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Thursday, June 7, 2012

रि‍क्‍शाबला :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल


“ओ रिक्शा, ओ रिक्शा।” - कने फड़िक्केसँ जीबछ जोरसँ बाजल। हाथमे बम्बैया बैग, जिन्स पेन्ट आ शर्ट पहीरिने, दहिना हाथमे चौड़गर घड़ी। फुल जुत्ता, मौजा सेहो लगौने। बम्बैये हिप्पी कट केश, बुच्चा मोछ आ आँखिपर चश्मा। बचनू रिक्शाबला अपन ताशक संगीक संग ताश खेलाइत। ताशो ओहिना नहि खेलैत, एक सेटपर चारु गोटेक चाह-पान खर्च, हरलाहा पार्टीकेँ देमए पड़ैत। पाँचटा लाल बचनूक जोड़ाकेँ। तेँ एक्केटा सेठ होइमे बाकी। एकटा लाल हएत, चाह-पानक जोगार लगत। तेँ एकाग्र भऽ बचनू लालक पाछू दिमाग लगौने। ताशक चौखड़ी लग आबि जीवछ दुइभेपर बैग रखि रुमालसँ मुँह लग हौंकए लगल। कने काल हौंकि रिक्शाबलाकेँ चड़िअबैत कहलक- “हौ भाय, हमरा बहुत दूर जाइक अछि, झब दे चलह?”
ताश परसँ नजरि उठा, जीबछ दिस देखि बचनू बाजल- “भाय, केहेन सुन्दर ठंढ़ा छै, कनी सुसता लाए। तोरो देखै छिअह जे पसीनासँ तड़-बत्तर भेल छह। हमरो एक्केटा लाल बाकी अछि, दू-तीन खेपमे भइये जाएत। अगर जँ अपन लाल नहियो हएत आ विरोधियेकेँ दूटा कारी भऽ जेतै, तैयो जीत हेबे करत।
बचनूक बात सुनि जीबछ शर्टो आ गंजिओ निकालि कऽ रौदमे पसारि देलक। आसीन मास। तीख रौद। तइ परसँ गुमकी सेहो। रेलबे स्टेशनसँ जीबछ पएरे आएल। किएक तँ स्टेशनक बगलेमे तेहेन खच्चा बाढ़िमे बनि गेल जे रिक्शो आ टमटमोक रास्ता बन्न भऽ गेलै। पएरे लोक कहुना कऽ थाल-पानिमे टपैत। बाढ़ि तँ तेहेन आएल छल जे जँ स्टेशन ऊँचगर जमीनपर नहि रहैत तँ ओहो भसि कऽ कतए-कहाँ चलि जाइत। मुदा तैयो स्टेशनक पूबरिया गुमती, पुल आ आध किलोमीटर रेलबे लाइन दहाइये गेल। रेलवेक दछिन तेहेन मोइन फोड़ि देलक जे गाड़िओ बन्न भऽ गेल। डेढ़ मासमे पुलो बनल आ गाड़ियो चलब शुरू भेल।
गाममे रिक्शा बचनुएटा केँ। जइसँ कोनो तरहक प्रतियोगिता नहि। प्रतियोगिता तँ शहर-बजारमे होइत, जइठाम सैकड़ो-हजारो रिक्शा रहैत। अनेरो रिक्शाबला सभ रिक्शापर बैसि, इमहरसँ उमहर घुमबैत आ बजैत- “कोट-कचहरी......बैंक.......पोस्ट आॅफिस....... कओलेज.... स्कूल..... स्टेशन..... बस स्टेण्ड...... अस्पताल.... बड़ा बजार..... सिनेमा चौक...... डाकबंगला..... भगतसिंह चौक..... आजाद चौक।
मुदा से तँ गाममे नहि। मुदा तेँ कि गामक रिक्शाबलाकेँ कमाइ नहि होइत। खूब होइत। एक तँ गामक कच्ची रस्ता, तइ परसँ जहाँ-तहाँ टुटलो आ गहुम पटौनिहार सभ कटनौ। एहेन सड़कमे दोसर कोन इंजनबला सवारी सकत। तेँ गामक सवारी रिक्शा। जइसँ गामक बेटी-पुतोहुक विदागरी निमहैत। धन्यवाद तँ रिक्शेबलाकेँ दी जे बेचारा छातीपर भार उठा, कखनो चढ़ि कऽ तँ कखनो उतरि कऽ पार लगबैत। कठिन मेहनतक पाइ कमाइत।
अखन धरि ताशक खेल नहि फड़िआइल। किएक तँ कखनो लाल कमि जाए तँ कखनो कारी। अगुताइत जीबछ बाजल- “भाय, ताश नै फड़िऐतह। बहुत दुरस्त जाइक अछि। झब दे चलह। नञि तँ अन्हार भेने तोरो दिक्कत हेतह आ हमरो अबेर भऽ जाएत। कहुना-कहुना तँ ऐठामसँ सुग्गापट्टी पाँच कोस हएत।
बचनू- “हँ, से तँ पाँच कोससँ कम नहिये हएत। मुदा तइसँ की? ई की कोनो शहर-बजार छिऐ जे रातिक कोन बात जे दिने देखार पौकेटमारी, डकैती, अपहरण होइ छै। ने रस्तामे भीड़-भड़क्का आ ने कोनो चीजक डर। निचेनसँ जाएब।
गामक बीचमे चौबट्टी। जइठाम पान-सातटा छोट-छोट दोकान। जइसँ गामोक आ आनो गामक लोक चौक कहए लगल। चौकक पछबरिया कोनपर एकटा खूब झमटगर पाखरिक गाछ। जइपर हजारो चिड़ैक खोँता। दिन भरि चिड़ै सभ चराउर करए बाहर जाइत आ गोसाँइ निच्चा होइते पतिआनी लगा-लगा गाछपर अबए लगैत। कतेको रंगक चिड़ै तेँ सभ जातिक चिड़ै अपन-अपन संगोर बना-बना अबैत। ततबे नहि, गाछक डारियो बाँटि नेने अछि। एक जातिक चिड़ै एक डारिपर खोँता बनौने अछि। तेँ एक जातिक चिड़ैसँ दोसर जातिक चिड़ैक बीच ने कहा-कही होइत आ ने झगड़ा-झंझट। मुदा अपनामे एक जातिक बीच नीक-अधलाक गप-सप्‍प जरुर होइत। कथा-कुटुमैतीसँ लऽ कऽ रामायण-महाभारतक किस्सा-पिहानी जरुर होइत। पान-पुनक चरचा सेहो करैत। अधला काज केनिहारकेँ डाँटो-फटकार दैत आ जुरमिनो करैत। ओइ गाछक निच्चाँमे बाटो-बटोही रौदमे ठंढ़ाइत आ पाि‍न-बुनीमे सेहो जान बँचबैत। ताशक चौखड़ी सेहो जमैत।
बचनुक बात सुनि जीबछ पेन्टक पैछला पौकेटसँ सिगरेटक डिब्बा आ सलाइ निकाललक। एकटा सिगरेट अपनो लेलक आ एकटा बचनुओकेँ देलक। दुनू गोटे सिगरेट लगा, रिक्शापर चढ़ि बिदा भेल। कनिये आगू बढ़ल आकि बचनू जीबछकेँ पूछलक- “भाय तूँ बम्बैमे रहै छह?”
“हँ
“मन तँ हमरो बहु दिनसँ होइए मुदा पलखतिये ने होइए जे जाएब।
“ओइ ठीन मन तँ खूब लगैत हेतह?”
“एँेह भाय मन। की कहबह? जखैनिये डेरासँ निकलबह आकि रंग-बिरंगक छौँड़ी सभकेँ देखबहक। उमेरगरो सभ जे कपड़ा लगौने रहतह से देखबहक तँ बूझि पड़तह जे कुमारिये अछि। मुदा छउरो सभ की ओइसँ कम अछि। एक तँ ओहिना जे छउरी सभ दामी-दामी कपड़ा पहीनने अछि आ सौंसे देह झक-झक करै छै। तइपरसँ छउरो सभ करिक्का चश्मा पहीन लेतह आ निङहारि-निङहारि देखैत रहतह। चश्मो की कोनो एक्की-दुक्की रहै छै। जखैनिये आँखिमे लगेबह आकि देहपर कपड़ा बुझिये ने पड़तह।
“ओहन चश्मा हमरा सभ दिस कहाँ छै, हौ।

“ऐँह, ओइ ठीन विदेशी चश्मा सभ बिकाइ छै की ने। देहातमे ओहन चश्मा के कीनत।
चौकसँ कनिये उत्तर एकटा ताड़ीक दोकान। चारि-पाँच कट्ठाक खजुरबोनी। बीच-बीचमे ताड़क गाछ सेहो। उत्तर-दछिने रास्ता। पछबारि भाग ताड़ीक दोकान। ताड़ीक दोकान देखि जीबछ बचनुक पीठमे आंगुरसँ इशारा करैत रोकैले कहलक। बचनुक मनमे भेलै जे भरिसक पेशाब करत। रिक्शा रोकि उतरि गेल। जीबछ बाजल- “भाय, ताड़ी दोकान देखै छिऐ। चलह दू घोंट पीबि लेब, तखन चलब। हमहीं पाइयो देबै।
ताड़ीक नाम सुनि बचनू कहलक- “ओना ताड़ी हमहूँ पीबै छी मुदा ताड़ी पीबि कऽ ने रिक्शा चलबै छी आ ने ताड़ी पीनिहारकेँ रिक्शापर चढ़बै छी। तेँ अखन ताड़ी-दारु बन्न करह। जखन घरपर पहुँचबह तखैन जे मन हुअह से करिहह।
“भाय, ओतऽ भेटत की नै भेटत, अखन तँ आगूमे अछि।
“तब अखन नै जाह। ताड़ी कीनि कऽ नेने चलह। गामेपर दुनू गोटे पीबि लेब आ रातिमे रहि जइहह।
“ऐ ठीन कतऽ रहब?”
“से की हमरा घर-दुआर नै अछि। ओतै रहि कऽ राति बीता लिहह। भोरे पहुँचा देबह।
“अच्छा, ठीक छै, चलह।
दुनू गोटे ताड़ी दोकान दिस बढ़ल। दोकान लग पहुँचते जीबछ घैलक-घैल ताड़ी फेनाइत देखलक। घैलक पतिआनी देखि मने-मन सोचए लगल जे हमरा होइ छलए जे शहरे-बजारक लोक ताड़ी पीबैए। मुदा से नहि गामो-घरक लोक खूब पीबैए। पच्चीस-तीस गोटे दोकानक भीतरो आ बाहरो ताड़क पातक चटाइपर बैसि ताड़िओ पीबैत आ चखनो खाइत। कियो-कियो असकरे पीबैत तँ कियो-कियो दू-दू, तीन-तीन, चारि-चारि गोटेक संगोरमे। कियो खिस्सा कहैत तँ कियो गीत गबैत। कियो अन्हागाहिस गारियो पढ़ैत। सभ उमंगमे। जहिना ताड़ीक फेन उधिआइत तहिना सबहक मन। ताड़ीक खटाइन गंध लगिते जीबछकेँ होए जे कखैन दू गिलास चढ़ा दिऐ।
ताड़ी दोकानसँ कने हटि दूटा बुढ़िया चखनाक दोकान पसारने। एकटा दोकानमे मुरही, घुघनी बदामक कचड़ी आ दोसरमे चारि पाँच रंगक माछक तरुआ। ओंगरिक इशारासँ मझोलका डाबा देखबैत जीबछ बचनूकेँ कहलक- “भाय, दुइये गोरे पीनिहार छी, तेँ वएह डाबा लऽ लाए।
बचनू- “पहिने दाम पूछि लहक?”
डाबाक कान पकड़ि जीबछ पासीकेँ दाम पुछलक। तोड़-जोड़ करैत पैंतीस रुपैयामे पटि गेलै। पेन्टक जेबीसँ नमरी निकालि ओ जीबछकेँ देलक। नमरी पकड़ैत दोकानदार कहलकै- “तारिये टाक दाम कटै छिअह। डाबा घुरा दिहह।
“बड़बढ़ियाँकहि बचनू डाबा उठा लेलक। डाबाकेँ चखना दोकानक आगूमे रखि बचनू मने-मन सोचए लगल जे औझुका तँ कमाइयो ने भेल। धिया-पुता की खाएत? से नञि तँ तेना कऽ मुरही-कचड़ी कीनि ली जे सभ तुर खाएब। जेहने झुर कऽ कऽ कचड़ी बनौने तेहने माछक कुटिया। एकदम लाल-बुन्द। माछक कुटिया देखि जीबछक मुँहमे पानि अबए लगल। मन चटपटाए लगल। बचनूकेँ कहलक- “भाय, कते चखना लेबह?”
मने-मन बचनू हिसाब जोड़ए लगल। दू-दूटा कचड़ी आ दू-दूटा माछ दुनू बच्चाले आ अपना सभले चारि-चारिटा। किएक तँ गरम चीज होइ छै, तेँ बेसी खराब करतै। बाजल- “भाय, एक किलो मुरही, एक किलो घुघनी, सोलहटा कचड़ी आ सोलहटा माछक कुटिया लऽ लाए।
सएह केलक। ताड़ीक डाबा उठा जीबछ विदा भेल। रिक्शा लग आबि बचनू चखनाक मोटरी सेहो जीबछेकेँ दऽ देलक।
चौकक रस्ता छोड़ि बचनू घर परक रस्ता धेलक। लगेमे घर। दुइयेटा घर बचनूकेँ। रिक्शा रखैले एकचारी भनसे घरक पँजरामे देने। एकटा घरमे भानसो करै आ जरनो-काठी रखै। दोसरमे सभतुर सुतबो करै आ चीजो-बौस रखै। अपना दरबज्जा नहि। मुदा घरक आगूमे धुर दसेक परती, जइपर सरकारी चबूतरा बनल। घर लग अबिते बचनू रिक्शा ठाढ़ कऽ आंगन बाढ़नि अनए गेल। बचनूकेँ देखि घरवाली कहलकै- “आइ जे भाड़ा नै कमेलौं, तँ राति खएब की? अपने दुनू गोरे तँ ओहुना सूति रहब मुदा बच्चा सभ कना रहत?”
