सुनि बजलीह- “हिनके टा समधीन लगड़गर छन्हि, आनकेँ कि किछु छैक?”
मुस्की दैत नागेसर आंगनसँ निकलि बाध दिस बिदा भेलाह। आँखि उठा-उठा डोमन गाम-घर देखैत जाइत। टोलसँ निकलि पछिम मुँहे एक पेड़िया धेलनि। गाछी टपि हाथक इशारासँ पच्छिम मुँहे देखबैत नागेसर कहलकनि- “पछबारि भाग जे चतरलाहा गाछ देखै छिऐक ओएह गामक सीमा छी।
दुनू बापुत देखि डोमन पुछलखिन- “उत्तरबरिया सीमा?”
ओंगरीसँ देखबैत नागेसर- “ओ ढ़िमका जे देखै छिऐ, सएह छी।
“दछिनबरिया।
“तीन चारिटा जे छोटका गाछ एक ठाम देखै छिऐ ओ सीमेपर अछि। पीरारक गाछ छिऐक।
बाधकेँ हियासि डोमन आँखिक इशारासँ बुचनकेँ देखलखिन। दुनू गोटे मने-मन अन्दाजलनि जे दू सए बीघासँ उपरेक बाध अछि। तइ बीच नागेसर बजलाह- “बुझलौं, बाबूक अमलदारीमे तँ सम्मिलिते छल मुदा हमरा दुनू भाँइमे बँटबारा भऽ गेल। उत्तरसँ हमर छी आ दछिनसँ भातिजक।
डोमन- “खोपड़ी कतऽ बनौने छी?”
नागेसरकेँ पैछला घटना मन पड़लनि। ओंगरीसँ देखबैत कहए लगलखिन- “ओइ बँसबाड़ि आ गाछीक बीच एकटा खाधि छैक। जहिमे बिसनारिक गाछ सभ छैक। भदवारिमे पानि भरि जाइत छैक। बाँसोक पात आ गाछो सबहक पात ओइमे खसि-खसि सड़ैत अछि। बिसनारियोक गाछ सभ सरि जाइत छैक। जइसँ कारी खट-खट पानि भऽ जाइत छैक। ढाकीक-ढाकी मच्छर फड़ि जाइत अछि। ओइ खाधिमे भैयाकेँ कालाज्वरक मच्छर काटि लेलकनि। कतबो दवाइ-बिरो भेलनि, मुदा नहि ठहरलखिन।
डोमन पुछलखिन- “अहाँ सभकेँ सरकारी अस्पतालमे दवाइ नहि दइए?”
नागेसर कहलखिन- “से जँ दैतैक तँ एत्ते लोक मरबै करैत। बीस आदमीसँ उपरे हमरा गाममे कालाजारसँ मरलहेँ। अस्पतालमे किछु छैक थोड़े, ओहिना ईंटाक घर टा ठाढ़ अछि। दवाइकेँ के कहए जे कुरसियो-टेबुल बेचि नेने अछि।
जैत-बजैत नागेसरक आँखि नोरा गेल। गमछासँ आँखि पोछि आगू बढ़ि गेला। तीनू गोटे खोपड़ी लग पहुँचलाह। बाधक बीचमे कट्ठा दुइएक परती, परतियेपर दुनू फरीकक खोपड़ियो आ पाँचटा अनेरुआ गाछो, दूटा साहोरक, दू-टा पितोझिया आ एकटा बज्र-केराइक। साहोरक गाछ सभसँ पुरान मुदा देखैमे सभसँ छोट। बज्र-केराइ सभसँ कम दिनक मुदा सभसँ नमहर। पितोझिया गाछक निच्चामे तीनू गोटे दुबिपर बैसि गप-सप्‍प करए लगलाह।
डोमन पुछलखिन- “रखबाड़ि–-राखी- केना गिरहत सभ दैत अछि?”
नागेसर बजलाह- “बीधामे पाँच घुर धानो आ गहुमो।
“रब्बी, राइ माने दलि‍हन-तेलहन?”
