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Thursday, June 7, 2012

बहि‍न :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल


“आब अधिक दिन माए नहि खेपतीह। ओना उमेरो नब्बे बर्खक धत-पत हेबे करतनि। तहूँमे बर्ख पनरह-बीसेकसँ कहियो बोखार के कहए जे उकासियो नहि भेलनि अछि। एक तँ ओहिना पाकल उमेर तहिपर सँ देहक रोगो पछुआएल, तँए भरिसक ऐ बेरि उठि कऽ ठाढ़ हेबाक कम भरोस। किएक तँ एक ने एक उपद्रव बढ़िते जाइत छन्हि। अन्नो-पानि अरुचिये जकाँ भेलि जाइ छन्‍हि‍।” -भखरल स्वरमे राधेश्याम पत्नीकेँ कहलखि‍न।
पतिक बात सुनि, कने काल गुम्म रहि, रागिनी बाजलि- “केकरो औरुदा तँ कियो नहिये दऽ सकैत अछि। तहन तँ जाधरि जीबैत छथि ताधरि हम-अहाँ सेबे करबनि की ने?”
“हँ, से तँ सएह कऽ सकैत छियनि। मुदा जिनगीक कठिन परीक्षाक घड़ी आबि गेल अछि। एते दिन जे केलौं, ओकर ओते महत्व नहि जते आबक अछि। किएक तँ कखनो पानि मंगतीह वा किछु कहती, तहिमे जँ कनियो देरी हएत आ कियो सुनि लेत तँ अनेरे बाजत जे फल्लांक माए पानि दुआरे किकिहारि कटैत रहैत छथिन। मुदा बेटा-पुतोहु तेहेन जे छै घुरि कऽ एको-बेरि तकितो नहि छन्हि। केकरो मुँहमे ताला लगेबै। देखिते छियै जे गाममे केना लोक झुठ बाजि-बाजि झगड़ो लगबैत आ कलंको जोडै़त अछि। तँए चैबीसो घंटा केकरो नहि केकरो लगमे रहए पड़त। जँ से नहि करब तँ अंतिम समएमे कलंकक मोटरी कपारपर लेब।
 “कहलौं तँ ठीके, मुदा बच्चा सबहक हिसाबे कोन, तहन तँ दू परानी बचलौं। बेरा-बेरी दुनू गोटे रहब। अन्तुका काज अहूँ छोड़ि दिऔ। किएक तँ अंगनेक काज बढ़ि गेल। बहीनो सभकेँ जनतब दइये दिअनु।
“अपनो मनमे सएह अछि। जँ तीनू बहि‍न आबि जाएत तँ काजो बँटा कऽ हल्लुक भऽ जाएत। ओना अंगनासँ दुआरि धरि काजो बढ़बे करत। जखने सर-संबंधी, दोस्त-महिम बुझताह तँ जिज्ञासा करए अएबे करताह। जखन दरबज्जापर औताह तँ सुआगत बात करै पड़त
मूड़ी डोलबैत रागिनी बजलीह- “हँ, से तँ हेबे करत।
“अखन निचेन छी आ काजो करैऐक अछि। तँए अखने तीनू बहि‍नि‍यो आ ममोकेँ जानकारी दइये दैत छि‍यनि‍। आन कुटुम्बकेँ अखन जानकारी देब जरुरी नहि छै। मोबाइलमे मामाक नम्बर लगौलक। रिंग भेलै।
“हेलो, मामा। हम राधेश्याम।
“हँ, राधेश्याम। की हाल-चाल?”
“माए, बड़ जोर दुखित पड़ि गेलीह।
“अखन हम एकटा जरुरी काजमे बँझल छी। साँझ धरि आबि रहल छी। मोबाइल बन्न कऽ राधेश्याम जेठ बहि‍न गौरीक नम्बर लगौलक।
“हेलो, बहि‍न। माए दुखित पड़ि गेलखुन।
“अखन हम स्कूलेमे छी आ अपनौं कओलेजेमे छथि। छुट्टीक दरखास्त दइये दैत छिअए। साँझ धरि पहुँचि‍ जाएब।
मोबाइल बन्न कऽ छोटकी बहि‍नि‍क नम्वर लगौलक।
“सुनीता। हम राधेश्याम।
“भैया, माए नीके अछि की ने?”
“अखन की नीक आ कि अधलाह। तीनि दिनसँ ओछाइन धेने अछि। तँए किछु कहब कठिन।
“हम अखने छुट्टीक दरखास्त दऽ आबि रहल छी।
“बड़बढ़ियाकहि मझिली बहि‍न रीताक नम्बर लगौलक।
“हेलो, रीता। हम राधेश्याम। माए, बड़ जोर दुखित छथुन।

“भैया, हम तँ अपने तते फिरीसान छी जे खाइक छुट्टी नहि भेटैत अछि। काल्हियेसँ दुनू बच्चाक प्रतियोगिता परीक्षा छियै
बिना स्विच ऑफ केनहि राधेश्याम मोबाइल राखि अकास दिस देखए लगल। ठोर पटपटबैत- “बच्चाक परीक्षा......, मृत्यु सज्जापर माए....! केकरा प्राथमिकता देल जाए? एक दिस, जे बच्चा अखन धरि जिनगीमे पएरो नहि रखलक, सौंसे जिनगी पड़ल छैक। दोसर दिस कष्टमय जिनगीमे पड़ल बृद्ध माए। खैर, सभकेँ अपन-अपन जिनगी होइ छैक आ अपना-अपना ढ़ंगसँ सभ जीबए चाहैत अछि। हम चारि भाए बहि‍न छी तँए ने दोसरपर ओंगठल छी। मुदा जे असकरे अछि, ओ केना माए-बापक पार-घाट लगबैत अछि। किछु सोचिते छल कि नव उत्साह मनमे जगल। नव उत्साह जगिते नजरि पाछू मुँहे ससरल। चारु भाए-बहि‍नमे माए सभसँ बेसी ओकरे मानैत छलि आ ओकर सेबो केलक। कारणो छलैक जे बच्चेसँ ओ रोगा गेल छलि। मुदा आश्चर्यक बात तँ ई जे जेकरा माए सभसँ बेसी सेवा केलक वएह सभसँ पहिने बिसरि रहलि अछि।
 गोसाँइ डूबैत-डूबैत मामो आ दुनू बहि‍न-बहिनोइ पहुँचि‍ गेलखि‍न।
अबिते डॉ. सुधीर -छोट बहिनोइ- आला लगा सासु माएकेँ देखि कहलखिन- “भैया, माए बँचतीह नहि। मुदा मरबो दस दिनक बादे करतीह। तँए अखन ओते घबड़ेबाक बात नहि अछि। अखन हम जाइ छी, मुदा बहि‍न डॉ. सुनिता रहतीह। ओना हमहूँ दू-दिन तीन-ि‍दनपर अबैत रहब।
डॉ. सुधीरक बात सुनि सभकेँ क्षणिक संतोष भेलनि। मामा कहलखिन- “भागिन, ओना हम केकरो छींटा-कस्सी नहि करैत छि‍यनि‍ मुदा अपन अनुभवक हिसाबे कहैत छिअह जे भरि दिन तँ स्त्रीगण सभ मुस्तैज रहथुन मुदा रातिमे नहि। ओना हमरो गाम बहुत दूर नहिये अछि। अखन तँ धड़फड़ाइले चलि एलौं। तँए अखन जाइ छी। काल्हिसँ साँझू पहरकेँ एबह आ भोर कऽ चलि जेबह। भरि राति दुनू माम-भगिन गप-सप्‍प करैत ओगरि लेब।
दुनू बहिनोइयो आ मामो चलि गेलखिन।
 “आइ सातम दिन माएकेँ अन्न छोड़ब भऽ गेलनि। दू-चारि चम्मच पानि आ दू-चारि चम्मच दूध, मात्र अधार रहि गेल छन्‍हि‍।” -आंगनसँ दरवज्जापर आबि रागिनी पतिकेँ कहलखि‍न।
पत्नीक बात सुनि राधेश्याम मने-मन सोचए लगलाह। मनमे उठलनि चारु भाए-बहि‍नक पारिवारिक जिनगी। कतेक आशासँ दुनू गोटे माए-पिता हमरा चारु भाए-बहि‍नकेँ पोसि-पालि, पढ़ा-लिखा, बि‍आह-दुरागमन करा परिवार ठाढ़ कऽ देलनि। जहिना गौरी जेठ बहि‍न एम.ए. पास अछि। तहिना एम.ए. पास बहिनोइयो छथि। हाई स्कूलमे बहि‍न नोकरी करैत अछि तँ कौलेजमे बहिनोइ। परिवारक प्रतिष्ठा, समाजोमे बढ़वे केलनि जे कमलनि नहि। तहिना छोटकियो बहि‍न अछि। बहीनो डॉक्टर आ बहिनोइयो डॉक्टर। तहिना तँ पिताजी मझिलियो बहि‍नकेँ केलनि। दुनू परानी इंजीनियर। बम्बइमे दुनू गोटे नोकरी करैत अि‍छ।
जहिना तीनू बहि‍न पढ़ल-लिखल अछि तहिना बहिनोइयो छथि। अजीव नजरि पितोजीक छलनि। मनुष्यक पारखी। तँए ने बहि‍नक बि‍आह समतुल्य बहिनोइक संग केलनि। एक माए-बापक तीनू बेटी, पढ़ल-लिखल, एक परिवारमे पालल-पोसल गेलि, मुदा तीनूक विचारमे एते अंतर केना अबि गेलै। ऐ प्रश्नक जबाव राधेश्यामकेँ बुझैमे अयबै नहि करनि। मन घोर-घोर होइत। एक दिस माइक अंतिम अवस्थापर नजरि तँ दोसर दिस मझिली बहि‍नक व्यवहारपर।
विचारक दुनियाँमे राधेश्याम औनाए लगलाह। प्रश्नक जबाब भेटिबे ने करनि। अपन परिवारपर सँ नजरि हटा बहि‍न सबहक परिवार दिस नजरि दौड़ौलनि।
गौरीक ससुर उमाकान्त हाई स्कूलक शिक्षक रहथिन। अपने बी.ए. पास मुदा पत्नी साफे पढ़ल-लिखल नहि। नाओं-गाओं लिखल नहि अबनि। ओना पिता पंडित रहथिन। मुदा बेटी कऽ परिवार चलबैक लूरिकेँ बेसी महत्व देथिन। जइसँ कुशल गृहिणी तँ बनि जाएत, मुदा ने चिट्ठी-पुरजी पढ़ल होइछै आ ने लिखल। ओना जरुरतो नहि रहै। किऐक तँ ने पति-पत्नीक बीच चिट्ठी-पुरजीक जरुरत आ ने कुटुम्ब-परिवारक संग। मुदा दुनू परानी उमाकान्त आ सरिताक बीच असीम सि‍नेह। मास्टर सहाएबकेँ अपन बाल-बच्चासँ लऽ कऽ विद्यालयक बच्चा सभकेँ पढ़बै-लिखबैक मात्र चिन्ता। जहि पाछू भरि दिन लगलो रहथि। जखन कि पत्नी सरिता परिवारक सभ काज सम्हारैत। एखनुका जकाँ लोकक जिनगियो फल्लर नहि, समटल रहै। गौरीक परिवारपर सँ नजरि हटा राधेश्याम छोटकी बहि‍न डॉ. सुनिताक परिवारपर देलनि। जहिना बहि‍न डॉक्टरी पढ़ने तहिना बहिनोइयो। जोड़ो बढ़ियाँ। सुनिताक ससुर वैद्य रहथिन। जड़ी-बुट्टीक नीक जानकार। जहिना जड़ी-बुट्टीक जानकार तहिना रोगो चिन्हैक। जइसँ समाजमे प्रतिष्ठो नीक आ जिनगियो नीक जकाँ चलनि। तँए अपन चिकित्साक वंशकेँ जीवित रखैक दुआरे बेटाकेँ डॉक्टरी पढ़ौलनि। पत्नियो तेहने। अंगनाक काज सम्हारि, बाध-बोनसँ जड़िओ-बुट्टी अनैत आ खरलमे कुटबो करैत रहथि। दवाइ वैद्यजी अपने बनाबथि किऐक तँ मात्राक बोध गृहिणीकेँ नहि रहनि। छोटकी बहि‍नक परिवारपर सँ नजरि हटा मझिली बहि‍नक परिवारपर देलनि। रीताक ससुर मलेटरिक इंजीनियरिंग विभागमे हेल्परक नोकरी करैत। अपनहि विचारसँ मलेटरिऐक बेटीसँ विआहो -लभ-मैरिज- केने। मलेटरिक नोकरी, तँए पाइयो आ रुआबो। हाथमे सदिखन हथियार तँए मनो सनकल। मुदा बेटा-बेटीकेँ नीक जकाँ पढ़ौलनि। जहिना रीता इंजीनियरिंग पढ़ने तहिना घरोबला। दुनू बम्बइक कारखानामे नोकरी करैत। कमाइयो नीक खरचो नीक, तहिना मनक उड़ानो नीक। एकाएक राधेश्यामक मनमे उठल जे आब तँ माइयक अंतिमे समए छी तँए एक बेरि रीताकेँ फेरि फोन कऽ कऽ जानकारी दऽ दिअए। मोवाइल उठा रीताक नम्वर लगौलनि। रिंग भेल बाजलि‍- “हेलो, हम राधेश्याम।
“हेलो, भैया। अखन हम स्टाफ सबहक संग काजमे व्यस्त छी।
रीताक जबाव सुनि राधेश्याम सन्न रहि गेलाह। रातिक दस बजैत। इजोरियाक सप्तमी अन्हार-इजोतक बीच घमासान लड़ाइ छिड़ल। किछु पहिने जहि चन्द्रमाक ज्योति अन्हारपर शासन करैत, वएह चन्द्रमा पछड़ि रहल अछि। तेज गतिसँ अन्हार आगू बढ़ि रहल अछि। तइ बीच छोटकी बहि‍न डॉ. सुनीता आंगनसँ आबि भाय राधेश्यामकेँ कहलक- “भैया, हम तँ भगवान नहि छी, मुदा माइयक दशा जहि तेजीसँ बिगड़ि रहल छन्‍हि‍, तहिसँ अनुमान करैत छी जे काल्हि साँझ धरि परान छुटि जेतनि।
एक दिस माइक अंतिम दशा आ दोसर दिस रीताक बिचारक बीच राधेश्यामक धैर्यक सीमा डगमग करए लगलनि। विचित्र स्थिति। जिनगीक तीनिबट्टीपर
बौआए लगलाह। तीनिबट्टीक तीनू रस्ता तीनि दिस जाइत। एक रास्ता देवमंदिर दिस जाइत तँ दोसर दानवक काल-कोठरी दिस। बीचक रास्तापर राधेश्याम ठाढ़। एकाएक निर्णय करैत राधेश्याम बहि‍न सुनिताकेँ कहलखिन- “कने गौरियो कऽ बजाबह।
आंगन जा सुनिता गौरीकेँ बजौने आएल। दुनू बहि‍नक बीच राधेश्याम बजलाह- “बहि‍न, जहिना हमर बहि‍न रीता तहिना तँ तोड़़ो सबहक छिअह। तेँ, तोहूँ सभ एक बेरि फोन लगा माइक जानकारी दऽ दहक। हम निर्णय कऽ लेलौं जे जहिना ऐ दशामे माइक रहनौं, ओकरा अपन धिया-पुतासँ अधिक नहि सुझैत छैक तहिना हमहूँ ओकरा भरोसे नहि जीबैत छी। तेँ जँ माए के जीवितमे नहि आओत तँ मुइलाक बाद नहो-केश कटबैक जानकारी नहि देबइ। हमरा-ओकरा बीच ओतबे काल धरि संबंध अछि जते काल माइक प्राण बँचल छैक। कहलो गेल छैक “भाए-बहि‍न महींसक सींग, जखने जनमल तखने भिन्न।मन तँ होइत अछि जे भने ओ अखन स्टाफ सबहक बीच अछि, तेँ एखने सभ बात कहि दियै। मुदा कहनौं तँ किछु भेटत नहि, तेँ छोड़ि दैत छियै।
जहिना अकासमे उड़ैत चिड़ैकेँ वंश रहितौं परिवार नहि होइ छै तहिना जँ मनुक्खोक होइ तँ अनेरे भगवान किऐक बुधि‍-विवेक दइ छथिन। किऐक नहि मनुक्खोकेँ चिड़ैइये-चुनमुनी आ कि चरिटंगा जानवरेक जिनगी जीबए देलखिन। बजैत-बजैत राधेश्यामोक आ दुनू बहि‍नयोक करेज फाटए लगलनि। आँखिसँ नोर टघरए लगलनि। भाए-बहि‍नक टूटैत संबंधसँ सभ अचंभित हुअए लगलथि। सबहक हृदयमे रीता नचए लगलनि। बच्चासँ बि‍आह धरिक रीताक जिनगी सबहक आँखिमे सटि गेलनि। एक दिस रीता बम्बइक घोड़दौड़ जिनगीक प्रतियोगितामे आगू बढ़ए चाहैत छलि तँ दोसर दिस देवालमे टांगल फोटो जकाँ सबहक हृदयमे चुहुट कऽ पकड़ने। जहिना बाँसक झोंझसँ बाँस काटि निकालैमे कड़चीक ओझरी लगैत तहिना धि‍या-पुताक ओझरीमे रीता।
“तीनू ननदि-भौजाइ गौरि, सुनिता आ रागिनी माए लग बैसि मने-मन सोचए लगलीह। कियो-केकरो टोकैत नहि। तीनू गुमसुम। सिर्फ आँखि नाचि-नाचि एक-दोसरपर जाइत। मुदा मन श्वेतवाण रामेश्वरम् जकाँ। एक दिस जिनगी रूपी भूमि स्थल जकाँ विशाल भूभाग देखैत तँ दोसर दिस मृत्यु रूपी अथाह समुद्र। यएह थिक जिनगी आ जिनगीक खेल। जहि पाछू पड़ि लोक आत्माकेँ बलि चढ़वैत। तइ बीच माए बाजलि- “रीता.....।रीताक नाम सुनि तीनूक हृदयमे ऐहेन धक्का लगलनि जइसँ तीनू तिलमिला गेलीह।
रातिक एगारह बजैत। गामक सभ सूति रहल। इजोरियो डुबैपर। झल-अन्हार। दलानक आगूमे, कुरसीपर बैसि राधेश्याम आँखि मूनि अपन वंशक संबंधमे सोचैत रहथि। मनमे अएलनि जे आइ सप्तमीक चान डुबि रहल अछि, अन्हार पसरि रहल अछि, मुदा कि कल्हुका चान आइसँ कम ज्योतिक होएत? की अगिला ज्योति पैछला अन्हारक अनुभव नहि करत? सभ दिनसँ अन्हार-इजोतक बीच संघर्ष होइत आएल अछि आ होइत रहत। फेरि मनमे उठलनि जे आजुक राति हमरा लेल ओहन राति अछि जे भरिसक माइक जिनगीक अंतिम राति हएत। जनिका संग हजारो राति बीतल ओइपर विराम लगि रहल अछि। विचारक दुनियाँमे उगैत-डूबैत राधेश्याम। तहिकाल शबाना पोतीक संग पहुँचलीह। दलान-आंगनक बीच रास्तापर दुनू गोटे चुपचाप ठाढ़ि। दुनू डेराएल। राधेश्याम आँखि मुनने तेँ नहि देखैत। परोपट्टामे हिन्दु-मुसलमानक बीच तना-तनी। जहि डरसँ शबाना दिनकेँ नहि आबि अन्हारमे आएल। किऐक तँ सरोजनीक सि‍नेह खींचि कऽ लऽ अनलकै। रेहना शबानाकेँ कहलक- “दादी, ऐ ठीन किअए ठाढ़ छीही, अंगना चल ने?”