बिना किछु उत्तर देनहि बचनू बारहनि लऽ अंगनासँ निकलि गेल। चबुतराकेँ देहरा कऽ बहारलक। चबुतराक बनाबट सुन्दर, तेँ बहारिते चमकए लगल। चबुतराक चमकी देखि जीबछ बाजल- “भाय, जेहने मजगूत चबुतरा छह तेहने सुन्दर। संगमरमर जकाँ चमकै छह।
जीबछक बात सुनि बचनुकेँ ओ दिन मन पड़लै जइ दिन ओ ठीकेदारकेँ गरिऔने रहए। मुस्कुराइत कहलकै- “भाय, ओहिना एहेन सुन्दर बनल अछि। जे ठीकेदार बनबाबैक ठीकेदारी नेने रहए ओ नमरी चोर। तीन नम्बर ईंटा आ कोसीकातक बाउलसँ बनबए चाहैत रहए। हम गामपर नै रही। जखन एलौं तँ देखलिऐ। देखिते सौंसे देह आगि लगि गेल। मुदा ऐठाम रहए क्यो ने। दोसर दिन नाओं कोड़ए ठीकेदारो आ जनो एलै। हमरा तँ गरमी चढ़ले रहए। जखने कोदारि लगौलक आकि जऽनक हाथसँ कोदारि छीनि ठीकेदारकेँ गरिअबै लगलौं। जहाँ गारि पढ़लिऐ आकि ठीकेदारो गहुमन साँप जकाँ हुहुआ कऽ उठल। जहाँ ओ जोरसँ बाजल आकि हमहूँ गरिअबिते दुनू हाथे कोदारिक बेंट पकड़ि कहलिऐ, सार नाओं लइसँ पहिने तोरे काटि देबह। मुदा सभ पकड़ि लेलक। डरे ठीकेदारो थर-थर कँपए लगल। तखन जा कऽ एक नम्मर सभ किछु -ईंटा, सिमटी, बालु आनि बनौलक।
“जीबछ बाजल- “बाह।
बचनू- “कनी उपर आबि कऽ देखहक जे की सभ बनबौने छी। देखहक ई खेलाइ लऽ पच्चीसी घर छी, कौड़ीसँ खेलाएल जाइए। मुदा ई खेल समैया छी। एकर चलती सिर्फ आसिने टामे रहैए। कोजगरा दिन तँ लोक भरि राति खेलते रहैए।
दोसरकेँ देखबैत- “ई मुगल पैठानक घर छी। हमरा गाममे लोक एकरा मुगल-पैठान कहै छै मुदा आन-आन गाममे एकरा कौआ-ठुट्ठी कहै छै। गोटीसँ खेलाइल जाइ अए।
तेसर घर देखबैत- “ई बच्चा सबहक छिऐ। एकरा चैरखी-चैरखी घर कहै अए। झुटकासँ खेलल जाइए।
जीबछ- हौ भाय, तू तँ बड़ खेलौड़िया बूझि पड़ै छह।
बचनू- “हौ, जिनगीमे आउर छै की? खाइत-पीबैत, हँसी-चौल करैत बिता ली। सभ दिन कमेनाइ, सभ दिन खेनाइ। कोनो हर-हर, खट-खट नै। धिया-पुताले तँ हम अपने इस्कूल खोलि देने छिऐ। खेती-पथारीक काजसँ लऽ कऽ रिक्शा चलौनाइ, ईंटा बनौनाइ सभ लूरि हमरा अछि। धिया-पुता तँ देखिये कऽ सीखि लेत।
ओना जीबछ बचनुक गप सुनैत मुदा मन ताड़ीक खटाइन गंधपर अँटकल। होइ जे कखन दू गिलास चढ़ाएब। नै तँ कमसँ कम आंगुरमे भिड़ा नाकोक दुनू पूरामे लगा ली। जीबछकेँ बचनू कहलक- “भाय, ताबे तूँ सभ कुछ सरिआबह, हम घरमे रिक्शा रखि दइ छिऐ। काजसँ निचेन भऽ जाएब।
जीबछ सभ समान सरिअबए लगल। रिक्शाकेँ गुरकौने बचनु एकचारीमे
रखि आंगन जा दुनू बच्चो आ पत्नियोकेँ कहलक- “दुनू बाटिओ आ दुनू छिपलियो नेने चलू।
कहि बचनू आगू बढ़ि गेल। पत्निक मन खुशीसँ झुमि उठल। दुनू बच्चा दुनू बाटी नेने आगू बढ़ल। दुनू छिपली नेने पत्नी डेढ़िया लग ठाढ़ भऽ मुँहपर नुआ नेने कनडेरिये आँखिये दुनूकेँ देखैत। अपना दुनू गोटेले बचनू चारि-चारि पीस माछ, चारि-चारि कचड़ी आ अधा किलो करीब मुरही-घुघनी मिला कऽ रखि, दुनू बच्चाकेँ एक-एक कचड़ी, एक-एक माछक कुटिया आ दू-दू मुट्ठी मुरही-घुघनी मिला कऽ देलक। दुनू बच्चा देखि कऽ चपचपा गेल। अपन-अपन बाटी वामा हाथे उठा दहिना हाथे खाइत बिदा भेल। माए लग पहुँचि‍ दुनू बच्चा अपन-अपन बाटी देखए देलक। बाटीमे घुघनीक मिरचाइक टुकड़ी आ कचड़ीमे सटल मिरचाइकेँ देखि माए कहलक- “बौआ, मिरचाइ बीछि कऽ रखि दिहए। तोरा सभकेँ करु लगतौ।
तइ बीच बचनू गमछाक एक भागमे मुरही-घुघनीकेँ मिला, चारि-चारिटा कचड़ी आ चारि-चारिटा माछक कुटिया फुटा, दुनू गोटेले रखलक। चबुतरे परसँ बचनू घरवालीकेँ सोर पाड़ि कहलक- “ई सभ लऽ जाउ।
अदहा मुँह झपने बचनुक पत्नी सरधा चबुतरापर पहुँचि‍ दुनू छिपली बचनुक आगूमे रखि देलक। एकटा छिपलीमे मुरही कचड़ी आ दोसरमे घुघनी-माछ बचनू दऽ देलक। झुर माछक तरुआ देखि सरधाक मन हँसए लगल। मनमे एलै जे कल्हुका जलखै तकक ओरियान भऽ गेल। दुनू छिपली तरा-उपरी रखि दुनू हाथसँ पकड़ि आंगन बिदा भेल।
दुनू गोटे –जीबछ आ बचनू- दुनू भाग बैसि बीचमे ताड़ीक डाबा, गिलास आ चखना रखलक। दुनू गिलासमे जीबछ ताड़ी ढारि, आगूमे रखि आँखि मुनि, ठोर पटपटबैत मंत्र पढ़ए लगल। कनी काल मंत्र पढ़ि, आँखि खोलि तीन बेर ताड़ीमे आंगुर डुबा निच्चाँमे झाड़ि बाजल- “हुअह भाय, आब पीबह।
छगाएल दुनू, तेँ एक लगाइते तीन-तीन गिलास पीबि लेलक। मन शान्त भेलै। मन शान्त होइते जीबछ सिगरेट निकालि एकटा अपनो लेलक आ एकटा बचनुओक हाथमे देलक। दुनू गोटे सिगरेट धरा पीबए लगल। सिगरेट पीबैत-पीबैत दुनूकेँ निशाँ चढ़ए लगल। निशाँ चढ़िते गप-सप्‍प करैक मन दुनू गोटेकेँ हुअए लगलै। एक मुट्ठी मुरही आ एक टुकड़ी माछ तोड़ि जीबछ मुँहमे लेलक। बचनुओ लेलक। मुँह महक घांेटि जीबछ बाजल- “भाय, तोरा रिक्शा चला कऽ परिवार चलि जाइ छह?”
कचड़ी तोड़ि मुँहमे लैत बचनू उत्तर देलक- “किअए ने चलत। हमरा की कोनो कोठा बनबैक अछि जे गुजर नै चलत। तहूमे की हम रिक्शा बारहो मास थोड़बे चलबै छी। भरि बरसात चलबै छी। जहाँ बरखा बन्न भेलै आकि महाकान्त भाइयक चिमनीमे काज करै छी।
“नोकरियो करै छह?”
“एहेन नोकरी तँ भगवान सभकेँ देथुन।
अलबेला लोक छथि महाकान्त भाय। हुनकर खाली पूँजी टा छि‍यनि‍। असली कारबारी हम दू गोटे छी। सरूप मुनसी आ हम। पजेबाक खरीद-बिकरीसँ लऽ कऽ कोइला मंगौनाइ, ओकर हिसाब बारी केनाइ हुनकर काज छि‍यनि‍। आ हमर काज पथेरीक देखभाल केनाइ, समएपर ओकरा दमकल चला, खाधिमे पानि देनाइसँ लऽ कऽ बजारसँ समान कीनि कऽ अननाइ आ चिमनी परसँ घर-परक दौड़-बरहा केनाइ रहैए।
“तब तँ खूब कमाइ होइत हेतह?”
“कमाइ जँ करए चाही तँ ठीके खूब हएत। मुदा से नै करै छी। एक सए रुपैया रोज होइए। ओ घरवालीक हाथमे दऽ दै छिऐ। बाकी खेलौं-पीलांै। किएक तँ नजाइज पाइ जँ घरमे देबै तँ ओइसँ भाभन्स नै हएत।
दुनू गोटे डबो भरि ताड़िओ आ चखनो खा-पीबि गेल। एक दिस निशाँसँ दुनूक देह भसिआइत, दोसर दिस जोरसँ पेशाब लगि गेलै। उठैक मने ने होइ। मुदा पेशाबो जोेरे होइत जाइत। दुनू गोटे उठि कऽ पेशाब करै गेल। जाबे पेशाब करै लऽ बैसै ताबे बूझि पडै़ जे कपड़ेमे भऽ जाएत। मुदा कहुना-कहुना कऽ सम्हारि पेशाब करए बैसल। पेशाब बन्ने ने होइ। बड़ी कालक बाद पेशाबो बन्न भेलै आ भक्को खुजलै।
चबुतरापर दुनू गोटे आबि कऽ बैसल। जीबछ कहलकै- “भाय, हमरा डान्स करैक मन होइए।
जीबछक बात सुनि बचनू पल्था मारि बैसि, ठेहुनपर दुनू हाथसँ बजबए लगल। मुदा ओइसँ अबाज नै निकलै। अबाज निकलै मुँहसँ। जहिना-जहिना मुँहसँ बोल निकलइ तहिना-तहिना दुनू ठेहुनपर हाथ चलबै। तइ बीच दुनू बच्चो चबुतरापर आबि थोपड़ी बजबए लगल। अंगनाक मुहथरिपर सरधा बैसि देखए लगली। जीबछ डान्स करए लगल। थोड़े कालक बाद बचनुक मुँह दुखा गेलै। मुदा जीबछ डान्स करिते। दुनू बच्चो थोपड़ी बजबिते। जहिना बाढ़िक रेतपर हेलनिहार चीत गरे सूति कतौसँ कतौ भसिया कऽ चलि जाइत तहिना बैसल बैसल सरधाक मन भसिआइत। तइ बीच बचनु उठि कऽ आंगन गेल। घैलची परक घैलसँ पानि फेकि नेने आएल। उल्टा कऽ घैल रखि, हाथमे औँठी रहबे करै, दुनू हाथे घैलक पेनपर बजबए लगल। लाजबाब बाजा। नचैत-बजबैत दुनू गोटे थाकि गेल। सूति रहल।
भोर होइते दुनू गोटे उठि, मुँह-हाथ धोए चलि देलक।
ऐबेर आसिन अपन चालि बदलि लेलक। किएक तँ आन साल अधहा आसिनक उपरान्त हथिया नक्षत्र अबैत छल। से ऐबेर नञि भेलै। पहिने हथिये चढ़ल। दू दिन हथिया बितलाक बाद आसिन चढ़ल। ओना बूढ़-बुढ़ानुसक कहब छन्‍हि‍ जे दुर्गापूजामे हथिया पड़िते अछि, मुदा से नञि भेलै। आसिनक इजोरिया पखक परीबकेँ दुर्गा पूजा शुरू होइत। ऐबेर अमबसिये दिन हथिया चलि गेल। तहिना बरखोक भेल। जइ दिन आसिन चढ़ल ओइ दिन घनघनौआ बरखा भेल आ तेकर बाद फुहियो ने पड़ल। झाँटक कोन गप। हथियाक लेल ओरिआओल जरनो-काठी आ अन्नो-पानि सबहक घरमे रहिये गेल। मुदा तैयो किसान सबहक मनमे खुशी नै कमल। किएक तँ जँ हथियामे धानक खेतमे ठेंगाक हूर गरत तँ धान हेबे करत। मुदा किछु गोटेक मनमे शंका जरुर होइ जे निचला खेतमे ने पानि लगल अछि मुदा उपरका खेतक धान केना फुटत? किएक तँ उपरका खेतक पानि टघरि कऽ निचला खेतमे चलि गेल। किछु खेतक पानि काँकोड़क बोहरि देने तँ किछु खेतक पानि मूसक बिल देने बहि गेल। जइसँ बरखाक तेसरे दिन उपरका खेत सभ सुखि गेल। ओना दसमीक मेलो देखिनिहारक आ मेलामे दोकानो-केनिहारक मनमे खुशी। किएक तँ रुख-सुखमे नाचो-तमाशा जमत आ देखिनिहारोक भीड़ जुटत। ओना पैछला सालक सभ छगाएल। किएक तँ जइ दिन सतमी मेला शुरू भेल ओइ दिन तेहेन झाँट आ पानि भेल जे मेलाक चुहचुहिये चलि गेलै।
सुखाड़ समए रहने महाकान्त ओछाइनेपर पड़ल-पड़ल सोचए लगल। जहियासँ चिमनी शुरू केलौं तहियासँ एहेन समए नहि पकड़ाएल छल। आन साल दिआरीक पछाति चिमनीक काजमे हाथ लगबै छलौं, से ऐबेर भगवान तकलनि। कहुना-कहुना तँ दिआरी अबैत-अबैत दू खेप भट्ठा जरुर लगि जाएत। सरकारोक योजना नीक पकड़ाएल। एक दिस खरन्जाक स्कीम तँ दोसर दिस इन्दिरा आबासक घर। ततबे नहि स्कूल आ अस्पताल सेहो बनत। ई सभ तँ अपने गामटा मे बनत से नहि, आनो-आन गाममे बनत। सालो भरि ईंटाक महगीये रहत। ओते पुराइये ने पाएब। एते बात मनमे अबिते मुँहसँ हँसी निकलल। तइकाल पत्नी रागिनी बेड टी नेने आबि चुप-चाप सिरमा दिस ठाढ़ भऽ पतिकेँ मुस्कुराइत देखलनि। पतिक मुस्की देखि रागिनी मने-मन सोचए लागलि जे की बात छिऐ जे ओछाइनेपर पड़ल-पड़ल मुस्करा रहल छथि। मुदा बिना किछु बजनहि टेबुलपर चाह रखि, ओरिया कऽ नाक पकड़ि डोला देलक। नाक डोलबिते महाकान्त उठि कऽ बैसि रहल। आगूमे रागिनीकेँ ठाढ़ देखि चौबन्निया मुस्की दैत आँखिक इशारासँ पलंगपर बइसैले रागिनीकेँ कहलक। पतिक मूड देखि रागिनी ससरिये जाएब नीक बुझलक। 
महाकान्त आ रागिनी, संगे-संग कओलेजमे पढ़ने। जहिये दुनू गोटे बी.ए.मे पढ़ैत छल तहिये दुनूक बीच प्रेम भऽ गेल। दुनू सम्पन्न परिवारक। ओना पढ़ैमे दुनू ओते नीक नहि जते दुनूक रिजल्ट नीक होए। दुनूकेँ मैट्रिको आ इन्टरोमे फस्ट डिविजन भेल रहै। तेकर कारण मेहनत नहि पैरबी रहए। नीक रिजल्टक दुआरे संगियो-साथीक बीच आ शिक्षकोक बीच दुनूक आदर होइ। दुनूक बीच संबंध बी.ए. आनर्सक क्लासमे भेलै। किएक तँ आनर्समे कम विद्यार्थी रहने गप-सप्‍प करैक अधिक समए भेटै। दुनूक बीच संबंध गप-सपसँ शुरू भेल। तेकर बाद किताबक लाथे डेरोमे एनाइ-गेनाइ शुरू भेल। संबंध बढ़िते गेलै। संगे बजार बुलनाइ, किताब-कापी खरीदनाइसँ लऽ कऽ कपड़ा, जुत्ता-चप्पल खरीदनाइ धरि संगे हुअए लगलै। सिनेमा तँ मेटनियो शोमे देखए लगल। जइसँ आंगिक संबंध सेहो शुरूह भऽ गेलै। एकटा डबल रुम लऽ दुनू गोटे डेरो एकठाम कऽ लेलक। दुनूक बीचक संबंधक चरचा सिर्फ विद्यार्थिये आ शिक्षके धरि नहि रहि दुनूक पिता धरि पहुँचि गेलै। मुदा दुनूक पिताक दू विचार। तेँ बुझियो कऽ दुनू अनठा देलक। महाकान्तक पिता सुधीर जुआन-जहानक खेल बुझैत तँ रागिनीक पिता रमानन्द सम्पन्न परिवार आ पढ़ल-लिखल लड़का बूझि बेटीक भार उतरब बुझैत।
एम.ए. पास केलापर दुनूक बि‍आह भऽ गेलै। सुधीरक परिवार एक पुरखियाह। अपनो भैयारीमे असकरे आ बेटो तहिना। ओना बेटी चारिटा, जे सासुर बसैत। परिवारक काजसँ महाकान्तकेँ कम्मे सरोकार। तेँ भरि-भरि दिन चौखड़ी लगा जुओ खेलैत आ शराबो पीबैत। जे पितो बुझैत। महाजनीक कारोबार, तेँ भरि दिन सुधीर रुपैयेक हिसाब-बारी आ धानेक लेन-देनमे व्यस्त रहैत। महाकान्तक क्रियाकलाप देखि एक दिन खिसिया कऽ सुधीर कहलखिन- “बौआ, बड़ कठिनसँ धन होइ छै। एना जे भरि-भरि दिन बौआइल घुमै छह, तइसँ कैक दिन लछमी रहतुहुन। तेँ किछु उद्यम करह।
पिताक बात महाकान्त चुपचाप सुनि लेलक। किछु बाजल नहि। बेटाकेँ चुप देखि फेर कहलखिन- “पाँच लाख रुपैया दै छिअह, चिमनी चलाबह। उत्तरबरिया बाधमे अपने बीस बीघा ऊँच जमीन छह, ओइमे चिमनी बना लाए।
“बड़बढ़ियाँकहि महाकान्तो चुप भऽ गेल। पिताक मनमे जे जखने काजमे लगि जाएत तखने चालि-ढ़ालि बदलि जेतै। किएक तँ काज ओहन कारखाना होइत, जहिमे मनुष्य पैदा लैत।
आने साल जकाँ अपन काज बचनू करए लगल। पथेरीक देखभालसँ लऽ कऽ हाट-बजार आ महाकान्तक घरपर जा रागिनीकेँ ब्राण्डीक बोतल पहुँचबै धरि। महाकान्तो अपन आने साल जकाँ नियमित काज करए लगल। सबेरे आठ बजेमे जलखै खा मोटर साइकिलसँ चिमनीपर चलि अबैत। चिमनीपर आबि तीनू गोटे -महाकान्त, सरूप, बचनू- भरि मन गाँजा पीबि महाकान्तक चिमनीक कार्यालयमे सूति रहैत। बारह बजेमे बचनू उठा दैत। उठिते महाकान्त मुनसीसँ रुपैया मांगि बचनुएकेँ ब्राण्डी कीनैक लेल बजार पठा दैत आ अपने मुँह-हाथ धोए खाइले घरपर बिदा होइत। घरपर पहुँचि धड़-फड़ कऽ खाइत आ चोट्टे घुरि कऽ चिमनीपर आबि सूति रहैत, जे चारि बजे उठैत। बचनुओ बजारसँ शराब खरीद महाकान्तक घरपर जा रागिनीकेँ दऽ दैत। कओलेजे जिनगीसँ दुनू गोटे -महाकान्तो आ रागिनियो- शराब पीबैत। ओना रागिनी ब्राण्डीये टा पीबैत मुदा महाकान्त सभ कुछ खाइत-पीबैत। गाँजा, भाँग, इंग्लीस, पोलीथिन, अफीम, ताड़ी सभ कुछ। जखन जे भेटल तखन सएह।
आइ जखन बचनू ब्राण्डीक बोतल लऽ रागिनी लग पहुँचल तँ रागिनीक नजरिमे नव विचार उपकलै। आन दिन रागिनी बचनूसँ बोतल लऽ रखि लैत। मुदा आइ आदरसँ बचनूकेँ हाथक इशारासँ पलंगपर बइसैक इशारा केलनि। दुनू गोटे, पलंगपर आमने-सामने बैसि गेल।
रागिनी बाजलि- “बहुत दिनसँ मनमे छल जे अहाँसँ भरि मन गप करितौं। मुदा अहाँ तते धड़फड़ाएल अबै छी जे किछु कहैक मौके ने भेटैए।
बचनू- “गिरहतनी, हम तँ मूर्ख छी। अहाँ पढ़ल-लिखल छी। अहाँक गप्पक जबाव हमरा बुते थोड़े देल हएत।
रागिनी- “कोनो की हम अहाँसँ शास्त्रार्थ करब जे जबाव देल नञि होएत। अपन मनक व्यथा कहब। जे सभकेँ होइ छै।
मनक व्यथा सुनि बचनू मने-मन सोचए लगल जे हम सभ गरीब छी, हरदम एकटा ने एकटा भूर फूटले रहैए। मुदा रागिनी तँ सभ तरहे सम्पन्न छथि। नीक भोजन, दुनू परानी पढल-लिखल। तखन की मनमे बेथा छन्‍हि‍ जे हमरा कहती। मुदा तैयो मनकेँ असथिर कऽ रागिनी दिस देखए लगल। मनमे उत्सुकता बढै़। मुदा रागिनीक चेहरामे, डूबैत सूर्य जकाँ, मलिनता बढ़ैत।
रागिनी- “हमरासँ अहाँ बहुत नीक जिनगी जीबै छी।
अपन प्रशंसा सुनि बचनू गद-गद भऽ गेल। आँखि चौकन्ना हुअए लगलै। मनमे ओहन-ओहन विचार सेहो उपकए लगलै जेहेन आइ धरि मनमे नहि आएल छलै। मुदा किछु बाजै नहि।
बचनूकेँ चौकन्ना होइत देखि रागिनी कहए लागलि- “जहिना अकासमे चिड़ैकेँ उड़ैत देखै छिऐ, तहिना अहूँ छी। मुदा हम पिजरामे बन्न चिड़ै जकाँ छी। जखन पढ़ै छलौं तखन यएह सोचै छलौं जे कोनो कओलेजमे प्रोफेसर बनि जिनगी बिताएब। से सभ मनेमे रहि गेल। भरि दिन अंगनामे घेराएल रहै छी। ने केकरोसँ कोनो गप-सप्‍प होइए आ ने अंगनासँ निकलि कतौ जा सकै छी। तहूमे असगरूआ परिवार अछि। लऽ दऽ कऽ एकटा सासु छथि। ने दोसर दियादनी आ ने कियो दोसर। भरि दिन पलंगपर पड़ल-पड़ल देह-हाथ दुखा जाइए। जाधरि पढ़ै छलौं ताधरि दुनियाँ किछु आरो बुझाइत छल। मुदा आब किछु आर बुझाइत अछि। कखनो मन होइए तँ किछु पढ़ै छी नै तँ टी.बी. देखै छी। पढ़िये कऽ की हएत। ने दोसरकेँ बुझा सकै छी आ ने अपना कोनो काज अछि, जहि लेल सीखब। जानवरोसँ बत्तर जिनगी बनि गेल अछि। जहिना गाए-महींस भरि पेट खेलक आ खूँटापर बान्हल रहल तहिना भऽ गेल छी। मुदा मनुक्ख तँ मनुख छी। जाधरि अपना मनक बात दोसरकेँ नहि कहबै आ दोसरक पेटक बात नहि सुनबै, ताधरि नीक लगत। अनेरे लोक किअए पढ़ैए। जँ लकीरक फकीरे बनि जीबैक छैक।
सुखल मुस्की दैत बचनू बाजल- “गिरहतनी, अहाँकेँ कोन चीजक कमी अछि जे कोनो तरहक दुख हएत?”