“अंदाजेसँ देलक। अपनो सभ उखाड़ि दै छिऐ। जइसँ बोइनो भेल आ राखियो।
दुनू बापूत डोमन मने-मन हिसाब जोड़ए लगलाह। अगर कट्ठामे एक
क्बीन्टल उपजत तँ पच्चीस किलो बीघामे भेल। जँ से नहि पचासो किलोक कट्ठा हएत, तैयो साढ़े बारह किलो बीघा भेल। सए बीघासँ उपरेक बाध अछि। तहिसँ या तँ पच्चीस क्वीन्टल, नहि तँ साढ़े बारह क्वीन्टल राखी -धान- सालमे जरुर
होइतै हेतनि। तेकर बाद गहुम भेल, मड़ुआ भेल, आरो-आरो दलिहन-तेलहन भेल। दुइये माइ-पूत कते खाएत? हमरो बेटीकेँ अन्नक दुख नहि हेतै। मुस्की दैत डोमन बेटा दिस तकलक। बेटो बाप दिस ताकि आँखियेसँ गप-सप्‍प कऽ लेलक।
कनी काल चुप रहि डोमन नागेसरकेँ पुछलखिन- “कथी-कथीक खेती बाधमे होइत अछि?”
नागेसर बजलाह- “पान साल पहिने तक तँ अन्ने टाक खेती होइत छल। टो-टा कऽ सेरसो-तोड़ीक खेती। मुदा आब खेती बदलि रहल अछि।
मुस्की दैत पुन: आगू बजलाह- “की कहब, बुझू तँ राजा छी। दू सए बीघाकेँ अपन बपौती सम्पति बुझैत छी। दुनू सए बीघाक मालिक छी। एक बेर टाँहि दैत छलिऐक तँ जुआन-जुआन घसवहिनी सभ नाङरि सुटुका कऽ पड़ा जाइत छलि। मुदा आब से नहि करैत छी। खसल-पड़ल खेत, आड़ि पड़क घास कटैले केकरो मनाही नहि करैत छिऐ......।
किछु मन पाड़ि फेर बजलाह- “हँ तँ कहै छलौं जे जहि दिनसँ लोक बोरिंग गरौलक आ कोशियो नहरि एलैक तइ दिनसँ तँ बूझि पड़ैत अछि जे घरसँ बाध धरि लछमी सदिकाल नचिते रहैत छथि। केकरो देखबै धानक बीआ पाड़ैत अछि तँ कियो रोपएले बीआ उखाड़ैत अछि। कियो कमठौन करैत अछि तँ कियो धान कटैत अछि, तँ कियो बोझ उघैत अछि। कियो दाउन करैत अछि, तँ कियो धान ओसबैत अछि, तँ कियो अगोँ रखैत अछि। कियो धान उसनियो करैत अछि तँ कियो पथार सुखबैत अछि। कियो मिलपर धान कुटबैत अछि तँ कियो चाउर फटकैत अछि। कते कहब।
डोमन बजलाह- “आनो-आनो चीजक खेती हुअए लागल होएत?”
नागेसर बजलाह- “ऐँह की कहब! पचासो किस्मक तँ धानेक खेती हुअए लगल अछि। ओते धानक की नामो मन अछि। धानक संग-संग खाद-पानि दऽ कऽ गहुम, दलिहनक खेती सेहो होअए लगल अछि। एते दिन तँ सरिसोए-तोड़क खेती होइत छल। आब सूर्यमुखीक खेती सेहो होइत अछि। राशि-राशिक तीमन-तरकारी सेहो हुअए लगल अछि। बीघा दसेकमे पनरह-बीस गोटे नवका आमक कलम सेहो लगौलक अछि। ऐँह, की कहब, आन्ध्राक आम, मद्रासी आम सभ सेहो लोक लगौलकहेँ। अजीब-अजीब आमो सभ अछि। ऐबेर रोपू तँ पौरुकेँ सँ फड़ए लगत। जेहने देखैमे लहटगर लागत तेहने खाइयोमे।
डोमन पुछलखि‍न- “आमक ओगरबाहि केना दैत अछि?”
नागेसर कहलखिन- “तीन आममे एक आम सरही आ चारि आममे एक आम कलमी। से जहि दिन तोड़ल जाएत तइ दिनक कहलौं, तइ बीच खसल-पड़ल आमक हिसाब नहि। तेहेन आम सभ अछि जे टुकलेसँ धिया-पुता खाए लगैत अछि। खटहो आमकेँ चून लगा कऽ मीठ बना लैत अछि। धियो-पुतो तते बुधियार भऽ गेल अछि जे अंगनेसँ चून नेने जाएत आ आममे लगा कऽ खाएत।
डोमन पुछलखिन- “आरो की सभ आमदनी बाधसँ अछि?”