रेहनाक अवाज सुनिते राधेश्याम आँखि तकलनि तँ दुनू गोटेकेँ ठाढ़ देखलनि। पुछलथि- “के?”
शबाना बाजलि- “बेटा, राधे।
“मौसी।
“हँ।
एत्ती राति कऽ किऐक अलेहेँ?”
“बौआ, से तू नै बुझै छहक जे गाम-गाममे केहेन आगि लागि रहल छैक। पाँचम दिन सुनलौं जे बहि‍न बड़ जोड़ अस्सक छथि। जखने सुनलौं तखने मन भेल जे जाइ। मुदा की करितौं? मन छटपटाइ छलए। बेटाकेँ पुछलियै तँ कहलक जे से तू नै देखै छीही रस्ता-बाटमे इज्जत-आवरुक लुटि भऽ रहल अछि। मार-काट भऽ रहल अछि। ऐहन स्थितिमे केना जेमए। मुदा मन नै मानलक। जिनगी भरि दुनू बहि‍न संगे रहलौं, आइ बेचारी मरि रहल अछि तँ मुँहो नै देखब? जी-जाँति पोतीकेँ संग केने एलौं।
कुरसीपर सँ उठि राधेश्याम शबानाक बाँहि पकड़ि आंगन दिस बढ़ैत बहि‍नकेँ कहलखि‍न- “मौसी एलखुन। पएर धोइले पानि दहुन।
राधेश्यामक बात सुनि दुनू बहि‍नि‍यो -गौरी आ सुनिता- आ रागिनियो घरसँ निकलि आंगन आइलि। गौरी बजलीह- “मौसी, शबाना मौसी!
शबाना बजलीह- “हँ।
दुनू गोटे -शबानो आ रेहनो- पएर धोए सोझे बहि‍न सरोजनी लग पहुँचि‍ दुनू पएर पकड़ि कानए लगलीह। कनैत देखि सरोजनी पुछलखि‍न- “कनै किअए छेँ। हम कि कोनो आइये मरब? एत्ती रातिकेँ किअए एलैहेँ?”
शबाना बाजलि- “बहि‍न, रस्ता-पेरा बन्न अछि। दू बर्खसँ भौरियो-बट्टा -घुमि-घुमि बेचनाइ- बन्न भऽ गेल। जखनसँ अहाँ दऽ सुनलौं, तखैनसँ मनमे उड़ी-बीड़ी लगि गेल तेँ दिन-देखार नै आबि चोरा कऽ अखन ऐलौंहेँ।
सरोजनी बहुत कठीनसँ बाजलि- “धिया-पुता नीके छौ कीने?”
शबाना कहलकनि- “शरीरसँ तँ सब नीके अछि, मुदा कारबार बन्न भऽ गेल अछि।
“गामो दिस गेल छलेँ?”
“नै। कन्ना जाएब....। तेसर सालक बाढ़िमे अहूँक गाम कटि कऽ कमला पेटमे चलि गेल आ हमरो गाम कोसीमे। आब सुने छी जे हमरो गाम भरनापर बसल हेँ आ अहूँक गाम कमलाक पछबरिया छहरक पछबरिया बाधमे। घनश्यामपुर तक तँ रस्ता छइहो मुदा ओइसँ आगू रस्ते सबपर मोइन फोड़ि देने अछि। पौरुकाँ जे जाइत रही तँ लगमा लगमे डुमए लगलौं।
सरोजनी गौरीकेँ इशारासँ कहलक- “दाइ, बड़ राति भेलइ। मौसीकेँ खाइले दहक।
शबाना बाजलि- “बहि‍न, पहिने हम कना खाएब? पहिने बौआ राधेश्यामकेँ खुआ दियौ। खा कऽ सूति रहत। हम भरि राति बहि‍नसँ गप-सप्‍प करब। बहुत दिनक गप्‍प पछुआइल अछि।
शबानाक बात सुनि राधेश्याम मने-मन सोचए लगल जे दुनियाँमे बहि‍नि‍क कमी नहि अछि। लोक अनेरे अप्पन आ बीरान बुझैत अछि। ई सभ मनक खेल छिअए। हँसी-खुशीसँ जीवन बितबैमे जे संग रहए, वएह अप्पन। शवानाकेँ कहलक- “मौसी, माए तँ ने सिर्फ हमरे माए छी आ ने अहींक बहि‍न। सबहक अप्पन-अप्पन छिअए, तेँ कियो अप्पन करत की ने?”
पूबरिये घरक ओसारपर राधेश्याम सूतल। बाकी सभ पूबरिया घरमे बैसि गप-सप्‍प करए लगलीह। गौरी पुछलनि- “मौसी, अहाँ दुनू बहि‍न तँ दू गामक छिअए। दुनू गोरेमे चीन्हा-परिचए कहिया भेलि?”
शबाना बाजनि- “जइहेसँ ज्ञान-परान भेलि, तेहियेसँ अछि। हमरा बाप आ तोरा नाना कऽ दोसतिआरै रहनि। कोस भरि पूब हमर गाम झगड़ुआ अछि आ कोस भरि पछिम बहि‍नि‍क। अखन तँ दुनू गाम उपटि कऽ दोसर ठीन बसल अछि। मुदा पहिने बड़ सुन्दर दुनू गाम छलै।
गौरी बाजलि- “मौसी, हम तँ बच्चेमे, बहुत दिन पहिने गेल रही। तइ दिनमे तँ बड़ सुन्दर गाम रहए।
शबाना बजलीह- “हँ, से तँ रहबे करए। मुदा आब देखवहक तँ बिसबासे ने हेतह जे यएह गाम छिअए। हँ, तँ कहै छेलिहह, काकाकेँ बहुत खेत-पथार रहनि। चारि जोड़ा बड़द खुट्टापर, चारि-पाँचटा महीसियो रहनि। मुदा हमरा बापकेँ खेत-पथार नै रहए। गामेमे खादी-भंडार रहए। सौंसे गामक लोक चरखोे चलबै आ कपड़ो बीनै। सभसँ नीक कारीगर रहए हमर बाप। घरक सभ कियो सुतो काटी आ कपड़ो बनबी। सलगा, चद्देरि, गमछी आ धोती बीनैमे हमरा बापक हाथ पकड़िनिहार कियो नहि। बहि‍नक गामक सभ हमरे बापसँ कपड़ा कीनए। सौंसे गामसँ अपेछा रहए। पाँचे-सात वर्खक रही तहियेसँ बहि‍नक ऐठाम ऐ ठीन जेबो करियै आ खेबो करियै।
शबानाक बात सुनि गौरीकेँ अचरज लगलै। मने-मन सोचए लगली जे एक तँ गरीब तहूमे मुसलमान। तइ बीच दोस्ती। मुस्की दैत रागिनी बाजलि- “कोन पुरना खिस्सा मौसी जोति देलखिन। ई कहथु जे दुनू बहि‍नक बिआह एक्के दिन भेलनि?”
शबाना बाजलि- “धूर्र कनियाँ! अहाँ की बजै छी। हमरासँ बहि‍न दू-तीन बरख जेठ छथि। बहि‍नक बि‍आहसँ दू वर्ख पाछू कऽ हमर बि‍आह भेल। कक्का हमरा बापकेँ कहलखिन जे पूबरिया आ दछिनबरिया इलाका कोशिकन्हा भऽ गेल तेँ आब कथा-कुटुमैती उत्तरेभर करब नीक हएत।
कन्ने गुम रहि, शबाना बाजलि- “बेटी, कपारक दोख भेल। आब अपनो बुझै छी जे नैहरक काजक जे महौत छेलै से ऐ काज –-भौरीक- नै अछि। मुदा की करितियै?
ऐ ठीम उ काज अछिये नहि। ने खादी-भंडार छै आ ने कारोवार अछि।
मुस्की दैत रागिनी बाजलि- “मौसी, अपना बि‍आहमे तँ हम कनियेटा रही। सभ गप मनो ने अछि। हिनका तँ मन हेतनि, बि‍आहमे झगड़ा किअए भेल रहए?”
कने काल गुम रहि शबाना ठाहाका मारि हँसि, बाजलि‍- “अहाँक बावू बड़ मखौलिया रहथि। हँसी-चौलमे केकरो नइ जीतए देथिन। घरदेखीमे एलथि। हम दुनू बहि‍न खूब छकौलिएनि। पीढ़ी तरमे खपटा, झुटका बैसैले आ रुइयाँ तरि कऽ खाइले सेहो देलिएनि। खा कऽ जहाँ उठलाह कि एक डोल करिक्का रंग कपारपर उझलि देलिएनि। मुदा हुनका लिए धनि सन। तहिना बरिआतीमे ओहो छकौलकनि। सबहक धोतीमे चारि-पाँच दिनक सड़लाहा खैर लगा देलकनि। पहिने तँ बरिआती सभ अपनमे रक्का-टोकी केलक। मुदा जखन भाँज लगलै जे घरवारी सभकेँ सड़लाहा खइर लगा देलक। तखन बरिआतियो सभ टुटल। मुदा कहे-कही भऽ कऽ रहि गेलइ। मारि-पीटि नहि भैल।कहि हँसै लागलि। सभ हँसल।
राधेश्याम ओसारपर सूतल रहथि। मुदा एक्को बेरि आँखि बन्न नहि भेलनि। किऐक तँ मनमे शंका होइत जे अनचोकेमे ने माए मरि जाए। खिस्से-पिहानीमे राति कटि गेल।
भोर होइते शबाना राधेश्यामकेँ कहलक- “बौआ, अपन मन अछि जे आब बहि‍नकेँ एक काठी चढ़ाइये कऽ जाएब। मुदा गामे-गाम जे आगि लगल देखै छिअए तइसँ डर होइए।
राधेश्याम- “मौसी, ऐठाम कियो किछु नहि बिगाड़ि सकैत छओ। जहिया तक तोरा रहैक मन होउ, निर्भीकसँ रह।
शबाना बाजलि- “बौआ, मन होइए जे बहि‍नक सभ नुआ-बिस्तर हम खीचि दिअए। फेरि ई दिन कहिया भेटत
राधेश्याम- “दुनू बहि‍नक बीच हम की कहबौ। जे मन फुड़ौ से कर।
इम्हर आब राधेश्यामक माए सरोजनीक टनगर बोलो मद्धिम भेल जा रहल छलनि।

भैयारी :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल


मैट्रिक परीक्षा दऽ दीनानाथ आगू पढ़ैक आशासँ, संगियो-साथी आ शिक्षको ऐठाम जा-जा विचार-विमर्श करैत। बिनु पढ़ल-लिखल परिवारक रहने, कॅालेजक पढ़ाइक तौर-तरीका नहि बुझैत। ओना ओ हाइ स्कूलमे थर्ड करैत मुदा क्लासमे सभसँ नीक विद्यार्थी। सभ विषए नीक जकाँ परीक्षामे लिखने, तँए फेल करैक चिन्ता मनमे एक्को मिसिया रहबे ने करै।
मूर्ख रहितो माए-बाप बेटाकेँ पढ़बैमे जी-जान अरोपने। ओना घरक दशा नीक नहि मुदा पढ़बैक लीलसा दुनूक हृदएमे कूट-कूट कऽ भरल। जखन दीनानाथ मैट्रिक परीक्षाक ि‍दअए दरभंगा सेन्टर जाइक तैयारी करए लगल, तखन माए अपन नाकक छक, जे डेढ़ आना-छअ पाइ भरि रहए, बेचि कऽ देलकै। अगर जँ माए-बापक मन बेटा-बेटीकेँ पढ़बैक रहत आ थोड़बो मेहनतिसँ ओ पढ़त तँ लाख समस्योक बावजूद ओ पढ़बे करत। तेहिमे सँ एक दीनानाथो। काल्हि एगारह बजिया गाड़ीसँ परीक्षा दिअए जाएत तँए आइये साँझमे पिता रामखेलावन पत्नी सुमित्राकेँ कहलक- “काल्हि एगारह बजे बौआ गाड़ी पकड़त तँए अखने केकरोसँ आध सेर दूध आनि कऽ पौड़ि दिऔ। दहीक जतरा नीक होइ छै।
माइयोक मनमे जँचलै। आध सेर दूध पौड़ैक विचार माए केलक आ मने-मन ब्रह्म-बाबाकेँ कबुला केलक जे अहाँ हमरा बेटाकेँ पास करा देब तँ कुमारि भोजन कराएब। संगे हाँइ-हाँइ कऽ चिकनी माटि लोढ़ीसँ फोड़ि अछींनजल पानिमे सानि, दिआरी बना, साफ पुरना कपड़ाक टेमी बना, दिआरीमे करु तेल दऽ साँझ दिअए ब्रह्म स्थान बिदा भेल। रस्तामे मने-मन ब्रह्म-बाबाकेँ कहैत जे हे ब्रह्मबाबा कहुना हमरा बेटाकेँ पास कऽ दिहक। तोरेपर असरा अछि।
स्कूलमे सभसँ नीक विद्यार्थी दीनानाथ, मुदा नीक रहितौं क्लासमे थर्ड करैत। एकर कारण रहए जे हाइ स्कूल सेेक्रेट्रीक मातहत चलैत। जइसँ स्कूलक सर्वेसर्वा सेक्रेट्रिये। इज्जतोक दुआरे आ फीसोक चलैत स्कूलमे फस्ट सेक्रेट्रिएक लगुआ-भगुआ करैत। जँ कहीं सेक्रेट्रीक समांग नञि रहैत तखन हेडमास्टरक समांग फस्ट करैत। मुदा ऐ बैचमे सेक्रेट्रियोक सवांग आ हेडमास्टरोक सवांग। तँए सेक्रेट्रीक समांग फस्ट करैत आ हेडमास्टरक समांग सेकेण्ड आ दीनानाथ थर्ड। जे फस्ट करैत ओकरा पूरा फीस आ सेकेण्ड-थर्डकेँ आधा फीस माफ होइत। ओना आन शिक्षक सभकेँ ऐ बातक क्षोभ होन्‍हि‍ मुदा कैयो की सकैत छथि। किएक तँ आन शिक्षक सबहक गति कोठीक नोकरसँ नीक नञि रहनि, सात घंटी पढ़ौनाइ आ डेढ़ सए रुपैया महीना पौनाइ मात्र रहनि। मुदा तैयो ओ सभ इमानदारीसँ काज करैत। असेसमेंटक चलनि सेहो रहए। बीस नम्बरक हिसाबसँ सभ विषएक असेसमेंट होइत। सिर्फ समाजे-अध्ययनक हिसाब अलग रहए। असेसमेंटक नम्बर परीक्षाक नम्बरमे जोड़ि कऽ रिजल्ट होइत। जे असेसमेंटक नम्बर सेक्रेट्री आ हेडमास्टरक हाथक खेल रहए। परीक्षाक तीन मासक उपरान्त रिजल्ट निकलै।
मास दिन परीक्षाक बीत गेल। दू मास रिजल्ट निकलैमे बाकी। माघक अंतिम समए। सरस्वती पूजा पाँच दिन पहिने भऽ गेल। शीतलहरी चलैत। जइसँ मिथिलांचल साइबेरिया बनि गेल। दिन-राति एक्के रंग। बरखाक बून्न जकाँ ओस टप-टप खसैत। सुरुजक दरसन दू माससँ कहियो ने भेल। दिन-राति कखन होए ओ लोक अन्हारेसँ बुझैत। सभ अपन-अपन जान बँचवै पाछू लागल।
खेती-पथारीक काज सबहक बन्न। रब्बी-राइ ठंढ़सँ कठुआएल। बढ़बे ने करैत। बोराक झोली ओढ़ोलाक बादो माल-जाल थर-थर कपैत। जहिना महींसक बच्चा तहिना गाइयक बच्चा कठुआ-कठुआ मरैत। बकरीक तँ फौतिये आबि गेल। गाछ सभ परहक घोरन सुड्डाह भऽ गेल। चिड़ै-चुनमुनीसँ लऽ कऽ नढ़िया, खिखिर, साँप मरि-मरि जहाँ-तहाँ महकैत।
माघक पूर्णिमासँ दू दिन पहिने रामखेलावनकेँ लकबा लपकि लेलक। सौंसे देहक अधा भाग सुन्न भऽ गेलै। क्रियाहीन। बिठुओ कटलापर किछु नहि बुझैत। चिड़ैक लोल जकाँ टेढ़ मुँह भऽ गेलै। ओना उमेरो कोनो बेसी नहि, चालीस बर्खसँ भीतरे। रौतुका समए। शीतलहरीक चलैत अन्हारो बेसी। ओना इजोरिया पख रहए। मुदा भादबक अन्हार जकाँ अन्हार। पिताक दशा देखि दीनानाथक मन घबड़ा गेलै। तहिना माइयोक। मुदा तैयो मनकेँ थीर करैत दीनानाथ डाॅक्टर ऐठाम विदा भेल। किछु दूर गेलापर पएर तेना कठुआ गेलै जे चलिये ने होइ। मनमे भेलै जे बाबूसँ पहिने अपने मरि जाएब। घरोपर घुरि कऽ नञि गेल हएत। बीच पाँतरमे दीनानाथ असकरे। दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर खसए लगलै। मनमे एलै, आब की करब? मुदा फेर मनमे एलै जे हाथसँ ठेहुन रगड़लापर पएर हल्लुक हएत। सएह करए लगल। जाँघ हल्लुक भेलै। हल्लुक होइते डाॅक्टर ऐठाम चलल।
डाॅक्टर ऐठाम पहुँचिते रोगीक भीड़ देखि दीनानाथ फेर घबड़ा गेल। मनमे एलै, जे सौंसे दुनियाँक रोगी एतै जमा भऽ गेल अछि। असकरे डाॅक्टर सहाएब छथि आ दूटा कम्पाउण्डर छन्‍हि‍, केना सभकेँ देखथिन। मुदा रोगो एकरंगाहे, तँए बेसी मत्था-पच्ची डाॅक्टरकेँ करै नै पड़नि। धाँइ-धाँइ इलाज करैत जाथि। मुदा मेले जकाँ रोगी एबो करै। थोडे़ काल ठाढ़ भऽ कऽ देखि दीनानाथ सिरसिराइते डाॅक्टर लगमे जा बाजल- “डाॅक्टर सहाएब, कनी हमरा ऐ ठीन चलियौ। हमर बाबू एते बीमार भऽ गेल छथि जे अबै जोकर नञि छथि।
दीनानाथक बात सुनि डाॅक्टर कहलखिन- “बौआ, ऐठाम तँ देखिते छी, केना एते रोगी छोड़ि कऽ जाएब? जे ऐठाम पहुँचि गेल अछि ओकरा छोड़िकेँ जाएब उचित हएत।
 “समए रहैत जँ हमरा ऐठाम नै जाएब तँ बाबू मरि जेताह।
“अहाँ घबड़ाउ नै तत्खनात दूटा गोली दै छी। हुनका खुआ देबनि आ एतै नेने अबिअनु।
दीनानाथक मनमे पिताक मृत्यु नचए लगल। मन मसोसि दुनू गोलि लऽ बिदा भेल। मुदा घर दिस बढ़ैक डेगे ने उठए। एक तँ ठंढ़, दोसर मनमे निराशा आ तेसर शीतलहरीसँ रातिओ अन्हार। मुदा तैयो जिबठ बान्हि कऽ बिदा भेल। कच्ची रस्ता रहने जहाँ-तहाँ मेगर आ तइ परसँ कते ठाम टुटलो। जइसँ कए बेर खसबो कएल मुदा तैयो हूबा कऽ उठि-उठि आगू बढ़िते रहल। घरपर अबिते दुनू गोली पिताकेँ खुऔलक। तइ बीच माए गोइठाक घूर कऽ सौंसे देह सेदैत। अपना खाट नहि। एते रातिमे केकरा कहतै। मुदा पितिऔत भाइक खाट मन पड़लै? मन परिते पितिऔत भाय लग जा कहलक- “भैया खाटो दिअ आ संगे चलबो करु। एहेन समएमे अनका केकरा कहबै। के जाएत?”
