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Thursday, June 7, 2012

बोनि‍हारि‍न मरनी :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल


छोट-छीन गाम छतौनी। तीनिये जातिक लोक गाममे। साइये घरक बसतियो। छेहा बोनिहारक गाम। ओना पास-परोसक गामक लोक छतौनीकेँ प्रतिष्ठित गाम नहि बुझैत। किऐक तँ ओइ गाम सबहक लोकक विचारे प्रतिष्ठित गाम ओ होइत जहिमे छत्तीसो जातिक लोक बसैत। जइसँ समाजक सभ तरहक जरुरतक पूर्ति गामेमे होइत। मुदा से छतौनीमे नहि। तेँ छतौनी जमाबंदी गाम भऽ सकैत अछि, प्रतिष्ठित नहि। मुदा ऐ विचारकेँ छतौनीक लोक मानै लए तैयारे नहि। छतौनीक लोकक कहब जे जहियासँ हमर गाम बनल तहियासँ ने कहियो अपनामे झगड़ा-झंझट भेल आ ने मारि-पीट। जइसँ ने कहियो कियो कोट-कचहरी देखलक आ ने थाना-बहाना। ततबे नहि, तीनि जातिक लोक रहितौं सभ मिलि एकठाम बैसि खेबो-पीबो करै छी आ तीन जातिक तीनू देवस्थानोमे पूजो-पाठ आ परसादियो खाइ छी। सभ जातिक लोक संगे-संग कमेबो करै छी आ एक-दोसराकेँ, मौका-मुसीबत पड़लापर, संगो पूरै छी। आन-आन गामबला हमरा गामकेँ अहि दुआरे गाम नै मानैए जे ओ सभ बहरवैया छी आ हमरा सबहक पूर्वज अदौसँ रहल अछि।
छतौनीक वासी सभ दिनसँ बोनिहारे नहि रहल अछि। पहिने ओकरो सभकेँ अपन-अपन खेत-पथार छलै। खेत-पथार गेलै केना? ऐ संबंधमे छतौनीक बूढ़-पुरान लोकक कहब छन्‍हि‍ जे हमरा सबहक पूर्बज, रौदीक चलैत, खेतक बाकी मालगुजारी राज दरभंगाकेँ समएपर नहि दऽ सकलनि, तेहिसँ ओ सभ जमीन निलाम कऽ अबधिया, छपरिया हाथे बेचि लेलक। हमरा सबहक जमीनक मलिकाना हक खतम भऽ गेल। ओ अबधियो आ छपरियो राजमे नोकरी करैत छल जे ऐ इलाकामे आबि जमीनो हथिया लेलक आ मुखियो सरपंच बनि मेनजनी करैत अछि। मुदा एकटा चलाकी ओ सभ जरुर केलक जे जेना अंग्रेज आबि सत्ता हथिऔलक तेना चलि नहि गेल, बल्कि मुगल जकाँ बसि गेल।
जहियासँ देश अजाद भेल आ सत्ताले भोट-भाँट शुरू भेल, तहियासँ ने एक्कोटा कोनो पार्टीक नेता भोट मंगैले ऐ गाम आएल आ ने एक्को बेरि गौआँ भोट खसोलक। किएक तँ आइ धरि ऐ गाममे भोटक बूथ बनबे ने कएल। तेँ नेतो किअए आओत? गाममे ने चरिपहिया गाड़ी चलैक रास्ता छै आ ने सार्वजनिक जगह स्कूल, अस्पताल। जइठाम भाषण-भुषण हएत। जइ गाममे छतौनीक बूथ बनैत ओइ गामक लोक सभ छतौनियोक भोट खसा लैत। छतौनीक लोकक जिनगियो छोट। ने पढ़ै-लिखैक झंझट, ने चोर-चहारक झंझट, ने रोग-व्याधिक झंझट। किएक तँ गामक सभ बुझैत जे जेकरा कपारमे विद्या लिखल रहत ओ डूबियो-मरि कऽ पढ़िये लेत। चोर-चहार एबे कथीले करत। रोग-बियाधिक लेल पूजो-पाठ आ झाड़ो-फूक अछिये। तहूसँ पैघ बात जे, जे ऐ धरतीपर रहैले आएल अछि ओ जीबे करत। पानि, पाथर, ठनका ओकर की बिगाड़ि लेतै। आ जे नञि रहैबला अछि ओकरा फूलोक गाछपर साँप काटि लेतै आ मरि जाएत। तेँ की, छतौनीबलाकेँ भगवानपर बिसवास नै छै? जरुर छै। जँ से नञि रहितै तँ देवस्थानमे सालमे एक बेर एत्ते धुमधामसँ पूजा किअए करै अए? उपास किअए करैए? दसनमो स्थान -देवस्थान- आ अपनो-अपनो घरमे गोसाउनिक पीड़ी किअए बनौने अछि? साले-साल कामौर लऽ कऽ बैजनाथ किअए जाइए?
सभ अभाव रहितौं छतौनीक लोक हँसी-खुशीसँ जीवन बितबैत अछि। अगर जँ कियो गाममे मरैत वा साँप-ताँप कटैत वा आगि-छाइ लगैत तँ सभ कियो दासो-दास भऽ लगि जाइत। पचास बर्खक मरनी सेहो तहिमे सँ एक। जे अपना आँखिसँ अपन पति, बेटा आ पुतोहुकेँ गाछक तरमे खून बोकरि कऽ मरैत देखने। आइ बेचारी पाँच बर्खक पोता आ आठ बर्खक पोतीक बीच आशाक संग जीबि रहल अछि। कारी झामर एक हड्डा देह, ताड़-खजुरपर बनाओल चिड़ैक खोंता जकाँ केश, आंगुर भरि-भरिक पीअर दाँत, फुटल घैलीक कनखा जकाँ नाक, गाइयक आँखि जकाँ बड़का-बड़का आँखि, साइयो चेफड़ी लागल साड़ी, दुरंगमनिया आंगी फटलाक बाद कहियो देहमे आंगीक नसीब नहि भेल, बिना साया-डेढ़ियाक साड़ी पहिरने। यएह छी मरनी।

चारि साल पहिने सुबध, मनोहर आ तौनकी धान रोपए बाध गेल। जाधरि तौनकीकेँ दोसर सन्तान नहि भेल ताधरि मरनिये पति सुबध आ बेटा मनोहरक संग काज करए जाइत। धनरोपनी, धनकटनी, कमठाउन, रब्बी-राइ उखारै-काटैले संगे जाइत। पुतोहु –तौनकी- अंगनाक काज सम्हारैत। मुदा जखन दूटा पोता-पोती भेलै तहियासँ मरनी अंगनाक काज सम्हारए लागलि। अंगनोमे कम काज नहि। भानस-भात करब, पोता-पोती खेलाएब, खूँटा परक बाछीक सेवा करब। आने परिवार जकाँ मरनियोक परिवार भरल-पूरल।