रागिनी- “अहाँ जे कहलौं ओ ठीके कहलौं। किएक तँ एहनो बुझिनिहारक
कमी नञि अछि। एहनो बहुत लोक अछि जे धनेकेँ सभ कुछ बुझैत अछि। मुदा
धन तँ खाली शरीरक भरण-पोषण कऽ सकैत अछि, मनक तँ नहि। तीन सालसँ बेसी ऐठाम ऐला भऽ गेल मुदा ने एक्कोटा सिनेमा देखलौं आ ने एक्को दिन कतौ घुमै-फिरैले गेलौं। जाधरि बेटी माए-बाप लग रहैए ताधरि सभ कुछ -धन-सम्पत्ति कुटुम्ब-परिवार- अपन बूझि पड़ै छै, मुदा सासुर पाएर दइते सभ बीरान भऽ जाइ छै। तहिना माए-बापक बीच जे आजादी बेटीक रहै छै ओ सासुर ऐलापर एकाएक बन्न भऽ जाइ छै।
बचनू- “जँ कतौ जाइक मन होइए वा देखैक मन होइए तँ नैहर किअए ने चलि जाइ छी?”
रागिनी- “जहिना सासुर तहिना नैहरो भऽ गेल। जहिना सासुरमे पुतोहु बनि जीबैत छी तहिना नैहरोमे पाहुन बनि जाइ छी। जना हम्मर किछु ऐ घरमे अछिये नहि। जे घर अप्पन नञि रहत ओइ घरमे केकरा कहबै जे हम फल्लाँ ठीन जाएब। जन्म देनिहारि माइयो आने बुझैए। तइ परसँ भाए-भौजाइक जुइत। ई तँ नञिहरक गप कहलौं आ अहिठामक जे होइए से हमहीं बुझै छी। बुरहा ससुर जखन आंगन औताह तँ बूझि पड़त जे जना अस्सी मन पानि पड़ल छन्‍हि‍। बूि‍ढ़ सासुसँ तँ कने हँसियो कऽ गप्प करताह मुदा हमरा देखिये कऽ झड़कबाहि उठि जाइत छन्‍हि‍। जँ कहियो माथपर नुआ नहि देखलनि तँ बुढ़ीकेँ अगुआ कऽ की कहताह की नहि, तेकर कोनो ठेकान नहि। भरि-भरि दिन, पहाड़ी झरना जकाँ, आँखिसँ नोर झहरैत रहैए। कियो पोछनिहार नहि।
बचनू- “गिरहतनी, हमरा बड़ देरी भऽ गेल। महाकान्त भाय बिगड़ताह।
रागिनी- “अच्छा, चलि जाएब। कहै छलौं जे सदिखन तरे-तर मन औंढ़ मारैत रहै अए जे लछमी बाइ जकाँ तलवार उठा परदा-पौसकेँ तोड़ि दी, मुदा साहस नै होइए। केरा भालरि जकाँ करेज डोलए लगैए। आइ जखन अपन मनक बात अहाँकेँ कहलौं तँ मन कने हल्लुक बूझि पडै़ए।
बचनू- “तखन तँ गिरहतनी हमहीं नीक छी।
रागिनी- “बहुत नीक। बहुत नीक। एते काल जे अहाँसँ गप केलौं से जना बूझि पड़ैए जे जना पाकल घाबक पीज निकललापर जे सुआस पड़ै छै तहिना भऽ रहल अछि। आब सभ दिन एक घंटा गप्प कएल करब। अहाँ कियो आन छी। घरेक लोक छी की ने।
एक टकसँ बचनू रागिनीक आँखिपर आँखि दऽ हृदए देखए लगल। तहिना रागिनियो बचनुक हृदए पढ़ैए लागलि।

जीवि‍का :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल


शिवरात्रिक प्रात। मध्य मास। ज डेढ़ मासक शीतलहरीमे सूर्य मरनासन्न भऽ गेल छलाह तमे जीबैक नव शक्ति सेहो आबि गेलनि। तेँ रौदमे धीरे-धीरे गरमी अबैत। चारि बजे भोरमे उमाकान्तक नीन टुटल। निन्न टुटिते देवाल घड़ीपर नजरि देलक। चारि बजैत। ओछाइनेपर पड़ल-पड़ल अपन आगूक जिनगी दिस नजरि देलक। ओना काल्हिये दिनमे दुनू दोस्त विचारि नेने छल। विचारि नेने छल जे दुनू गोटे टेम्पू कीनए भोरुके गाड़ीसँ दरभंगा जाएब। बदलैत जिनगीक संकल्प उमाकान्तक मनमे। किएक तँ जिनगी मनुष्यकेँ किछु करैक लेल भेटैत अछि। मनमे एलै जे पाँच पचपनमे गाड़ी अछि तेँ पाँच बजे घरसँ निकलब। ओना अधे घंटाक रस्ता स्टेशनक अछि मुदा किछु पहिनहि पहुँचब नीक रहत। ओना काहियो कोनो गाड़ी अपना समएपर नहिये अबैए, एकाध घंटा लेट रहिते अछि मुदा तइसँ हमरा की? हम समएपर जाएब। शुभ काज सदिखन समएसँ पहिनहि करैक कोशिश करक चाही। एते बात मनमे अबिते उमाकान्त ओछाइन छोड़ि उठि गेल। उठिते मनमे एलै जे हमर ने नीन टुटि गेल मुदा जँ दोस शोभाकान्तक नीन नहि टुटल होए, तखन तँ गड़बड़ होएत। से नहि तँ पर-पैखाना जाइसँ पहिने ओकरो जा कऽ उठा दिऐ। फेर मनमे एलै दतमनि करिते जाए। किएक तँ एकटा काज तँ अगुआइल रहत। हाथमे दतमनि लइते मनमे एलै जे किछु खा-पी कऽ घरसँ निकलब। रास्ता-बाटक कोन ठेकान। तहूमे लोहा-लक्कड़क सवारी। कखन नीक रहत कखन बगदि जाएत, तेकर कोन ठेकान। एक बेर एहिना भेल रहए की ने। दरभंगे जाइत रही आकि मनीगाछी लोहनाक बीच गाड़ीक
इंजिन खराब भऽ गेलै। भोरुके गाड़ी, तेँ सोचने रही जे दरभंगे पहुँचि किछु खाएब-पीब। ले बलैया, दू बजे तक गाड़ी ओतए अॅटकि गेलै। कखनो गाड़ीक डिब्बामे जा बैसी तँ कखनो उतरि कऽ इंजिन लग पहुँचि ड्राइवरकेँ पूछिऐ। ओहू बेचाराक मन घोर-घोर भेल। हमहूँ आशा-बाटीमे रहि गेलौं। से जँ पहिने बुझितिऐ तँ गाड़ी छोड़ि बिदेसर चौकपर चलि जइतौं आ बस पकड़ि सबेर सकाल दरभंगा पहुँचि जइतौं। सेहो नै केलौं। तेकर फल भेल जे भूखे-पियासे खूब टटेलौं। तेँ बिना किछु मुँहमे देने घरसँ नै निकलब। ई बात मनमे अबिते उमाकान्त पत्नीकेँ उठबैत कहलक- “जाबे हम दोस शोभाकान्तक ऐठामसँ अबै छी ताबे अहाँ चारिटा रोटी आ अल्लूक भुजिया बना लेब।
कहि उमाकान्त शोभाकान्तक ऐठाम दतमनि करैत बिदा भेल। दाँतमे घुस्सो दिअए आ मने-मन बिचारबो करए। मनमे एलै जे काजे एहेन छी जे मनुक्खकेँ मनुक्खो बनबैए आ जानवरो। दुनियाँक सभ मनुक्ख तँ किछु नहि किछु करिते अछि। मुदा कियो देव बनि जाइत अछि तँ कियो दानव। तेँ काजकेँ परिखब सभसँ मूल बात छी। शोभाकान्त ऐठाम पहुँचिते उमाकान्त रस्तेपर सँ बोली देलक- “दोस छेँ रौ, रौ दोस।
ओछाइनपरसँ उठैत शोभाकान्त बाजल- “हँ। दोस छिऐ रौ, हमरो नीन टुटले अछि। अखन तँ अन्हारे छै।
उमाकान्त- सवा चारि बजै छै। तैयार होइत-होइत पाँच बजिये जाएत। कने पहिले स्टेशन जाएब।
उमाकान्त आ शोभाकान्त एक्के बतारी। दुनूमेे उमेरक हिसाबसँ के छोट के पैघ, से तँ ने अपने दुनू गोरे बुझए आ ने कियो टोले-पड़ोसक। किएक तँ टिपनि दुनूमेसँ केकरो नहि। बच्चेसँ दुनू गोटे, बेसी काल, एक ठाम रहैत तेँ समाजोक लोक बिसरि गेल। अपना दुनू गोटेक माइयो-बाप मरिये गेल, आन मने किएक राखत। मुदा दुनू गोटे ऐ मौकाक लाभ उठबैत। लाभ ई उठबैत जे दुनू, दुनू गोटेक स्त्रीसँ हँसी-चौल करैत। तइले दुनूमेसँ केकरो मलाल नहि। मुदा गामक बूढ़ो-बुढ़ानुस आ नवकियो कनियाँ दुनू स्त्रीगणकेँ निरलज कहैत। तेकर गम दुनूमे सँ केकरो नहि। किएक तँ सभ स्त्रीगणकेँ होइत जे अधिक सँ अधिक पुरुखक संग गप-सप्‍प, हँसी-मजाक हुअए।
बच्चेसँ दुनू गोटे- उमाकान्त आ शोभाकान्त- एक्के ठाम गुल्लियो-डंडा खेलए आ गामेक स्कूलमे पढ़बो करए। बच्चामे दुनू गोरे दुनूकेँ नामे धऽ-धऽ बजैत। मुदा चेष्टगर भेलापर, कनगुरिया ओंगरीमे ओंगरी भिरा दोस्ती लगा लेलक। मिडिल तक गामेक स्कूलमे दुनू गोटे पढ़लक। मुदा हाइ स्कूलमे उमाकान्तेटा नाओं लिखेलक। शोभाकान्त गरीब, तेँ पढ़ाइ छोड़ि देलक। मुदा उमाकान्तकेँ दू-तीन बीघा खेतो आ पितो गामेक स्कूलमे नोकरी करैत। ओना शोभाकान्त उमाकान्तसँ बेसी चड़फड़ो आ पढ़ैइयोमे नीक। तेँ अपना क्लासक मुनिटिराइयो करैत। मुनीटरक बात शिक्षको अधिक मानैत आ चट्टियाक बीच धाखो। पढ़ाइ छोड़लाक बाद शोभाकान्त नोकरी करए पटना गेल। गामसँ तँ यएह सोचि निकलल जे जएह काज भेटत सएह करब। मुदा रस्तामे बिचार बदलि गेलै। विचार ई बदलल जे ने चाहक दोकानमे नोकरी करब आ ने होटलमे। ने कोठीमे काज करब आ ने तारी-दारुक दोकानमे। अगर जँ नोकरी नै हएत तँ रिक्शे चलाएब वा मट्टियेमे काज करब। सरकारी नोकरीक तँ कोनो आशे नहि। किएक तँ उमेरो नै भेलहेँ।
गामसँ शहर शोभाकान्त पहिले-पहिल पहुँचल। मुदा जे आकर्षण शहर-बजार देखि लोककेँ होइत ओ आकर्षण शोभाकान्तकेँ नै होइत। जहिना सोना-चानीक दोकान दिस गरीबक नजरि नहि पड़ैत, तहिना। स्टेशनसँ उतरि ओ उत्तर दिशक रस्ता धेलक। कोठा-कोठीपर नजरि पड़बे ने करै। किछु दूर गेलापर एकटा साइकिल मिस्त्रीक दोकान देखलक। रस्तापर ठाढ़ भऽ दोकान हियासए लगल। दोकानदारोक नजरि पड़ल। शोभाकान्तपर नजरि पड़िते दोकानदारक मनमे आएल जे छोटो-छोटो काजमे अपने बरदा जाइ छी, जइसँ नमहर काज पछुआ जाइए। से नञि तँ ऐ बच्चाकेँ पूछिऐ जे नोकरी रहत। जँ रहत तँ रखि लेब। हाथक इशारासँ सोर पारि मिस्त्री पुछलक- “बाउ, की नाम छी?