दीनानाथक बात सुनिते पितिऔत भाय धड़फड़ा कऽ उठि खाट नेनहि बढ़ल। खाटपर एक पाँज पुआर बिछा सलगी बिछौलक। दुनू पाइसमे बरहा बान्हि खाट तैयार केलक। खाट तैयार होइते दुनू गोरे रामखेलावनकेँ उठा ओइपर सुतौलक। बरहामे बाँस घोसिया दुनू गोरे कान्हपर उठा बिदा भेल। पाछू-पाछू सुमित्रो बिदा भेल। थोड़े काल तँ दीनानाथ किछु नहि बुझलक मुदा थोड़े कालक बाद कन्हा भकभकाए लगलै। कान्ह परक छाल ओदरि गेलै। जइसँ बाँस कान्हपर रखले ने होए। लगले-लगले कान्ह बदलै लगल। मुदा जिबट बान्हि डाॅक्टर ऐठाम पहुँचि गेल।
डाॅक्टर ऐठाम पहुँचते डाॅक्टर सहाएब देखलखिन। बीमारी देखारे रहए। धाँए-धाँए पाँचटा इन्जेक्शन लगा देलखिन। इन्जेक्शन लगा डाॅक्टर दीनानाथकेँ कहलखिन- “हिनका खाटेपर रहए दिअनु। बेसी चिन्ता नै करु। तखन तँ नमहर बीमारी पकड़नहि छन्‍हि‍। किछु दिन तँ लगबे करत।
रामखेलावनकेँ नीन आबि गेलै। खाटक निच्चाँमे तीनू गोटे -दीनानाथ, पितिऔत भाय आ सुमित्रा- बैसल। सुमित्रा मने-मन सोचैत जे समए-साल तेहने खराब भऽ गेल अछि जे बेटा-पुतोहु केकरा देखै छै। जाबे पति जीबैत रहै छै ताबे स्त्रीगण गिरथाइन बनल रहैत अछि। पुरुखकेँ परोछ होइते दुनियाँ अन्हार भऽ जाइ छैक। बिना पुरुखक स्त्रीगण ओहने भऽ जाइत अछि जेहने सुखाएल गाछ। कहलो गेल छै जे साँइक राज अप्पन राज, बेटा-पुतोहुक राज मुँहतक्की। मुदा की करब? अपन कोन साध। ई तँ भगवानेक डाँग मारल छि‍यनि‍। हे माए भगवती, कहुना हिनका नीक बना दिअनु। जँ से नञि करबनि तँ पहिने हमरे लऽ चलू।
दोसर दिन डाॅक्टर रामखेलावनकेँ देखि कहलखिन- “हिनका घरेपर लऽ जइअनु। ऐठामसँ नीक सेवा घरपर हेतनि। बीमारी आब आगू मुँहे नहि बढ़तनि मुदा इलाज बेसी दिन करबै पड़त। हमर कम्पाउण्डर सभ दिन जा-जा सुइयो देतनि आ देखबो करतनि। तै बीच जँ कोनो उपद्रव बूझि पड़त तँ अपनो आबि कऽ कहब।
कहि दूटा सुइया फेर डाॅक्टर सहाएब लगा देलखिन। दवाइक पुरजा बना देलखिन। एकटा सूइया आ तीन रंगक गोली सभ दिन दैले कहि देलखिन। गप-सप्‍प सभ कियो करिते छलाह आकि तइ बीच रामखेलावन पत्नीकेँ कहलक- “किछु खाइक मन होइए।
खाइक नाम सुनिते दीनानाथक मुँहसँ हँसी निकलल। लगले दोकानसँ दूध आ बिस्कुट आनि कऽ देलक। दूध-बिस्कुट खुआ दुनू भाँइ खाट उठा बिदा भेल।
घरपर अबिते टोल-परोससँ लऽ कऽ गाम भरिक लोक देखए अाबए लगल। शीतलहरी रहबे करै मुदा तैयो लोक अबैक ढबाहि लगल। दू घंटा धरि लोक अबैत रहल। दीनानाथ माएकेँ कहलक- “माए, बड़ भूख लगल अछि। पहिने भानस कर। भुखे पेटमे बगहा लगैए।
दीनानाथक बात सुनि माए भानस करए बिदा भेल। भूख तँ अपनो लागल मुदा कहती केकरा। बेर-बि‍पत्ति‍मे तँ ऐ ना होइते छैक। दीनानाथक बात पितिआइन सेहो सुनलक। बेचारी पितिआइन सोचलक जे सभ भुखाइल अछि। बेरो उनहि गेलै। आब जे भानस करए लगत तँ साँझे पड़ि जेतैक। तहूँमे सभ भुखे लहालोट होइए। से नञि तँ घरमे जे चूड़ा अछि ओ दऽ दै छिऐ जइसँ तत्खनात तँ काज चलि जेतै। सएह केलक।
दीनानाथ आ सुमित्रा चूड़ा भिजा कऽ खाइते छल आकि माम -सुमित्राक भाए- आएल। भाएकेँ देखिते सुमित्राक आँखिमे नोर आबि गेल। बिना पएर धोनहि भाए मकशूदन बहिनोइ लग पहुँचि देखए लगलथि। बहिनोइक दशा देखि दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर खसए लगलनि। नोर पोछि बेचारे सोचै लगलाह जे हम तँ सियान छी तहूमे पुरुख छी। जँ हमहीं कानबै तँ बहि‍न आ भागिनक दशा की हेतै। धैर्य बान्हि बहि‍नकेँ कहलक- “दाइ, ई दुनियाँ अहि‍ना चलै छै। रोग-व्याधि सह-सह करैत अछि। जइ ठीन गर लगि जाइ छै पकड़ि लैत अछि। अपना सभ सेबे करबनि की ने मुदा.......। रुपैयाक लेल दवाइ-दारुमे कोताही नञि होन्‍हि‍। आइ भोरे पता लागल। पता लगिते दौगल एलौं। अपने गाए बिआएल अछि। काल्हि गाइयो आ जहाँ धरि हएत तहाँ धरि रुपैयो आनि कऽ दऽ देबौ। अखन हम जाइ छी, काल्हि आएब।
चारि दिनक बाद रामखेलावनक मुँह सोझ भऽ गेल। उठि कऽ ठाढ़ सेहो हुअए लगल। मुदा एकटा पएर नीक नहि भेल। कनी-कनी झखाइते डेग उठबैत।
सभ दिन भोरे आबिकेँ कम्पाउण्डर सूइयो दैत आ चला-चला देखबो करैत।
दू मासक बाद दीनानाथक रिजल्ट निकलल। फस्ट डिबीजन भेलै। नम्बरो नीक। छह सौ तीन नम्बर। हेडमास्टरक समांगकेँ सेहो फस्ट डिबीजन भेलै। मुदा नम्बर कम। पाँच सौ पैंतालिस आएल छलै। सेक्रेट्रीक समांगकेँ सेकेण्ड डिवीजन भेलै। मुदा नम्बर बढ़िया, पाँच सए चौंतीस। आगू पढै़क आशा दीनानाथ तोड़ि लेलक। किएक तँ घरमे कियो दोसर करताइत नहि। एक तँ पिताक बीमारी, दोसर घरक खर्च जुटौनाइ, तै परसँ छोट भाए अठमामे पढै़त। मुदा दीनानाथकेँ अपन पढ़ाइ छोडैैैैै़क ओते दुख नै भेलै जते परिवार चलौनाइसँ लऽ कऽ पिताक सेवा करैक सुख भेलै। जे बेटा बाप-माइक सेवा नै करत ओ बेटे की? अपन पढ़ैक आशा दीनानाथ छोट भाए कुसुमलालपर केन्द्रित कऽ देलक।
अधिक काल मकशूदन बहीनेक ऐठाम रहए लगलाह। गाइयोक सेवा आ खेतो-पथारक काज सम्हारए लगलथि। अपना ऐठामसँ अन्नो-पानि आनि-आनि दिअ लगलखिन। अपना घर जकाँ भार उठा लेलक। अपन दशा देखि रामखेलावन मकशूदनकेँ कहलखिन- “हम तँ अबाहे भऽ गेलौं। जाबे दाना-पानी लिखल अछि ताबे जीबै छी। मरैक कोनो ठीक नहि अछि तँए अपना जीबैत कतौ दीनानाथक बिआह करा दियौ। बेटा-बेटीक बिआह-दुरागमन कराएब तँ माए-बापक धरम छिऐ। मुदा हम तँ कोनो काजक नै रहलौं। कमसँ कम देखियो तँ लेबै।
बहनोइक बात सुनि मकशूदन गुम्म भऽ गेला। मने-मन सोचए लगला जे समए-साल तेहने खराब भऽ गेल अछि जे नीक मनुख घरमे आनब कठिन भऽ गेल अछि। सभ खेल रूपैयापर चलि रहल अछि। मनुखक कोनो मोले ने रहलै। एहेन स्थितिमे नीक कन्याँ केना भेटत? तखन एकटा उपाए जरुर अछि जे रुपैया-पैसाक भाँजमे नहि पड़ि, गुनगर कन्याँक भाँज लगाबी। जइसँ घरक कल्याण हेतै। पाहुन जखन हमरा भार देलनि तँ हम दान-दहेज नहि आनि नीक कन्याँ आनि देबनि। बहिनोइकेँ कहलखिन- “पाहुन, रूपैयाक पाछू लोक भसिआइत अछि। अगर अहाँ हमरा भार दै छी तँ हम रूपैयाक भाँजमे नहि पड़ि नीक मनुक्ख आनि कऽ देब। से की विचार?”
मकशूदनक बात सुनि बहि‍न धाँइ दऽ बाजलि- “भैया, रुपैया मनुक्खक हाथक मैल छिऐ। मुदा मनुक्ख तपस्यासँ बनैत अछि। तँए हमरा नीक पुतोहु हुअए। रूपैयाक भुख हमरा नै अछि।
बहि‍नक बात सुनि मकशूदनक मनमे सबुर भेलनि। बजलाह- “बहि‍न, जहिना तोरा सबहक पुतोहु तहिना तँ हमरो हएत की ने। के एहेन अभागल हएत जे अपन घर अबाद होइत नै देखत?”
अपन पढ़ाइक आशा तोड़ि दीनानाथ मने-मन अपना पएरपर ठाढ़ होइक
बाट ताकए लगल। संकल्प केलक जे जहिना नीक रिजल्ट पबैक लेल विद्यार्थी जी-तोड़ मेहनति करैत अछि तहिना हमहूँ परिवारकेँ उठबैक लेल जमि कऽ मेहनति करब।
बिऔहती लड़कीक भाँज मकशूदन लगबए लगला। मुदा मनमे एलनि जे हम तँ वर पक्ष छी तँए लड़की ऐठाम पहिने केना जाएब? कने काल गुनधुन करैत सोचलनि जे बेटा-बेटीक बिआह परिवारक पैघ काज होइत अछि तँए एहेन-एहेन छोट-छीन बेवहारपर नजरि नहिये देब उचित हएत। तहूमे तँ हम लड़काक बाप नहि माम छी। पाहुन जखन भार देलनि तँ नहियो करब उचित नै हएत।
अपना गामक बगलेक गाममे लड़कीक भाँज मकशूदनकेँ लगलनि। परिवार तँ साधारणे मुदा लड़की काजुल। काजमे तपल। किएक तँ माए सदिखन ओकरा अपने संग राखि खेत-पथारक, घर-आंगनक काजसँ लऽ कऽ अरिपन लिखब, दुआरिमे पूरनि, फूलक गाछ, कदमक फुलाइल गाछक संग-संग पावनि-तिहारमे गीत गौनाइ सभ सिखबैत। बड़द कीनैक बहानासँ मकशूदन भेजा विदा भेला। पहिने दू-चारि गोटेक ऐठाम पहुँचि बड़दक दाम करैत कन्यागतक दुआरपर पहुँचला। कन्यागत दुआरपर नहि। मुदा लड़की बाल्टीमे पानि‍ भरि अंगना अबैत। लड़कीकेँ देखि मकशूदन पुछल- “बुच्ची, घरवारी कतए छथि?”
बाल्टी रखि सुशीला बाजलि- “बाड़ीमे मिरचाइ कमाइ छथि। अपने चौकीपर बैसियौ। बजौने अबै छि‍यनि‍।
बाल्टी अंगनामे रखि सुशीला बाड़ीसँ पिताकेँ बजौने आएल। पड़ोसी होइ दुआरे दुनू गोटे दुनू गोटेकेँ चेहरासँ चिन्हैत मुदा मुँहा-मुँही गप नै भेने अनचिन्हार। कन्यागत पूछल- “किनकासँ काज अछि?”
मुस्कुराइत मकशूदन- “अखन दुइये गोरे छी, तँए मनक बात कहै छी। हमरो घर बीरपुरे छी। हमरा भागिन अछि। काल्हि खन पता चलल जे अहाँकेँ बिऔहती बच्‍चि‍या अछि तँए ओइठाम कुटमैती कऽ लिअ।
कुटुमैतीक नाम सुनि कन्यागत गुम्म भऽ गेलाह। कनी-काल गुम्म रहि कहलखिन- “हम गिरहस्त छी। सेहो नमहर नै छोट। ऐ ठीनक गिरहतक की हालत अछि से अहाँ जनिते छी। तँए ऐबेर बेटीक बिआह नै सम्हरत।
कन्यागतक सुखल मुँह देखि मकशूदन बजलाह- “मनमे जे दहेजक भूत पकड़ने अछि ओ हटा लिअ। अहाँकेँ जहिना सम्हरत तहिना बिआह निमाहि लेब।
मकशूदनक विचार सुनि कन्यागतक मुँह हरिआए लगलनि। दरबज्जे परसँ बेटीकेँ सोर पाड़ि कहलक- “बुच्ची, सरबत बनौने आबह?”