दस आँटीक जोड़ा तीन-तीन जोड़ा बीआ उखाड़ि सुबध आ मनोहर पटैपर टंगलक आ राड़ीक जुन्ना बना तौनकी बीआक बोझ बान्हि माथपर लऽ कदबा खेत पहुँचल। कदबा एक दिन पहिने गिरहत करा देने। तेँ तीनू गोटेक मनमे खुशी होइत जे सबेर-सकाल रोपि कऽ चलि जाएब। आन दिन कदबे दुआरे अबेर भऽ जाइ छलै। मने-मन सुबध सोचैत जे बेरु पहर अपनो जे कट्ठा भरिक खेत अछि ओहो सभ तूर मिलि कऽ हाथे-पाथे रोपि लेब। कदबामे बीआ रखि सुबध आड़िपर बैसि, तमाकुल चुनबए लगल। मनोहर आ तौनकी खेतमे बीआ पसारए लगल। सौंसे खेत बीओ पसरि गेलै आ सुवधो तमाकुल खा लेलक। तीनू गोटे एक-एक आँटी खोलि खुज्जा पसारि एक-एक खुज्जा रोपैले वामा हाथमे रखलक। आड़िक कात पछिमसँ तौनकी बीचमे मनोहर आ पूबसँ सुवध पाहि धेलक। एक पाँति‍ रोपि दोसर धेलक आकि पूब दिस एक चिड़की मेघ उठैत देखलक। मेघक छोट टुकड़ी देखि केकरो मनमे पानिक शंका नै उठलै। कने-कने सिहकी सेहो चलए लगलै। जहिना-जहिना हवा तेज होइत जाइत, तहिना-तहिना करिया मेघक टुकड़ी सेहो उधिया-उधिया उपर चढ़ए लगलै। उपर चढ़ि-चढ़ि ओ टुकड़ी एक-दोसरमे मिलए लगल। मुदा पछिम दिस रौद उगलै। कनिये कालक बाद सुरुज झपा गेल। हबो तेज हुअए लगलै। बिजलोका चमकए लगलै। बुन्दा-बुन्दी पानि पड़ए लगलै। जते मेघ सघन होइत जाइत तते पानियोक बुन्न जोर पकड़ैत। संगे बिजलोको बेसिआइल जाइत। घन-घनौआ बरखा हुअए लगल। पानिमे भीजै दुआरे तीनू गोरे दौड़ि कऽ आमक गाछ लग पहुँचल। खेतसँ बीघे भरि हटि कऽ आमक गाछ। खूब झमटगर। चारि हाथ उपरेमे दू फेंड़ भऽ गेल। सरही आम। गाछक पँजरेमे पछिमसँ तौनकी बैसलि आ पूबसँ सुवध आ मनोहर। तौनकी साड़ी ओढ़ि दुनू हाथक मुट्ठी बान्हि काँखमे लऽ लेलक। मुदा सुवधो आ मनोहरो छुच्‍छे देहे। गमछाक मुरेठा बान्हि लेलक। मुदा तैयो जाड़े दुनू बापूत थर-थर कपैत। नमहर-नमहर बुन्न सेहो देहपर खसै। सौंसे देहक रुइयाँ भुलकि कऽ ठाढ़ भऽ गेलै। मुदा की करत? कोनो उपाए नहि। पछिमो मेघ पकड़ि बरिसए लगल। जइसँ दूर-दूर धरि बरखा हुअए लगलै। रहि-रहि कऽ मेघो गरजै आ बिजलोको चमकै। एक बेर खूब जोरसँ बिजलोका चमकलै। मुदा आन बेरक चमकलहासँ बिजलोकाक रंग बदलल। आन बेर पिरौंछ इजोत होइत जखनि कि ऐ बेर लाल टुह-टुह। दुरकाल समए देखि तौनकी मने-मन खौंझा भगवानकेँ कोसैत जे कोनो काजक समए होइ छै। अखन पानिक कोन काज छै। जहिना तगतगर लोक सदिखन बलउमकी करैत अछि तहिना ई टिकजरौना इन्द्रो भगवान करैए। अनेरे काजकेँ बरदा जाड़े कठुुअबैए। लोक सभ कहै छै जे देवता-पितरकेँ बड़का-बड़का आँखि होइ छै जे एक्के ठीन बैसल-बैसल सगरे दुनियाँ देखैए। से आँखि अखन कतऽ चलि गेलै। देवियो-देवता गरीबे-गुरबाकेँ जान मारै पाछू लागल रहै अए। जन-बोनिहारक काज करैक दू उखड़ाहा होइए। भिनसुरका आ दुपहरिया। भिनसुरका उखड़ाहामे जँ एगारहो बजे पानि भेल वा कोनो बाधा भेल तँ गिरहत थोड़े बोइन देत। अगर जँ जलखै भऽ गेल रहलै तँ बड़बढ़िया नञि तँ जलखैइयो पार। यएह तँ ऐठामक चलनि छै। ई टिकजरुआ भगवान गिरहतेकेँ मदति करै छै।
जाड़सँ कपैत सुवध मनोहरकेँ कहलक- “बौआ, सोचै छलौं जे आन दिन रोपैन करैमे अबेर भऽ जाइ छलै जइसँ अपन काज नञि सम्हरै छलै मुदा आइ सबेरे-सकाल रोपैन होइत तँ अपनो बाड़ीक खेत रोपि लइतौं। से सभ भंगठि गेल। कखैन पानि छुटत कखैन नै सेहो ठीक नहि। दुनू बापूत गप-सप्‍प करिते छल आकि तड़-तड़ा कऽ ठनका ओइ गाछपर खसल। जइठीनसँ दुनू डारि फुटल छलै तकरा चिड़ैत माटिमे चलि गेल। चिड़ा कऽ गाछ दुनू भाग खसल। एक फँाकक तरमे तौनकी आ दोसर फाँकक तरमे दुनू बापूत पड़ि गेल।
पानि छुटल। सौंसे गाममे हल्ला हुअए लगलै जे बाधमे जे आमक गाछ छलै से खसि पड़लै। भरिसक ओहीपर ठनका खसलै। एक्के-दुइये लोक देखैले जाइ लगल। कातेमे ठाढ़ भऽ भऽ लोक देखैत। गाछोपर आ गाछक निच्चोमे जमीनोपर तते घोरन पसरि गेलै जे लोक गाछक भीर जाइक हिम्मते ने करैत। मुदा जीवठ बान्हि करिया गाछक जड़ि देखै बढ़ल। घोरन तँ खूब कटै मुदा तैयो हिम्मत कऽ करिया जड़ि लग पहुँचल। ठनकाक आगिक चेन्ह ओहिना दुनू फाँकमे छल। जड़ि लग ठाढ़ भऽ ओ हिया-हिया देखए लगल। देखैत-देखैत मनोहरक टाँगपर नजरि पड़लै। टाँगपर नजरि पड़िते हल्ला करए लगल जे एक गोरे तरमे पिचाइल अछि। दौड़ि कऽ अबै जाइ जा, एकरा बहार करह? करियाक बात सुनि चारु भरसँ लोक बढ़ल। देखैत-देखैत तीनू गोरेपर नजरि पड़लै। हल्ला करैत करिया कुड़हरि अनए घरपर दौगल। तीनू खून बोकरि-बोकरि मरल। मुदा तैयो सभ बचा-बचा कऽ डारि काटए लगल। डारि काटि सील उनटौलक तँ तीनू थकुचा-थकुचा भेल। पहिने तँ कियो नै चिन्हलक, किऐक तँ तीनू बेदरंग भऽ गेल। मुदा भाँज लगौलापर पता चललै जे दुनू बापूत सुवध कक्का छी आ पुतोहु छिऐ।
अखन धरि मरनी, अंगनेमे दुनू बच्चाकेँ खेलबैत। गौरिया आबि कऽ कहलकै- “दादी तोरे अंगनाक सभ, गाछक तरमे दबि कऽ मरि गेलौ।
गौरियाक बात सुनिते मरनी अचेेत भऽ खसि पड़ल। दुनू बच्चा सेहो चिचियाए लगलै। मरनीकेँ अचेत देखि अलोधनी मुँहपर पानि छीटि बिअनि हौँकए लागलि। कनिये कालक बाद होश भेलै। होशमे अबिते मरनी फेर बपहारि कटए लगल।