“शोभाकान्त।
“कत्तऽ घर छी?”
“मधुबनी जिला।
“कत्तऽ जाएब?”
“नोकरी करए एलौं।
“ऐठाम रहब?”
“हँ। रहब।
जहिना अतिथि-अभ्यागतकेँ दुआरपर अबिते घरबारी लोटामे पानि आनि आगूमे दैत, खाइक आग्रह करैत, तहिना शोभाकान्तकेँ मिस्त्री केलक। आठ आना पाइ दैत, आंगुरक इशारासँ मुरही-कचड़ीक दोकान देखबैत कहलक जे ओइ दोकानसँ जलखै केने आउ। झोरा रखि शोभाकान्त बिदा भेल। ओना गाड़ीक झमारसँ देहो-हाथ दुखाइत आ भूखो लागल, मुदा नोकरी पाबि देहक दरदो आ भूखो कमि गेलै। मुरही-कचड़ीक दोकानपर बैसितहि, बगए-बानि देखि दोकानदार पुछलक- “बौआ, अहाँक घर कत्तऽ छी?”
शोभाकान्त- “मधुबनी जिला।
“गामक नाम कहू।
“लालगंज।
“हमरो घर तँ अहाँक बगलेमे अछि, रुपौली। बीस-पच्चीस बर्खसँ हम ऐठाम रहै छी।
बिना पाइ नेनहि दोकानदार शोभाकान्तकेँ भरि पेट खुआ देलक। खा कऽ शोभाकान्त साइकिलक दोकानपर आबि मिस्त्रीकेँ पाइ घुमबैत कहलक- “दोकानदार पाइ नञि लेलक। मुदा गहिकीक झमेल दुआरे मिस्त्री आगू किछु नहि पुछलक।
साइकिल ट्यूबक पनचर बनौनाइ, छोट-छोट भंगठीसँ शोभाकान्त अपन जिनगी शुरू केलक। छोट-छोट काज भेने दोकानदारोकेँ आगू बढ़ैक अवसर हाथ लगल। साइकिल, रिक्शाक संग मोटर साइकिल आ टेम्पूक मरम्मत केनाइ सेहो शुरू केलक। शोभाकान्तोकेँ मौका भेटलै। उपारजनक लूरि अबए लगलै। दुनियाँकेँ बिसरि शोभाकान्त रिन्च-हथौरीमे मगन भऽ गेल।
छह मास बीतैत-बीतैत शोभाकान्त साइकिल-रिक्शाक मिस्त्री बनि गेल। संगहि मोटर साइकिल आ टेम्पू चलाएब सेहो सीखि लेलक। मेहनत केने शरीरो फौदा गेलै। साले भरिमे जवान भऽ गेल।
ड्राइवरीक लाइसेंस शोभाकान्त बना लेलक। ड्राइवरीक लाइसेंस बनबिते शोभाकान्तक मनमे द्वन्द्व उत्पन्न हुअए लगल जे ड्राइवरी करी आकि अपन दोकान खोलि मिसतिरिआइ करी। मुदा अपन दोकान खोलैक लेल घर भाड़ाक संग मरम्मत करैक सामानो लिअए पड़त। फेर मनमे एलै जे एक तँ मेनरोडमे घर नै भेटत दोसर पाइयो ओते नञिए जे सामानो कीनब। तइसँ नीक जे ड्राइवरिये करी। सएह केलक। ड्राइवरीमे दरमहो नीक आ बाइलियो आमदनी। महीना दिन तँ अव्यवस्थिते रहल मुदा दोसर मास बीतैत-बीतैत असथिर भऽ गेल। दरमाहा जमा करए लगल आ बाइली आमदनी घर पठबए लगल।
सालभरिक दरमाहासँ शोभाकान्त टेम्पू कीनि लेलक। टेम्पू कीनि, अपन सभ सामान लादि, शोभाकान्त सोझे गाम चलि आएल।
सेकेण्ड डिबीजनसँ उमाकान्त बी.ए. पास केलक। ओना पढ़लो-लिखल लोक कम मुदा ओहूसँ कम नोकरी। खेती-पथारी आ कारोवार कियो पढ़ल-लिखल करै नहि चाहैत। जइसँ गाम-सबहक दशा दिनो-दिन पाछुए मुँहे ससरैत। गामक लोको तेहने जे पढ़ल-लिखल लोककेँ खेती करैत देखि, दिल खोलि कऽ हँसबो करैत आ लाख तरहक लांछना सेहो लगबैत। जइसँ गामक पढ़ल-लिखल लोककेँ नोकरी करब मजबूरी भऽ जाइत।
नोकरीक भाँजमे उमाकान्त दौड़-धूप करए लगल। मुदा मनमे संकल्प रखने जे घूस दऽ कऽ नोकरी नञि करब। चाहे नोकरी हुअए वा नहि। दौड़-धूपसँ मन विचलित हुअए लगलै। संकल्प डोलए लगलै। मनमे अनेको प्रश्न औंढ़ मारए लगलै। कखनो मनमे होए जे पाँच कट्ठा खेत बेचि कऽ नोकरी पकड़ि लेब। फेरि मनमे होए जे जखन घूस दऽ कऽ नोकरी लेब तँ घूस लऽ कऽ लोकक काज किअए ने करबै? फेर मनमे होए जे तखन जिनगी केहेन हएत? अछैते जिबने मुरदा बनल रहब। लोक शरीर तियागक बाद मृत्यु धारण करैत अछि आ हम जीबितेमे मरल रहब। फेर मनमे एलै जे पत्नी तँ जीवन-संगिनी छी तेँ एक बेर हुनकोसँ पूछि लिअनि। मनमे कने शान्ति एलै। पत्नीसँ पुछलक- “बिना घूस-घासक नोकरी भेटब कठिन अछि, से अहाँक की विचार?”
मुस्की दैत पत्नी बाजलि- “आइक युगमे नोकरी भेटब जिनगी भेटब छी। तेँ हमरो गहना-जेबर अछि आ जँ ओइसँ नञि पूड़ै तऽ थोड़े खेतो बेचि कऽ नोकरी पकड़ि लिअ। देखते छिऐ जे साले भरिमे लोक की सँ की कए लैत अछि।
एक तँ ओहिना उमाकान्तक मन घोर-घोर होइत, तइपरसँ पत्नीक बात आरो मरनासन्न बना देलक। जिनगीक आशा टुटए लगल। आँखिक रोशनी क्षीण हुअए लगल। आशाक ज्योति कतौ बुझिये ने पड़ैत। जहिना अन्हारमे सगतरि भूते-प्रेत, चोरे-डकैत, साँपे-छुछुनरि बूझि पड़ैत, तहिना उमाकान्तकेँ हुअए लगल। डूबैत जिनगीक आशामे कने टिमटिमाइत इजोत बूझि पड़लै। इजोत अबिते शक्तिक संचार हुअए लगलै। मनमे संकल्पक अंकुर अंकुरित हुअए लगलै। जइसँ दृढ़ताक उदए सेहो हुअए लगलै। मने-मन विचार करए लगल। विचार केलक जे जिनगीक किछु लक्ष्य हेबाक चाही। मनुष्य तँ चुट्टी-पिपरी नहि होइत जे साधारण केकरो पाएर पड़लासँ मरि जाएत। मनुष्य तँ ब्रह्मक अंश छी। ओकरामे विशाल शक्ति छिपल छै। जिनगीमे एहिना हवा-बिहाड़ि अबै छै, तइसँ की मनुष्य मनुष्यता गमा लेत। मनुष्यते तँ मनुष्यक धरोहर सम्पति छी। जेकरा लोक ओहिना कतौ फेकि देत। कथमपि नहि। मने-मन विचारलक जे हमरा नोकरी नै भेटत। तेँ कि हाथपर हाथ दऽ कऽ बपहारि काटब। एते कमजोर छी। की हमरामे मनुष्यक सभ गुण मरि चुकल अछि। हमरा बुते किछु कएल नै हएत? जरुर हएत।
नोकरी दिससँ नजरि हटा उमाकान्त राशनक दोकान चलबैक विचार केलक। विचार ऐ दुआरे केलक जे जीबैक लेल अर्थक उपार्जन जरुरी होइत। जिनगीक अधिकांश काज अरथेसँ चलैत। तेँ बिना अर्थे जिनगी जिनगी नहि रहि जाइत। हँ ई बात जरुर जे अर्थक उपार्जन आ उपयोगक ढ़ंग नीक हेबाक चाही। राशनक दोकानक जरुरत सभ गाममे अछि, सरकार आ समाजक बीचक कड़ी सेहो छी। ओना डीलरीक लाइसेंसो बनबैमे पाइयेक खेल चलैत। मुदा तैयो जी-जाँति कऽ उमाकान्त लाइसेंस बनबै दिस बढ़ल।
डीलरीक लाइसेंस बनौलाक उपरान्त उमाकान्त समान उठबैसँ पहिने मिश्रीलालसँ कारोबारक तौर-तरीका बुझैक लेल गेल। मिश्रीलाल पुरान डीलर। मुदा जहिना गाममे अपन इज्जत बनौने तहिना सरकारियो आॅफिसमे। इज्जत बनबैक अपन तरीका। तेँ ब्लौकक पैंतालिसो डीलर मिलि ओकरा यूनियनक सेक्रेट्री बनौने। जहिना सभ डीलर मिश्रीलालकेँ मानैत तहिना मिश्रीलालो सभकेँ। यएह बूझि उमाकान्त भेँट करब आवश्यक बुझलक। मिश्रीलाल ऐठाम उमाकान्त पहुँचल तँ देखलक जे चारि-पाँचटा धिया-पुता रजिस्टरपर दसखतो करैए आ निशानो लगबैए। किएक तँ पछिला मासक समान बँटबारा भऽ गेल छल। तेँ बिना रजिस्टर तैयार भेने अगिला समान केना उठत? जरुरी काज बूझि मिश्रीलाल मगन भऽ अपन काज करैत। उमाकान्तकेँ देखते मिश्रीलाल रजिस्टरक बीचहिमे, जइ पेजमे निशान आ हस्ताक्षर करबैत, पेनो आ कार्बनो रखि मोड़ैत बेटाकेँ कहलक- “बौआ, चाह बनबौने आबह?” उमाकान्त दिस होइत पुछलक- “किमहर किमहर एनाइ भेलै बौआ।
निर्बिकार भऽ उमाकान्त बाजल- “भैया, अहाँ पुरान डीलर छी। डीलरीक सभ कुछ जनै छिऐ। बी.ए. केलाक बाद हम दू साल नोकरीक पाछू बौऐलौं मुदा कतौ गर नै धेलक। आब तँ नोकरीक उमेरो लगिचाइले अछि, तेँ नोकरीक आशा तोड़ि डीलरीक लाइसेंस बनेलौंहेँ।
नोकरीक गर नहि लागब सुनि मिश्रीलाल कहलक- “बौआ, जहिना कोनो परिवारमे चारि-पाँच भाँइक भैयारी रहैत अछि। सभ कुछ सामिले रहै छै। मुदा सभ भाइक पत्नीकेँ अप्पन-अप्पन सम्पत्ति सेहो छै। जहिमे भाइयो सभ चोरा-नुका शामिल भऽ जाइत अछि। जेकर फल होइ छै घरमे आगि लागब। तहिना नोकरियो सभमे भऽ गेल अछि। जे कुरसीपर अछि ओ अपने सार-बहिनोइक जोगारमे रहैए। कहीं कतौ बिकरियो होइ छै। जेकर परिणाम बनि गेल अछि जे नाेकरी केनिहारोक वंश बनि गेल अछि। देशक विकास केहेन अछि से तँ तू पढ़ले-लिखल छह, सभ कुछ जनिते छहक। जँ कनी-मनी एक रत्ती आगूओ बढ़ि रहल अछि तँ ओइसँ बेसी ओइ नोकरिहाराक वंशमे नोकरी केनिहार बढ़ि रहल अछि। तेँ देखबहक जे डाक्टरक बेटा डाक्टरे बनत। इंजीनियरक इंजीनियरे। कते कहबह। जे जत्ते अछि ओ बपौती बूझि ओकरा पकड़ने अछि। तइ बीच तेसरक- जे ओइसँ अलग अछि- जे गति हेबाक चाही सएह तोरो भेलह। तहूसँ बेसी जुलुम अछि जे किछु गनल-गूथल लोक अछि जे नोकरियो करैत अछि, खेतो हथिऔने अछि आ जे कोनो सरकारी योजना बनै छै ओकरो हड़पैत अछि। जइसँ देखबहक जे केकरो सम्पत्ति राइ-छित्ती होइए आ कियो सम्पत्ति लेल लल्ल अछि।
उमाकान्त- “भैया, दुनियाँ-दारीक गप छोड़ू। अपना काजक विषएमे कहू।
मिश्रीलाल- “बौआ, अखन तू जुआन-जहान छह। मुदा जे काज कऽ अपना जीबए चाहै छह ओ गलती भेलह। तोरा सन आदमीकेँ डीलरी नञि करक चाही। हम तँ सभ घाटक पानि पीनाइ सीखि नेने छी। की नीक की अधला, से बुझिते ने छिऐ। बुझह तँ नढ़ड़ा-हेल हेलैत छी। तेँ हमर कारबार ठीक अछि। मुदा तोरा बुते नै हेतह?
उमाकान्त- “किए?”
तइ बीच चाह एलै। दुनू गोटे हाथमे गिलास लेलक। एक घोंट चाह पीबि मिश्रीलाल- “देखहक, डीलरी दू दुनियाँक सीमा परक काज छी। एक दिस सत्ताक दुनियाँ अछि आ दोसर दिस आम लोकक। गड़बड़ दुनू अछि।
उमाकान्त- “से की?”
मिश्रीलाल- “पहिने पब्लिकेक बात कहै छिअह। राशनक वस्तु चीनी मटियातेल, तँ हिसाबेसँ भेटैत अछि। नामे छिऐ कोटा। जँ मनमाफित भेटिते तँ खुल्ला बजार होइतै। से तँ नञि अछि। गाममे किछु एहेन-एहेन रंगबाज सभ बनि गेल अछि जेकरा खाइ-पीबैले नै देबहक तँ भरि दिन अपनो आ अनको उसका-उसका रग्गड़े करैत रहतह। रग्गड़केँ तँ कोनो सीमा नै होइ छै। जँ कहीं गोटे दिन लाठिये-लठौबलि भऽ जेतह तखन तँ लेनीक देनी पड़ि जेतह। दू पाइ कमाइले धंधा करबह आकि कोट-कचहरीक फेरमे पड़बह। बुझिते छहक जे कोट-कचहरी लोकेक पाइपर ठाढ़ अछि। ओइ साला रंगबाज सभकेँ की अछि। अपने किछु करतह नहि आ अनका काजमे सदिखन टांगे अड़ौतह। गामक उत्पातसँ लऽ कऽ थाना-पुलिस, कोट-कचहरीक दलाली भरि दिन करैत रहतह। आब तोंही कहह जे बरदास हेतह? नीक लोकक लेल ऐ दुनियाँमे कतौ जगह नहि अछि। ओइ साला सभकेँ की छै, भरि दिन ताड़ी-दारु पीबि ढहनाइत रहतह। ने छोट-पैघक विचार करतह आ ने गाड़ि मारिक। तइपरसँ पंचायत मुखियो आ वार्डो-मेम्बर सभकेँ कमीशन चाहबे करियै। पब्लिको तेहने अछि। देखबहक जे कतेक एहेन परिवार अछि जेकरा कोटाक वस्तुक जरुरत नै छै जेना चीनी। मुदा ओहो कोटासँ चीनी उठा दोकानमे किछु नफा लऽ कऽ बेचि लेतह। जखनिकि किछु परिवार एहेन अछि जेकरा कोटाक वस्तुसँ खर्च नै पूड़ै छैक। अपनो आँखिसँ देखबहक जे दस-बीस कप चाह आने पीबैत अछि। की ओकरा सभकेँ फाजिल नै देबहक। जखने एक गोटेकेँ फाजिल देबहक तँ दोसराक हिस्सा कटबे करत। एहेन स्थितिमे डीलरे की करत? आखिर ओहो तँ समाजेक लोक छी।
उमाकान्त- “सभ गोटे तँ कोटा उठबितो नै हेतै?”