बड़का लोटामे सरबत आ गिलास नेने सुशीला दरबज्जापर आबि चौकीपर रखए लागलि। तइ बीच पिता बजलाह- “बुच्ची, इहो कियो आन नहि छथि। पड़ोसिये छिआह। बीरपुरे रहै छथि। दहुन सरबत।
दुनू गोटे सरबत पीलनि। सरबत पीबि पिता कहलखिन- “बुच्ची, चाहो बनौने आबह।
सुशीला चाह बनबए गेलि। दरबज्जापर दुनू गोरे गप-सप्‍प करए लगलाह।
मकशूदन- “जेने अहाँक कन्याँ छथि तेहने हमर भागिन। अजीब जोड़ा बिधाता बनाकेँ पठौने छथि। काल्हिये अहूँ लड़काकेँ देखि लियौ। संयोग नीक अछि तँए शुभ काजमे विलंब नहि करु।
मकशूदनक विचारसँ जते उत्साहित कन्यागतकेँ हेबाक चाहियनि तते नहि होइत। किएक तँ मनमे घुरिआइत जे कहुना छी तँ बेटीक बिआह छी। फुसलेने काज थोडे़ चलत। मुदा कन्याक माए दलानक भीतक भुरकी देने अढ़ेसँ गप्पो सुनैत आ दुनू गोटेकेँ देखबो करैत। मने-मन उत्साहितो होइत जे फँसल शिकार छोड़ब मुरुखपना छी। माए-बापक सराध आ बेटीक बिआहमे केकरा नै करजा होइ छै। जानिये कऽ तँ हम सभ गरीब छी। गरीबकेँ जनमसँ लऽ कऽ मरै धरि करजा रहिते छै। तैले एते सोचै विचारैक कोन काज। करजो हाथे बेटीक बिआह कइये लेब। फस्ट डिवीजनसँ मैट्रिक पास लड़का अछि। एहेन पढ़ल-लिखल लड़का थोड़े भेटत। कहबियो छै जे पढ़ल-लिखल लोक जँ हरो जोतत तँ मुरुखसँ सोझ सिराओर हेतै। आइक युगमे मूर्खो बड़क बाप पचास हजार रुपैया गनबैत अछि। खुशीसँ मनमे होइ जे छड़पि कऽ दरवज्जापर जा कहिअनि जे अगर अहाँ आइये बिआह करए चाही तँ हम तैयार छी। मुदा स्त्रीगणक मर्यादा रोकि दैत। तँए बेचारी अढ़ेमे अहुरिया कटैत। मुदा पतिक मन बदलल। ओ मकशूदनकेँ कहलक- “देखू, हम भैयारीमे असकरे छी मुदा गृहिणी तँ छथि। हुनकासँ एक बेर पूछि लै छि‍यनि‍। किएक तँ हम घरक बाहरक काजक गारजन छी ने, घरक भीतरी काजक गारजन तँ वएह छथि। जँ कहीं बेटी बिआहक दुआरे किछु ओरिया कऽ रखने होथि तँ कइये लेब।
कन्यागत भोला उठि कऽ आंगन गेला। आंगन पहुँचते पत्नी झपटि कऽ कहए लगलनि- “दुआरपर उपकरि कऽ लड़काबला एलाहेँ तँए अहाँ अगधाइ छी। जखन लड़काक भाँजमे घुमैत-घुमैत तरबा खियाएत आ बेमाइसँ खूनक टगहार चलत तखन बुझबै। तीन-तीन साल बेटीबला घुमैए तखन जा कऽ कतौ गर लगै छै। जा कऽ कहि दिअनु जे अखन हमर हालत नीक नञि अछि मुदा जँ अहाँ तैयार छी तँ हमहूँ तैयार छी। वर देखैक दिन कौल्हुके दऽ दिअनु।
पत्नीक बातसँ उत्साहित भऽ भोला आबि कऽ बजलाह- “पत्नीक विचार सोलहो आना छन्‍हि‍। मुदा कहबे केलौं जे अखन हमर हालत बढ़ियाँ नै अछि।
मकशूदन- “काल्हि अहाँ लड़का देखि लियौ। जँ पसिन्न हएत तँ जहिना कुटमैती करए चाहब तहिना कऽ लेब। असलमे हमरा लोकक जरुरत अछि, नै की रूपैया-पैसाक।
आठे दिनक दिनमे बिआह भऽ गेल। भोलाक बहिनो आ साउसो नीक जकाँ मदति केलकनि। अपना घरसँ सिर्फ एकटा सोनाक सुक्की -नअटा चौवन्नीक छड़- भोलाकेँ निकलल।
पनरह दिनक उपरान्त दीनानाथ पुबरिया ओसारपर बैसि, पितासँ छीपि कऽ माएकेँ कहलक- “माए, घरक दशा जे अछि से तोहूँ देखते छीही। जेना घर चलैए तेना कते दिन चलत। साले-साल खेत बिकाइत। जइसँ किछुए सालक बाद सभ सठि जाएत। छोड़ैबला काज एक्कोटा नञि अछि। जहिना कुसुमलालक पढै़क खर्च, तहिना बाबूक दवाइ आ पथ्यक। मुदा आमदनी तँ कोनो दोसर अछि नहि। लऽ दऽ कऽ खेती। सेहो डेढ़ बीघा। तहूमे ने पानिक जोगार अपना अछि आ ने खेती करैक लूरि। एते दिन तँ बाबू कहुना-कहुना कऽ करैत छलाह, आब तँ सेहो नै हएत। हमहूँ जँ कतौ नोकरी करए जाएब सेहो नै बनत, किएक तँ बाबूक देखभाल सेहो करैक अछि। तखन तँ एक्केटा उपाए अछि जे घरेपर रहि आमदनीक कोनो काज ठाढ़ करी।
बेटाक बात सुनि माए गुम्म भऽ गेलीह। जइ घरमे आमदनी कम रहत आ खरचा बेसी हएत ओ घर केना चलत। एते बात मनमे अबिते माइक आँखिसँ दहो-बहो नोर खसए लगलनि। आँचरसँ नोर पोछि बाजलि- “बौआ, हम तँ स्त्रीगणे छी। घर-अंगनामे रहैवाली। तूँ जँ बच्चो छह तँ पुरुखे छह। जखन भगवाने बेपाट भेल छथुन तखन तँ किछु करै पड़तह।
दुनू गोटेक -माइयो आ बेटोक- मुँह निच्चाँ मुँहे खसल। ने बेटाक नजरि माए दिस उठैत आ ने माइक नजरि बेटा दिस। जहिना मरुभूमिमे पियासल लोकक दशा होइत, तहिना दुनूक दशा होइत। केबाड़ लग ठाढ़ सुशीला दुनूकेँ देखैत। जोरसँ कियो अहि दुआरे नहि बजैत जे रोगाइल पिता वा पति जँ सुनताह तँ सोगसँ आरेा दुख बढ़ि जेतनि। केबाड़ लगसँ घुसकि ओसारपर आबि सुशीला बाजलि- “माए चिन्ता केलासँ दुख थोड़े भगतनि। दुखकेँ भगबैले किछु उपाय करै पड़तनि। छोटका बौआ बच्चे छथि, बाबू रोगाइले छथि मुदा अपना तीनू गोरे तँ खटैबला छी। खटलासँ सभ कुछ होइ छै।
सुशीलाक बात सुनि सासु बजलीह- “कनियाँ, कहलिऐ तँ बड़बढ़िया मुदा ओहिना तँ पानि‍ नै डेंगाएब।
सासुक बात सुनि पुतोहु बाजलि- “हमर एकटा पित्ती धानक कुट्टी करै छथि। जहिना अपन परिवार अछि तहूसँ लचड़ल हुनकर परिवार छलनि। तइ परसँ चारि-चारिटा बेटिओ छलनि। मुदा जइ दिनसँ धानक कुट्टी करए लगलथि तइ दिनसँ दिने-दुनियाँ घुरि गेलनि। चारु बेटिओक बिआह केलनि, बेटेाकेँ पढ़ौलनि। ईंटाक घरो बनौलनि आ पाँच बीघा खेतो कीनि लेलनि। अखन हुनकर हाथ पकडै़बला गाममे कियो नै अछि।
पत्नीक बात सुनि दीनानाथक भक्क खुजल। भक्क खुजिते दीनानाथ खुशीसँ उछलि अंगनामे कूदल। दरबज्जापर आबि कागज-कलम निकालि हिसाब जौड़ए लगल। डेढ़ सेर धानमे एक सेर चाउर होइत अछि। ओना धानक बोरा अस्सिये किलोक होइत अछि जखन कि चाउरक सौ किलोक। चारि सए रुपैये बोरा धान बिकैत अछि तँ पान सौ रुपैये क्वीन्टल भेल। एक क्वीन्टल धानक सड़सठि किलो चाउर भेल। दू-चारि किलो खुद्दियो हएत जेकर रोटी पका कऽ खाएब। एक किलो चाउरक दाम साढ़े दस रुपैयासँ एगारह रुपैया होइत। ऐ हिसाबसँ एक क्वीन्टल धानक चाउरक लगभग सात सौ रुपैया भेल। पान सएक पूँजीसँ सात सएक आमदनी भेल। तइ परसँ तीस किलो गुड़ो। जेकर दाम साठि रुपैया भेल। खर्चमे खर्च सिर्फ जरना, कुटाइ आ गाड़ीक भाड़ा। बाकी सभ मेहनतिक फल भेल। अगर जँ एक बोराक कुट्टी सभ दिनक हिसाबसँ करब तँ पाँच हजारक महीना आमदनी जरुर हएत।
हिसाब जोड़ैत-जोड़ैत दीनानाथक मनमे शंका उठल जे हिसाबेमे तँ नै गलती भऽ गेल। कागज-कलम छोड़ि उठि कऽ टहलै लगल। मने-मन हिसाबो जोड़ैत। मनमे कखनो हिसाब सही बूझि पड़ैत तँ कखनो शंका होइत। आंगन जा पानि पीलक। दू-चारि बेर माथ हसोथलक। फेर आबि कऽ हिसाब जोड़ए लगल। मुदा हिसाब ओहिना कऽ ओहिना होइ। मनमे बिसवास जगलै। जइसँ काजक प्रति आकर्षण सेहो भेलै। फेर आंगन जा माएकेँ पुछलक- “एक बोरा धान उसनैमे कते समए लगतौ?”
माए बाजलि- “एक बोरा धान तँ दसे टीन भेल। दुचुल्हियापर पाँच खेप भेल आ चरि चुल्हियापर अढ़ाइये खेप भेल। एक्के घंटामे उसनि लेब।
माइक बात सुनि दीनानाथ तँइ केलक जे हमहूँ यएह रोजगार करब। पूँजीक लेल पत्नीक सोना सुक्कीमे सँ पाँचटा निकालि आ सबा भरि बेचि, धान कीनि कुट्टी शुरू केलक। जइसँ परिवारमे खुशहाली आबि गेलै।
कुशुमलाल बी.ए. पास कऽ मधुबनी कोर्टमे किरानीक नोकरी शुरू केलक। कोर्टेक बड़ाबाबूक बेटीसँ बिआह सेहो केलक। मधुबनियेमे डेरा राखि दुनू परानी रहए लगल। तीन-चारि बर्ख तँ संयमित जीवन बितौलक। सिर्फ वेतनेपर गुजर करैत। मुदा तेकर बाद पाइ कमाइक लूरि सीखि लेलक। जइसँ खाइ-पीबैक संग-संग आउरो लूरि भऽ गेलै। घरोवाली पढ़ल-लिखल। जहिना कमाइ तहिना खर्च। शहरक हवामे उधियाए लगल। सिनेमा देखैक, शराब पीबैक, नीक-नीक वस्तु कीनैक आदति बढ़ैत गेलै। एक दिन पत्नी कहलकै- “गाममे जे खेत अछि ओ अनेरे किअए छोड़ने छी। ओइसँ की लाभ होइए। ओकरा बेचि कऽ अहीठाम जमीन कीनि अपन घर बना लिअ।
स्त्रीक बात कुसुमलालकेँ जँचल। रवि दिन छुट्टी रहने गाम आबि भाए दीनानाथकेँ कहलक- “भैया, हम अपन हिस्सा खेत बेचि लेब। मधुबनियेमे दू कट्ठा खेत ठीक केलौंहेँ। ओ कीनि ओतै घर बनाएब। भाड़ाक घरमे तते भाड़ा लगैए जे एक्को पाइ बचबे ने करैए जे अहूँ सभकेँ देब।
कुसुमलालक बात सुनि दीनानाथ कहलक- “बौआ, अखन बाबू-माए जीविते छथुन, तँए हम की कहबह? हुनके कहुन।
दीनानाथक जबाब सुनि कुसुमलाल पितासँ कहलक। रोगाइल रामखेलावन खिसिया कऽ कहलक- “डेढ़ बीधा खेत छौ। दस कट्ठा हमरा दुनू परानीक भेल,
दस कट्ठा दीनानाथक भेलै आ दस कट्ठा तोहर भेलौ। अपन हिस्सा बेचि कऽ लऽ जो।
खेत कीनै-बेचैक दलाल गामे-गाम रहिते अछि। कुसुमलाल जा कऽ एकटा दलालकेँ कहलक। पाँच हजार रुपैये कट्ठाक हिसाबसँ दलाल दाम लगा देलक। कुसुमलाल राजी भऽ गेल। मुदा बेना नै लेलक। तरे-तर दीनानाथो भाँज लगबैत। साँझू पहर जखन कुसुमलाल मधुबनी बिदा भेल तखन दीनानाथ कहलकै- “बौआ, जते दाम तोरा आन कियो देतह तते हमहीं देबह। बाप-दादाक अरजल सम्पति छी, आन कियो जे आबि कऽ घराड़ीपर भट्टा रोपत ओ केहेन हएत?
मुदा दीनानाथक बात कुसुमलाल मानि गेल। पचास हजारमे जमीन लिखि देलक। मधुबनियेमे कुसुमलाल घर बना लेलक। अपना गामक लोकसँ ओते संबंध नहि रहलै जते सासुरक लोकसँ। सासुरक दू-चारि गोटे सभ दिन अबिते-जाइत रहैत। आदरो-सत्कार नीक होए।
बीस बर्ख बाद दीनानाथक बेटा मेडिकल कम्पीटीशनमे कम्पीट केलक। बेटी आइ.एस.सी. मे पढ़िते। पढै़मे दुनू भाए-बहि‍न उपरा-उपरी। तँए परिवारक सभकेँ आशा रहै जे बेटिओ मेडिकल कम्पीट करबे करत। माए-बापक सेवा आ बेटा-बेटीक पढ़ाइ देखि दुनू परानी दीनानाथक मन खुशीसँ गद-गद। परिवारोक दशा बदलि गेल। मुदा तैयो दीनानाथ धानक कुट्टी बन्न नञि केलक। आरो बढ़ा लेलक। मनमे इहो होइ जे धनकुटिया मिलि‍ गरा ली मुदा समांगक दुआरे नहि गड़बैत। टाएरगाड़ी कीनि लेलक। जइसँ खेतिओ करै आ भड़ो कमाइ।
कुसुमलालकेँ सेहो दूटा बेटा। दुनू पब्लिक स्कूलमे पढ़ैत। जेठका अठमामे आ छोटका छठामे। मधुबनियेमे डेरा रहितौं दुनू होस्टलेमे रहैत। तइ परसँ सभ विषएक ट्यूशन सेहो पढ़ैत। तँए नीक खर्च होइ।
शराब पीबैत-पीबैत कुसुमलालक लीभर गलि गेलै। किछु दिन मधुबनियेमे इलाज करौलक मुदा ठीक नहि भेने दरभंगाक अस्पतालमे भर्ती भेल। चारि मास दरभंगोमे रहल मुदा ओतहु लीभर ठीक नै भेलै। तखन पटना गेल। पटनोमे ठीक नै भेलै, संगहि शरीर दिनानुदिन खसिते गेलै। अंतमे दिल्लीक एम्समे भर्ती भेल। ओतहु ठीक नञि भेलै। शरीर एते कमजोर भऽ गेलै जे अपनेसँ उठियो-बैसि नञि होइ। हारि-थाकि कऽ मधुबनीक डेरापर आबि गेल। मुदा एते दिनक बीमारीक बीच दीनानाथकेँ जानकारीयो ने देलक। सारे-सरहोजिक संग घुमैत रहल।
ओछाइनपर पड़ल-पड़ल सौंसे देहमे धाव भऽ गेलै। ढाकीक-ढाकी माछी देहपर सोहरए लगलै। कतबो कपड़ा ओढ़बै तैयो माछी घुसि-घुसि असाइ दऽ दै। दिन-राति दर्दसँ कुहरैत। सदिखन घरवालीक मन तामसे लह-लह करैत। गरिएबो करैत। दुनू बेटामे सँ एक्कोटा लगमे रहैले तैयार नहि। जेठका बेटा कहए- “पप्पा जी, महकता है।
जखन कखनो लगमे अबैत तँ नाक मूनि कऽ अबैत। छोटका बेटा सेहो तहिना। सदिखन बजैत- “पप्पा जी, अब भूत बनेगा। लगमे रहेंगे तो हमको भी पकड़ लेगा।
जइ आॅफिसमे कुसुमलाल काज करैत ओइ आॅफिसक एकटा स्टाफ दीनानाथकेँ फोनसँ कहलक- “कुसुमलाल अंतिम दिन गनि रहल अछि तँए आबि कऽ मुँह देखि लियौ।
फोन सुनि दीनानाथ सन्न भऽ गेल। जेना दुनियाँक सभ कुछ आँखिक सोझासँ निपत्ता भऽ गेलै। सुन-मशान दुनियाँ लगै लगलै। मनमे एलै, कियो केकरो नहि। दुनू आँखिसँ नोर टधरए लगलै। नोर पोछि सोचए लगल जे कियो झुठे ने तँ फोन केलक। फेर मनमे एलै जे एहेन समाचार झूठ किअए हएत? अनेरे कियो पैसा खर्च कऽ फोन किअए करत? एहेन अवस्थामे कुसुमलाल पहुँचि‍ गेल मुदा आइ धरि किछु कहबो ने केलक। खैर, जे होए। मुदा हमरो तँ किछु धर्म अछि। अपना कर्तव्यसँ कियो मनुख ऐ दुनियाँमे जीबैत अछि। अखन तँ अबेर भऽ गेल। काल्हि भेारुके गाड़ीसँ मधुबनी जाएब। एते विचारि माएकेँ कहलक- “माए, एक गोटे मधुबनीसँ फोन केने छेलाह जे कुसुमलाल बहुत दुखित छथि तँए आबि कऽ देखिअनु।
दीनानाथक मुँहक बात सुनिते माएक देहमे आगि लगि गेलनि। जरैत मने बाजलि- “कुसुमा हमर बेटा थोड़े छी जे मुँह देखबै। उ तँ ओही दिन मरि गेल जइ दिन हमरा दुनू परानी बाप-माएकेँ छोड़ि चलि गेल। जँ ऐ धरतीपर धरमक कोनो स्थान हेतै तँ ओइमे हमरो कतौ जगह भेटत। जँ कोनो शास्त्र-पुराणमे पतिब्रता स्त्रीक चरचा हेतै तँ हमरो हएत। आइ बीस बर्खसँ ऐ हाथ-पएरक बले बीमार पतिकेँ जीबित राखि अपन चूड़ी आ सिनुरक मान रखने छी।
माइक बात सुनि दीनानाथ मने-मन सोचलक जे कुसुमलाल अगर हमरा कमा कऽ नहिये देलक तँ हमर की बिगड़ल। माइयो-पिताक दर्शन भोरे-भोर होइते अछि, बालो-बच्चा आनंदेसँ अछि। तखन तँ एक-वंशक छी जा कऽ देखि लिऐ।
दोसर दिन भोरुके गाड़ीसँ मधुबनी पहुँचि ओ कुसुमलालक डेरापर पहुँचल। बाहरेक कोठरीमे कुसुमलाल। चद्दरिसँ सौंसे देह झाँपल। मुँह उघारिते कुसुमलाल बाजल- “भ-इ-अ-अ।कहि सदाक लेल आँखि मूनि लेलक।
दीनानाथ- “बौआ कुसुम, बौआ.....बौआ..... बउआ।

डीहक बटबारा :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल


अमानतक दिन। चारि बजे भोरेसँ पूड़ी-जिलेबी, तरकारीक सुगंध गामक हवामे पसरि गेल। सौंसे गामक लोककेँ बुझले, तँए केकरो सुगंधसँ आश्चर्य नै होए। भोरे श्रीकान्तोक पत्नी आ मुकुन्दोक पत्नी फूल तोड़ि, नहा ब्रह्मस्थान पूजा करए गेलि। हलुआइ दू-चुल्हियापर तरकारियो बनबैत आ जिलेबियो छनैत। कुरसीपर बैसल श्रीकान्त मने-मन ब्रह्मबाबाक कबुला केलक जे जँ हमरा मनोनुकूल नापी भेल तँ तोरा जोड़ा छागर चढ़ेबह। तहिना मुकुन्दो। गामक सुगंधित हवामे सबहक मन उधिआइत। चाह बनबैबला चाह बनबैमे व्यस्त। पान लगबैबला पानमे। दुनू दिस कट्ठा-कट्ठा भरिक टेंट लागल। दड़ी आ जाजीम बिछाओल। एक भागमे गाँजा पीनिहारक बैसार आ दोसर भागमे दारुक। जहिना बुचाइ कूदि कऽ कखनो हलुआइ लग जा देखैत तँ कखनो दारुबलाक बैसारमे जा दू-गिलास चढ़ा दैत। तहिना सरुपो। सभ कथूक ओरियान काल्हिये दुनू गोटे, दुनू दिस कऽ नेने, तँए अनतऽ जेबाक जरुरते नहि केकरो, चाह-पानक इत्ता नै। जेकरा जते मन हुअए से तत्ते खाउ-पीबू। जलखैमे पूड़ी-जिलेबी डलना आ कलौमे खस्सीक माँस आ तुलसीफुलक भात। तँए भरि दिनक चिन्ता सबहक मनसँ पड़ाएल। जीविलाह सभ दुनू दिस टहलि-टहलि खाइत-पीबैत।

श्रीकान्तो आ मुकुन्दो इंजीनियर। दुनू एक्के वंशक। दुनूक परदादा सहोदरे भाए। पाँच कट्ठाक घराड़ी, जहिमे दुनू गोटेक अधा-अधा हिस्सा। जहियेसँ दुनू गोटे नोकरी शुरू केलनि, तहियेसँ गाम छोड़ि देलनि। एक पुरिखियाह वंश, तँए परिवारमे दोसर नहि। पैंतीस सालक नोकरीक बीच कहियो, दुनूमेसँ कियो, गाम नहि आएल। जइसँ पहिलुका बापक बनाओल घर दुनूक खसि पड़लनि। गामक स्त्रीगण सभ ठाठ-कोरो, धरनिकेँ उजाड़ि-उजाड़ि जरा लेलक। ढ़िमका-ढ़िमकीकेँ सरिया गामक छौड़ा सभ फील्ड बना लेलक। गामक जते खेलवाड़ी छौड़ा सभ छल ओ सभ अपन-अपन खेलक जगह बाँटि लेलक। एकटा फील्ड कबड्डीक, दोसर गुड़ी-गुड़ीक, तेसर चिक्का-चिक्काक, चारिम गुल्ली-डंटाक आ पाँचम रुमाल चोरक बनि गेल। उकट्ठी छौड़ा सभ एक दोसराक फील्डमे रातिकेँ, झाड़ा फीरि दै। मुदा खेल शुरू करैसँ पहिने दस-बीसटा गारि पढ़ि सभ अपन-अपन फील्ड चिक्कन बना लिअए। ओना दुनू गोटे -श्रीकान्तो आ मुकुन्दो- बाहरे घर बना नेने छथि, मुदा मरै बेरमे दुनूकेँ गाम मन पड़लनि। साले भरिक नोकरी दुनूक बाँचल तँए तीन मासक छुट्टी लऽ लऽ गाम ऐलाह। गाम अबैसँ पहिने दुनू गोटे, फोनक माध्यमसँ, अबैक दिन निर्धारित कऽ नेने रहथि। किएक तँ परोछा-परोछी नापी करौलासँ आगू झंझटिक डर दुनूक मनमे रहनि।
घराड़ी नापी होइसँ दस दिन पहिने श्रीकान्त गाम ऐलाह। अपना तँ घरो नहि, मुदा अबैकाल एकटा रौटी, सुतै-बइसैक समानक संग भानसो करैक सभ कुछ नेने ऐलाह। गाम आबि पितिऔत भाइकेँ कहि सभ बेवस्था केलनि। सभ गर लगला बाद भाएकेँ पुछलखिन- “बौआ, गाममे के सभ मुहपुरखी करैए?”