बच्चाकेँ कोरामे लऽ मरनीक संग अलोधनी देखैले बिदा भेल। गाछ लग पहुँचते तीनू गोरेकेँ मुइल देखि मरनी ओंघरनियाँ कटए लागलि। ओंघरनियाँ कटैत देखि करिया पजिया कऽ पकड़ि मरनीकेँ कात लऽ गेल। मरनीक दशा देखि सभ सांत्वना दिअए लगल। मुदा मरनीक करेज थीरे ने रहै। विचित्र स्थितिमे पड़ल। एक दिस परिवारकेँ नाश होइत देखए तँ दोसर दिस दुनू बच्चाक मुँह देखि कनी-मनी आशा मनमे जगै।
चारि साल पहिलुका नहि, आब नव मरनीक जन्म भेल। जहिना आगिमे तपैसँ पहिने सोनाक जे रंग रहैत तपलापर जहिना चमकि उठैत तहिना। ओना समाजोक बेवहार जे पहिलुका छलै अहूमे बदलाव एलै। कियो खाइक बौस दऽ जाइत तँ कियो बच्चो आ मरनि‍यो लए नुआ-बस्तर। जखन केकरो भाँजमे कोनो काज अबै तँ ओ मरनियोकेँ संग कऽ लैत। जहिना परिवारमे बूढ़ आ बच्चाक प्रति जे सिनेह होइत, ओहने सिनेह मरनीक प्रति समाजोक बीच हुअए लगलै। अपनो जीबैक आशा आ बच्चोक, मरनीकेँ नव स्फूर्ति पैदा केलक। एते दिन मरनीक हाथमे पुरने खेतीक औजार टा रहै छलै ओ आब बढ़ि कऽ दोबर भऽ गेल। हँसुआ, खुरपी, टेंगारी, कोदारिक संग-संग हथौरी, गैंचा सेहो आबि गेलै।
समए आगू बढ़ल। देशक विकासक गति सेहो, बहुत तेज नहि मुदा किछु गति तँ जरुर पकड़लक। गाम-गाममे बान्ह-सड़क, पुल-पुलिया, स्कूल, अस्पताल सेहो बनए लगल। जइसँ खेतिहर बोनिहारक सेहो काज बढ़ल। मरनियो छिट्टामे माटि उघब, पजेबा उघब, गिट्टी फोड़ब, सुरखी कुटब सीखि लेलक। जइसँ बेकारी मेटाएल। रोज कमेनाइ रोज खेनाइ धरि गरीबो पहुँचि गेल। भलहि‍ं जिनगीमे बहुत अधिक उन्नति नञि एलै मुदा जीबैक आशा जरुर जगलै। मुदा ई सभ काज छतौनीमे नहि, पास-पड़ोसक आन-आन गाममे हुअए लगलै। जइमे छतौनियोक बोनिहार सभ काज करए लगल।
छतौनियोक दिन घुरलै। सात किलोमीटर पक्की पीच सड़क जे एन.एच.सँ लऽ कऽ रेलवे स्टेशनकेँ जोड़ैत, छतौनिये होइत बनैक शुरू भेल। जहियेसँ “प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजनाकछतौनी होइत बनैक चरचा भेल तहियेसँ छतौनीक लोकक मनमे खुशी अबए लगलै। गामक लोकक तँ ओहन दशा नहि जे बस, ट्रक कीनैक विचार करैत। मुदा तैयो एते बात जरुर एलै जे बरसातमे जे घरसँ बहराएब कठिन छलै ओ आब नै रहतै। किछु गोटेक मनमे ई बात जरुर होइत जे एते दिन बिना जूत्तो-चप्पलक काज चलैत छल, से आब नै चलत। आड़ि-धुर माटिपर चललासँ, बेसीसँ बेसी काँट-कुश गरैत छल मुदा पीच भेने शीशाक टुकड़ी, लोहाक टुकड़ी सेहो गरत। जइसँ पएरक नोकसान बेसी हएत। मुदा फेर मनमे अबै जे एते दिन कम आमदनी रहने जुत्ता-चप्पल नै कीनि पबै छलौं से आब नै हएत। नञि बेसी तँ एक्को जोड़ा जरुरे कीनि लेब। जैसँ पएरमे बेमाइयो ने फटत।
प्रधानमंत्री योजनाक सड़क बनए लगल। मुदा जते आशा बोनिहार सभकेँ छलै तते नै भेलै। किएक तँ माटिक काज शुरू होइते रंग-बिरंगक गाड़ी सभ पहुँचए लगल। जे माटिक काज बोनिहार करैत ओ ट्रेक्टर करए लगल। ओना काजक गति तेज रहै मुदा बोनिहारक बेकारी बरकरारे रहलै। सड़कपर माटि पड़िते रौलर आबि सरियाबए लगल। खेनाइ-पीनाइ छोड़ि धियो-पुतो आ जनिजातियो भरि-भरि दिन देखते रहैत। ओना बूढ़ो-पुरान देखैत मुदा घरक चिन्ता खीचि कऽ काज दिस लऽ जाइत। पनरहे दिनमे सातो किलोमीटर सड़कपर माटिक काज सम्पन्न भऽ गेलै। एकदम चिक्कन, उज्जड़ धप-धप। घर एते ऊँच सड़क बनि गेल।
माटिक सड़क बनिते बड़का-बड़का ट्रक चिमनीसँ ईटा खसबए लगल। ऐँह, अजीब-अजीब ट्रको सभ। एते दिन छह-पहिये ट्रक टा गामक लोक देखने मुदा ऐ सड़कक बनने दस पहियासँ लऽ कऽ अट्ठारह पहियाबला ट्रक सभकेँ सेहो देखलक। तीनिये दिनमे सातो किलोमीटरक ईंटा खसा देलक। मुदा ईंटा पसारैक काज तँ इंजन नहि करत। ओ तँ लोके करत। मुदा ओहिक लेल तँ अनुभवी माने एक्सपर्ट लोकक जरुरत हएत। जे छतौनीमे नहि। तेँ बाहरेसँ अनुभवी मिसतिरी आओत! मुदा तेहेन बड़का ठीकेदार सड़क बनबैत जे अनेको सड़कक काज एक संग चलबैत। एक्के दिन तते अनुभवी मिसतिरी ईंटा पसारै लऽ आएल जे सभकेँ बूझि पड़लै जे दुइये दिनमे सातो किलोमीटर ईंटा पसारि देत। मुदा ईंटा उघैले तँ मजदूर चाहिऐ। पहिले दिन छतौनीक बोनिहारकेँ काज भेटलै। ईंटा पसरए लगल। धुरझाड़ काज चलए लगल। छतौनीक सभ बोनिहार खुशीसँ काज करए लगल। तइ बीच ईंटापर पसारैले फुटलाहा ईंटा ट्रकसँ अाबए लगल। दोहरी काज देखि छतौनीक बोनिहारक मन खुशीसँ नाचए लगल। किएक तँ गिट्टी फोड़ैले गामेक बोनिहारकेँ काज भेटतै। मुदा ठीकेदारक मुनसी, अपने खाइ-पीबै दुआरे सस्ते दरसँ गिट्टी फोड़ैक रेट लगा देलक। एक ट्रेक्टर पजेबा फोड़ैक दर साठिये रुपैया दैले तैयार भेल। एक-दू दिन तँ बोनिहार लोक गिट्टी फोड़ब बन्न केलक मुदा पेटक आगि मजबुरन सभकेँ लऽ गेलै। मरनी सेहो गिट्टी फोड़ैए लागलि। एक ट्रेक्टर गिट्टी फोड़ैमे बेचारीकेँ चारि दिन लगैत। मुदा की करैत?