मिश्रीलाल- “हँ, सेहो होइए। मुदा ओ तखन होइए जखन कोटाक वस्तुक दाम आ खुल्ला बजारक दाममे अन्तर नै रहैत अछि। मुदा जखन दुनूक दाममे अन्तर रहैत अछि तखन जेकरो ने अपना पाइ रहै छै ओहो दोकानदार सभसँ, अधा-अधी नफापर, पाइ लऽ कऽ समान उठा लइए आ बेचि लइए। ततबे नै ओहो चाहतह जे किछु फाजिले कऽ समान भेटए।
मुँह बिजकबैत उमाकान्त- “तब तँ बड़ ओझरी अछि।
उमाकान्तक सोचकेँ गहराइ दिस जाइत देखि मुस्की दैत मिश्रीलाल- “बौआ, एतबेमे छगुन्ता लगै छह। ई तँ एक दिसक बात कहलिहह। अहूमे कते ओझरी छुटिये गेलह। जँ सरिया कऽ सभ बात कहबह तँ सैकड़ो ओझरी आरो अछि। आब सुनह आॅफिस, बैंक, एफ.सी.आइ.क गोदामक संबंधमे। दौड़-बरहा जे करै पड़तह ओकरा छोड़ि दै छिअह। किएक तँ मोटा-मोटी यएह बुझह जे एक दिनक काजमे पनरहो दिनसँ बेसिये लगतह। जइमे समएक संग पच्चीस-पचास पौकेटो खर्च हेबे करतह।
उमाकान्त- “तब तँ बड़ लफड़ा अछि?”
मिश्रीलाल- “लफड़ा की लफड़ा जकाँ अछि। जखने ब्लौक पाएर देबहक आकि गीध जकाँ चारु भरसँ, अफसरसँ लऽ कऽ चपरासी धरि, नोंचए लगतह। कियो कहतह जे चाह पिआउ तँ कियो कहतह पान खुआउ। कियो कहतह सिगरेट पिआउ तँ कियो मिठाइ खुआउ। सुनि-सुनि मन मोहरा जेतह। मुदा की करबहक? भीखमंगोसँ गेल-गुजरल चालि देखबहक। जेना अपना दरमाहा भेटिते ने होए। मुदा डीलरे की करत? अगर जँ सभकेँ खुशी नै राखत तँ काजे लटपटेतै। काजो तेहेन अछि जे एक्के टेबुलसँ नञि होइ छै। जत्ते टेबुल तते खर्च। अखन हमहू अगुताइल छी, तेँ नीक-नहाँति नहि कहि सकबह। देखते छहक जे रजिस्टर तैयार करै छी। ब्लौक जाएब। मुदा तैयो एक-दूटा बात कहि दै छियह। सबहक तड़ी-घटी ने हम बुझै छिऐ।
उमाकान्त- “कनी-कनी सबहक बात कहि दिअ?”
मिश्रीलाल- “अगुताइलमे की सभ बात मनो पड़ै छै। मुदा जे मन पड़ैए से कहि दै छिअह। पहिने बैंकक सुनह। कोरियापट्टीमे दुनियाँलाल डीलर अछि। बेचारा बड़ मुँह सच। जहिना-जहिना समान बिकाइल रहए तहिना-तहिना पाइ रखने रहए। खुदरा समानक बिक्री तेँ खुदरा पाइ। जखन बैंकमे जमा करए गेल अगिला कोटाक लेल, तँ खुदरा पाइ देखि बैंकमे लेबे ने केलकै। कहलकै जे ओते हमरा छुट्टी अछि जे भरि दिन तोरे पाइ गनैत रहब। भरि दिन बेचारा छटपटा कऽ रहि गेल। बैंकसँ निकलबो ने करए जे पौकेटमार सभ ने कहीं पाइ उड़ा दिअए। दोसर दिन आबि कऽ हमरा कहलक। तामस तँ बड़ उठल। किएक तँ जेना मोटका पाइ सरकारक होए आ खुदरा नै होए, तहिना। जखन पाइयेक लेन-देन बैंकमे होइ छै तँ गनै ले स्टाफ राखह। मुदा की करितियै। दोसर दिन गेलौं। मनेजरकेँ कहलियै। तखन दू प्रतिशत कमीशनपर फड़िआइल। आब तोंही कहह जे ई दू प्रतिशत कोन बिलमे चलि गेल। तहिना दोसर बात लाए, सप्लाइ इन्सपेक्टरक। इन्सपेक्टर बदली भेलै। नव इन्सपेक्टर बूझि पनरह-बीस गोटे डीलर ओकरा पाइ नै देलकै। ओना पचास रुपैये प्रति डीलर प्रति मास इन्सपेक्टरकेँ दैत अछि। सभकेँ मनमे भेलै जे नव हाकिम छथि तेँ छओ मास तँ इमानदारी रखबे करताह। ले बलैया, जहाँ डीलर दोसर कोटाक सभ समान उठौलक आकि दोसर दिन भेने विश्वनाथ डीलर ऐठाम पहुँचि गेल। विश्वनाथोकेँ कोनो डर मनमे नहि। किएक तँ समान ओहिना रहए। विश्वनाथकेँ इन्सपेक्टर चीनी काँटा करैले कहलक। ओहो तैयार भऽ काँटा करै लगल। पाँचो बोरा मिला कऽ चौदह किलो चीनी कमि गेलै।
बिच्चहिमे उमाकान्त कहलक- “चीनी तौलि कऽ नञि नेने रहए?”
मिश्रीलाल- “ई एफ.सी.आइ. गोदामक खेल छी। एफ.सी.आइ. गोदाम तँ ब्लौके-ब्लौके नै अछि। तेँ देखबहक जे डीलर सबहक नम्बर लगल अछि। सभकेँ धड़फड़ करैत देखबहक। किएक तँ अपन टाएर गाड़ी तँ सभ डीलरक रहै नै छै। अधिक डीलर भड़ेपर गाड़ी लऽ जाइए। तेँ मनमे होइत रहै छै जे जते जल्दी समान हएत तते कम भाड़ा लगत। तेँ कियो समान तौलबै नै अछि। जे कियो पच्चीस रुपैइये बोरा मनेजरकेँ दऽ देने रहलै ओकरा तँ नीक समानो आ पुरल बोरो देलक। जे पाइ नञि देने रहल ओकरा समानो दब आ घटल बोरो देलक। चोरपर चोर अछि।
छुब्ध होइत उमाकान्त- “हद लीला सभ अछि।
मिश्रीलाल- “आब मार्केटिंग अफसर एम.ओ.क बात सुनह। अखुनका जे एम.ओ. अछि ओ पीआक अछि। ओना काज करैमे भुते अछि। रस्तो-पेरामे मोटर साइकिल लगा फाइलपर लिखि दैत अछि। मुदा ओहिना नहि। पहिले एक बोतल पीआ देबहक, तखन।
उमाकान्त- “अफसर भऽ कऽ रस्ता-पेरापर बोतल पीबैए?”
ठहाका मारि हँसि मिश्रीलाल- “बौआ, तूँ गाम-घरक बात बुझै छहक। गाम-घरमे जे छोट-पइघीक, इज्जत-आबरुक विचार अछि ओ कत्तऽ पेबह। मुदा तइओ ओकरामे दूटा गुण जरुर छलैक। पहिल गुण छलैक जे आन कोनो स्त्रीगण दिस नहि तकितह। आ दोसर गुण छलै जे केकरोसँ एक्को पाइ नञि लइतह। मुदा ऐ सँ पहिलुका एम.ओ. जे रहए ओ भारी पाइखौक। सभ काजक रेट बनौने रहए। जे सभ बुझै। तेँ जेकरा जे काज रहै ओ ओइ हिसाबसँ पाइ दऽ दै आ लगले काज करा लिअए।
मुस्कुराइत उमाकान्त- “तब तँ पक्का नटकिया सभ अछि।
मिश्रीलाल- “नटकिया की नटकिया जकाँ अछि। रंग-बिरंगक चोर सभ पसरल अछि। कियो धनक चोर अछि तँ कियो धरमक। कियो बुइधिक चोर अछि तँ कियो विवेकक। कते कहबह। तेसराक सुनह। अंदाज करीब पचपन छप्पन बर्खक उमेर ओकर रहए। मुदा फीट-फाटमे जुआनक कान कटैत। जेहने हीरोकट कपड़ा पहिरैत तेहने हिप्पीकट केश रखैत। रंग-बिरंगक तेल आ सेंट लगबै। सदिखन उपरका जेबीमे ककही देखबे करितहक। रातियोमे कैक बेर केश सीटै। चौबीस घंटामे दू बेर दाढ़ी बनबै। ओ एम.ओ. भारी नंगरचोप जेहने अपने तेहने बहुओ। दिन भरिमे पच्चीसो बेर कपड़ा साड़ी-ब्लाउज आ जूत्ता-चप्पल बदलै। केशमे कते रंगक क्लीप लगबै तेकर ठेकान नहि। भरि दिन रिक्शापर ऐ डेरासँ ओइ डेरा, ऐ बजारसँ ओइ बजार घुमिते रहैत छलि। संयोगो ओकरा नीक भेटलै। एक्के बेर बी.डी.ओ., सी.ओक बदली भऽ गेलइ। ओकरे दुनू गोटे चार्ज दऽ कऽ गेल। ओही बीच शिक्षा मित्रक भेकेन्सी भेल। लड़की सभकेँ आरक्षण भेटलै। जहिमे जाति प्रमाणपत्रक जरुरत पड़ल।
अपसोच करैत- “बौआ की कहबह, ओइ सालाक डेरा बेश्यालय बनि गेल। कखनो ब्लौक आॅफिसमे नञि बैइसै। जखन बैसबो करै तँ आन-आन कागज देखए मुदा एक्कोटा जाति प्रमाणपत्रपर हस्ताक्षर नञि करए।
उमाकान्त- “परिवारक कियो किछु ने कहए?”
मिश्रीलाल- “स्त्रीक विषएमे तँ कहिये देलियह। जेठकी बेटी बी.ए. मे पढ़ैत रहए। ओकरो चालि-ढ़ालि बापे-माए जकाँ। कओलेजेक एकटा छौंड़ा आदिवासी क्रिश्चन संग चलि गेलै।
उमाकान्त- “बाप-माएकेँ लाज नै भेलै?”
मिश्रीलाल- “लाज तँ तेहेन भेलै जे राता-राती ऐ ठीनसँ भागल।
उमाकान्त- “अहूँकेँ बहुत काज अछि आ हमरो मन भरि गेल। आखिरीमे एकटा बात बुझा दिअ।
मिश्रीलाल- “की?”
उमाकान्त- “अहाँ केना अप्पन प्रतिष्ठा समाजो आ आॅफिसोमे बना कऽ रखने छी?”
मिश्रीलाल मुस्कुराइत बजलाह- “समाजमे जेकरा ऐठाम सराध, बिआह, उपनैन, मूड़न, भनडारा वा आन कोनो तरहक काज होइ छै तँ ओकरा हम जरुर चीनियो आ मट्टियो तेलक पूर्ति कइये दैत छिऐ। भलहि‍ं अपना लग नहियो रहल तैयो जहाँ-तहाँसँ आनि पुराइये दैत छिऐ। जइसँ समाजक सभ खुशी रहैए। आॅफिसक बात तँ पहिने कहि देलियह।
उमाकान्त- “हमरा की करक चाही? किएक तँ जइ हिसाबे अहाँ कहलौं तइसँ हम्मर मन भटकि रहल अछि।
मिश्रीलाल- “बौआ, जखन लाइसेंस बना लेलह तखन कमसँ कम एक खेप समान ठा कऽ बाँटि लाए। जइ सँ समाजोक चालि-ढ़ालि आ आॅफिसोक चालि-ढ़ालि देखि लेबहक। बेवहारिक ज्ञान भऽ जेतह। व्यवहारिके ज्ञान असली ज्ञान छिऐ। अखन हम एते मदति जरुर कऽ देबह जे तोरा कतौ अड़चन नै हेतह। मुदा दोसर खेपक भार हम नै लेबह। किएक तँ बुझिते छहक जे बिलाइ जे मूससँ दोस्ती करत तँ खाएत की? तोरो सीखैक अवसर भेटि जेतह।
उमाकान्त- “बड़बढ़िया! जहिना अहाँ कहलौं तहिना हम करब।
मिश्रीलाल- “बाउ, आब तँ हम बूढ़ भेलौं। जहिया हम सोलहे बरखक रही तहियेसँ डीलरी करै छी। मुदा पहिलुका आ अखुनकामे अकास-पतालक अंतर भऽ गेल अछि। जते धन आ शिक्षाक प्रसार भेल जा रहल छै ओते घटिया मनुक्ख सेहो बढ़ि रहल अछि। पहिने इमानदार लोक बेसी छल मुदा आब आंगुरपर गनए पड़तह। हम तँ डीलरीमे रमि गेलौं। सभ घाटक पानि पीनाइ सीखि नेने छी, तेँ नीक छी।
उमाकान्त- “चलैत-चलैत किछु........।
मिश्रीलाल- “जहिना आमक गाछ होइ छै जे आमक आँठीसँ जनमैत अछि। तहिना तँ मनुक्खोक होइ छै। दुनियाँमे जते मनुक्ख अछि, सभ तँ मुरुखे भऽ कऽ जन्म लैत अछि। मुदा ऐठाम जेकरा जेहेन परिवार, समाज, वातावरण भेटैत छैक ओ ओहन बनैत अछि। जहिना आमक छोट-छोट सरही गाछकेँ नीक-नीक कलमी आमक गाछक डारिमे बान्हि कलम लगा नीक-नीक आम बना लैत, तहिना मनुक्खोक होइत। मुदा नीक परिवार, नीक समाज अछिये कतेक। अधिकांश तँ गेले-गुजरल अछि। ने सभकेँ भरि पेट खेनाइ भेटै छै आ ने नीक बात-विचार। तखन नीक मनुष्य बनत केना? जाधरि नीक मनुष्य नहि बनत ताधरि नीक समाज केना बनत? तखन तँ जएह अछि तेहिमे अपनाकेँ जते नीक बना जीबि सकी, वएह संतोषक बात। तोहूँ अखन सादा कागज जकाँ साफ छह, तेँ हम चाहब जे गन्दा नहि हुअ। जेहेन विचार, हाथ होइत कर्म निकलतह तेहेन जिनगी हेतह। कियो शरीरांतकेँ मृत्यु बुझैत अछि आ कियो आत्माक हननकेँ। मनुष्यमे असीम शक्ति छिपल छैक, ओकरा जगबैक अछि। जे हमहूँ सरिया कऽ नहिये बुझै छिऐ।
जहिना तेज हथियार हाथमे एलासँ सक्कत-सक्कत वस्तु कटैक हूबा बनि जाइत तहिना उमाकान्तोकेँ भेल।
ओ विचार केलक जे आब बैलगाड़ीक युग नञि रहल। मशीनक युग आबि गेल। तेँ हमहूँ अपना हाथसँ इन्जिने चलाएब।

ठेलाबला :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल


टाबरक घड़ीमे बारह बजेक घंटी बजिते भोलाक निन्न टूटि गेलनि। ओछाइन परसँ उठि सड़कपर आबि हियासए लगला तँ देखलनि जे डंडी-तराजू माथसँ कनिये पछिम झुकल अछि। मेघनक दुआरे सतभैयाँ झँपाएल। जेम्‍हर साफ मेघ रहए ओम्हुरका तरेगण हँसैत मुदा जेम्‍हर मेघोन रहए ओम्हुरका मलिन। गाड़ी-सबारीसँ सड़क सुनसान। मुदा बिजलीक इजोत पसरल। गस्तीक सिपाही टहलैत। सड़क परसँ भोला आबि ओछाइनपर पड़ि रहला। मुदा मन उचला-चाल करैत रहनि। सिनेमाक रील जकाँ पैछला जिनगी मनमे नचैत। जहिना चुल्हिपर चढ़ल बरतनक पानि तरसँ उपर अबैत तहिना भोलोक मनक खुशी हृदएसँ निकलि चिड़ै जकाँ अकासमे उड़ैत। किएक नहि खुशी अओतैक? हराएल वस्तु जे भेटि गेलैक। मन गेलनि परसुका पत्रपर। जे गामसँ दुनू बेटा पठौने रहनि। असंभव काज बूझि विश्वासे नहि होइत रहनि। पत्र तँ नहि पढ़ल होइत रहनि मुदा पढ़बै काल जे पाँति‍ सभ सुनने रहथि, ओहिना आँखिक आगू नचैत रहनि। पत्र उघारि आँखि गड़ा देखए लगलथि। “बाबू, पाँच तारीखकेँ दुनू भाँइ ज्वाइन करए जाएब। इच्छा अछि जे घरसँ विदा हेबा काल अहाँकेँ गोर लागि घरसँ निकली। तेँ पाँच तारीखकेँ दस बजेसँ पहिनहि अपने गाम पहुँचि जाइ।पत्रक बात मनमे अबिते भोला गाम आ शहरक बीचक सीमापर लसकि गेलाह। मनमे ऐलनि, समाजसँ निकलि छातीपर ठेला घीचि, दूटा शिक्षक समाजकेँ देलिऐक, की ओइ समाजक आरो ऋण बाकी छैक? जँ नहि तँ किएक ने छाती लगाओताह। जइसँ मनमे खुशी उपकलनि जे जहिना गामसँ धोती गोल-गोला आ दू टाका लऽ कऽ निकलल छलौं, तहिना देहक कपड़ा, सनेस, चाह-पानक खर्च छोड़ि किछु नहि ऐठाम लऽ जाएब। चिड़ै टाँहि देलकै, फेर ओछाइन परसँ उठि निकललाह, तँ देखलखिन जे बाँस भरि ऊपर भुरुकबा आबि गेल अछि। चोट्टे घुरि कऽ आबि संगी-साथीकेँ उठा अपन सभ किछु बाँटि देलखिन, अपनाले खाली टिकटक खर्च, सनेस आ पाँकेट खर्च मिला सए रूपैया राखि, कपड़ा पहीरि, धर्मशालाकेँ गोड़ लागि हँसैत निकलि गेलाह।