भाए कहलकनि- “गाममे तँ कियो राजनीति नहिये करैए मुदा बुचाइ आ सरूप सभ धंधा करैत अछि।
“की सभ धंधा?”
“जना कियो खेत कीनैए वा बेचैए, ओइ बीचमे पड़ि किछु कमा लइए। तहिना गाइयो-महींसमे करैए। भोट-भाँटसँ लऽ कऽ कथा-कुटुमैती धरिमे किछु नहि किछु हाथ मारिये लैत अछि।
भाएक बात सुनि इंजीनियर सहाएब कने काल गुम्म भऽ गेलाह। मने-मन सोचि-विचारि कहलखिन- “कनी बुचाइकेँ बजौने आबह?”
“बड़वढ़ियाकहि भाए बुचाइकेँ बजबए विदा भेल। मने-मन श्रीकान्त सोचए लगलथि जे गाममे तँ सबहक हालत तेनाहे सन अछि। देखै छिऐ जे जेहने घर-दुआर छै तेहने बगए बानि। दू चारिटा जे ईंटो घर देखै छिऐ सेहो भितघरे जकाँ। तँए गाममे ओहन घर बना कऽ देखा देबै जे गामक कोन बात, परोपट्टाक लोक देखए आओत। पुरान लोक सबहक कहब छन्‍हि‍ जे जेहेन हवा बहै ओइ अनुकूल चली। युग पाइक अछि। जेकरा पाइ रहतै ओ बुधियार। जेकरा पाइ नै रहतै ओ किछु नहि। असगर बिरहसपतियो फूसि। जेकरा पाइ छै वएह नीक घर बनबैत अछि, नीक गाड़ीमे चढ़ैत अछि। ओकरे धिया-पुता नीक स्कूल-कओलेजमे पढ़ैत अछि। ओकरे परिवारक लोक नीक लत्ता-कपड़ा पहिरैत अछि। बेटा-बेटीक बि‍आह नीक परिवारमे होइ छै। आइक जे सुख-सुविधा विज्ञान करौलकहेँ ओकर सुख भोगैत अछि। यएह ने युगक संग चलब थिक। समाजक बीच प्रतिष्ठा बनाएब तँ वामा हाथक काज छी। अधलासँ अधलाह काज कऽ कऽ पाइ कमा लिअ आ समाजकैँ भोज खुआ दिऔ, बस जसे-जस, प्रतिष्ठे-प्रतिष्ठा। हाथमे पाइ अछि, सभ कुछ कऽ कऽ गौआँकेँ देखा देबै। बेटो-बेटीकेँ पढ़ा-लिखा, बिआह-दुरागमन करा कऽ निचेने छी। तखन तँ एकटा काज मात्र पछुआइल अछि, ओ अछि सामाजिक प्रतिष्ठा। सेहो बनाइये लेब।
मने-मन श्रीकान्त विचारिते रहथि आकि बुचाइक संग भाए पहुँचलनि। लगमे अबिते बुचाइ दुनू हाथ जोड़ि बाजल- “गोड़ लगै छी कक्का। अहाँ तँ गामकेँ बिसरि गेलिऐ। सरकारक एयर कंडीशन मकान भेटले अछि, तँए किए थाल-कादोमे आबि मच्छर कटाएब?”
अपनाकेँ छिपबैत श्रीकान्त बजलाह- “नै बौआ, से बात नै अछि। जखने नोकरीक जिनगी शुरू केलौं तखने दोसराक गुलाम बनि गेलौं। जे-जे हुकूम देत से से करै पड़त। तू सभ कम उमेरक छह तँए नञि देखलहक, मुदा हम तँ अंग्रेजक शासन देखने छी की ने! शासन तरे-तर चलैत छै, जे सभ थोड़े बुझैए। अंग्रेजक पीठिपोहु छल ऐठामक राजा-रजबाड़ आ ओकरा सबहक फाँड़ी थिक जमीनदार सभ। ओ सभ जे ऐठामक लोकक संग बेवहार करैत छल आ करैत अछि से तँ तोहूँ सभ देखते छहक। मुदा ऐ सभ गपकेँ छोड़ह। तोरा जे बजौलिअह से सुनह। साले भरि आब नोकरी अछि। नोकरी समाप्त भेला बाद गामेमे रहब। तँए तीन मासक छुट्टी लऽ कऽ एलौंहेँ जे घराड़ीक अमानत करा घर बनाएब। बिना घरे रहब कतऽ।
बुचाइ- “हँ, ई तँ जरुरिये अछि। मुदा हमरा किअए बजेलौं?”
पासा बदलैत श्रीकान्त- “मुकुन्द जीकेँ सेहो खबरि दऽ देने छि‍यनि‍। ओहो काल्हिसँ परसू धरि एबे करताह। ऐठाम तँ दुइये गोटेक घराड़ी खाली अछि, तँए दुनू गोटेक रहब जरुरी अछि। तोरा तँ नञि बुझल हेतह, हमर परबाबा आ मुकुन्दक परबाबा सहोदरे भाए छलाह। अढ़ाइ-अढ़ाइ कट्ठाक हिस्सा जमीन दुनू गोरेकेँ अछि। तँए कोनो पेंच लगाबह जे हमरा तीन कट्ठा हुअए।
श्रीकान्तक पेटक मैल बुचाइ देखि गेल। मुस्कुराइत बाजल- “ऐँ, अहीले अहाँ एते चिन्तित छी। ई तँ वामा हाथक काज छी। अमीनकेँ मिला लेब, सभ काज भऽ जाएत। किएक तँ अमीनक गुनिया-परकालमे पाँच-दस धुर जमीन नुकाएल रहै छै। मुदा ऐ ले खरचा करए पड़त। हम तँ जोगारे ने बैसाएब, खर्च तँ अहींकेँ करए पड़त।पाइक गरमी श्रीकान्तकेँ रहबे करनि। मनमे इहो बात रहनि जे भलहि‍ं मुकुन्दो इंजीनियर छथि, दुनू गोटेक दरमहो एक्के रंग अछि मुदा पाइमे बराबरी कऽ लेता, से केना हेतै। मुस्की दैत कहलखिन- “तोहर मेहनत आ हम्मर पाइ। सएह ने। जते खर्च हएत-हएत। मुदा मैदानसँ जीति कऽ अबैक छह।
श्रीकान्तक बात सुनि बुचाइ मने-मन खुश भेल। मनमे एलै जे नीक मोकीर हाथ लागल। भरिसक राशि घुमलहेँ। ओह, बहुत दिनसँ अखवारो नै पढ़लौं जे कने राशि देखि लैतिऐ। खैर नहियो पढ़लौं तैयो शुभ बूझि पड़ैए। जोशमे बाजल- “कक्का, रुपैया पूत पहाड़ तोड़ैए। ई तँ मात्र अमानते छी। जे चाहबै, से हेतै। मुदा अहाँ कंजूसी नै करबै।
कंजूसीक नाम सुनि श्रीकान्त कहलखिन- “मरदक बात छिऐ। जे बाजि देब ओ बिना पुरौने छोड़ब।बैगसँ पाँच हजार रुपैया निकालि श्रीकान्त बुचाइकेँ देलखिन। रुपैया जेबीमे राखि बुचाइ प्रणाम कऽ विदा भेल। गामक पेंच-पाँचमे बुचाइ माहिर, मुदा समाजमे अनुचित हुअए, से कखनो नहि सोचए। जहिया कहियो उकड़ू काज अबै तखन गुरुकक्कासँ पूछि लैत। मने-मन रस्तामे सोचए लगल जे ऐबेर हिनका तेहेन सिखान सिखेबनि जे मरै काल तक मन रहतनि। जहिना सरकारी खजानासँ लऽ कऽ ठीकेदार धरिसँ समेटलाहा रुपैया केहेन होइ छै, से सिखताह।
आंगन पहुँचि बुचाइ चारि हजार पत्नीक हाथमे आ एक हजार अपना हाथमे रखलक। जहिना अगहनमे धानक ढेरी देखि, दुनू परानी किसानक मन खुशीसँ गद-गद होइत, तहिना दुनू परानी बुचाइकेँ भेल। मुदा दुनूक खुशीमे अन्तर होइत। किसानक खुशी मेहनतक फल देखि होइत जखन कि बुचाइक खुशी दलालीक। मुस्की दैत बुचाइ घरवालीकेँ कहलक- “खिड़कीपर एकटा शीशी अछि, कने नेने आउ?”
मुँह चमकबैत घरवाली बाजलि- “खाइ-पीबै रातिमे शीशी की करब?”
बुचाइ- “शीशियो नेने आउ आ खेनाइयो नेने आउ। दुनू संगे चलतै। जाबे भरि मन नै पीअब तावे मूड नै बनत। बहुत बात सोचैक अछि। अहाँ नै ने हमर बात बुझबै?”
पत्नी- “अहाँक बात बुझैक जरुरत हमरा कोन अछि। हमरा तँ अपने मन केनादन करैत अछि। देह भसिआइए।
“अच्छा ठीक अछि, अहूँ दू घोट पीबि लेब।
भोरे बुचाइ चौकपर पहुँचल। गामक बीचमे चौबट्टी। जहि चौबट्टीपर चारु भरसँ तीस-पैंतीसटा छोट-छोट दोकान। दस-बारहटा दू-चारी घर, बाँकी कठघरा। ओना एक्कोटा नमहर दोकान नहि, मुदा सभ कथुक दोकान। जइसँ गामक लोककेँ हाट-बजार जेबाक जरुरत कम पड़ैत। जहिया कहियो कोनो परिवारमे नमहर काज होइत-जेना बिआह, सराध इत्यादि, तखने बजार जेबाक जरुरत पड़ैत। ओना भरि दिन चौकक दोकान खुजल रहैत, मुदा गहिकीक भीड़ साँझे-भिनसर होइत। भरि दिन लोक अपन-अपन काज-उदम करैत आ साँझू पहरकेँ दोकानक काज कऽ लैत। खाली चाहे-पानक बिकरी भिनसरु पहरकेँ बेसी होइत। चौकपर पहुँचि बुचाइ दुनू चाहबलाकेँ एक-एक सए रुपैया दऽ दोकानपर बैसलि सभकेँ चाह पीअबै लेल कहलक। गाँजा पिआकक सेहो तीन ग्रुप चलैत। चाह पीबि पान खा बुचाइ चिलमक ग्रुपमे पहुँचि, दू दम लगा, तीनू ग्रुपमे पचास-पचास रुपैया गाँजा लेल दऽ देलक। सबहक मन खुशी भऽ गेलै। मुस्कुराइत बुचाइ अमीन ऐठाम बिदा भेल। गाममे तीनटा अमीन। रामचन्द्र, खुशीलाल आ किसुनदेव। कहै लेल तँ तीनू अमीन मुदा पढ़ि कऽ अमीन रामचन्द्रे टा भेल। मिडिल पास केलाक बाद रामचन्द्र हाइ स्कूलमे नाम नहि लिखा सकल। आब तँ लगेमे हाइ स्कूल खुजि गेल मुदा ओइ समएमे एक्कोटा हाइ स्कूल परोपट्टामे नहि छल, जइसँ रामचन्द्र आगू नहि पढ़ि सकल। बाहर पठा बेटा पढ़बैक ओकाइत रामचन्द्रक पिताकेँ नहि। सर्वे अबैसँ दस-पनरह बर्ख पहिने मुजफुरपुरक एकटा अमीन गाममे आबि अमानतक स्कूल खोललक। छह मासक कोर्स। चारि विषएक- पैमाइस, क्षेत्रमिति, कानून आ चकबन्दीक-पढ़ाइ। ओना समानो सभ- गुनिया, परकाल, मास्टर, स्केल, लेन्स, राइटऐंगिल, प्लेन, टेबुल, कंघी, टाँक, थ्याजो रैटर, जंजीर, फीता रखने। पाँच रुपैया महीना फीस लैत। मधुकान्तक दरबज्जेपर स्कूल खोललक। मधुकान्ते खाइयो लेल दै। जेकरा बदलामे मधुकान्तकेँ सेहो पढ़ा देलक। ओना गामोक आ गामक चारु भरक गामक विद्यार्थी सेहो पढ़लक। कुल मिला कऽ पनरह गोरे पढ़लक। मुदा जमीनक नापी-जोखी कम होइत, तँए रामचन्द्र छोड़ि सभ अमीनी छोड़ि देलक।
सर्वे अबैसँ महीना दिन पहिने बेगूसराएक एक गोटे आबि पाँच-पाँच सौमे अमानतक सर्टिफिकेट बेचए लगल। ओकरेसँ खुशीलालो आ किसुनदेवो सर्टिफिकेट कीनि लेलक।
गामे-गाम सर्वेक काज शुरू भेल। अमीन सबहक चलती आएल। नक्शा बनब शुरू होइते दलाली शुरू भेल। पाइ दऽ दऽ लोक अपन-अपन खेतक नक्शा बढ़बै लगल। लोकक दलाल अमीन आ सरकारक सर्वेयर। खुशीलालो आ किसुनदेवो उठि बैसल। मुदा रामचन्द्र कात रहल। गाए-महींस, गाछ-बिरीछ बेचि-बेचि लोक रुपैया बुकए लगल। रामचन्द्र दबि गेल मुदा खुशीलाल आ किसुनदेव नाम कमा लेलक। जेम्‍हर निकलैत तेम्‍हर लोक सभ चाहो-पान करबैत आ अमीन सहाएब, अमीन सहाएब कहि परनामो करैत। दुनू गोटे सर्वेक नांगड़ि पकड़ि किस्तवारसँ लऽ कऽ तसदीक खानापुरी, दफा-३, दफा-६,८,९ धरि दौड़ि-बड़हा करैत रहल। जइसँ मोटर साइकिल मेन्टेन करए लगल।
खुशीलाल ऐठाम पहुँचि बुचाइ श्रीकान्त दिससँ नापीक अमीन मुकर्रर कऽ लेलक। नापीक फीसक अतिरिक्त पक्ष लेबाक फीस सेहो गछि लेलक।
दोसर दिन मुकुन्द जी सेहो गाम पहुँचलाह। रहैक सभ ओरियान केनहि ऐलाह। गाम अबिते दूटा जन रखि परती छिलवा रौटी ठाढ़ करौलनि। जखन जन जाइ लगलनि तखन पुछलखिन- “गाममे के सभ नेतागिरी करैए?”
मुकुन्दजीक बात सुनि एक गोटे बुचाइक नाम कहलकनि। बुचाइक नाम सुनि बजा अनैले कहलखिन। दुनू गोटे बिदा भेल। दुनू कोदारि लऽ एक गोटे घरपर गेल आ दोसर गोटे बुचाइ ऐठाम। मुकुन्द जी पत्नीकेँ कहलखिन- “कने चाह बनाउ?