नागेसर बजलाह- “सभटा की मनो अछि। (ओंगरीसँ देखबैत) दछिनबारि भाग बीघा बीसेक गहींर खेत छल। चौरी। गोटे साल नहि, ने तँ पहिने सभ साल धान दहाइये जाइत छलैक। मुदा आब, जहियासँ पानिक सुविधा भेल, सभ गिरहत अपन-अपन खेतकेँ आरो खुनि कऽ पोखरि जकाँ बना-बना माछ पोसए लगलहेँ। आन्ध्र प्रदेशक एकटा माछ छै “इलिस। ऐँह, की कहब, (मुँह चटपटबैत) अपना सभ कहै छिऐ रौह, मुदा ओइ इलिस आगूमे किछु नहि। जहिना बढै़मे तहिना सुआद। हमरा की कोनो रोक अछि, हमहीं ओगड़ै छिऐ ने, जहिया मन भेल तहिया बन्सीमे दूटा मारि लेलौं। आ सभ खेलौं। सभसँ मुश्किल आब बनौनाइ भऽ गेल। काजेसँ ने छुट्टी। के ओते मेठैन कऽ कऽ खाएत। आब सुर्ज माथपर आबि गेल। चलू। भानसो भऽ गेल हएत। गरमे-गरम खाइमे नीक होइ छै।
तीनू गोटे बाधसँ घर दिसक रास्ता धेलनि। थोडे़ आगू बढ़ल तँ बँसवारिमे एकटा चिड़ै बजैत सुनलनि। बाजबो अजीब ढ़ंगक। मुस्की दैत नागेसर डोमनकेँ पुछलखिन- “कहू तँ ई चिड़ै की बजैत अछि?”
कने अकानि कऽ डोमन बजलाह- “ई तँ पान-बीड़ी सिगरेट बजैत अछि।
बात सुनि नागेसर ठहाका दऽ हँसल। कने काल हँसि बजलाह- “ई चिड़ै अहाँ गाम सभ दिस नहि अछि। जहिया कोसीक बाढ़ि अबैत छलैक तहियेसँ ई चिड़ै हमरा गाममे अछि। ई बजैत अछि- बढ़मा, बिसुन, महेश।
विचारक भिन्नताक कारणे डोमन पुनः चिड़ैक बोली अकानए लगल। बुचन सेहो अकानए लगल। अपना बातमे मजबूती अनैक लेल नागेेसर सेहो अकानए लगल। दुनू चुप। दुनू अपन-अपन दुविधामे। डोमन बुचनकेँ पुछलक- “बौआ, तूँ तँ इसकुलो देखने छहक, तांेही कहह?”
मामूली सवालमे हारि मानब केकरा पसिन्न होइत। डोमनक मन विचारकेँ मथैत।
डोमनक बात सुनि बुचन बाजल- “बाबू, हमरा बूझि पड़ैत अछि जे “तुलसी, सूर, कबीरकहैत अछि।
तीनूक तीन मत, तँए विवादक प्रश्ने नहि, तीनू अपन-अपन रमझौआमे ओझड़ाएल। तँए तीनू चुपचाप आगू-पाछू घर दिस बिदा भेलाह।
घरपर अबिते डोमन बजलाह- “लोटा नेने आउ। कनी डोल-डाल दिससँ भऽ अबैत छी।
नागेसर आंगनसँ दू लोटा पानि आनि कऽ देलकनि। लोटामे पानि देखि बुचन बाजल- “बाबू, आगूमे कल-तल नै छैक?”
डोमन बजलाह- “अखन तूँ बच्चा छह, नहि बुझल छह?” कहि आगू मुँहे गाछी दिस बिदाह भेलाह। गाछी पहुँचि एकटा सरही आमक गाछक निच्चाँमे दुनू बापूत बैसि विचार-विमर्श करए लगलाह।
बुचन- “बाबू, कुटुमैती करै जोकर परिवार अछि। समलाइके मे बिआह-सादी, दुश्मनी आ दोस्ती छजैत छैक। लड़िकाक बाप नहि छैक तँ की हेतै। गाम-घरमे लोक मइटुगरकेँ अधलाह बुझैत छैक।