जखन आठे बर्खक भोला रहथि तखनहि माए मरि गेलखिन। तीनिये मासक पछाति पिता रघुनी चुमाओन कऽ लेलखिन। ओना पहिलुको पत्नीसँ चारि सन्तान भेल रहनि। मुदा खाली भोलेटा जीवित रहल। सत्माएकेँ परिवारमे ऐने भोलाकेँ सुखे भेलनि। ओना गामक जनिजातियो आ पुरुखोकेँ होइत जे सत्माए भोलाकेँ अलबा-दोलबा कऽ घरसँ भगा देतैक, नहि तँ परिवारमे भिनौज जरुर कराइये देतीह। मुदा सबहक अनुमान गलत भेलनि। भोला घरसँ सोलहन्नी फ्री भऽ गेलाह। फ्री सिर्फ काजे टामे भेला, मान-दान बढ़िये गेलनि। दुनू साँझ भानस होइते माए फुटा कऽ भोलाले सीकपर थारी साँठि कऽ राखि दैत छलीह। भलहि‍ं भोला दिनुका खेनाइ साँझमे आ रौतुका खेनाइ भोरमे किएक ने खाथि।
परोपट्टामे जालिम सिंह आ उत्तम चन्दक नाच जोर पकड़ने। सभ गाममे तँ नाच पार्टी नहि मुदा एक गाममे नाच भेने चारि कोसक लोक देखए अबैत।
भोलाक गामक विशौलक नाच पार्टी सभसँ सुन्दर अछि। जेहने नगेड़ा बजौनिहार तेहने बिपटा। जइसँ पार्टीक प्रतिष्ठा दिनानुदिन बढ़िते जाइत। घरसँ फ्री भेने भोला नाचक परमानेंट देखिनिहार भऽ गेलाह। नाचो भरि रौतुका, नहि कि एक घंटा, दू घंटा, तीन घंटाक। जेहने देखिनिहार जिद्दी, तेहने नचिनिहारो। गामक बूढ़-बुढ़ानुससँ लऽ कऽ छौड़ा-मारड़ि भरि मन मनोरंजन करैत। मनोरंजनो सस्ता। ने नाच पार्टीकेँ रूपैया दिअ पड़ैत आ ने खाइ-पीबैक कोनो झंझट। ओना गामक बारह-चौदह आना लोकक हालतो रद्दिये। मुदा जे किसान परिवार छल ओ अपना ऐठाम मासमे एक-दू दिन जरुर नाच करबैत छलाह। ओ नटुआकेँ खाइयोले दैत छलथि आ कोनो-कोनो समानो कीनिकेँ दैत छलखिन। भोलो नाच पार्टीक अंग बनि गेल, डिग्री सेदैक जिम्मा भेटि गेलैक। डिग्री सेदैक जिम्मा भेटिते काजो बढ़ि गेलैक। घूरक लेल जारनोक ओरियान करए पड़ैत छलै। अपना काजमे भोला मस्त रहए लगल। मुदा एतबेसँ ओकर मन शान्त नहि भेलैक। काजक सृजन ओ अपनोहु करए लगल। स्टेजक आगूमे जे छोटका धिया-पुता बैसि पी-पाह करैत, ओकरो सभपर निगरानी करए लगल। आब ओ चुपचाप एकठाम नहि बैसैत। घूमि-घूमि कऽ महफिलोक निगरानी करए लगल। आरो काज बढ़ैलक। नटुआ सभकेँ बीड़ी सेहो लगबए लगल। बीड़ी सुनगबैत-सुनगबैत अपनो बीड़ी पीब सीखि लेलक। किछुए दिनक पछाति भोला बीड़ीक नमहर पियाक भऽ गेल। किएक तँ एक्के-दू दम जँ पीबए तैयो भरि रातिमे तीस-पैंतीस दम भऽ जाइत छलैक। जइसँ भरि राति मूड बनल रहैत छलैक।
बीड़ीक कसगर चहटि भोलाकेँ लागि गेलै। रातिमे तँ नटुऐ सभसँ काज चलि जाइत छलैक मुदा दिनमे जखन अमलक तलक जोर करैत तँ मन छटपटाए लगैत छलैक। मूडे भंगठि जाइत छलैक। मूड बनबैक दुआरे भोला बापक राखल बीड़ी चोरा-चोरा पीबए लगल। जहिक चलैत सभ दिन किछु नहि किछु बापक हाथे मारि खाइत। एक दिन एक्केटा बीड़ी रघुनीकेँ रहनि। भोला चोरा कऽ पीबि लेलक। कोदारि पाड़ि रघुनी गामपर एलाह तँ बीड़ी पीबैक मन भेलनि। खोलिया परसँ अानए गेलाह तँ बीड़ी नहि देखलनि। चोटपर भोला पकड़ा गेलै। सभ तामस रघुनी भोलापर उताड़ि देलखिन। मारि खाए भोला कनैत उत्तर मुँहेक रास्ता पकड़लक। कनिये आगू बढ़ल आकि करिया काकाक नजरि पड़लनि। भोलाक कानब सुनि ओ बूझि गेलखिन जे भीतरिया मारि लागल छै। पुचुकारिकेँ पुछलखिन- “की भेलौ रौ भोला?”
करिया काकाक बात सुनि भोला आरो हिचुकि-हिचुकि कानए लगल। हिचुकैत भोला कनिये जोरसँ काकाकेँ कहलकनि, जे कानबक अवाजमे हरा गेलैक। काका भोलाक बात नहि बुझलखिन। मुदा बिगड़लखिन नहि, दहिना डेन पकड़ि रघुनीकेँ कहए बढ़लथि। काकाकेँ देखि रघुनियोक मन पघिल गेलैक। काका कहलखिन- “रघुनी, भोला बच्चा अछि किऐक तँ बि‍आह नञि भेलैए। तेँ नीक हेतह जे बि‍आह करा दहक। अपन भार उतरि‍ जेतह। परिवारक बोझ पड़तै अपने सुधरत। अखन मारने दोषी हेबह, समाज अबलट्ट जोड़तह जे बाप कुभेला करैत छैक। जनिजातिक मुँह रोकि सकबहक ओ कहतह जे “माए मुइने बाप पित्ती।
करिया काकाक विचार रघुनीक करेजकेँ छेदि देलक। आँखिमे नोर आबि गेलैक। अखन धरि जे आँखि रघुनीक करिया काकापर छलैक ओ भोलाक गाल पड़क सुखल नोरक टघारपर पहुँचि अॅटकि गेलैक। मारिक चोट भोलाक देहमे निजाइये गेलैक जे संग-संग बि‍आहक बात सुनि मनमे खुशियो उपकलै। बुधि‍क हिसाबसँ भलहि‍ं भोला बुड़िबक अछि मुदा नाचमे मेल-फीमेल गीत तँ गबिते अछि।
पिताक हैसियतसँ रघुनी करिया काकाकेँ कहलखिन- “काका, हम तँ ओते छह-पाँच नहि बुझैत छिऐ, काल्हिये चलह कतौ लड़की ठेमा कऽ बि‍आह कइये देबै।
“बड़बढ़ियाकहि करियाकाका रास्ता घेलनि।
भोलाक बि‍आह भेला आठे दिन भेल छलैक कि पाँच गोटेक संग ससुर आबि रघुनीकेँ कहलकनि- “बि‍आहसँ पहिने हम सभ नहि बुझलिऐक, परसू पता लागल जे लड़का नाच पार्टीमे रहैए। नटुआ-फटुआ लड़काक संग अपन बेटीकेँ हम नहि जाए देब। तेँ ई संबंध नहि रहत। अपना सभमे तँ खुजले अछि। अहूँ अपन बेटाकेँ बियाहि लिअ आ हमहूँ अपना बेटीक दोसर बि‍आह कऽ देब। कहि पाँचो गोटे चलि गेलाह।
ससुरक बात सुनि भोलाक बुधि‍ये हरा गेलै। जहिना जोरगर बिर्ड़ो उठलापर सभ किछु अन्हरा जाइत छैक तहिना भोलोक मन अन्हरा गेल। दुनियाँ अन्हार लगए लगलैक। ओना तीन मास पहिनहि नाच पार्टी टुटि गेल छलैक। एकटा नटुआ एकटा लड़की लऽ कऽ पड़ा गेल छलैक, जइसँ गाम दू फाँक भऽ गेलैक। दू ग्रुपमे गाम बँटा गेलैक। सौंसे गाममे सनासनी चलै लगलैक। तइपरसँ भोला आरो दू फाँक भऽ गेल।
पाण्डु रोगी जकाँ भोलाक देहक खून तरे-तर सुखए लगलैक। मुदा की करैत बेचारा? किछु फुड़बे नहि करैत छलैक। ग्लानिसँ मन कसाइन होअए लगलैक। मने-मन अपनाकेँ धिक्कारए लगल। कोन सुगराहा भगवान हमरा जन्म देलनि जे बहुओ छोड़ि देलक। विचारलक जे ऐ गामसँ कतौ चलिये जाएब नीक होएत।
घरसँ भोला पड़ा गेल। संगी-साथीक मुँहसँ दिल्ली, कलकत्ता, बम्बइक विषएमे सुननहि रहए। जइसँ गाड़ियोक भाँज बुझले रहए। ने जेबीमे पाइ रहए, ने बटखरचा। सिर्फ दुइयेटा टाका संगमे रहए। अबधारि कऽ कलकत्ताक गाड़ी पकड़ि लेलक।
हबड़ा स्टेशन गाड़ी पहुँचते भोला उतरि‍ बिदा भेल। टिकट नहि रहनौं एक्को मिसिया डर मनमे नहि रहैक। निरमली-सकरीक बीच कहियो टिकट नहि कटबैत छल। एक बेर पनरह अगस्तकेँ सिमरिया धरि बिना टिकटे घुरि आएल रहए। प्लेटफार्मक गेटपर दूटा सिपाहीक संग टी.टी. टिकट ओसुलैत। भोलाकेँ देखि टी.टी.क मनमे भेलै जे दरभंगिया छी भीख मंगए आएल अछि। टिकट नहि मंगलकै। सिपाहियोकेँ बूझि पड़लै जे जेबीमे किछु छैक नहि। टिकटेबला यात्री जकाँ भोलो गेट पार भऽ गेल।
सड़कपर आबि आँखि उठा कऽ तकलक तँ नमहर-नमहर कोठा चौरगर
सड़क, हजारो छोटका-बड़का गाड़ी आ लोकक भीड़ भोला देखलक। मनमे भेलै जे भरिसक आँखिमे ने किछु भऽ गेल अछि। जहिना आँखि गड़बड़ भेने एक्के चान
सात बूझि पड़ैत तहिना। दुनू हाथे दुनू आँखि मीड़ि फेर देखलक तँ ओहिना। भीड़ देखि मनमे एलै जे जखन एत्ते लोकक गुजर-बसर चलैत छै तँ हमर किएक ने चलत। आगू बढ़ि लोकक बोली अकानए लगल। मुदा केकरो बाजब बुझबे नहि करैत। अखन धरि बुझैत जे जहिना गाए- महींस सभ ठाम एक्के रंग बजैत अछि
तहिना ने मनुक्खो बजैत होएत। मुदा से नहि देखि भेलैक जे भरिसक हम मनुक्खक जेरिमे हेरा ने तँ गेलौंहेँ। फेर मनमे एलै जे लोक तँ संगीक बीच हराइत अछि, असगरमे केना हराएत। विचित्र स्थितिमे पड़ि गेल। ने आगू बढ़ैक साहस होइ आ ने केकरोसँ किछु पूछैक। हिया हारि उत्तर मूँहे बिदा भेल। सड़कक किनछरिये
सभमे खाइ-पीबैक छोट-छोट दोकान पतिआनी लागल देखलक। भुख लगले रहै
मुदा अपन पाइ आ बोली सुनि हिम्मते ने होइत। जेबी टोबलक तँ दूटकही रहबे करै। मन पड़लैक मधुबनीक स्टेशन कातक होटल, जहिमे पाँच रुपैये प्लेट दैत।
ई तँ सहजहि कलकत्ता छी। ऐठाम तँ आरो बेसी महग हेबे करत। एकटा दोकानक आगूमे ठाढ़ भऽ गर अँटबए लगल जे नहि भात-रोटी तँ एक गिलास
सतुऐ पीबि लेब। बगए देखि दोकानदारे कहलक- “आबह, आबह बौआ। ठाढ़ किएक छह?”
अपन बोली सुनि भोला घुसुकि कऽ दोकान लग पहुँचि पुछलक- “दादा, केना खुआबए छहक?”
 “तीन मास पहिने धरि आठे आनामे खुआबै छेलिऐक। अखन बारह आनामे खुआबै छिऐ।
भोलाक मनमे संतोष भेल। पाइयेबला गहिकी जकाँ बाजल- “कुरुड़ करैले पानि लाबह।
भरि पेट खा आगू बढ़ल। ओना तँ रंग-विरंगक बस्तु देखैत मुदा भोलाक नजरि सिर्फ दुइये ठाम अँटकैत। देवाल सभमे साटल सिनेमाक पोस्टरपर आ सड़कपर चलैत ठेलापर। जइ पोस्टरमे डान्स करैत देखए ओइठाम अॅटकि सोचए जे ई नर्तकी मौगी छी आकि पुरुख। गाम-घरमे तँ पुरुखे मौगी बनि डान्स करैत अछि। फेर मन पड़लै संगीक मुँहे सुनल ओ बात जे कहने रहए सत्य हरिश्चन्द फिल्ममे
मर्दे मौगियोक रौल केने रहए। गुनधुन करैत बढ़ल तँ अपने जकाँ छौड़ाकेँ
ठेला ठेलने जाइत देखि सोचए लगल जे ई काज तँ हमरो बुते भऽ सकैत अछि। गाड़ीक ड्राइवरी तँ करए नहि अबैत अछि। बिना सिखने रिक्शो केना चलाओल हएत? ततमत करैत आगू बढ़ल। सड़कक बगलेमे एकटा ठेलाबलाकेँ चाह पीबैत देखलक। ओइठाम जा कऽ ठाढ़ भऽ गेल। चाह पीबि ठेलाबला पुछलक- “कोन गाँ रहै छह?”
“विशौल।
“हमहूँ तँ सुखेते रहै छी। चलह हमरा संगे।
गप-सप्‍प करैत दुनू गोटे धर्मतल्लाक पुरना धर्मशाला लग पहुँचल, ठेलाकेँ सड़केपर छोड़ि दीनमा भोलाकेँ धर्मशालाक भीतर लऽ जा कऽ कहलक- “समांग असकरे कतौ जैहह नहि। हरा जेबह। हम एक ट्रीप मारने अबै छी।
टंकीपर हाथ-पएर धोए भोला दीनमासँ बीड़ी मांगि पीबि, पीलर लगा ओँगठि कऽ बैसि गेल। आँखि उठा कऽ तकलक तँ झड़ल-झुरल देवालक सिमटी, तैपर कतौ-कतौ बर-पीपरक गाछ जनमल देखलक। पैखाना कोठरीक आ पानिक टंकीक आगूमे ठेहुन भरि किचार सेहो देखलक मन पड़लैक गाम। नाच-पार्टी टूटि गेल, घरवाली छोड़ि देलक। दू पाटी गाम भऽ गेल। सोचितहि-सोचिते निन्न आबि गेलैक। बैसिले-बैसल सूति रहल।
गोसाँइ डूबिते बुचाइ -दोसर ठेलाबला- आबि भोलाकेँ जगबैत पुछलक- “कोन गाम रहै छह?”
आशा भरल स्वरमे भोला बाजल- “बिशौल।
विशौलक नाओं सुनिते मुस्की दैत बुचाइ पुछलक- “रूपनकेँ चीन्है छहक?”