पत्नी चाह बनबैक ओरियान करै लगली। गैस चुल्हिपर ससपेन चढ़ा बजलीह- “केकरा लेल तीन महला मकान बनेलौं।
पत्नीक बात सुनि मुकुन्दजीक करेज दहलि गेलनि। करेजकेँ दहलिते आँखिमे नोर आबि गेलनि। आँखि उठा पत्नी दिस देखि आँखि निच्चाँ कऽ लेलनि। रुमालसँ नोर पोछि मुकुन्द जी मने-मन सोचए लगलथि जे अपन हारल केकरा कहबै। सपनोमे नञि सपनाइल रही जे पढल़-लिखल मनुक्ख एत्ते नीच होइत अछि। कत्ते मेहनतिसँ बेटाकेँ पढ़ेलौं, नोकरी दिएलौं। नीक घर नीक पढ़ल-लिखल कन्याक संग बि‍आह करेलौं। मुदा फल उल्टा भेटल। पढ़ल-लिखल लोक जे अपन सासु-ससुरक संग एहेन बरताव करै, तँ लोक जीविये कऽ की करत? ऐ सँ नीक मरनाइ। मुदा मृत्युओ तँ ओते असान नहि होइत। तखन तँ जे भाग्य-तकदीरमे लिखल अछि, से भोगब। अगर जँ बुढा़ढ़ीमे गनजने लिखल रहत तँ कियो बाँटि लेत। ओ तँ विधाताक रेख छी। के बदलि देत? मूड़ी गोतने मुकुन्द घुनघुना कऽ बजैत। पत्नीक आँखि तँ ससपेनपर रहनि मुदा करेज पीपरक पात जकाँ, जे बिनु हवोक डोलैत रहैत। आँखिसँ समतल भूमिक पानि जकाँ नोर टघरैत।
चाह बनल। दुनू गोटे आमने-सामने बैसि चाह पीबए लगलथि। एक घोंट कऽ चाह पीबि दुनू गोटे दुनू गोटेक मुँह दिस देखैत। मुदा कियो किछु बजैत नहि। जेना दुनूक हृदएक भीतर विरड़ो उठैत। दुइये घोंट चाह पीलनि, बाकी सभ सरा कऽ पानि भऽ गेलनि। तही काल बुचाइ पहुँचल। अबिते बुचाइ दुनू हाथ जोड़ि, दुनू गोटेकेँ प्रणाम कऽ बैसल। बुचाइकेँ देखिते मुकुन्द मनकेँ थीर करैत पत्नीकेँ कहलखिन- “भरि दिनक थकान देहकेँ खण्ड-खण्ड तोड़ैत अछि। मन केनादन करैए। कने एटैचीसँ एकटा बोतल नेने आउ। जावे पीब नहि ताबे कोनो बाते ने कएल हएत।
पतिक बात सुनि पत्नी एटैचीसँ एकटा किलो भरिक ब्राण्डीक बोतल आ दूटा गिलास निकालि कऽ आनि आगूमे रखि देलकनि। तीनू गोटे- मुकुन्द, पत्नी राधा आ बुचाइ- त्रिकोण जकाँ तीनू दिससँ बैसल। बीचमे मोड़ुआ टेबुल लोहाक। टेबुलपर गिलास बोतल। बोतलक मुन्ना खोलि मुकुन्द दुनू गिलासमे ब्राण्डी देलखिन। एक गिलास अपनो लऽ एक गिलास बुचाइ दिस बढ़ौलनि। ब्राण्डी देखि बुचाइक मन तँ चटपटाए लगल मुदा अनभुआर लोकक संग पीबैक परहेज करैत बाजल- “कक्का जी, ई सभ हम नै पीबै छी। गाममे हमरा कतऽ ई चीज भेटत। गरीब-गुरवा लोक छी, जँ कहियो मनो होइए तँ एक दम चीलममे लगा लै छी। नै तँ पीसुआ भाँगक एकटा गोली चढ़ा दै छिऐ।
जिद्द करैत मुकुन्द कहलखिन- “ई तँ फलक रस छिऐ। कोनो की मोहुआ दारु आकि पोलीथिन छिऐ जे अपकार करतह।
मुकुन्दक मनमे रहनि जे शराब पीआ बुचाइसँ सभ बात उगलवा लेब। जाबे गामक तहक बात नै बुझबै ताबे किछु करब कठिन हएत। दुनू गोरे एक-एक गिलास पीलनि। गिलास रखि मुकुन्द सिगरेटक डिब्बा आ सलाइ निकालि, एकटा अपनो हाथमे लेलनि आ एकटा बुचाइयोकेँ देलखिन। दुनू गोटे सिगरेट पीबए लगलाह। सिगरेटक धुँआ मुँहसँ फेकैत मुकुन्द कहलखिन- “बुचाइ, हम तँ आब बुरहा गेलौं, तू सभ नौजवान छह। तोरे सभपर ने गामसँ लऽ कऽ देश तकक दारोमदार छह। शहरमे रहैत-रहैत मन अकछा गेल। साले भरि नोकरियो अछि। तँए चाहैै छी जे जल्दी नोकरी समाप्त हुअए जे गाम आबि अपन सर-समाजक बीच रहब। मुदा गाममे तँ अपना किछु अछि नहि। लऽ दऽ कऽ थोड़े घराड़ी अछि। जेकरा नपा कऽ घर बनबए चाहै छी। तहिमे तूँ कने मदति कऽ दाए।
बुचाइ- “हमरा बुते जे एत से जरुर कऽ देब। अहाँ तँ अपने तत्ते कमा कऽ टलिया नेने छी जे अनकर कोन जरुरत पड़त?”
मुकुन्द- “तूँ तँ जनिते छहक जे सभ दिन नीक एयर कंडीशन घरमे रहै छी, नीक गाड़ीमे चढै़ छी, नीक लोकक बीच आमोद-परमोद करै छी, से केना हएत?
बुचाइ- “अहाँ की कोनो खेती-पथारी करब आकि माल-जाल पोसब, जे तइले खेत-पथार चाही। लऽ दऽ कऽ रहैक घर चाही। से तँ घराड़ी अछिये।
मुकुन्द- “कहलह तँ ठीके, मुदा रहैले तँ घर बनाबै पड़त। बिजली गाममे नञि छै तइले जेनरेटर बैसबै पड़त, पानिक टंकी नै छै तइले कलक संग-संग मोटर सेहो लगबौ पड़त। गाड़ी रखैले घर आ साफ करैले सेहो जगहक जरुरत हएत। पैखाना, नहाइले सेहो घर चाही, घरक आगूमे दसो धुरक फुलवारी, बइसैले चबुतरा सेहो चाही। चारु भर छहरदेवाली बनबए पड़त। सभले तँ जमीने चाही।
बुचाइ- “हँ, से तँ चाहबे करी। मुदा हमरा की कहए चाहै छी?
मुकुन्द- “तोरा यएह कहै छिअह जे अपना अढ़ाइये कट्ठा घराड़ी अछि, तइमे सभ कुछ केना हएत? कहुनाकेँ दसो धुर बढ़बैक गर लगाबह।
मुकुन्दक बात सुनि बुचाइक मनमे हँसी उठल। हँसीकेँ दबैत बाजल- “देखियौ कक्का, पान-दस धुर जमीन अमीनक हाथमे रहै छै, मुदा ओ तँ तखने हएत जखन पंचो आ अमीनो पक्षमे रहत।
मुकुन्द- “तेहीले ने तोरा बजेलियह। हमरा तँ केकरोसँ जान-पहचान नै अछि। मुदा तोरा तँ सभसँ छह, तँए, तूँ हमरा अप्पन बूझि मदति करह।
मने-मन बुचाइ सोचलक जे ई पनहाइल गाए जकाँ छथि, तँए सरियाकेँ हिनका सिखबैक अछि, चपाड़ा दैत बाजल- “देखियौ कक्का, गामक लोक गरीब अछि, ओ जे पक्ष लेत से ओहिना किअए लेत? गौआँक लिये जेहने अहाँ तेहने श्रीकान्त कक्का। तखन तँ कियो जे नेत घटाओत से बिना मीठ खेने किअए घटौत?”
मुकुन्द- “तइले हमहुँ तैयारे छी। जना जे तूँ कहबह से हम देबह।
बुचाइ- “अच्छा हम भाँज-भूज लगबैले जाइ छी। मुदा काल्हि खन श्रीकान्त कक्का सेहो कहने रहथि। ओना हम हुनका कहि देने रहियनि जे अमानतक दिन हमहूँ रहब। तँए थोड़े दिक्कत हमरा जरूर अछि। मुदा तैयो दिन-देखार तँ हम अहाँक भेँट नहि करब, साँझमे जरूर करब। जना जे हेतै से सभ बात अहाँकेँ कहैत रहब आ अहूँ ओइ हिसाबसँ अपन गर अँटबैत रहब। ओना गाममे अखन सरूपक संग बेसी लोक छै, तँए अहाँकेँ ओकरासँ भेँट करा दै छी। ओ जँ तैयार भऽ जाएत तँ कियो ओकरा रोकि नहि सकतै।
“बड़बढ़ियाकहि मुकुन्द बैगसँ दस हजार रूपैया निकालि बुचाइकेँ दऽ देलखिन।
रूपैया गनि बुचाइ बाजल- “ऐ सँ की हएत? हम ने गामक पेंच-पाँच बुझै छिऐ। काजो तँ उकड़ूए अछि।
“एते ताबत राखह। जना-जना काज आगू बढै़त जाएत तना-तना कहैत जइहह।
“बड़बढ़ियाकहि बुचाइ प्रणाम कऽ बिदा भेल।
मने-मन मुकुन्द सोचए लगलाह जे भलहि‍ं श्रीकान्तो इंजीनियरे छथि मुदा जते पाइ हम कमेलौं तते हुनकर नन्नो ने देखने हेतनि। भऽ जाए पाइयेक भिड़ंत। मने-मन सोचबो करैत आ खुशियो होइत।
मुुकुन्द ऐठामसँ निकललाक बाद रस्तामे बुचाइ विचारै लगल। आरौ बहिं, आइ धरि एहेन-एहेेन बुढ़बा चोट्टा नञि देखने छलौं। जिनगी भरि पाइये हँसोथति रहल मुदा सबुर नै भेलै। अच्छा, ऐबेर दुनू सिखताह। जइ गामक लोक आइ धरि सहि-मरि अपन बाप-दादाक गाम आ घराड़ी धेने रहल, समाजक बेर-बिपत्तिमे संगे प्रेमसँ रहल ओइ गाममे जँ एहेन-एहेन चोट्टा आबि कऽ रहत, तँ कए दिन गामकेँ सुख-चैनसँ रहए देत। सभकेँ टीकमे टीक ओझरा नाश करत की नहि?”
दोसर दिन, सबेरे सात बजे बुचाइ सरूप ऐठाम पहुँचल। दुनूकेँ बच्चेसँ दोस्ती, तँए धियो-पुता भेलोपर दुनूक बीच रउए-रउ चलैत। सरूपकेँ दरबज्जापर नहि देखि बुचाइ सोर पाडैए लगल- “दोस छेँ रौ, रौ दोस।
सरूप अंगनाक दछिनबरिया ओसारपर बैसि दारुक बोतलक मुन्ना खोलैत। बुचाइक अवाज सुनि, कहलक- “दोस रौ, आ-आ। अंगने आ।
घरक कोनचर लग अबिते बुचाइ सरूपक घरवालीकेँ देखि बाजल- “दोस रौ, दोसतिनीक थुथुन बड़ लटकल देखै छियौ। रौतुका झगड़ा अखन तक फड़िएलौहेँ नञि रौ। हम तँ रौतुका झगड़ा रातियेमे उठा-पटक कऽ फड़िया लै छी आ तू अखन तक रखनहि छेँ।
बुचाइक बात सुनि सरूप कहलक- “धुर-बूड़ि, सभ दिन एक्के रंग रहि गेलेँ। कहियो तोरा बजैक ठेकान नै हेतौ।कहि पत्नीकेँ कहलक- “एकटा गिलास नेने आउ? एकटा गिलास आनि पत्नी सरूपक आगूमे रखलक। दुनू गोटे एक-एक गिलास दारु पीलक। बोतलकेँ डोला कऽ देखि सरूप फेर दुनू गिलासमे ढारलक। तइ बीच बुचाइ बाजल- “एक गिलास दोसतिनोकेँ दहुन?”
बुचाइक बात सुनि सरूपक पत्नी कला बाजलि- “हम नै गाइयक गोत पीबै छी।
बुचाइ- “कनी पी कऽ देखियौ जे केहेन ताव चढै़ए।
सरूप- “भोरे-भोर दोस किमहर एलेँ?”
जेबीसँ पाँच हजार रुपैयाक गड्डी निकालि बुचाइ सरूपक आगूमे रखैत बाजल- “ले, ई तोहर हिस्सा छियौ। गाममे दूटा मोकीर फँसलौहेँ। तँए सरिया कऽ दुनूकेँ सिखबैक छौ। एकटाकेँ हम संग देबै आ दोसरकेँ तूँ देही। जहिना धिया-पुता दूटा मुसरीकेँ नंागड़ि पकड़ि लड़बैत अछि तहिना दुनू गोटे दुनूकेँ लड़ा।
सरूपक आगूमे रुपैया देखि कलाक मुँहसँ हँसी निकलल। हँसी देखि बुचाइ बाजल- “एकटा बात बुझै छिऐ दोसतिनी, लछमी दुइये टा होइत अछि। एकटा घरवाली आ दोसर रुपैया। दोस, तोहर भाग बड़ जोरगर छौ। किएक तँ दुनू तोरा लगेमे छौ।

बुचाइक बात सुनि कला पाछू दिस मुँह घुमा लेलक। कलाकेँ पाछू मुँहे घुरल देखि बुचाइ कहलक- “मुँह घुमौने नै हएत दोसतिनी। अहीमे सँ रुपैया लिअ आ दोकानसँ अंडा नेने आउ। भुजल चूड़ा आ अंडाक कोफ्ता खुआउ।
एकटा पचसटकही लऽ कला अंडा आनै दोकान बिदा भेल। खाली अंगना देखि बुचाइ सरूपकेँ फुसफुसा कऽ कहए लगल- “दोस, दूटा जुएलहा चोर गाम एलौहेँ। दुनू जेहने “चोरतेहने “लोभी। दुनू अपन-अपन घराड़ी नपाओत। दुनूकेँ अढ़ाइ-अढ़ाइ कट्ठा जमीन छै। जे खतिआनी छिऐ। किएक तँ दुनू एक्के वंशक छी। एक पुरखियाह अछि तँए दोसर-तेसर नै छै। दुनू चाहैए जे हमरा तीन कट्ठा हुअए तँ हमरा तीन कट्ठा हुअए। दुनूकेँ पाइयक गरमी छै, तँए एक-दोसरकेँ निच्चाँ देखबै चाहैए। गामक लोक तँ दुनूक नजरिमे, बोन झाँखुर छी। से थोड़े हुअए देबै। पाइयो खा जेबै आ सुपत-सुपत बँटबरो करा देबै।
कने काल गुम्म रहि सरूप बाजल- “आँइ रौ दोस, अपने सभ कोन नीक
लोक छेँ रौ। भरि दिन झूठ-फूसि बजै छी, ताड़ी-दारु पीबै छी, तखैन नीक कना भेलौ रौ।
बुचाइ- “धुर बूड़ि, तोरा निशाँ चढ़ि गेलउ, तँए नै बुझै छीही। तोँही कह जे गाममे कोनो जातिक लोक किए ने हुअए, मुदा जखन मरैए तँ कठिआरी जाइ छिऐ की नै? गरीबसँ गरीब लोक किए ने हुअए, कियो बिना कफने जराओल गेलहेँ? अपना हाथमे जँ पाइ नहियो रहल तँ दू-चारि गोरेसँ मांगि-चांगि पुरा दै छिऐ। तेसर सालक गप मन छौ की नै। देखने रही की ने जे मखनाक गाए बाढ़िमे भसल जाइत रहै तँ भरि छाती पानिमे सँ पकड़ि अनलौं। मोतिया बेटीक बिआह कोन पेंचपर करा देलिऐ से बिसरि गेलही। डोम खंजनमाक घरमे जे आगि लगल रहै तँ देखने रही की नञि जे अपन घैलची परक घैल लऽ कऽ सभसँ पहिने आगि मिझबैले गेल रहिऐ। हमरा देखलक तखन पाछूसँ सभ गेल। जइकेँ चलैत माए कते दिन तक गरिअबैत रहल जे तोहूँ छुवा गेलेँ आ घइलो छुबा गेल। आँइ रौ, गाइरियो-फज्झति सुनि कऽ जे सेवा करै छी उ धरम नै भेल रौ।
मूड़ी डोलबैत सरूप- “हँ, से तँ ठीके कहै छेँ।
बुचाइ- “हम श्रीकान्त कक्काक पछ लऽ कऽ रहब आ तूँ मुकुन्द कक्काक संग दहुन। जहिना इलेक्शनमे परचार करैक, आॅफिस चलबैक, चाह-पानक खर्च, लाउडस्पीकर आ सवारीक, बूथपर दसटा कार्यकर्ता रखैक, एजेंटक, नेता सबहक सुआगतक लेल मेहराओ बनबैक खर्च नेतासँ लै छिऐ तहिना अखनसँ जाबे तक नापी हेतै ताबे तकक खरचा दुनू गोटेसँ दुनू गोटे लेब। हेतै तँ उचिते मुदा ठकसँ ठकब कोनो पाप थोड़े छी।
सरूप- “कना-कना पाइ लेबही से तँ प्लानिंग कऽ लेमे की ने?”
बुचाइ- “घबड़ाइ छैँ किए, इलेक्शनोसँ बेसी लेबै। अमीनक घूस, पंचक घूस, चौक-चौराहाक चाह-पान, गाँजा-भाँग, ताड़ी-दारुक, लठैतक, कते कहबौ। जना-जना काज अबैत जेतै तना-तना टनैत जेबै। अखन जे आएलहेँ ओ सगुन छी। साँझमे जखन खूब अन्हार तेसरि साँझ भऽ जेतै तखन चलिहेँ। तोरा-दुनू गोरेकेँ मुँह-मिलानी करा देबउ। चौकपर दूटा चाहक दोकान छेबे करै, एकटा पर साँझ-भिनसर तूँ बैसिहेँ आ एकटा पर हम बैसब। तूँ मुकुन्द जी दिससँ बजिहेँ जे हुनका तीन कट्ठा घराड़ी छन्‍हि‍ आ दोसरपर हम बैसि बाजब। मुदा एकटा बात मन रखिहेँ जे जखन श्रीकान्त कक्का चौकपर आबथि, तखन अपने दिससँ चाह-पान खुआ, हुनके बात बजिहेँ आ जखन मुकुन्द कक्का औताह तँ हमहूँ बाजब। जइसँ हुनका सभकेँ हेतनि जे सौंसे गौआँ हमरे दिस अछि। अखन तँ गैाँआ सभकेँ चाहे-पान, गाँजा, ताड़ी पइर लगतै मुदा नापी दिन पूड़ी-जिलेबी जलखै आ माँस-भात भोजन करा देबै।
सरूप- “बड़बढ़ियाँ प्लानिंग छौ।
बुचाइ- “हम श्रीकान्त कक्का दिससँ खुशीलाल अमीनकेँ ठीक केलौंहेँ, तूँ मुकुन्द कक्का दिससँ किसुनदेव अमीनकेँ ठीक करिहेँ। दुनू अमीन तँ दुनू पार्टीक हएत की ने मुदा मध्यस्त अमीन तँ सेहो चाही। तइले रामचन्द्र भायकेँ पकड़ि लेब। तहिना गामक लोक तँ दुनू दिससँ बँटाएल रहत की ने मुदा एक्कोटा तँ तेहल्ला पंच चाही। तइले गुरुकक्काकेँ पकड़ि लेब। जखने गुरुकक्का पंच आ रामचन्द्र भाय अमीन रहताह तखने एक्को तिल जमीन इमहर-ओमहर थोड़े हएत।
दोसर दिन दुनू गोटे -बुचाइयो आ सरुपो- गुरु कक्का लग पहुँचल। गुरुकक्का दलानेपर। दुनू गोटे प्रणाम कऽ बैसल। दुनू गोटेकेँ देखि गुरु कक्का पुछलखिन- “की बात छिऐ हौ बुचाइ? दुनू भजारकेँ संगे देखै छिअह?”