डोमन बुचनक बातो सुनैत आ मुड़ि‍यो डोलबैत मुदा मने-मन परिवारक आमदनी आ ओइ आमदनीकेँ समटैक लूरि सोचैत रहथि। जहि हिसाबसँ आमदनीक जड़ि देखि रहल छी ओइ हिसाबसँ सम्हारैक लूरि नहि छैक। जँ दुनू एक सतहपर आबि जाए तँ परिवारकेँ आगू मुँहे ससरैमे बेसी समए नहि लगत। एतेटा बाध छैक। अलेल घास सभ दिन रहतै। बाध ओगड़ैमे की लगैत छैक? एक-दू बेर ऐ भागसँ ओइ भाग घुमब मात्र छैक। अगर जँ अपनो काज ठाढ़ कऽ लिअए तँ बैसारियो नहि रहतैक आ आमदनियो बढ़ि जएतैक। हमरा बेटीकेँ ऐ घर अएलासँ एकटा काजुल आ बुधियार समांग बढ़ि जेतै। जानकीकेँ सभ हिसाब-कनमा, अधपेइ, पौवा, असेरा, सेर, अढ़ैया, पसेरी, धार आ मन सँ लऽ कऽ बोरा-क्वीनटल धरि, जोड़ैक लूरि छै। तहिना कोड़ी -बीस वस्तु, सोरे- सोलह, सोरहा -सोलह सोरे, दर्जन–बारह, ग्रुस-बारह दर्जन, जोड़ा -धानक आँटी, दस, गाही–पाँच, गंडा–चारि, जोड़ा–दू, पल्ला- एक सभ बुझैत अछि। मनमे खुशी एलै। बाजल- “बौआ, ओना जानकी गिरहस्तीक काज सम्हारि दूटा गाइयोक सेवा कऽ लेत। मुदा तहिसँ दूधे टाक आमदनी बढ़त। जरुरत छैक खेतिओ बढ़बैक। तँए नीक हएत जे एकटा गाए आ एकटा बड़द दऽ दिऐक। एकटा बड़द आ एकटा हरबाह भेने दू समांग अपन भऽ जेतै। जइसँ बीघा दू बीघा खेतियो कऽ सकैत अछि।
बुचन- “अपना खेत जे नहि छैक?”
बुचनक बात सुनि डोमन हँसए लगलाह। हँसैत बजलाह- “बौआ, समए एहेन आबि गेल अछि जे खेतोबला सभ खेती छोड़ि नोकरियेक पाछू बौआ रहल अछि। जइसँ खेती केनिहारक अभाव भऽ रहल छैक। गिरहस्तीक हाल बिगड़ि गेल छैक। जबकि जरुरत छैक खेतमे मेहनतिक। जे सभ किसान नहि बूझि रहलाह अछि।
बुचन- “केना बुझत?”
डोमन गंभीर होइत बजलाह- “बौआ खेतीमे बड़ बुधि‍क काज छै मुदा खेती दिन-दिन मूर्खेक हाथमे पड़ल जाइ छै, से सोचलहकहेँ?”
तर्क-वितर्क कऽ दुनू बापुत तँइ कऽ लेलक जे कुटमैती करबे करब। मुदा
एकटा जटिल प्रश्न आबि कऽ आगूमे ठाढ़ भऽ गेलनि। ओ ई जे बिआह उट-पटाँग ढ़ंगसँ नहि होइ? रस्तासँ पाइक उपयोग होइ। गुन-धुन करैत दुनू बापूत घर दिस बिदा भेलाह।
जाधरि डोमन पैखाना दिससँ अबैत ताधरि लुखिया चारि-पाँच बेर दौड़ि-दौड़ि आंगनसँ बान्हपर जा-जा देखलनि। मनमे उड़ी-बीड़ी जेना लगल रहनि। जे कुटमैतीमे कोनो तरहक गड़बड़-सड़बड़ नहि हुअए। नहि तँ लोक पीकी मारत। कहत जे मौगीक मुख्तिआरी छी ने। बिनु मरदक मौगी बेलगामक होइते अछि। कहलो गेल छै- “राँड़ मौगी साँढ़।फेर मनमे उठलनि जे किछु होउ बिआह तँ हमरे बेटाक होएत। तँए केकरो ओंगरी बतबैक रस्ता नहि रहए देबैक। जहिना बड़तुहार कहताह तहिना हमहूँ करब। जँ दुनू गोटेक मिलान रहत तँ किअए कोइ आँखि उठाओत। एते बात मनमे अबिते बड़तुहारकेँ लुखिया अबैत देखलनि। बान्ह परसँ दौड़ले आंगन आबि हाँइ-हाँइ कऽ थारी साँठए लगलीह।
हाथ-पएर धोइते नागेसर डोमनकेँ कहलकनि- “पहिने भोजने कऽ लिअ।
आगू-आगू लोटा नेने नागेसर आ पाछू-पाछू दुनू बापुत डोमन आंगन ऐलाह। पीढ़ीपर बैसिते नागेसर थारी आनि आगूमे देलकनि। आँखि घुमा कऽ देखि डोमन बजलाह- “समैध, समधीनियोकेँ अढ़मे बजा लिअनु। बि‍आहक सभ गप पक्का-पक्की कइये लेब। बैसारपर जखने गप उठाएब आकि चारु दिससँ लोक आबि अन्टक-सन्ट गप चालि देत।
आँखिक इशारासँ नागेसर भौजाइकेँ सोर पाड़ि बैसैले कहलक। तइ बीच डोमन कहलखिन- “समैध, समधीनकेँ पुछिअनु जे केना बेटाक बिआह करतीह?”