“उ तँ हमरा कक्के हएत।
अपन भाएक ससुर बूझि भोलासँ सार-बहिनोइक संबंध बनबैत कहलक- “चलह, पहिने चाह पीबी। तखन निचेनसँ गप-सप्‍प करब।
कहि टंकीपर जा बुचन देह-हाथ धोए, कपड़ा बदलि भोलाकेँ संग केने दोकानपर गेल। आँखिक इशारासँ दोकानदारकेँ दू-दूटा पनितुआ, दू-दूटा समौसा दैले कहलक। दुनू गोटे खा, चाह पीबि पानक दोकानपर पहुँचि बुचइ पान मंगलक। पान सुनि भोला बाजल- “पान छोड़ि दियौ। बीड़िये कीनि लिअ।
बीड़ी पीबैत दुनू गोटे धर्मशालाक भीतर पहुँचल। एका-एकी ठेलाबला सभ अबए लगलैक। बिशौलक नाओं सुनिते अपन-अपन संबंध सभ फरियबए लगल। संबंध स्थापित होइते चाहक आग्रह करैत। चाह पीबैत-पीबैत भोलाक पेट अगिया गेलै। अखन धरिक जिनगीमे एहेन सि‍नेह भाेलाकेँ पहिल दिन भेटलै। ठेलाबला परिवारक अंग भोला बनि गेल। भोलाक सभ व्यवस्था ठेलाबला सभ कऽ देलक। दोसर दिनसँ ठेला ठेलए लगल।
शनि दिनकेँ सभ ठेलाबला रौतुका शो सिनेमा देखए जाइत। ओइ शोमे एक क्लासक कन्सेशन भेटैत अछि। भोलो सभ शनि सिनेमा देखए लगल।
चौदह मास बीतलाक बाद भोला गाम आएल। नव चेहरा नव बिचार भोलाक। घरक सभले कपड़ा अनने अछि। धिया-पुताकेँ दू-दूटा चौकलेट देलक। धिया-पुताकेँ चौकलेट देखि एका-एकी जनिजातियो सभ अबए लगलीह। झबरी दादी आबि भोलाकेँ देखि बजए लगलीह- “कहू तँ ऐ सँ सुन्नर पुरुख केहेन होइ छै जे सौंथ जरौनियाँ छोड़ि देलकै।
दादीक बात भोलाकेँ बेधि देलक। आँखि नोराए लगलैक। रघुनीक मन सेहो कानए लगलै। दोसरे दिन रघुनी लड़की ताकए घरसँ निकलल। ओना लड़कीक तँ कमी नहि, मुदा गाम-घर देखि कऽ कुटुमैती करैक विचार रघुनिक मनमे रहै। लड़कीक कमी तँ ओइ समाजमे अधिक अछि जहिमे भ्रूण-हत्याक रोग धेने छैक। समयो बदलल। गिरहस्त परिवारसँ अधिक पसन्द लोक नोकरिया परिवारकेँ करैत अछि। बगलेक गाममे भोलाक बि‍आह भऽ गेल।
बि‍आहक तीनिये दिन पछाति कनियाँक बिदागरियो भऽ गेलैक आ पाँचमे दिन अपनो कलकत्ता चलि देलक।
सालक एगारह मास भोला कलकत्ता आ एक मास गाममे गुजारए लगल। गाम अबैत तँ अपनो घरक काज सम्हारि अनको सम्हारि दैत।
तेसर साल चढ़िते भोलाकेँ जौआँ बेटा भेलै। नवम् मास चढ़िते ओ गाम आबि गेल। मनमे आशो बनले रहैक जे पाइ-कौड़ीक दिक्कत तँ नहिये हएत। सभ ठेलाबला अपन संस्था बना पाइ-कौड़ीक प्रबन्ध अपने केने अछि। मुदा पहिल बेर छी, कनियाँक देखभाल तँ कठिन अछिये। सरकारीक कोनो बेवस्थो नहिये छैक। मुदा समाजो तँ समुद्र थिक। बिनु कहनौं सेवा भेटैत अछि। जइसँ भोलोकेँ कोनो बेसी परेशानी नहिये भेलैक।
समय आगू बढ़ल। पाँच बर्ख पुरिते भोला दुनू बेटाकेँ स्कूलमे नाओं लिखौलक। शहरक वातावरणमे रहने भोलोक विचार धिया-पुताकेँ पढ़बै दिस झुकि गेल रहैक। मनमे अरोपि लेलक जे भलेही खटनी दोबर किऐक ने बढ़ि जाए मुदा दुनू बेटाकेँ जरुर पढ़ाएब। अपन आमदनी देखि पत्नीक ऑपरेशन करा देलक। जइसँ परिवारो समटले रहलैक।
पढ़ैमे जेहने चन्सगर रतन तेहने लाल। क्लासमे रतन फस्ट करैत आ लाल सेकेण्ड। सातवाँ क्लास धरि दुनू भाँइ फस्ट-सेकेण्ड स्कूलमे करैत रहल। मुदा हाइ स्कूलमे दुनू भाँइ आर्ट लऽ पढ़ए लगल जइसँ क्लासमे कोनो पोजीसन तँ नहिये होइत मुदा नीक नम्बरसँ पास करए लगल।
मैट्रिकक परीक्षा दऽ दुनू भाँइ कलकत्ता गेल। अखन धरि आने परदेशी जकाँ अपनो पिताकेँ बुझैत छल। तेँ मनमे रंग-विरंगक इच्छा संयोगने कलकत्ता पहुँचल रहए। मुदा अपन पिताक मेहनत, -छातीक बले ठेला घीचैत देखि- पराते भने गाम घुमैक विचार दुनू भाँइ कऽ लेलक। पितेक जोरपर तीनि दिन अँटकल। मुदा किछु कीनैक विचार छोड़ि देलक। मेहनतक कमाइ देखि अपन इच्छाकेँ मनेमे दुनू भाँइ दाबि लेलक। मुदा तैयो भोला दुनू बेटाकेँ फुलपेंट, शर्ट, धड़ी, जुत्ता कीनि कऽ देलखिन।
तीन मासक उपरान्त मैट्रिकक रिजल्ट निकललै। दुनू भाँइ-रतनो आ लालो- प्रथम श्रेणीसँ पास केलक। फस्ट डिवीजन भेलोपर आगू पढ़ैक विचार मनमे नहि अनलक। उपार्जनक लेल सोचए लगल। नोकरीक भाँज-भुँज लगबै लगल। नोकरियोक तँ वएह हाल। गामक-गाम पढ़ल बिनु पढ़ल नौजवानक फौज तैयार अछि। एक काजक लेल हजार हाथ तैयार अछि। जइसँ समाजक मूल पूँजी –मानवीय- आगिमे जरैत सम्पति जकाँ नष्ट भऽ रहल अछि।
समए मोड़ लेलक। पढ़ल-लिखल नौजवानक लेल नोकरीक छोट-छीन दरबज्जा खुजल। गामक स्कूलमे शिक्षा-मित्रक बहाली होअए लगलैक। जइसँ नव ज्योतिक संचार गामोक पढ़ल लिखल नौजवानमे भेलैक। ओना समएक हिसाबसँ शिक्षा मित्रक मानदेय मात्र खोराकी भरि अछि, मुदा बेरोजगारीक हिसाबसँ तँ नीक अछिये। बगलेक गामक स्कूलमे रतनो आ लालोक बहाली भऽ गेलैक। पाँच तारीककेँ दुनू भाँइ ज्वाइन करत।
आगू नहि पढ़ैक दुख जते दुनू भाँइक मनमे नहि रहैक तइसँ बेसी खुशी नोकरीसँ भेलैक। कोपर बुधि‍मे कलुषताक मिसियो भरि आगमन नहि भेलैक अछि। दुनू भाँइ बैसि कऽ अपन परिवारक संबंधमे विचारए लगल। रतन लालकेँ कहलक- “बौआ, कोन धरानी बाबू अपना दुनू भाँइकेँ पढ़ौलनि से तँ देखले अछि। अपनो सभ एक सीमा धरि पहँचि गेल छी। तेँ अपनो सबहक की दायित्व बनैत अछि, से तँ सोचए पड़तह?”
रतनक बात सुनि लाल बाजल- “भैया, अपना सभ ओइ धरतीक सन्तान छी जइ धरतीपर श्रवण कुमार सन बेटा भऽ चुकल छथि। पाँच तारीकसँ पहिनहि बाबूकेँ कलकतासँ बजा लहुन। हम सभ ठेलाबलाक बेटा छी, ऐ मे कोनो लाज नहि अछि। मुदा लाजक बात तहन हएत जहन ओ ठेला घीचताह आ अपना सभ कुरसीपर बैसि दोसरकेँ उपदेश देबै।
मूड़ी डोला स्वीकार करैत रतना बाजल- “आइये बाबूकेँ जानकारी दऽ दैत छि‍यनि‍ जे जानकारी पबिते गाड़ी पकड़ि घर चलि आउ। पाँच तारीखकेँ दुनू भाँइ ज्वाइन करए जाएब। दुनू भाँइक विचार अछि जे अहाँकेँ गोर लागि घरसँ डेग उठाएब।
दुनू भाँइक विचार सुनिते माएक मन सुख-दुखक सीमापर लसकि गेलनि। जरल घराड़ीपर चमकैत कोठा देखए लगलीह। आँखिमे नोर छलकि गेलनि। मुदा ओ दुखक नहि सुखक छलनि।

हारि‍-जीत :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल


चारिमे दिन दुनू प्राणी सोमन विचारलक जे आब ऐ गाममे जीयब कठिन अछि तेँ गामसँ चलिये जाएब नीक हएत। दुनियाँ बड़ी टा छैक। जतए जीबैक जोगार लागत ततए रहब। सामान सभ बान्हि, करेजपर पाथर राखि गामसँ जेबाक लेल दुनू प्राणी तैयार भऽ गेल। भुखल पेट! सुखाएल मुँह! निराश मन! ओसारपर बैसल दुनू प्राणीक आँखिसँ दहो-बहो नोर टघरैत रहै! दुनियाँ अन्हार देखि, उठैक साहसे नहि होइत छलै। सोमनक मनमे होइत जे की छलौं आइ की भऽ गेलौं? रंग-बिरंगक विचार, पानिक बुलबुला जकाँ दुनूक मनमे उठैत आ विलीन भऽ जाइत! आगूमे मोटरी राखल रहै। जहिना सीमा परहक सिपाही छातीमे गोली लगलासँ घाइल भऽ जमीनपर खसि छटपटाइत, तहिना दुनू प्राणी सोमन दुखक अथाह समुद्रमे डुबैत-उगैत। भिनसरसँ बारह बजि गेलैक।
सहरसा जिलाक गाम मैरचा। पूबसँ कोसी आबि गामक कटनिया करए लागल। गर लगा-लगा गामक लोक जहाँ-तहाँ पड़ाए लगलाह। ओना सरकार पुबरिया बान्हक बाहर पुनर्वासक व्यवस्था सेहो करैत रहए मुदा ओइसँ बोनिहारकेँ की सुख हएत? ओकरा सबहक तँ रोजगारो छिना गेल।
पत्नी, बेटा-पुतोहुक संग फुलचनो पंडित गाम छोड़ि पछिम मुँहे बिदा भेलाह। घराड़ी छोड़ि अपना एक्को बीत जमीन-जाएदाद नहि छलनि। मुदा अपन व्यवसाएक सभ लूरि छलनि तेँ मनमे चिन्तो ओतेक नहि रहनि। चिन्ता मात्र रहनि ठौर भेटबाक। कखनो-कखनो मनमे होन्‍हि‍ जे अपन गाम तँ बुझल- गमल अछि, आन गाम केहन होएत केहन नहि? मुदा उपाइये की? जीबैक लेल तँ मनुष्य सभ किछु करैत अछि। पछबरिया बान्हसँ मील भरि पाछुये रहथि आकि बान्हपर नजरि पड़लनि। बान्ह देखिते आशा जगलनि। किएक तँ ओइ बान्हक पछिम कोनो धार-धुर नहि अछि। मुस्कुराइत फुलचन पत्नीसँ पुछलक- “भगवान रामक खिस्सा बुझल अछि?”
फुलचनक मुँह दिस देखि मुनिया बजलीह- “बहुत दिन पहिने सुनने छेलौं, आब ओते धियान नै अए।
“जहिना अपना सभ गाम छोड़ि कऽ जा रहल छी तहिना ओहो सभ गेल रहथि। अपना सभकेँ तँ बटखरचो अछि, हुनका सभकेँ तँ सेहो नै रहनि।
तइ बीच फुलचनक पुतोहु कपली सासुक बाँहि पकड़ि पाछू मुँहे घुमा कहलक- “ऐँड़ीकेँ डोका काटि देलक। खुन बहैए। कनी कतौ बैसथु जे लत्ता बान्हि देबै।
ऐँड़ी देखि मुनिया कहलखि‍न- “कनियाँ, कतौ गाछो ने देखै छिऐ जे कनी सुस्ताइयो लैतौं। हमरो पियासे कंठ सुखैए।
सासु-पुतोहुक बात सुनि फुलचन बाजल- “कनियाँ, जानिये कऽ तँ दैवक डाँग लागल अछि, तखन तँ कहुना कऽ बान्ह धरि चलू। एक तँ रौदाइल छी तइपर सँ जत्ते काल अँटकब तते रौदो बेसिये लागत।
बान्हपर पहुँचते सभ निसाँस छोड़लनि। बान्हक पछिमसँ एकटा आमक गाछ रहै। छाहरि देखि सभ कि‍यो गाछ तर पहुँचि‍ गेलाह। एकटा बटोही पहिनहिसँ तौनी बिछा पड़ल छल। कने काल सुस्तेलाक बाद बटोहीकेँ फुलचन पुछलखिन- “भाय, तमाकू खाइ छह?”
जेबीसँ चुनौटी निकालि फुलचनक आगूमे फेकैत ओ बटोही बाजल- “कोन गाम जेबह?”
कोन गामक नाओं सुनिते फुलचनक हृदए सिहरि गेलनि। मिरमिरा कऽ कहलखि‍न- “भाय, कोन गाम जाएब तेकर तँ ठेकान नहि अछि। मुदा मैरचासँ एलौंहेँ। धारमे गाम कटि रहल अछि। तेँ गाम छोड़ि जा रहल छी। जइ गाममे कुम्हार नञि हएत तइ गाममे बसि जाएब।
कुम्हारक नाओं सुनिते बटोही उठि कऽ बैसैत कहलखिन- “हमरो गाममे कुम्हार नै अछि। चलह, हमरे गाममे रहि जइहह।
आशा देखि सोमन पुछलकनि- “ऐठामसँ कत्ते दूर अहाँक गाम अछि?”
“अढ़ाइ कोस। हमहूँ बहि‍नि‍ये ऐ ठीनसँ अबै छी। गामे जाएब।
बेर झुकैत पाँचो गोटे बिदा भेलाह। लछमीपुर पहुँचते बटोही रतीलाल फुलचनकेँ कहलक- “भाइ, यएह हमर गाम छी।
गाछी बँसबाड़ि देखि फुलचन पंडित मने-मन खुश! मने मन आकलन कएलनि जे जारनक अभाव कहियो नहि हएत। गाममे प्रवेश करिते बीघा दुइयेक पोखरि देख फुलचन मने-मन तेँइ कएलनि जे नहि कतौं रहैक ठौर भेटत तँ पोखरिक महार तँ अछि। पोखरिक बगलेमे सभ क्यो रुकि जाइ गेलाह। रत्तीलाल आगू बढ़ि गेलाह।
जहिना गाममे नट-किच्चककेँ अबिते धिया-पुता देखए अबैत तहिना फुलचनो सभ तुरकेँ देखए गामक धिया-पुता आबए लागल। गाममे कुम्हार अएबाक समाचार पसरल। थोड़े कालक बाद फुलचन पंडित बेटा सोमनकेँ हाथ पकड़ि कहलखि‍न- “बौआ, तूँ सभ एतै बैसह। हम कने गामक बाबू-भैया सभसँ भेँट केने अबै छी।
कहि फुलचन गाम दिस बिदा भेलाह। इजोरिया पख रहै तेँ सूर्यास्त भेलोपर दिने जकाँ लगै। जाधरि फुलचन घुरि कऽ अएबो नहि कएलाह तहिसँ पहिनहि गामक पनरह-बीस टा नवयुवक पहुँचि‍ गेल। सबहक मनमे नव उत्साह रहै। किएक तँ अखन धरि जे अभाव कुम्हारक गाममे रहल ओ पूर्ति भऽ रहल अछि। जहिना आवश्यकताक वस्तु पूर्ति भेलासँ किनको मनमे खुशी होइ छै, तहिना फुलचनक अएलासँ गामक लोकक मनमे खुशी रहै। पोखरिसँ थोड़े हटि कट्ठा तीनियेक परती छलै। सभ युवक विचारलक जे ओइ परतीपर बसाओल जाए। ताधरि गाम घुि‍र कऽ फुलचनो अएलाह। फुलचन दुनू बापुत परती देखलनि। परती देखि सोमन पिता दिस घुमि बाजल- “कुम्हारक बसै जोकर परती अछि, मात्र पिऐबला पानिक दिक्कत अछि।
तइपर पिता फुलचन पंडित जबाव देलनि- “अखन ने पानिक दिक्कत अछि मुदा जखन अपने इनार खुनैयोक आ पाटो बनबैक लूरि अछि तखन दिक्कत किए रहत?”