बुचाइ- “अहीं लग तँ एलौहेँ कक्का। श्रीकान्तो काका आ मुकुन्दो काका घराड़ी नपौताह। तेहीमे अपनो रहबै।
गुरुकाका- “की करताह ओ सभ घराड़ी नपा कऽ। केहेन बढ़िया तँ धिया-पुता सभ खेलाइए।
सरूप- “रिटायर केला बाद गामेमे रहताह। नोकरियो लगिचाइले छन्‍हि‍। तँए अखने नपा कऽ घरमे हाथ लगौता।
गुरुकक्का- “सुनै छी जे दुनू गोटे शहरेमे घर बनौने छथि, तखन गाममे बना कऽ की करताह। हुनका सभकेँ गाममे थोड़े वास हेतनि। जिनगी भरि तँ बड़का-बड़का होटल देखलखिन, नीक रोडपर नीक सवारीमे चललथि, दामी-दामी वेश्यालय देखलनि, से सभ गाममे थोड़े भेटतनि। अनेरे गाममे आबिकेँ किए थाल-कादोमे चलता आ मच्छर कटौताह।
गुरुकाकाक बात सुनि लपकि कऽ बुचाइ बाजए लगल- “से नै बुझलिऐ कक्का, दुनू गोटे भारी चोट खा चोटाएल छथि। तँए गाम दिस झुकलाह।
“से की?” - ओ अकचकाइत गुरुकक्का पुछलनि‍।
बुचाइ कहए लगल- “तेसर सालक घटना छिऐ। श्रीकान्त काकाक पत्नी ड्राइवरकेँ संग केने बजार गेली। बजारसँ समान कीनि जखन घुमली तँ दोसर गाड़ी सेहो पछुअबैत रहनि। जखन फाँक-पाँतरमे गाड़ी पहुँचलनि तँ पछिला गाड़ी आगू आबि रोकि देलकनि। गाड़ीसँ चारि गोटे उतरि हिनका गाड़ीमे बैसि ड्राइवरकेँ दोसर रस्तासँ गाड़ी बढ़बैले कहलक। बेचारा की करैत। बढ़ल। थोड़े दूर गेलापर गाड़ी रोकि, काकीकेँ उतारि ड्राइवरकेँ कहलक- “मालिककेँ जा कऽ कहिअनु जे पाँच लाख रुपैया नेने आबथि आ पत्नीकेँ लऽ जाथि। दू घंटाक समए दैत छिअह।ड्राइवर बिदा भेल। इमहर काकीकेँ चारि-पाँच ठूसी मुँहमे लगा देलकनि। जइसँ अगिला चारि टा दाँतो टुटि गेलनि। ठोह फाड़ि कऽ कानए लगली। कनिते काल मोबाइल दऽ कहलकनि जे पतिकेँ कहिअनु जे जल्दी रुपैया लऽ कऽ आउ नञि तँ हम नहि बँचब। तावे ड्राइवरो पहुँचि कऽ कहलकनि। अपना हाथमे दुइये लाख रुपैया, जे हालक आमदनी रहनि, बाकी रुपैया सभ बैंकमे। वएह दुनू लाख रुपैया लऽ कऽ गेला आ पएर-दाढ़ी पकड़ि कऽ पत्नीकेँ छोड़ा अनलनि।
बुचाइक बात सुनि ठहाका मारि हँसि गुरुकाका- “मुकुन्द किअए औताह?”
मुस्की दैत बुचाइ- “हुनकर तँ आरो अजीव बात छन्‍हि‍। एक दिन एकटा ठीकेदारक पार्टी चललै। जते बड़का-बड़का हाकिम आ ठीकेदार सभ छल, सभ रहए। मुकुन्द अपन पुरना गाड़ी छोड़ि नवका गाड़ी, जे बेटाकेँ सासुरमे देने रहनि, लऽ कऽ गेला। जखन पार्टीसँ घुमि कऽ ऐला तँ पुतोहु कहलकनि- “पुतोहुक गाड़ीपर चढ़ैत केहेन लागल?” ऐ बातक चोट हुनका खूब लगलनि। बेटा-पुतोहुसँ मोह टूटि गेलनि। तँए गामेमे रहताह।
बुचाइक बात सुनि गुरुकक्का गुम्म भऽ गेलाह। कने काल गुम्म रहि, मने-मन बिचारि कहलखिन- “गाम तँ गामे छी। शुद्ध मिथिला। भारत। जे स्वर्गोसँ नीक अछि। मुदा सभ गामक अपन-अपन चरित्र आ प्रतिष्ठा छैक। जे चरित्र आ प्रतिष्ठा गामक कर्मठ, तियागी लोकनि बनौने छथि। अपन कठिन मेहनति आ कर्तव्यसँ सजौने छथि। ओकरा जीवित राखब तँ अखुनके लोकक कान्हपर भार अछि की ने? नोकरीक जिनगीमे किछु कियो केलनि तइसँ समाजकेँ कोन मतलब। अपनाले केलनि। समाजक एक अंग होइक नाते हुनको सबहक कान्हपर किछु भार छलनि जे अखन धरि नहि कऽ सकलाह। मुदा तैयो जँ समाजमे आबि, समाज रूपी फुलवारीमे फूल लगबए चाहताह तँ बढ़िया बात। से तँ लक्षणसँ नहि बूझि पड़ैत अछि। समाजमे रहैक लेल समाजक चरित्रक अनुकूल अपन चरित्र बनौताह, तखने ने समाजमे अँटाबेश हेतनि। ई तँ नहि जे गदहा गेल स्वर्ग तँ छान-पगहा लगले गेलै।
गुरुकाकाक बात सुनि बुचाइयो आ सरुपो पुछलकनि- “कक्का, गामक विषएमे हम सभ किछु ने बुझैत छी, से कने बुझा दिअ?”
गुरुकाका- “अखन काजक बेर अछि तँए बहुत बात तँ नहि कहि सकबह, मुदा जखन बुझैक जिज्ञासा छह तँ दूटा जरुर कहबह। देखहक, गामक पढ़ल-लिखल वा बिनु पढ़ल-लिखल लोक, पेट भरैक लेल नोकरी करैक लेल बाहर जाइ छथि, नीक बात। मुदा गामकेँ सोलहन्नी नहि छोड़ि देथि। अखन देखै छी जे अमेरिका, इंग्लैडसँ लोक तीन दिनमे गाम आबि सकै छथि। तँए सालमे कमसँ कम एक्को बेर, नञि तँ हुनकरो गाम छि‍यनि‍, कतेको बेर आबि सकै छथि। जइसँ गामक लोक आ खेत-पथारक संग संबंध बनल रहतनि। मुदा से नहि कऽ गामकेँ सोलहन्नी छोड़ि, अनतै घर बना रहए लगै छथि। जे गामक दुर्भाग्य छी। जेकर फल होइत अछि गामक ज्ञान निर्यात भऽ जाइत अछि। जइसँ सूतल गाम सुतले रहि जाइत अछि। संगे गामक बेवहार, कला-संस्कृति सभ टुटि जाइत अछि। रिटायर केला बाद वा जिनगीक अंतिम अवस्थामे, जँ कियो गाम आबि रहए चाहता तँ हुनका गाम केहेन लगतनि। डेग-डेगपर टक्कर आ बात-बातमे विवाद हेबे करतनि। दोसर बात सुनह। अपना गाममे वैदिक जी भेल छथि। जिनके पोता शुभकान्त छि‍यनि‍। वेदक प्रकाण्ड विद्वान वैदिक जी। नाम तँ छलनि गंगाधर मुदा वैदिक जी नामसँ विख्यात भेलाह। अपनो राजमे आ आनो-आनो राजमे जखन पंडितक बीच शास्त्रार्थ होइ तँ हुनकर जबाव देनिहार कियो ने ठहरैत। अनेको तगमा आ प्रशस्ति पत्र भेटलनि। अखनो परोपट्टाक लोक हुनके नामपर अपना गामक नाम वैदिक जीक गाम बुझैत अछि। हुनके चलाओल अपना गामक पानि छी। पहिने पानिक छुआछूत अपनो गाममे छल, मुदा ओ सभकेँ बैसार कऽ कऽ बुझा देलखिन जे दुनियाँमे जते मनुक्ख अछि, सभ मनुक्ख छी, तँए मनुक्ख-मनुक्खक बीच छुआछूत नै हेबाक चाही। थोपड़ी बजा सभ हुनकर विचारक समर्थन कऽ देलक। ओइ दिनसँ पानिक छुआछूत गामसँ मेटा गेल तहिना दोसर भेल जोगिनदर। भिखारीदासक पक्का चेला। अजीब कला हुनकोमे छलनि। जहिना नचैमे अगिया-बेताल, तहिना गीत गबैमे। जे पार्ट लऽ कऽ स्टेजपर अबैत, धऽ कऽ झहरा दैत। एहेन बिपटा अखन धरि कोनो नाचमे नञि देखलिऐहेँ। ओकरो परसादे गाममे भिखारीदासक नाच कतेको बेर भेल। जखन भिखारीदासक पार्टी छपरासँ पूब मुँहे असाम, बंगाल, नेपाल बिदा होए तँ अपने गाममे रुकै। खाली खेनाइ आ इजोतक खर्च गौआँक होइ। तहिना जब तीन-चारि मासमे घुमै तँ फेर अँटकै। तहिना भेल महावीर। बेचारा बड़ गरीब छल। नोकरी करैले कलकत्ता गेल। मुदा नोकरी नहि कऽ रिक्शा चलबए लगल। अजीब संस्कार ओकरोमे छलै। रिक्शो चलबै आ गीतो-कविता बनबै। पहिने तँ लिखल-पढ़ल नै होइ। मुदा अ-आसँ सीखब शुरू केलक। किछुए दिनक बाद लिखबो आ पढ़बो सीखि लेलक। रिक्शापर जखन चलै तँ अपन बनाओल गीत गाबए। एक दिन एकटा साहित्य प्रेमी रिक्शापर चढ़ल रहथि आ महावीर रिक्शो चलबै आ गीतो गाबै। उतड़ै काल कवि पूछि देलखिन। सभ बात महावीर कहलकनि। ओ एकटा कवि गोष्ठीमे आमंत्रित कऽ देलखिन। ओइ गोष्ठीमे पहुँचि महावीर तीनटा कविता आ दूटा गीत गौलक। तइ दिनसँ कवि गोष्ठीमे आमंत्रित हुअए लगल। बंगाल सरकार दस हजारक पुरस्कार आ प्रशस्तिपत्रसँ सम्मानित केलकनि। तहिना भेल कारी खलीफा। जेकरा इलाकाक लोक खलीफा मानैत। बड़का-बड़का दंगलमे पहँुचि ओ आन-आन जिलाक कतेको खलीफाकेँ पटकलक। ओकरा चलैत गाममे कियो केकरो बहु-बेटीकेँ खराब नजरिसँ नहि देखैत। एक बेर एकटा घटना जमीनदारक सिपाही संग घटलै। एक सौ लाठी सिपाहीकेँ समाजक बीचमे मारलक। तेही दिनसँ जमीनदार दू बीघा खेत ओहिना दऽ देलकै। एहेन-एहेन पंडित, कलाकारक बनाओल गाम छी, तेकरा हम सभ, अपना जीवैत केना दुइर कऽ देबै। आइ जँ गाम दुइर हएत तँ अगिला पीढ़ी केकरा गारि पढ़तै। तँए जँ दुनू गोटे मनुक्ख बनि गाममे रहए चाहताह तँ बड़बढ़ियाँ, नहि तँ गाममे रहने कियो समाज तँ नहि बनि जाइत।
अमानत भेल। कोनो बेसी झमेल रहबे नै करै। पाँच कट्ठा कऽ दू भाग केनाइ। बँटवारा करैत रामचन्द्र अमीन कहलखिन- “जिनका संदेह हुअए ओ चाहे कड़ीसँ, वा फीतासँ, वा लग्गीसँ वा डेगसँ भजारि लिअ।

चुनवाली :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल


नीन्न टुटिते मखनी मोथीक बिछान समेटि ओसारक उत्तर-पूब कोनमे ठाढ़ कऽ निच्चाँ उतरए लागलि आकि सीढ़ीपर पिछड़ि गेलि। पाएर पिछड़िते हाथसँ ओसार पकड़ए चाहलक। मुदा जाबे सरिया कऽ ओसार पकड़ै-पकड़ै ताबे ओलतीमे खसि पड़लि। झलफल रहने कियो दोसर उठल नहि। थोड़बे पहिने एकटा छोटकी अछार भेल। घरक चारसँ ठोपे-ठोप पानि चुबतहि। सीढ़ीपरसँ खसिते मखनीक दहिना ठेहुनक जोड़ छिटकि गेलै। तत्काल छिटकब नहि बुझलक। एतबे बुझलक जे ठेहुन कट दऽ उठलहेँ। मनमे एलै जे कियो देखलक तँ नहि तेँ हाँइ-हाँइ उठए लागलि। जोशमे उठि तँ गेलि मुदा ठेहुनक कचकबसँ फेर ओसार पकड़ि सीढ़ियेपर बैसि गेलि। बैसिते मनमे बिचार उठए लागलै- केना मटकुरियाक बेटाक परबरिस चलतै....ढेरबा बेटी छै बिआह कन्ना करत.... अपना कमाइक कोनो लूरि नहि छैक.... बहुओ धमधुसरिये छै.... अपना खेत-पथार नहि छै.... गामक लोको तेहेन अछि जे केकरो कियो नीक नहि करैत.... हे भगवान कोन बिपत्ति दऽ देलह?
कने काल गुम्म रहि बेटाकेँ जोरसँ सोर पाड़ि कहलक- “मटकुरिया, रौ मटकुरिया?
दुनू परानियो आ दुनू धियो-पुतो निन्ने भेर। तेँ ने मटकुरिया उठल आ ने कियो दोसर। पुनः दोहरा कऽ मखनी जोरसँ बाजलि- “रौ बौआ, बौआ रौ। हम पिछड़ि कऽ खसि पड़लौं से उठिये ने होइए।
धड़फड़ा कऽ उठैत मटकुरिया बाजल- “माए-माए, अबै छी।
ताधरि फुलियो, कबुतरियो आ बेटोक नीन टुटल। कहि केवाड़ खोलि मटकुरिया दौगल माए लग आबि पुछलक- “केना कऽ खसलैं?”