नागेसरकेँ अगुआ लुखिया बजलीह- “अहाँ सभ मरदा-मरदी गप करु। हमरा कोनो चीजक लोभ नहि अछि। नीक मनुक्ख घर आबए, बस एतबे लोभ अछि।
मने-मन नागेसर सोचैत जे हमर कतबो मोजर अछि, तइसँ की? कोनो की हमरा बेटा-बेटीक बि‍आह हएत? तँए हम अनेरे मुँह दुरि किअए करब। बाजल- “समैध, अहाँ अपने मुँहसँ बजियौक जे केना करब?”
भात-दालि सनैत डोमन बजलाह- “समैध, जहिना अहाँक भातिजक बिआह हएत तहिना तँ हमरो बेटीक हएत.....। लुखियाकेँ खुश करै दुआरे पुन: आगू बजलाह- “हमर बेटी साक्षात् लछमी छी। साल भरि की दसोसाल घुमि कऽ लड़की ताकब तँ ओहन नहि भेटत। तहूमे आब? आब तँ लोक मनुक्ख थोड़े घर अनैत अछि, अनैत अछि रूपैया।
नागेसर टाटक अढ़मे बैसलि भौज दिस तकैत बाजल- “खर्च-बर्च करै लेल किछु तँ चाहबे करी....।
नागेसरक बातकेँ कटैत लुखिया बजलीह- “नै! हम केकरो बेटीकेँ पाइ लऽ कऽ अपना घर नै आनब।
नागेसर भौजक गप्प सुनि चुप भऽ गेल।
मुस्की दैत लुखिया बजलीह- “जखन दुआरपर आबि बेटा मंगलनि तँ हम दऽ देलियनि। आब हमरा की अछि। दू कौर अन्न आ दू बीत कपड़ा टा चाही। घर तँ आब ओकरे सबहक -बेटे-पुतोहुक- हेतै।
डोमन बजलाह- “समैध, पाँच गोटे जे बरिआती चलब, हुनकर सुआगत हम नीक जकाँ करबनि। बड़-कनियाँकेँ, जे नव घर ठाढ़ करैक वस्तु अछि से तँ देबे करब। तेकर अतिरक्ति एकटा बड़द आ एकटा लगहरि गाए सेहो देब।
सबहक मुँहसँ हँसी निकलल। बिआहक दिन तँइ भऽ गेल। मुस्की दैत लुखिया बजलीह- “आब की हम कहबनि जे समधीनो हमरे दऽ दोथु।
ठहाका दैत डोमन उत्तर देलकनि- “बाह-बाह, तब तँ दुनू रोटी चाउरेक।
चारि बजे सूति-उठि चाह पीबि, पान खा डोमन नागेसरकेँ कहलखिन- “समैध, सभ बात तँ तइये भऽ गेल। आब चलब।
दुनू जोड़ धोती नागेसर आंगनसँ आनि आगूमे रखि देलकनि। धोती देखि डोमन बजलाह- “समैध, कतबो गरीब छी तँए की मुदा इज्जति बचा कऽ रखने छी। बेटीक दुआरपर केना धोती पहिरब?”
टाटक भुरकी देने लुखिया देखैत रहथि। डोमनक बात सुनि दोगसँ बाजलीह- “समैधकेँ कहिअनु जे जखन बेटी आओत तखन ने बेटीक घर हेतनि, ताबे तँ हमर छी कीने। हम दैत छि‍यनि‍।
ठहाका दैत डोमन बजलाह- “जखन हमर बेटी ऐ घर आओत तखन ने ओ समधीन हेतीह आकि अखने?”
तइ बीच पीहुआ, सभकेँ गोड़ लगलक। एक्कैस रूपैया डोमन पीहुआ हाथमे देलखिन।
थोड़े दूर अरिआति नागेसर घुमैत बाजल- “समैध, आब बढ़िऔक। नवम् दिनक दिन भेल। अहाँ काजमे लगि जाउ आ हमहूँ लगि जाइ छी।
डोमन दुनू बापुत बिदा भेलाह। आगू बेटीक बिआहक ओरिआओन रहनि किन्तु मनपर नचैत रहनि लुखियाक गप्प- “केकरो बेटीकेँ पाइ लऽ कऽ अपन घर नै आनब।देह सिहरि गेलनि बेटा दिश तकलनि। ओहो आब बि‍आह जोगर भऽ गेल रहए।