घराड़ी पसन्द होइते हो-हा करैत युवक सभ बाँस काटए बिदा भेलाह। जे जेहन बाँसबला, तिनकामे तइ हिसाबसँ बाँस काटि पच्चीसटा बाँस जमा केलनि। इहो दुनू बापुत संग दैत रहथिन। हाथे-पाथे सभ घरक काजमे जुटि गेलाह। रातिक बारह बजैत-बजैत तेरह हाथक घर ठाढ़ भऽ गेलैक।
प्रात भेने दुनू बापूत विचारलनि जे एक तँ नव गाम, तहूमे नव बाँस। काज तँ बहुत अछि। तेँ काजकेँ सोझरा कऽ चलए परत। रहै जोकर घर भलहि‍ं नहि भेल मुदा दिन कटै जोकर तँ भइये गेल। घर-आंगन बनबैसँ लऽ कऽ कारोबार धरिक काजमे हाथ लगबए पड़त। फुलचन सोमनसँ पुछलखिन- “बौआ, मैरचासँ कोन-कोन समान अनने छह?”
सोमन कहलक- “बाबू, सोचलौं जे आन गाममे लगले सभ कुछ थोड़े भऽ जाएत। तेँ चाक बनबैक शिला, तख्ता, फट्ठा, जौर, बेलक कील सभ किछु अनने छी।
खुशीसँ गद-गद होइत फुलचनक मुँहसँ निकलल- “बाह-बाह। चाकक ओरियान तँ भइये गेलह। आरो की सभ अनने छह?”
“चकैठ, हथमैन, पिटना, पीरहुर, मजनी, छन्ना सेहो अनने छी।
मुस्कुराइत फुलचन बाजल- “काजक तँ सभ किछु अछिए। आइए चाको बनबैमे हाथ लगा दहक। एक गोरे पात खरड़ि अनिहह। एक गोरे घरक लेबिया-मुनियामे हाथ लगा दहक। हमरा तँ समचे सभ ओड़िअबैमे समए बीत जेतह।
दस दिनक मेहनतिसँ रहै जोकर एकटा घर बनि गेलै। चाको सुखा गेल। जारनोक ओरियान भऽ गेलैक। चाक गारि, माटि बना सोमन चाक लग बैसल। जहिना उद्योगपतिकेँ नव कारखानाक उद्घघाटन दिन मनमे खुशी रहै छै, आइ तहिना सभ प्राणी फुलचनोकेँ रहनि। हँसैत फुलचन पंडित बेटा दिस देखैत बजलाह- “बौआ, जते सामान बनबैक लूरि अछि, सभ सामान बना, पका कऽ खरिहानमे पसारि, सौंसे गौवाँकेँ हकार दऽ देखा देबनि। जिनगीक परीक्षा छी।
आबा उघारि चारु गोटे खल लगा-लगा सभ वस्तु- कूड़, हाथी, ढकना, कोशिया, दीप, पाण्डव, गणेश, लक्ष्मी, मटकूर, छाँछी, डाबा, घैल, सामा-चकेबा, पुरहर, अहिबात, कोहा, फुच्ची, सरबा, सीरी, भरहर, आहूत, धुपदानी, पातिल, तौला, मलसी, बसनी, उन्नैसमासी, कोही, लाबनि, कलश, कराही, रोटिपक्का, अथरा, कसतारा, लग्जोरी, धिया-पुता खेलैक जाँत, नादि, लोइट, माँट, टारा, टारी, बधना इत्यादि चारि-चारि खल पावनिक, बिआहक, उपनयनक, श्राद्धक, पोखरिक यज्ञ-कीर्तनक आ घरैलू काजक वस्तु सभ अलग-अलग सजा कऽ राखल। फुलचन दुनू बापूत जा गौवाँकेँ देखैक हकार देलनि।
चारु प्राणी फुलचनकेँ अपना लूरिक ठेकान नहि छलन्हि ि‍कऐक तँ सभ काजक लेल एकबेर सभ समान कहियो नहि बनौने छलाह। मुदा आइ सभटा बना सभकेँ ई विश्वास भऽ गेलनि जे जहिना बड़का व्यापारिक दोकानमे अनेको किस्मक सौदा रहै छै तहिना तँ हमरो अछि!
समए बीतैत गेल। अधिक बएस भेने दुनू प्राणी फुलचन शरीरसँ कमजोर हुअए लगलाह। सोमनोकेँ एकटा बेटा, एकटा बेटी भेलै। परिवार बढ़लै। खरचो बढ़लै।
समए आगू मुँहे ससरैत गेल। दुनू प्राणी फुलचन मरि गेलाह। ....बेटीक बियाह सेहो सोमन कऽ लेलक। सोमनक बेटा रामदत दुर्गापूजा देखए मात्रिक गेल। ओतहिसँ बौर गेल। माटिक बरतनक जगह द्रव्यक बर्तन सभ परिवारमे धीरे-धीरे बढ़ए लगलै। जइसँ माटिक बर्तनक मांग कमए लगल। घटैत-घटैत माटिक बरतन परिवार छोड़ि देलक। रहि गेल मात्र पावनि, उपनयन, बि‍आह आ श्राद्ध।
अपन घटैत कारोबार आ टूटैत परिवारसँ दुनू प्राणी सोमन चिन्तित होअए लागल। आगूक जिनगी अन्हार लागए लगलै। कोनो रस्ते नहि देखाइ। सोचैत-बिचारैत सोमनक नजरि एकटा काजपर पड़लै। खपड़ा बनौनाइ। खपड़ापर नजरि पहुँचते मुस्कुराइत सोमन पत्नीकेँ कहलक- “एकटा बड़ सुन्दर काज अछि। कमाइयो नीक आ काजो माटियेक।
अकचकाइत पत्नी कपली पुछलकनि- “कोन काज?”
सोमन- “खपड़ा बनौनाइ।
कने काल गुम रहि कपली बाजलि- “थोपुआ खपड़ा तँ हमहूँ बना सकै छी मुदा नड़िया नै हएत।
जोर दैत सोमन बाजल- “हँ, हएत! चाक परक भलहि‍ं नञि हूअए मगर मुंगरी परक किअए ने हएत।
“हँ, से तँ हएत।
दुनू प्राणी खपड़ा बनबए लगल। लोककेँ बुझल नहि रहै तेँ अगुुरबार क्यो खोज नहि केलक। मुदा जखन एकटा भट्ठा लगौलनि तखन गामक लोक देखलखिन। खपड़ो नीक, पाको बढ़ियाँ। गिनतियेक हिसाबसँ खपड़ा बेचए लगल। बढ़िया आमदनी हुअए लगलनि।
बढ़िया कारोबार चलल। मुदा सिमटिक एस्बेस्टस अबिते खपड़ाक मांग कमए लगल। खपड़ा बनौनिहारकेँ मंदी आबि गेलनि। ओना सोमनक परिवारो छोट रहै। मात्र दुइये गोटे परिवारमे रहै। मुदा तैयो गुजरमे कटमटी हुअए लगलै। फेर जिनगी भारी हुअए लगलै।
हँसी-खुशीसँ जीवन-यापन करैबला परिवार एहेन स्थितिमे पहुँचि गेल जे साँझक-साँझ चुल्हि नहि पजरैत। दोसर कोनो लूरि नहि। अपन खसैत जिनगी देखि कपली पतिक मुँह दिस तकैत बाजलि- “एना कते दिन दुख काटब? जखन हाथ-पएर तना-उताड़ अछि आ काज करए चाहै छी तखन की अही गामकेँ सीमा-नाङरि छैक? चलू ऐ गामसँ।
पत्नीक विचार सुनि सोमनक आँखि नोरा गेलै। किछु बजैक हिम्मते नहि
होइ। मने-मन सोचए लागल जे जइ लूरिक चलते अखन धरि जीलौं ओ लूरि
आब मरि रहल अछि। दोसर लूरि तँ अछि नहि। की करब? असमंजसमे पड़ल पतिकेँ देखि कपली बजलीह- “दुनियाँ बड़की टा छै। जतै पेट भरत ततै रहब। जहिना मैरचासँ आबि लछमीपुरमे एते दिन रहलौं तहिना ऐ गाम छोड़ि दोसर गाममे रहब।
पत्नीक विचारसँ सहमत होइत सोमन बाजल- “अहाँक विचार मानि लेलौं। ऐ गामसँ चारिम दिन चलि जाएब। बीचमे जे दू दिन बाँचल अछि तइमे अहूँ आ हमहूँ गाममे टहलि कऽ सभकेँ जना दिअनु जे जहिना एक दिन हँसी-खुशीसँ छाती लगेलौं तहिना आब जा रहल छी। चुपचाप गामसँ चलि जाएब नीक नै हएत। गामसँ तँ चुपचाप ओ भगैत अछि जे अधलाह काज केने रहैत अछि।
दुआरिए-दुआरिए दूनू प्राणी गाममे घुरि सभकेँ कहि देलकै- “गामसँ चलि जाएब।
प्रात होइते दुनू प्राणी घरक सभ सामानक मोटरी बान्हि ओसारपर रखलक। भुखल पेट! सुखाएल मँुह! निराश मन! तेँ आगू बढ़ैक डेगे नै उठैत।
ओसारापर बैसल एक-दोसराक मँुहो देखैत आ कनबो करैत। दुनूक करेज छहोछीत भऽ गेल।
सबा बारह बजैत। टहटहौआ रौद। हवा शान्त। साफ मेघ। घामसँ तर-बत्तर, माथपर मोटरी, हाथमे वी.आइ.पी. बैग नेने सोमनक बेटा रामदत आंगन पहुँचल। माए-बापक दशा देखि छाती काँपए लगलैक। मेह जकाँ आगूमे ठाढ़। सोगे दुनूक आँॅखि बन्न। बन्न आँखिसँ नोर टघरैत! दुनू अधीर। करेजकेँ थीर करैत रामदत बाजल- “बाबू।
बाबू शब्द कानमे पड़िते दुनू बेकतीक आँखि खुजलै। मुदा नोर टघरिते रहै। किन्तु आब नोरक रूप बदलए लगल। अखन धरि जे नोर सोगसँ खसैत ओ सि‍नेहमे बदलि गेलै। अकचकाइत सोमनक मुँहसँ निकलल- “बौआ।
बिचहिमे झपटि कपली बाजलि- “बे ट-ट-अ-आ।
ओसारापर बैग-मोटरी राखि रामदत पिताकेँ गोड़ लगै लए झुकल की तइ बीच कपली उठि कऽ दुनू हाथे पजिया कऽ पकड़ि चुम्मा लैत पुनः बाजलि- “भाग नीक छेलौ बेटा जे हम सभ भेँट भेलियौ, नञि तँ तोँ कतऽ रहितेँ आ हम सभ कतऽ रहितौं.......!
माएकेँ गोड़ लागि रामदत मोटरी खोलि दू किलो भरिक रसगुल्लाक पोलीथिन, किलो रि कटलेट, किलो भरिक बीकानेरी भुजियाक झोरा निकालि, घुसुका कऽ रखलक। दुनू प्राणीक भुखसँ जरल मन रहै। जहिना गाएक गौजुरा बच्चा माएक थन दिस आँखि गड़ा देखैत रहैत, तहिना रसगुल्ला, भुजिया दिस दुनूक नजरि एकाग्र भऽ गेलै। दुनूक लेल नव वस्त्र निकालि फुटा-फुटा रखलक। चमकैत स्टीलक थारी, लोटा, गिलास, बाटी एक भागमे रखलक। चाह बनबैक केटली, कप, छन्ना, आयरन, नारियल तेलक डिब्बा आरो-आरो सामान निकालि चद्दरिकेँ झाड़लक। जहिना चुल्हिक आगिमे उपरसँ थोड़बो पानि पड़लासँ उपर ठंढ़ापन अबै लगैत, तहिना दुनूक नजरि चीज-वस्तु देखि शीतल हुअए लगलै। एकदम स्नानोपरान्तक शीतलता जकाँ! सोमनक शीतल मनसँ मधुर शब्द निकललै- “बच्चा गरमाएल छह। पहिने नहा लएह। तखन मन चैन हेतह।
माए-बापक मँुह देखि रामदत बाजल- “बाबू हमरो भूख लागल अछि। पहिने कनी-कनी खा लिअ। पछाति नहाएब।
कहि रसगुल्लाक पोलीथिनक गिरह खोलि दू बाकुट सोमनक आगू स्टीलक थारीमे आ दू बाकुट कपलीक थारीमे दऽ कटलेट, भुजियाक गिरह खोलि बाजल- “जते मन हुअए तते खाउ। नहाइक कोनो धड़फड़ी थोड़े अछि?”
अपनो मँुहमे रसगुल्ला दैत, बैग खोलि, मनी बैग निकालि रामदत सोमनक आगूमे देलकनि। रूपैया देखि कपलीक मन टिकुली जकाँ पहाड़पर चढ़ि गेल। धरतीकेँ गोड़ लगलनि।
खाइत-नहाइत बेेर टगि गेलै। पछबरिया घरक छाहरि अधा आंगन पसरि गेल। घरक कोनमे जहिना मोथीक पुरना बिछान बिछौल छल तहिना बिछौले रहै। घरसँ बिछान निकालि कपली पछबरिया ओसार लगा बिछौलक। उपरसँ नवका जाजीम बिछौलक। नवका सिरमा रखलक। तीनू गोटे बैसि गप-सप्‍प करए लगलाह। सोमन- “बौआ, तू बौर केना गेलहक?”
मन पाड़ैत रामदत बाजल- “बाबू हम बौरुलौं कहाँ! मामा गाममे मुजफ्फरपुरक छलगोरिया दुर्गाक मुरती बनबैले आएल रहै। ओहो कुम्हारे रहए। तीन गोरे रहै। ओकर छोटका बेटा हमरे एतेटा रहै। ओकरासँ हमरा दोस्ती भऽ गेल। ओकरे संगे चलि गेलियह।
बिचहिमे कपली टपकलीह- “रौ डकूबा, तोरा चिठियो-पुरजी नञि पठौल भेलौ।
अपनाकेँ स्मरण करैत रामदत बाजल- “माए, काज सिखैमे सभ किछु बिसरि गेल रहियौ। तोरो सबहक हालत तँ बँढ़िये रहौ। तखन चिन्ते कथीक करितौं।
सामंजस्य करैत सोमन- “जहिया जे दुख लिखल छल से भोगलौं। यएह तँ भगवानक लीला छि‍यनि‍। कखनो दुख तँ कखनो सुख।
रामदत- “बाबू एहेन दशा भेलह केना?”
बेटाक बात सुनि सोमनक आँखि भरि गेल, उत्तर देलक- “बौआ, अखन धरिक जते लूरि-बुधि‍ छलए से सभ पुरान भऽ गेल। नवका सिखलौं नै।
पिताक बात सुनि रामदत नमहर साँस छोड़ि मुस्कुराइत कहलक- “बाबू, हमरा तँ छुट्टिये नै दैत रहए। बीस-बीस हजार रूपैया मासमे कमाइ छी। तइपर सँ मूर्ति बनबौनिहारक कतार लागल रहैए।
बिचहिमे कपली टोकलकनि- “बेटा, की सभ लूरि छौ?”
मुस्कुराइत रामदत कहए लगलनि- “माए, माटिसँ लऽ कऽ सिमटी धरिक मुरती, नाच-तमाशाक परदा, घर सभमे चित्र सभ बनबैक लूरि अछि।
बेटाक बात सुनि सोमनक अहं जगलै। बाजल- “बौआ, जहन एते कमाइक लूरि छह, तहन नोकरी किए करै छह?”
मुस्कुराइत रामदत कहलकनि- “एते दिन जे नोकरी केलौं ओ नोकरी नञि भेल। साल भरि तँ माटिये सनैमे लागि गेल। साल भरि खढ़ बन्हैमे आ पहिल माटि लगबैमे चलि गेल। तेसर साल मुरती बनबैमे लागल। चारिम साल मुरतीक आँखि बनबैमे लागल। ऐ साल पाँचम बर्ख, गुरु दैछना चुका अएलौंहेँ। आब अपन कारोबार करब। जखने अपन कारोबार हएत तखने ने दू-चारि गोटे सिखबो करत!
अपन मजबूरी देखबैत सोमन कहल- “बौआ, अपन चिन्ता जते शरीरकेँ नै खेलक तइसँ बेसी तोहर खेलक। किअए तँ हरदम मनमे नचैत रहए जे वंश अंत भऽ गेल। जाबे दुनू परानी छी ताबै धरि....। मुदा आइ सबुर भऽ गेल जे जाबे बीटमे बाँसक चढ़न्त रहै छै, ताबे उन्नैससँ बीस होइत जाइ छै मुदा निच्चाँ मुँहे होइते सरसरा कऽ कोपरो सुखए लगै छै। आशा भऽ गेल जे हमरो वंश एकसँ एक्कैस हएत!

बेटाकेँ आधुनिक मुर्तिकार रूपमे पाबि सोमन गद्-गद् भऽ गेल। हृदए अह्लादसँ भरि गेलै! नजरि सहजहि बेटाक नजरिमे गड़ि गेलै। ध्यान बढ़ंत बाँसक बीटमे बिचरण करए लगलै...! मनमे भेलै जे बेटासँ इहो नव गुण सीखत। एखनो ई दुनू व्यक्ति बहुतो काज कऽ सकैए।