पाछूसँ स्त्रियो आ बेटो-बेटी पहुँचल। बेटा तँ पाँचे बर्खक मुदा तैयो माए-बापक देखा-देखी करैत दादीकेँ पकड़लक। चारु गोटे उठा मखनीकेँ ओसारपर लऽ गेल। बिछान बिछा सुता देलक। कनी-कनी ठेहुन फुलए लगल। फुलब देखि फुलिया पतिकेँ कहलक- “अहाँ पहिने डाकडर बजा लाउ। हम ताबे कड़ू तेलसँ ससारि दै छि‍यनि‍। बुच्ची घरसँ तेलक शीशी नेने आ।
मटकुरिया डाॅक्टर ऐठाम बिदा भेल। तेलक शीशी अानए कबुतरी घर गेलि। तइबीच मंगनिया दादीकेँ कहए लगल- “आँइ गै बुढ़िया, एतने उपर से....।
बेटाक मुँहपर फुलिया हाथ दऽ आगू बाजब रोकि देलक। मुदा पोताक बातसँ मखनीकेँ एक्को मिसिया दुख नहि भेल। मुस्की दैत बाजलि- “बिलाइ खसा देलक।
शीशीक मुन्ना खोलिते कवुतरी आएल। दुनू माए-धी तरहत्थीपर तेल लऽ लऽ दुनू हाथमे मिला, दहिना पाएर-जाँघ सहित- मे ओंसइ लागलि। मखनीक ठेहुनक दर्द बढ़िते जाइत। जइसँ दुनू गोटेकेँ ससारब छोड़ि दै लेल कहलक। ताबत डाॅक्टरक संग मटकुरियो पहुँचल। मखनीक ठेहुन देखिते डाॅक्टर कहलखिन- “हिनका ठेहुनक जोड़ छिटकि गेल छन्हि। पलस्तर करबए पड़त। ताबत दर्द कम होइ ले इन्जेक्शन दऽ दै छि‍यनि‍। पलस्तरक समान सभ मंगबए पड़त।
एक्के-दुइये गामक जनिजाति पहुँचए लागलि। जनिजातिक संग धियो-पुता। लोकसँ मटकुरियाक आंगन भरि गेल। पलस्तरक समान मंगा डाॅक्टर पलस्तर करैत कहलखिन- “चिन्ता करैक बात नहि अछि। पनरह दिनमे ठीक भऽ जेतनि।कहि अपन फीस लऽ चलि गेलाह। मुदा लोकक आबा-जाही लगले। रंग-विरंगक गपसँ अंगना गनगनाइत।
भरि दिन सभ तुर मटकुरिया भुखले रहि गेल। ने भानसपर ध्यान गेलै आ ने केकरो भूखे बूझि पड़लै। घरमे चूड़ा रहए। जे मंगनिया खेलक। बेर झुकैत-झुकैत अंगना खाली भेलै। खाली अपने पाँचो गोटे अंगनामे रहल। सबहक मनो असथिर भेलै। सभ -मटकुरियो, फुलियो आ कबुतरियो- अपना-अपना ढ़ंगसँ सोचए लगल। ओना कहियो-काल, सासुकेँ मन खराब भेने वा कतौ गाम-गमाइत गेने, फुलिये चून बेचए जाइत। सभ काज बुझले तेँ मनमे बेसी चिन्ता नहि। चिन्ता खाली एतबे जे कहुना सासु माने माएक परान बचि जाइन। मुदा खुशी बेसी। सोलह बर्खसँ सासुर बसै छी मुदा अखन धरि घरक गारजन नहि बनलौं। लोककेँ देखै छिऐ जे सासुर अबिते अपन जुइत लगबए लगैत अछि। भगवान हमरो दहिन भेलाह। आब हमहूँ गार्जन बनब। घरक गारजन तँ वएह ने होइत जे कमाइत अछि। जे उपारजने नै करत ओ घरक जुतिये-भाँति की लगौत। अगर जँ लगेबो करत तँ चलतै केना? छुच्‍छ हाथ थोड़े मुँहमे जाइत छैक। काजक अपन रस्ता होइत अछि। जे केनिहारे बुझैत। बिनु केनिहार जँ जुतिये लगौत तँ ओ या तँ दुरि हेतै वा गरे ने लगतै। ओना अखन फुलियाक घरोबला आ सासुओ जीविते, तँए गारजनियो हाथमे आएब कठिन। मुदा तैयो आशा। अखन धरि सिन्नुरो-टिकुली लेल खुशामदे करै छलि, से आब नहि करै पड़तै। तँए खुशी।
कबुतरीक मनमे ऐ दुआरे खुशी होइत जे जते लूरि दादीकेँ अछि ओते लूरि गाममे केकरो नहि अछि। मुदा कमाइक तेहेन भुत लगि गेल छै जे जइ दिन मरत तही दिन छोड़तै। सभ लूरि संगे चलि जेतै। तँए नीक भेलै जे अवाह भऽ गेल, आब तँ अंगनामे रहत। जखने अंगनामे रहए लगत तखने एका-एकी सभ लूरि सीखए लगब। मुदा दादीएकेँ की दोख देबै। भरि दिन दस सेरक छिट्टा माथपर नेने बुलैत अछि तँ देह-हाथ दुखेबे करतै। साँझखिन कऽ थाकल-ठहिआएल अबैए असुआकेँ पड़ि रहैए। से आब नञि हेतै। निचेनसँ पावनियो-तिहारक विधि-विधान आ गीतो-नाद सीखब। एत्तेटा भऽ गेलौंहेँ, ने अखन तक एक्कोटा गीत अबैए आ ने बि‍आह-दुरागमनक अड़िपन बनौल होइ अए। कअए दिन मनमे अबैए जे मालतिये जकाँ हमहूँ अपन गोसाँइ घरक ओसारमे पुरैनिक लत्ती, कदमक गाछ लिखी। से लुरियो रहत तब ने। साँझू पहरकेँ जते खान जतै छिऐ तते खान समयो भेटैए ते नहिये होइए। किएक तँ बिछानपर पड़िते ओंघा जाइए। जँ पुछबो करै छिऐ तँ ऐ गीतक पाँति ओइ गीतमे आ अोइ गीतक भास ऐ गीतमे कहए लगैत अछि। जइसँ किछु सीखि नहि पबैत छी।
मटुकलालकेँ ऐ दुआरे खुशी होइत जे बेटा-पुतोहुक रहैत बूढ़ि माए एते खटए से उचित नहि। मुदा कहबो केकरा करबै। हमरा कोनो मोजर दइए। दूटा धिया-पुता भेल। बेटिओ बि‍आह करै जोकर भऽ गेलि मुदा हमरा बच्चे बुझैए। हम की करु। तँए भगवान जे करै छथिन से नीके करै छथिन। भने आब भारी काज करै जोकर नहि रहलि। जे अपनो बुझत आ मनाही करबै तँ मानियो जाएत। मरैक डर केकरा नै होइ छै। तहूमे बूढ़-बुढ़ानुसकेँ। तँए मने-मन खुश। लोक हमरा तड़िपीबा बूझि बुड़िबक बुझए। तँए की हम बुड़िबक छी। कियो बुझैए तँ बुझऽ। जहिया बाबू मुइलाह तहिया जते भार कपारपर आएल, से कियो आन सम्हारि दइए। की अपने करै छी। पसिखन्ने जाइ छी तँ की लुच्चा-लम्पटक संग बैसि पीबै छी जे चोरी-छिनरपन्नी सीखब। या तँ असकरे बैसि कऽ पीबै छी या बड़का लोक लग बैसि कऽ पीबै छी। बड़का लोेकक मुँहमे सदिखन अमृत रहैत छैक। रमानन्द बाबूसँ गियनगर लोक ऐ इलाकामे दोसर के अछि। तिनकासँ हमरा दोस्ती अछि। हुनकर ओ बात हम गिरह बान्हि नेने छी जे जहिना कियो जनमैए, बढ़ि कऽ जुआन होइए। जुआनसँ बूढ़ भऽ मरि जाइत अछि। ई तँ दुनियाँक नियमे छिऐ। सभकेँ होएत। जे नहि बुझत ओ नहि बुझह। मुदा हम तँ ओएह मानै छी। फेर माए दिस नजरि घुरलै। मने-मन सोचए लगल जे माइयक पाएर टुटब कोनो अनहोनी थोड़े भेलै। ई तँ भगवानक लीले छि‍यनि‍। भगवान कखनो अपना सिर अजस लेताह। कोनो ने कोनो कारण भइये जाइत छैक। तइले हमरा दुखे किए हएत। जहिना एते दिन बीतल तहिना आगुओ बीतत। एते दिन जहिना माएकेँ, बेचि कऽ घुमैत काल, आगूसँ पथिया आनि दै छलिऐ तहिना आब घरोवालीकेँ आनि देबै। कियो हमरा देखा दिअ तँ जे एक्को दिन हमरा काजमे नागा भेल। गोसाँइ डूबै बेर, कतौ रही, कतवो पीबि कऽ बुत्त रही मुदा तँए की अपन काज कहियो छोड़ैत छी।
मटकुरिया परिवारक खानदानी जीविका चूनक। महिला प्रधान रोजगार। किएक तँ चूनक बिक्री अंगने-अंगने होइत। शुद्ध गमैआ व्यवसाय। ने चून बनबैक समान बाहरसँ अनै पड़ैत आ ने बेचैक असुविधा। गामक अधिकांश परिवारमे चूनक खर्च। कियो पान खाइत तँ कियो तमाकुल। दुनूमे चूनक जरुरत। चून बनाएबो कठिन नहि। डोका जरा कऽ बनैत। अन्नेक कोठी जकाँ डोको जरबैक कोठी होइत। मुदा अन्नक कोठीमे उपर छोट मुँह, अन्न ढारैक लेल बनाओल जाइत, जखन कि चूनक कोठीक उपरका भाग खुलल रहैत। निच्चाँक मुँह दुनूक एक्के रंग। कच्चो मालक कमी नहिये। किएक तँ गरीब-गुरबा लोक डोकाक मांस खाइत। मांसो पवित्र। किएक तँ डोका माटि खा जीवन-बसर करैत। डोकेक उपरका भागसँ चून बनैत।
चूनक बजारो गामे-घर। बिरले गोटे घरमे चूनक खर्च नहि होइत, नहि तँ सबहक घरमे होइत। पहिने मटकुरियाक दादी-परदादी चून बेचैत छलि, मुइलाक पछाति माए बेचए लागलि। सात दिनक सप्ताहमे पाँच दिन मखनी भौरी गामे-गामे करैत। एक-एक गाममे एक-एक दिनक पार बनौने। आठ दिन खर्चक हिसाबसँ सभ कियो चून कीनैत। सभ काज अन्दाजेसँ। अन्दाजेसँ चूनो दैत आ अन्दाजेसँ -धान-मड़ुआ- बेचो लैत। कोनो हरहर-खटखट नहि। किएक तँ मनक उड़ान छोट। ने कोठा-कोठीक इच्छा, ने सुख-भोगक। बान्हल मन तँए मात्र मनुक्ख बनि जीबै टाक इच्छा।
बजारोक प्रतियोगिता नहि। कारोबारमे छीना-झपटी नहि। किएक रहतै। जहिना जातिक शासन तहिना समाजक दंडात्मक रुखि। समाजमे निश्चित जाति निश्चित काजसँ बान्हल। एकक काज दोसर नहि करैत, तँए लक्कड़-झक्कड़ कम। जेना डोम, नौआ, धोबि, बरही कुम्हार इत्यादिक अपन-अपन जीविकाक धंघा। जे कड़ाइसँ पालन होइत। दुनू बिन्दुपर। कराओलो जाइत आ करबो करैत। सीमित क्षेत्रक बीच कारोबार। कियो अतिक्रमण नहि करैत। जँ कहीं-कतौ अतिक्रमण होइत तँ जातिक बीच ओकर फरिछौट होइत। तँए सभ अपन-अपन सीमाक भीतर रहैत। हँ, ई बात जरुर होइत जे सीमाक भीतर भैयारीक बँटबारासँ विभाजित होइत। मुदा मटकुरियाक परिवार एक पुरिखियाह, तँए एहेन प्रश्ने नहि। रोजगारोक लेल तहिना। सबहक अपन-अपन सीमित क्षेत्र। एक क्षेत्रमे दोसरक प्रवेश बर्जित। मुदा बेर-बेगरतामे एक-दोसराकेँ भार दऽ समाजक काजमे बाधा उपस्थिति नहि हुअए दैत।
चून बेचि मखनी सिर्फ परिवारे नहि चलबैत। महाजनियो करैत। किएक तँ सोलहो आना श्रमे पूँजी। मेहनत कऽ डोका एकत्रित करैत। डोका जरा कऽ चून बनबैत। आ अन्नसँ चून बदलैत। चूनक कीमतो अलग-अलग। जइठाम गरीब लोक चुनक कम कीमत दैत तहिठाम सुभ्यस्त किछु बेशिये दैत। पाँचे गोटेक परिवार मखनीक। कते खाएत। तँए फजिलाहा अन्न सवाइपर लगबैत। सेहो बिना लिखा-पढ़ीक। मुँह जवानी। जइसँ किछु उपरो होइत किछु बुड़ियो जाइत। पाँच गाममे मखनीक कारोबार। अगर जँ ऐ सँ आगू कारोबार बढ़बए चाहत तँ सम्हारले ने होइत। किएक तँ डोका जमा करैसँ चून बनबै धरि, दू दिन समए लगि जाइत। आठे दिनपर बिक्रीक बीट घुमैत। तँए पाँच गामसँ बेशी गाम सम्हारब कठिन।
टाँग अवाह होइते मखनी चून बेचब छोड़ि देलक। मुदा परिवारक रोजगार बन्न नहि भेलै। आब फुलिया बेचए लागलि। चिन्हार गाम चिन्हार गहिकी। तँए कतौ बाधा नहि। मुदा मखनीक महाजनी बुड़ि गेल। किएक तँ पाँचो गाममे पाँच गोटे ऐठाम अपन धान-मड़ुआ रखैत छलि, ओइठामसँ ओइ गाममे सवाइ लगबैत छलि। अपन आवाजाही बन्न भेने बिसरि गेलि। लेनिहारो बिसरि गेल। मुदा तइ लेल मखनीक मनमे दुख नहि भेलै। खुशिये भेलै। खुशी ऐ दुआरे भेलै जे जावत देहमे ताकत छलै ताबत अपनो, परिवारो आ दोसरोकेँ खुऔलौं। जिनगीक सार्थकता ऐ सँ बेशी की हएत। यएह ने धर्म छी। धर्ममय जिनगी बना बुढ़ाड़ी धरि जीवि लेब, ऐ सँ बेशी की चाही। तँए मने-मन खुशी।
समए आगू बढ़ल। कारोबारक रुपो बदलल। केना नहि बदलैत? समयोक तँ कोनो ठेकान नहि। कोनो साल अधिक बरखा होइत तँ कोनो साल रौदी। अधिक वर्षा भेने तँ अधिक डोकाक वृद्धि होइत। मुदा रौदीमे कमि जाइत। बिसबासु कारोबारक लेल वस्तुक उपलब्धि अनिवार्य। जे आब नहि भऽ पबैत। मुदा समयो तँ पाछू मुहे नहि आगू मुँहे ससरत। पत्थर-चून बजारमे आबि गेल। पर्याप्त वस्तुक उपलब्धि भऽ गेल। बाजारो बढ़ल। जइठाम उमरदार लोक तमाकुल-पान सेवन करैत छलाह तहिठाम आब स्कूल-कओलेजक विद्यार्थी सेहो करै लगल। ततबे नहि बाल-श्रमिक सेहो करए लगल। गामे-गाम चौक-चौराहा बनि गेल। जइसँ चाह-पान खेनिहारो बढ़ल। ओना तमाकुल-पानक अतिरिक्त पान-पराग, शिखर, रंग-विरंगक गुटका सेहो बढ़ि गेल। तेकर अतिरिक्त सार्वजनिक उत्सब सेहो बढ़ल। परिवारक मांगलिक काज बि‍आह, मूड़न, सराध, सेहो नमहर भेल। जइसँ पान-तमाकुलक खर्च बढ़ल। तँए चुनोक खर्च कते गुणा बढ़ि गेल।
मखनीक जगह फुलिया लेलक। ओना घरक रोजगार तँए फुलियोकेँ किछु सीखैक जरुरत नहि। सभ बुझले। सासुक रहितौं, कहियो-काल फुलियो बेचए जाइत छलि। किएक तँ जहि दिन मखनी नैहर जाइत तइ दिन फुलिये बेचैयो जाइत आ डोका आनि-आनि चूनो बनबैत। मुदा आब चून बनबैक रुपे बदलि गेल। लोको डोकाक चूनक बदला पत्थर-चून खाए लगल। ओना अखनो बुढ़-पुरान सभ पाथरक चूनकेँ घटिया बुझैत। जे तेजी डोकाक चूनमे होइत ओ पाथरक चूनमे नहि। मुदा हारल नटुआ की करत।
चून बेचैक रुपो बदलल। अखन धरि जे अंदाजसँ बिक्री होइत छल ओ आब तौल कऽ हुअए गल। बेचक जगह पाइ लेलक। ओना अन्नोक चलनि सोलहन्नी समाप्त नहिये भेलहेँ। आब ओतबे अन्न पड़ैत जे आन ठाम रखैक जरुरत फुलियाकेँ नहि होइत। पाइ बौगलीमे रखैत आ अन्न पथियामे। ओना कर्जखौक सेहो कमल। किएक तँ समएक आगू बढ़ने खाइ-पीबैक उपाए सेहो लोककेँ भेल। बोइन सेहो सुधरल। पाइक आमदनी किसानोकेँ हुअए लगल। लोकक पीढ़ियो बदलल। जइसँ विचारोमे बदलाव आएल।
समएक आगू बढ़ने कारोबार असान भेल। जइसँ मटकुरियाक परिवार सेहो आगू मुँहे ससरल। मुदा मटकुरिया जहिनाक तहिना रहि गेल। पहिने जे मटकुरिया माएक संग डोका अनैत छल ओ आब एक्के ठाम बजारसँ चून कीनि कऽ लऽ अबैत अछि। सुखल चून। सुखल चूनकेँ गील बनबैमे सेहो अधिक फीरिसानी नहिये।
फागुन मास। शिवरातिक तीनि दिन पछाति। धुरझार लगन चलैत। मेला जकाँ बरिआती चलैत। अंग्रेजीबाजा आ लाउडस्पीकरक अवाजसँ वायुमंडल दलमलित। आइ सबेरे -आन दिन चारि बजे- मटकुरिया पसिखाना विदा भेल। समइयो सोहनगर। झिहिर-झिहिर हवा चलैत। अकासमे जहिना चिड़ै गीत गबैत तहिना हवामे गाछ-बिरीछ नचैत। पसिखाना पहुँचते मटकुरियाकेँ पासी कहलक- “भैया, आइ निम्मन बसन्ती माल अछि, खजुरिया नहि ताड़क।
पासीक बात सुनि मटकुरियाक मनमे खुशी उपकल। मने-मन सोचलक जे दू गिलास आरो बेसी चढ़ा देबै, बाजल- “तब तँ आइ जतरा नीक बनल अछि।
पासी- “अहाँ तँ हमर पुरान अपेछित छी भैया, तँए दू गिलास ओहिना मंगनिये पिआएब।
दू गिलास मंगनी सुनि मटकुरिया सोचलक जे पहिल दिन छिऐ तँए आन दिनसँ कम केना लेब? यात्रा तँ पहिलुके दिन नीक होइ छै। बेचाराकेँ सगुन केना दुरि करबै। मुस्की दैत कहलक- “बड़बढ़ियाँ। अपनो मिला कऽ नेने आबह।
वसन्ती ताड़ी, पीबिते मटकुरियाकेँ रंग चढ़ए लगल। ताड़ी पीबि मटकुरिया सोझे, पसिखन्नेसँ, पत्नीकेँ माथ परक पथिया अानए दछिनमुँहे बिदा भेल। गामक दछिनवरिया सीमापर ठाढ़ भऽ आगू तकलक। जते दूर नजरि गेलै तइ बीच कतौ पत्नीकेँ अबैत नहि देखलक। कनी-काल पाखरिक गाछ लग ठाढ़ भऽ सोचए लगला जे आगू बढ़ी वा एतै रुकि जाइ। अंग्रेजी बाजा आ लाउडस्पीकरक फिल्मी गीत कानमे पैसि-पैसि मनकेँ डोलबैत। मन पड़लै अपन बि‍आह। बिआह मन पड़िते फुलियाक रूप आगूमे ठाढ़ भऽ गेलै। गुनधुन करैत सोचलक जे ऐठाम ठाढ़ भऽ कऽ समए बिताएब, तहिसँ नीक जे आरो थोड़े बढ़ि जाइ। आगू बढ़ल। किछु दूर आगू बढ़लापर पत्नीकेँ अगिला गाम टपि अबैत देखलक। बाधो कोनो नमहर नहि। फुलियाक नजरि सेहो मटकुरियापर पड़ल। दुनूक डेग तेज भेल। तेज होइक दुनूक दू कारण। मटकुरियाक मनमे जे जते जल्दी लगमे पहुँचब तते जल्दी भार उतरतै। जखन कि पसीनासँ नहाएल फुलियाक मनमे शान्ति। शान्ति अबिते पथिया हल्लुक लगए लगलै। दुनूक मनमे कतेको नव-नव विचार अाबए लगलै।
लग अबिते मटकुरिया धोतीक ढट्ठा सरिऔलक। किएक तँ माथपर भारी एलासँ डाँड़क धोती डाँड़मे बैसि जाइत। ढट्ठा सरिया गमछाक मुरेठा बान्हि दुनू हाथसँ पकड़ि फुलियाक माथ परक पथिया अपना माथपर लेलक। माथपर लैते किछु कहैक मन मटकुरियाकेँ भेल। मुदा किछु बाजल नहि। किएक तँ फेर मनमे एलै जे बेचारी थाकल अछि, तँए मन अगिआइल होएत। हो ने हो किछु करुआएल बात बाजि दिअए। जखन कि एकाएक माथ परक भार उतरलासँ फुलियाक मन हल्लुक भेल। मुदा ओहो किछु बाजलि‍ नहि, ओहिना देह कठिआएल। आगू-पाछू दुनू बेकती घर दिस बिदा भेल। जते आगू बढ़ैत तते फुलियाक मन हल्लुक होइत आ मटकुरियाक मन भारी। पत्नीसँ किछु कहैक विचार मटकुरियामे कमए लगल। जना मुँह खोललासँ भारी बढ़त। मुदा जना-जना आगू बढ़ैत तना-तना फुलियाक देहो-हाथ सोझ होइत आ पतिकेँ किछु कहैक मन सेहो होइत। मुदा किछु बजैत नहि। किएक तँ पति-पत्नीक बीच गप्पक आनंद तखन होइत जखन दुनूक मन सम -ने बेसी सुख आ ने बेसी दुख- होइत। से अखन धरि दुनूक –-मटकुरिया आ फुलियाक- बीच नहि भेल। एते काल फुलियाक माथपर पथिया रहने मन पीताएल तँ आब मटकुरियाक हुअए लगल। ने फुलिया पतिकेँ किछु कहैत आ ने मटकुरिया पत्नीकेँ। मुदा बीच रस्ता बाध अबैत-अबैत दुनूक मुँहसँ हँसी निकलल। पथिया नेनहि मटकुरिया पाछू घुमि कऽ तकलक तँ देखलक जे फुलिया मुस्किया रहल अछि। फुलियोक नजरि मटकुरियाकेँ मुस्किआइत देखलक। एक टकसँ एक-दोसरपर आँखि गरौने अपन जिनगी देखए लगल।