ऐ सड़कसँ पहिने जे सड़क बनै ओ रिआइत-खिआइत रहि जाइ। माटिक काज भेलापर साल-दू साल ईंटा बैसैमे लगै। जइसँ माटि ढहि-ढ़ूहि कऽ उबड़-खाबड़ बनि जाए। बड़का-बड़का खाधि सड़कपर बनि जाइ। तहूमे तीन नंबर पजेबा फूटि-भाँगि कऽ गरदा बनि जाइत। गामक धियो-पुतो उठा-उठा खेत-पथारमे फेकि दैत। कोठीक गोरा बनबैले स्त्रीगण सभ निकहा ईंटा उठा-उठा लऽ जाइत। मुदा ऐबेर से नै हएत। दुइये मासमे सड़क बनबैक शर्त ठीकेदारकेँ अछि। जाबे बरखा खसत-खसत ताबे सड़क बनि जएबाक छैक। पचास बर्खक मरनी जे देखैमे झुनकुट बूढ़ि बूझि पड़ैत। सौंसे देहक हड्डी झक-झक करैत। खपटा जकाँ मुँह। खैनी खाइत-खाइत अगिला चारु दाँत टुटल। गांगी-जमुनी केश हवामे फहराइत। तहूमे सड़कक गरदासँ सभ दिन नहाइत। मुदा तइओ मरनी अपन आँखि बचैने रहैत। जखन पुरबा हवा बहै तँ पछिम मुँहे घुरि कऽ गिट्टी फोड़ैए लगैत आ जखन पछवा बहए लगैत तँ पूब मुँहे घुरि जाइत। बीच-बीचमे सुसताइयो लैत आ खैनियो खा लैत। मुदा तैयो ओकर मुँह कखनो मलिन नै होए। किएक तँ हृदएमे अदम्य साहस आ मनमे असीम बिसवास सदिखन बनल रहैत। तेँ सदिखन हँसिते रहए।
भिनसुरके उखड़ाहा। करीब नअ बजैत। पूब मुँहे घुरि मरनी गिट्टी फोडै़त। तइ बीच पच्चीस-तीस बर्खक सुगिया माथ उघारने, छपुआ बनारसी साड़ी आ ओही रंगक आंगी पहिरने, घुमौआ केश सीटि जुट्टी लटकौने, ऐँड़ीदार चमड़ौ-चप्पल आ मोजा लगौने, मुँहमे सौ नम्बर पत्ती देल पान खेने, डोलचीमे नूनक पौकेट, कड़ू तेलक शीशी, मसल्लाक पुड़िया आ साबुन रखि हाथमे लटकौने आबि कऽ मरनीक लग ठाढ़ भऽ गेल। मरनीक मेहनत आ बगए देखि दिल खोलि मने-मन हँसए लागल। मरनी गिट्टी फोड़ैमे मस्त। किएक किम्हरो ताकत! सुगियाक हृदएक खुशी मुँहसँ हँसी
होइत निकलए चाहैत। मुदा मुँहक पानक पीत ठोरक फाटककेँ बन्न केने। तेँ पानक पीत फेकब सुगियाकेँ जरुरी भेलै। जइ पजेबाक ढेरीपर बैसि मरनी गिट्टी बनबैत
ओइ ढेरीपर सुगिया भरि मुँहक पीत फेकि देलक। पीतक दू-चारि बुन्न मरनीक
देहोपर पड़लै। देहपर पड़िते ओ उनटि कऽ तकलक। टटका पीत चक-चक
करैत। कनडेरिये आँखिये मरनी सुगियाक मुँह दिस तकलक। सुगियाकेँ पान
चिबबैत देखि मरनीक मनमे आगि पजड़ि गेलै। पजेबाक ढेरी देखलक। सौंसे थूक पड़ल। मने-मन सोचलक जे आब केना गिट्टी फोरब। ढ़ेरियो आ देहो अँइठ कऽ देलक।
आँखि गुड़ारि कऽ मरनी सुगियाकेँ कहलक- “गै रनडिया, तोरा सुझलौ नै जे ढेरीपर थूक फेकलेँ?”
गरीब मरनीक कटाह बात सुनि सुगिया तमकि कऽ उत्तर देलक- “तोरे बान्ह छिऔ जे हम थूक नै फेकब।
सुगियाक बोलकेँ दबैत मरनी बाजलि- “एतेटा बान्ह छै, तइमे तोरा कतौ थूक फेकैक जगह नै भेटिलौ जे ऐठाम फेकलेँ।
सुगिया- “जदी एतै फेकलिऐ तँ तू हमर की करमे?”
मरनी- “की करबौ। आँइ गै निरलज्जी, तोरा लाज होइ छौ जे सात पुरखाकेँ नाक-कान कटौलही। जेहने कुल-खनदान रहतौ तेहने ने चाइल चलमे।
सुगिया- “अपन देह-दशा नै देखै छीही?”
मरनी- “की देखबै। ई देह बोनिहारनिक छिऐ। तोरा जकाँ की हम कहियो बमैबला छौड़ा सेने तँ कहियो डिल्लीबला छौड़ा सेने बौआइ छी। एक चुरुक पानिमे डूमि कऽ मरि जो। तीमन चिक्खी नहितन। जहिना सात घरक तीमन चिक्खै छैँ तहिना सातटा मुनसा देखै छैँ। हमर पड़तर सातो जिनगीमे हेतौ। जेकरा संगे बाप हाथ पकड़ा देलक, सहि-मरि कऽ तै घरमे छी। छुछुनरि कहीं कऽ। आगि लगा ले ऐ फुललाहा देहमे।
मरनीक बातसँ सुगिया सहमि गेलि। मनमे डर पैसि गेलै जे हो न हो कहीं मारबो ने कराए। मुँह सकुचबैत, मूड़ी गोति बिदा भेल। सुगियाकेँ जाइत देखि मरनी साड़ीक खूँटसँ तमाकुल-चून निकालि चुनबए लागलि। मुदा तैयो मन असथिर नञि भेलै। मूड़ी उठा-उठा सुगियो दिस देखै आ मने-मन बजबो करए “देह केहेन सीटने अछि, उढ़ढ़ी। जेना रजा-महराजाक बोहू हुअए। हाथ-पएरमे लुलही पकड़ने छन्‍हि‍ जे कमा कऽ खेतीह। जेहने छुछुनरि छौरा सभ तेहने छौरी सभ।
तमाकू खा मरनी ईंटा फोडै़ले घुमल आकि दादी-दादी करैत पोता दौगल आबि दुनू हाथे दुनू जाँघ पकड़ि ठाढ़ भऽ गेल। पाछूसँ पोतियो एलै। पोताकेँ कोरामे उठा मुँहमे चुम्मा लऽ पोतीकेँ कहलक- “दाइ, बौआकेँ रोटी नै देलही। दुनू गोरे चलि जाउ, मोरामे रोटी रखने छी, लऽ कऽ दुनू गोरे खाए लेब। हम अखन काज करै छी। कनीकालमे आबि कऽ भानस करब।
पोता-पोती, आंगन दिस बिदा भेल। पूब मुँहे घुरि कऽ मरनी गिट्टी फोड़ए
लगल। चारिटा बन्दूकधारी बड्डी-गार्डक संग सड़कक ठीकेदार उत्तरसँ दछिन मुँहे सड़क देखैत जाइत। आगू-आगू ठीकेदार पाछू-पाछू बन्दूकधारी। ठिकेदारक नजरि मरनीपर पड़ल। मरनीपर नजरि पड़िते ठिकेदारक डेग छोट-छोट हुअए लगल। ठिकेदारक आँखि मरनीपर अॅटकि गेल। डेग तँ आगू मुँहे बढ़बैत मुदा आँखिक
ज्योति हृदएमे ढुि‍क कऽ हृदएकेँ हड़बड़बै लगलै। मनमे अन्हर-तूफान उठए लगलै। जइसँ मने-मन विचारए लगल जे जेकरा कमाइपर हमरा चारिटा बड्डी गार्ड अछि, करोड़ो-अरबोक आमदनी अछि, तेकर ई दशा छैक। ओ तँ हमर ओहन समांग अछि जे कमासुत अछि, ओहन तँ नहि जे ऐश-मौजक जिनगी बना कमेलहे सम्पत्तिकेँ
भोगैत अछि। मुदा अँटकल नहि। आगू मुँहे बढ़िते रहल। किछु दूर आगू बढ़लापर जेना मरनीक आत्मा आगूसँ रोकि देलकै। बिचहि सड़कपर ओ ठीकेदार ठाढ़ भऽ गेल। ठाढ़ भऽ एकटा सिपाहीकेँ कहलक- “ओइ गिट्टी फोड़िनिहारिकेँ कने बजौने आउ?”
ठीकेदारक बात सुनि एकटा सिपाही मरनी दिस बढ़ल। मरनी लग जा ओइ सिपाहीकेँ कहलक- “मालिक बजबै छथुन। से कने चल?”
गिट्टी फोड़ब छोड़ि मरनी उनटि कऽ सिपाही दिस तकलक। सिपाहीकेँ देखि मने-मन सोचै लगल जे ने हम कोनो मेमलामे फँसल छी आ ने कोनो बैंकक करजा नेने छिऐ, तखैन किअए हमरा सिपाही बजबए आएल। मन सक्कत कऽ कऽ कहलक- “तूँ नै देखै छहक जे अखन हम काज करै छी। जेकर बोइन लेबै ओकर काज नै करबै। अखन जा। काजक बेरि उनहि जेतै तब ऐबह।
मरनीक बात ठीकेदारो आ सिपाहियो सुनैत। एक-दोसरकेँ देखि आँखि निच्चाँ कऽ लिअए। मुदा ठीकेदारक मन पीपरक पात जकाँ डोलैत। कखनो मरनीक इमानदारीपर मन नचैत तँ कखनो ओकर अवस्थापर। जइ देशक श्रमिक एते श्रममे बिसवास करैत अछि ओइ देशक विकास जँ बाधित अछि तँ जरुर कतौ नै कतौ संचालनकर्ताक बेइमानी छैक। ई बात मनमे अबिते ठीकेदार अपना दिस घुरि कऽ तकलक, तँ अपन दोख सामने आबि ठाढ़ भऽ गेलै।
सिपाही कड़कि कऽ मरनीकेँ कहलक- “नञि जेबही तँ पकड़ि कऽ लऽ
जेबौ?”
सिपाहीक गर्म बोली सुनि मरनी कहलक- “तोहर हम कोनो करजा खेने छिअह जे पकड़िकेँ लऽ जेबह। अपन सुखलो हड्डीकेँ धुनै छी, खाइ छी।
मरनीक बात सुनि सिपाहियोक मन उनटए-पुनटए लगलै। एक दिस मालिकक आदेश दोसर दिस मरनीक विचार। आखिर, एहेन लोकक बीच एहेन सक्कत विचार अबैक कारण की छै? अनका देखै छिऐ जे सिर्फ सिपाहीक बरदी देखि डरा जाइत अछि, भलहि‍ं ओ सरकारक सिपाही नहियो रहए। मुदा हमरा तँ सभ कुछ अछि तैयो ऐ बुढ़ियाकेँ डर नै होइ छै। फेर मनमे एलै जे हम किछु छी तँ नोकर छी मुदा ई किछु अछि तँ स्वतंत्र बोनिहारिन। स्वतंत्र देशक स्वतंत्र श्रमिक। जे देशक आधार छी। आखिर देश तँ एकरो सबहक छिऐ।
सिपाहीकेँ ठाढ़ देखि ठीकेदारे पाछू ससरि कऽ मरनी लग आएल। मरनियो सभकेँ देखैत आ मरनियोकेँ सभ। ठीकेदार मरनीक आँखि देखैत। आँखिमे सुरुजक रोशनी जकाँ प्रखर ज्योति। ललाटसँ आत्म-विश्वास छिटकैत। मधुर स्वरमे ठीकेदार पुछलक- “चाची, अहाँक परिवारमे के सभ छथि?”
ठिकेदारक प्रश्न सुनि मरनीक आँखिमे नोर अबए लगलै। मन पड़ि गेलै अपन पति, बेटा आ पुतोहुक मृत्यु। टघरैत नोरकेँ आँचरसँ पोछि बाजलि- “बौआ, हमर घरबला, बेटा आ पुतोहु ठनकामे मरि गेल। अपने छी आ पिलुआ जकाँ दूटा पोता-पोती अछि।
ठिकेदार- “बच्चा सभ स्कूलो जाइए?”
नै। एक तँ गाममे इस्कूल नै छै। तहूमे पहिने गरीब लोकक धिया-पुताकेँ पेट भरतै तब ने जाएत। ने भरि पेट अन्न होइ छै आ ने भरि देह वस्त्र, ने रहैक घर छै, तखन इस्कूल कना जाएत।
मरनीक बात सुनि ठीकेदार सहमि गेल। मने-मन सोचए लगल जे आँखिक सोझमे देखै छिऐ ओ झूठ केना भऽ सकैत अछि। एत्ते भारी काज केनिहारक देहपर कारी खट-खट कपड़ा छै, तोहूमे सइयो चेफड़ी लागल छै, काज करै जोकर उमेर नै छै, तैपर एते भारी हथौरी पजेबापर पटकैत अछि। ठिकेदारक मन दहलि गेलै। जहिना अकास आ पृथ्वीक बीच क्षितिज अछि, जइ ठाम जा चिड़ै-चुनमुनी लसकि जाइत अछि, तहिना ठीकेदारक मन सुख-दुखक बीच लसकि गेल। जेना सभ कुछ मनक हरा गेलै। शून्न भऽ गेलै। ने आगूक बाट सूझै आ ने पाछुक। मरनीसँ आगू की पूछब से मनमे रहबे ने केलै। साहस बटोरि पुछलक- “भरि दिनमे कते रुपैया कमाइ छी?” ठिकेदारक प्रश्न सुनि मरनीक मनमे झड़क उठलै। बाजलि- “कते कमाएब! जेहने बैमान सरकार अछि तेहने ओकर मनसी छै। चारि दिनमे एकटा पजेबाक ढेरी फोड़ै छी तँ तीन-बीस रुपैया दैए। ऐ सँ तीन तूरक पेट भरत? भरि दिन ईंटा फोड़ैत-फोडै़त देह-हाथ दुखाइत रहैए मुदा एकटा गोटियो कीनब से पाइ नै बँचैए।
ठिकेदारक आँखिमे नोर आबि गेलै। मनुष्यता जागि गेलै। मुदा ई मनुष्यता कते काल जिनगीमे अँटकतै? जिनगी तँ उनटल छै। जइमे मनुष्यता नामक कोनो दरस नहि छैक।

दूटा पाइ :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल


हलहोरिमे फेकुओ दिल्लीक रैलीमे जाइक विचार केलक। परसू सौझुका गाड़ी सभ पकड़त। दिल्लीक लड्डूक बात फेकुआकेँ बुझल। तेँ खाइक मन रहै। अबसर भेटल छलै। किएक तँ ने गाड़ीमे टिकट लागत आ ने संगबेक कमी। मात्र चारि दिनक खेनाइ टा अपन खर्च। गाड़ीमे लोक बेसी खाइतो नहि अछि किएक तँ पेशाब-पैखानाक समस्या रहै छै। फेकुआ माएकेँ कहलक- “माए, परसू दिल्ली जेबउ। बटखरचाक ओरियान कऽ दिहेँ?”
माए बाजलि- “की सभ लेबही?”
फेकुआ कहलक- “दू सेर चूड़ा लऽ कऽ डाॅक्टर सहाएब नागेंद्र जी चलैले कहलखिनहेँ। हमरो दू सेर चूड़ा कूटि दिहेँ।
फेकुआक बातक विश्वास माएकेँ नहि भेलै। मने-मन सोचलक जे दू सेर चूड़ा तँ एक दिनमे लोक खाइत अछि। चारि दिन केना पुरतै? फेर मनमे एलै जे दू सेर चूड़ो आ चारि-दुना आठटा रोटियो पका कऽ दऽ देबै। कहुना भेलै तँ रोटी सिद्ध अन्न भेलै।
गाड़ी अबैसँ पहिनहि जुलूसक संग फेकुआ स्टेशन पहुँचल। जिनगीक पहिल दिन फेकुआ गाड़ीमे चढ़त। प्लेटफार्मपर भीड़ देखि फेकुआक मन घबड़ेबो करै आ उत्साहो जगै जे एत्ते लोक चढ़त से हेतै आ हमरा बुत्ते की नहि चढ़ि हएत। निरमली-सकरीक बीच छोटी लाइन। गाड़ियो छोटकिये। मुदा सकरीसँ दिल्लीक लेल गाड़ियो बड़की आ लाइनो बड़की। गाड़ीमे चढ़ि फेकुआ सकरी पहुँचल। दिल्लीक गाड़ी लगले रहै। हाँइ-हाँइ कऽ निरमलीक गाड़ीसँ उतरि दिल्लीवाली गाड़ीमे सभ चढ़ल। गाड़ी खुजल।
ओना सकरीसँ दिल्ली जाइक लेल चौबीस घंटा लगैत। मुदा आइ से नहि भेल। चालीस घंटामे पहुँचल। मुदा चालीस घंटा केना बीतल से फेकुआ बुझबे ने केलक। हलहोरियेमे पहुँचि गेल। ने एक्को बेर खेलक आ ने पानि पीलक। मुदा तैयो भुख बुझिये ने पड़ए। गाड़ीसँ उतड़ै काल फेकुआ खिड़की देने प्लेटफार्म दिस तकलक, जेरक-जेर सिपाही घुमैत। मुदा फेकुआक नजरि कतौ नहि अँटकि, मोटका सिपाहीपर अँटकल। ओकर मनही पेटपर नजरि गेलै। तइ परसँ छअ आंगुर चाकर ललका बेल्ट। जे बेर-बेर निच्चाँ ससरैत। चानि‍ परसँ पसीनाक टघार। दस किलोक बन्दुक कान्हमे लटकल। मुदा तखने नागेन्द्र जी सेहो अपन छबो संगीक संग हाथसँ सभकेँ उतड़ैक इशारा दैत। धड़फड़ा कऽ फेकुओ उतरल।
प्लेटफार्म टपि जहाँ फेकुआ मुसाफिर खाना प्रवेश करए लगल आकि ममिऔत भायपर नजरि गेलै। ममिऔत भाय रतना चरिपहिया गाड़ीक ड्राइवर। अपना मालिककेँ गाड़ी पकड़बैले आएल। भायपर नजरि पड़िते फेकुआ गोर लगलक। गोर लागि लालकिला मैदान दिसक रास्ता धेलक। पाछूसँ झटकि कऽ आगू बढ़ि रतना फेकुआसँ घरक कुशल पूछलक। कुशलक जबाब नहि दऽ फेकुआ कहलक- “काल्हि साँझ धरि लाल किला मैदानमे रहब तेँ ओतै अबिहह। अखन नै रुकबह।
“कनी चाहो पीबि ने ले?”
“नै अखन कुछो नै पीबह।
फेकुआ बढ़ि गेल। मुदा रतनाकेँ पाछू घुमैक डेगे ने उठै। फेकुए दिस तकैत। मने-मन विचारए लगल जे हो न हो काल्हि भेँट नहि हुअए। ओत्ते लोकमे के कत्तऽ रहत तेकर कोन ठीक। तहूमे सौझुका बात कहलक। दिल्ली छिऐ। कोन ठीक जे बिजलीक इजोत रहतै की नहि। एत्ते लोकमे तँ दिनोमे अन्हरायले रहत। एक्को दिन मेजमानियो ने करौलिऐ। गाममे दीदी सुनत तँ की कहत? ओ की कोनो दिल्लीकेँ दिल्ली बुझैत हएत। ओ तँ गामे जकाँ बुझैत हएत। जहिना गाममे सभकेँ सभ चिन्है छै तहिना। मुदा ई तँ दिल्ली छी। भाड़ाक एक कोठरीमे सोहर गाओल जाइत छैक आ दोसरमे कन्नारोहट होइ छै। विचित्र स्थितिमे रतना पड़ि‍ गेल। आइ धरि रतनाक बुधि‍पर एहेन भार कहियो नहि पड़ल। एकाएक मनमे एलै जे कौल्हुका छुट्टी लऽ कऽ भोरे फेकुआक भेँट करब। भेँट भेलापर लालकिला, जामा मस्जिद देखा देबै।
दोसर दिन भोरे रतना फेकुआक भेँट करै बिदा भेल। लाल किला मैदान पहुँचते भेँट भऽ गेलै। भेँट होइते दुनू भाइ गामेक बसिया रोटी खा पानि पीलक। भरि दिन संगे, रैली समाप्त कऽ दुनू गोटे डेरापर आएल। पैघ सेठक ड्राइवर रतना, तेँ डेरो नीक। सभ सुविधा। मुदा रतनाक डेरासँ फेकुआक मनमे खूब खुशी नहि भेलै। मन पड़ि गेलै माइक ओ बात जे सदिखन बजैत- “अनकर पहीरि कऽ साज-बाज छीनि लेलक तँ बड़ लाज।अपना जएह रहए ओइसँ सबुर करी। मुदा माइयक बात फेकुआक मनमे बेसी काल नहि अँटकल। किएक तँ तीन दिनसँ नहाएल नहि छल। जइसँ देहमे लज्जतिये ने बूझि पड़ै। रतनाकेँ कहलक- “भैया, पहिने हम नहेबह। बिना नहेने मन खनहन नै हएत। ओना ओंघियो लागल अछि। तेँ नहा कऽ खेबह आ भरि मन सुतबह।
फेकुआकेँ रतना बाथ रुम देखा देलक। बिजली जरैत। पानि चलैत बाथ रुम देखा रतना गैस चुल्हि पजारि भानस करए लगल। भरि मन फेकुआ नहाएल। मन शान्त भेलै। मनमे उठलै जखन दिल्ली आबि गेलौं तँ किछु लैये कऽ जाएब। रतना लग आबि बैसल। भानसमे देरी देखि रतना कहलकै- “बौआ देखही, ई दिल्ली छिऐ। ऐठाम लोक सोलह-सोलह घंटा खटैत अछि। दरमाहाक संग ओभरटाइमोक पाइ भेटै छै। मुदा जिनगी जीबैक लूरि नहि रहने सभ चलि जाइ छै। ने गामक कर्जसँ मुक्ति होइ छै आ ने अही ठाम चैनसँ रहैत अछि। भुतलग्गु जकाँ सदिखन बूझि पडै़त छै। तोरा ऐ दुआरे कहि दै छिऔ जे तूँ अपन छोट भाए छियेँ।
रतनाक बात सुनि कने-काल गुम रहि फेकुआ कहलक- “भैया, तूँ सभ तरहे पैघ छह। जखन तोरा लग छी तँ तोँही ने हमर नीक-बेजाए बुझबहक।
फेकुआक बातसँ रतनाकेँ अपन जिम्माक भार बूझि पड़लै। बाजल- “देखही बौआ, अखन जे कहलिऔ से स्टील फैक्ट्रीक स्टाफक बात कहलिऔ। मुदा सभ एहने अछि सेहो बात नहि छै। एहनो लोक अछि जे अपन मेहनत आ लूरिसँ गरीब रहितो अमीर बनि गेल। अपने इलाकाक ढोरबा छी। जेकरा हम तँ ढोरबे कहै छिऐ मुदा ओ ढोढ़ाइ बाबू बनि गेल। जखन गामसँ आएल तँ बौआ-ढहना कऽ चारि दिनक बाद ऐठीन आएल। ओकरा शैलूनमे नोकरी लगा देलिऐ। किछु दिन तँ काज करैमे लाज होए। किएक तँ ओ धानुक छी। मुदा किछुए दिनक पछाति तेहेन हाथ
बैसि गेलै जे नौओ कऽ उन्नैस करए लगल। अपनो खूब मन लगए लगलै। दरमहो बढ़ि गेलै। तीन सालक बाद जेना ओकरा ऐठीनसँ मन उचटि गेलै। सोचलक जे जखन लूरि भऽ गेल अछि तखन कतौ कमा कऽ खा सकै छी। से नहि तँ गामेक चौकपर दोकान खोलब। अपना जँ दू पाइ कम्मो हएत तइसँ की, समाजक उपकार तँ हेतै। सएह केलक। ले बलैया, गामक लोक कियो ठाकुर तँ कियो नौआ तँ कियो हजमा कहए लगलै। घरक जनिजातिकेँ नौआइन कहए लगलै। सभसँ दुखद घटना तखन भेलै जखन कथा-कुटुमैती आ जातिक काजसँ अलग कएल गेलै। मुदा
ओहो कर्म-योगी। गामकेँ प्रणाम कऽ अपन परिवारक संग दिल्ली शहर चलि आएल। वाह रे वनक फूल, ऐठाम आबि कऽ अपन शैलूनक कारोबार ठाढ़ कऽ लेलक।
छह टा स्टाफ रखने अछि। बहिनीक बिआह इंजीनियरसँ केलक। हमहूँ बिआहमे रहिऐ।
फेकुआ बाजल- “हमरो कोनो लाज-सरम नै हएत। जे काजमे लगा देबह, हम पाछू नै हटबह।
रतना- “परसू रवि छिऐ। हमरो छुट्टी रहत। ताबे दू दिन अरामे कर।
फेकुआ- “हमरा ओते सूतल नीक नै लगतह। चलि जेबह बुलैले।
रतना- “रौ बुड़िबक! गाममे लोक खिस्सा कहै छै जे फल्लां तेहेन काबिल छै जे एक्के पाइमे बेचि लेतउ। मुदा ऐ ठीन सभ काबिले छै। तैं देखबिही जे ऐ ठीन सभसँ पैघ कारबार मनुक्खेक खरीद-बिक्रीक छैक। देहाती बूझि कोइ ठकि कऽ बेचि लेतउ। कहतौ जे हवा-जहाजक नोकरी धड़ा देबउ आ चलि जेमए आन देश।
रतनाक बात सुनि फेकुआ क्षुब्ध भऽ गेल। मुदा मनमे एलै जे जेना हम बेदरा रही तहिना भैया कहैए। मुदा किछु बाजल नहि। दम साधि कऽ रहि गेल।
तीन दिनक उपरान्त फेकुआ कपड़ा सिलाइक दोकानमे काज शुरू केलक। दू हजार रूपैया दरमाहा। भिनसर छअ बजेसँ राति नअ बजे धरिक डयूटी। बीचमे एक बेरि अधा घंटा जलखै करैले आ एक घंटा खाइ बेर छुट्टी। फेकुआक मनमे उठल जे ड्यूटी तँ बीसो घंटा कऽ सकै छी मुदा सुतैक जे आठ घंटा छै से कना पुरत। मुदा फेर मनमे एलै जे जखन दू पाइ कमाए चाहै छी तखन तँ सभ सुख-भोग कमबए पड़त। दोकानमे आठटा कारीगर। आठो नोकरे। फेकुआ अनारी, तेँ दोकानक झाड़-बहारसँ काज शुरू केलक। कपड़ा काटब आ सिलाइ मशीन चलौनाइ सेहो कने-कने सीखए लगल।
दुइये माए-बेटा फेकुआ। दस साल पहिनहि बाप मरि गेल। अपने दिल्ली धेलक आ माए गाममे। मुदा माइयो थेहगरि। पुरुखे जकाँ बोनि-बुत्ता करैत। नोकरी होइते फेकुआकेँ माए मन पड़लै। माइये नहि गामो मन पड़ल। मन पड़ल गामक स्मृति। माइक ममता जगि मनकेँ खोरए लगलै। मनमे उठए लगलै- परदेशियाक परिवारमे गेटक-गेट कपड़ा.....राशि-राशिक चीज-बौस.. रेडियो, घड़ी, टी. वी, मोबाइल इत्यादि। केकरा नहि नीक वस्तुक सेहन्ता होइ छै। मुदा ओहन सिहन्ते की जेकरा पुरबैक ओकातिये ने रहै। दू हजार महीना रूपैआक गरमी फेकुआक मनमे तरे-तर चढ़ि गेल। केना नहि चढ़ैत? मुदा आमदनियेक गरमी चढ़ल, खर्चक पानि परबे ने कएल। सोचलक जे सभसँ पहिने माएकेँ चिट्ठी लिखि जना दिऐ।
आठ दिनक बाद फेकुआ रतनाकेँ कहलक- “भैया, हमरा तँ लिखल-पढ़ल नै होइए। मुदा जखन नोकरी लागि गेल तँ माएकेँ जनतब देब जरुरी अछि। किएक तँ ओकरा होइत हेतै जे कत्तऽ बौआइ-ढ़हनाइए। रतनोक मनमे जँचल। वी. आइ. पी. बैगसँ पोस्ट-कार्ड निकालि रतना चिट्ठी लिखैले तैयार भेल। पुछलक- “बाज की सभ दीदीकेँ लिखबीही?”
फेकुआ लिखबए लगल-
स्थान- दिल्ली
ता.- ०५.०६.२००७

माए,
गोर लगै छिऔ
भगवानक दया आ तोरा सबहक असीरवादसँ तेहेन नोकरी भेटल जे कहियो मनमे नै आएल छल। दू हजार रूपैआ महीनाक तलब। अपना कते खर्च हएत। जे उगड़त से मासे-मास पठा देबउ। बेङबा कक्काकेँ कहिअनि जे चिमनीपर जा कऽ ईंटाक दाम बूझि अबैले। पहिने घर बना लेब। अपना चापा-कलो नै छौ, सेहो गड़ा लेब। घरक आगू जे मलिकाबाक चौमास छै, ओहो कीनि लेब।
तोहर फेकुआ

सात बजे भिनसर। मेघौन समए। कखनो कऽ सुरुज देखि पड़ैत आ फेर झपा जाइत। झिहिर-झिहिर पुरबा हबा चलैत। पान-छअ गोटेक संग फेकुआक माए रामसुनरि धन-रोपनी करए बिदा भेल। किछुए आगू बढ़लापर डाक-प्यूनकेँ देखलक। मुदा आन स्त्रीगण जकाँ रामसुनरि नहि जे दिनमे दू बेर मोबाइलसँ तीन पन्नाक चिट्ठीे आ तइ परसँ जे समदिया भेटल ओकरा दिया समाद पठौत। मनमे कोनो हलचल नहि। रामसुनरिक आगूमे आबि हँसैत डाकप्यून कहलक- “काकी, फेकुआक चिट्ठी एलौहेँ। कहि झोरासँ निकालि पोस्ट कार्ड देलक। छबो स्त्रीगण डाकप्यूनकेँ चारु भागसँ घेरि कऽ ठाढ़ भेल। हाथमे पोस्ट-कार्ड अबिते रामसुनरिक मन बिहाड़िमे उड़ैत ओइ सुखल पात जकाँ जे सरंगोलिया उठि अकासमे उड़ैत, तहिना उड़ि गेल। जिनगीक पहिल पत्र। मनमे एलै जे पहिने केकरोसँ पत्र पढ़ा ली। ओना डाकप्यून लगमे सँ चलि गेल। मुदा तेकर अफसोस नहि भेलै। किएक तँ जाधरि प्यून लगमे छल ताधरि पत्र पढ़ेबाक विचार मनमे आएलो नहि छलैक। फेर मनमे एलै जे काज कामै नै करब। अखन खूँटमे बान्हि कऽ रखि लै छी आ जखन निचेन हएब तखन पढ़ा लेब। सएह केलक।
गोसाँइ डुबैत रामसुनरि निचेन भेल। निचेन होइते चिट्ठी पढ़बै लऽ श्याम ओइठाम बिदा भेल। श्यामोक घर लगे। पोस्ट-कार्ड हाथमे लऽ श्‍याम सत्यनारायण कथा जकाँ पढ़ए लगल। मुदा दोसरे पाँति‍- दू हजार रूपैया महिना तलब- मे रामसुनरि ओझरा गेलि। मने-मन सोचए लागलि जे छौड़ाकेँ घरक सोह एलै। बुधि‍यो फुटैक उमेर भेल जाइ छै। आब कहिया चेतन हएत। अगिला साल तक बिआहो कइये देबै। असकरे राकश जकाँ अंगनामे रहै छी। लगले विचार बदलि गेलै। बुदबुदाए लागलि- केना लोक कहै छै जे मसोमातक बेटा दुइर भऽ जाइ छै। विचारमे डुमल रामसुनरि। तइ बीच श्याम बाजल- “सभ बात बुझलिऐ ने काकी?”
श्यामक पुछबसँ रामसुनरिक भक्क खुजल। बाजलि- “बौआ, चिट्ठी पढ़ल भऽ गेलह। की सभ छौड़ा लिखने अछि?”
काकीक मनक बात नहि बूझि श्याम खौंझा गेल। मुदा किछु बाजल नहि। चिट्ठीकेँ निच्चाँमे रखि श्याम ओहिना मुँहजबानिये कहए लगलनि। मुदा पोस्ट-कार्डकेँ निच्चाँमे राखल देखि बेचारी रामसुनरिकेँ भेलै जे अपने दिससँ कहैए। जइसँ विश्वासे ने भेलै। मुदा झगड़ो करब उचित नहि बुझलक। किएक तँ बेटाक पहिल चिट्ठी छी तेँ अशुभ व्यवहार नीक नहि।
दोसर दिन एकटा पोस्टकार्ड कीनि रामसुनरि चिट्ठी पढ़बैयो आ लिखबैयो लेल सोहन ऐठाम गेलि। दुनू पोस्टकार्ड- लिखलहो आ सौदो- रामसुनरि सोहनकेँ दैत कहलक- “बौआ, पहिने पढ़ि कऽ सुना दएह। तखन लिखियो दिहह।
पत्र पढ़ि कऽ सोहन सुना देलकनि। समाचार सुनि रामसुनरिक मन खुशीसँ उत्साहित भऽ गेलै। बाजलि- “बौआ आब चिट्ठी लिखि दियौ। सोहन चिट्ठी लिखए लगल-
परमानपुर
ता. ०३.०७.२००७
फेकू।
असीरवाद।
अखन हम अपने थेहगर छी तेँ हम्मर चिन्ता जुनि कर। रहैले घरो अछिये। एक घैल पानि इसकूल बला कल परसँ लऽ अबै छी वएह भरि दिन चलैत अछि। तेँ पानियोक दिक्कत नहिये अछि। नहाइले धारो आ पोखरियो अछि। कहियो-काल बरखोमे नहा लै छी। तेँ ऐ सभले तूँ चिन्ता किए करै छेँ? अखन खाइ-खेलाइक उमेर छौ। तेँ कमा कऽ जे मन फुड़ौ से करिहेँ। अगिला साल धरि अबिहेँ, बिआहो कऽ देबउ। असकरे अंगनामे नीक नै लगैए।
माए, रामसुनरि‍

साल भरि बीत गेल। जहिना गाममे रामसुनरि अपना काजमे हेरा गेलि तहिना दिल्लीमे फेकुओ। साले भरिमे फेकुआ कपड़ा सिलाइक कारीगर बनि गेल। अपना देहक कपड़ा-लत्ता कीनैत-कीनैत फेकुआक सालो भरिक दरमाहा सठि गेल। माइक जिनगी तँ जहिनाक तहिना रहल मुदा फेकुआक जिनगीमे बदलाब आएल। दुब्बर-दानर फेकुआ फूटि कऽ जुआन भऽ गेल। कपड़ा सिआइक लूरि भेने आत्मबलो मजबूत भेलै। मुदा गामक जिनगी आ दिल्लीक जिनगीक बीचक संघर्ष फेकुआक मनमे चलिते रहल।
रवि दिन। रतनो आ फेकुओक छुट्टी रहै। सूति उठि दुनू ममियौत-पिसियौत विचारलक जे साल भरिसँ बगेरी नहि खेलौं। से नहि तँ आइ बगेरिये आनब। तइ बीच रोडपर देखलक जे पुलिसक गाड़ी इम्हरसँ ओम्हर कऽ रहल छै। दुनू भाँइकेँ कोनो भाँजे नहि लगै। कोठरीसँ निकलि रतना चाहबलासँ पुछलक। चाहबलासँ भाँज लगलै जे महल्लासँ एकटा जुआन लड़की आ एकटा सेठक बेटाक अपहरण रातिमे भऽ गेलै। समाचार सुनि दुनू भाँइ डरा गेल। बगेरीक विचार छोड़ि गामक गप-सप्‍प करए लगल।
रतना बाजल- “बौआ, तोरा साल लगि गेलह। एक बेर गाम जा सबहक भेँट केेने आबह।
गामक नाम सुनिते फेकुआक मन उड़ि कऽ दोसर दुनियाँ पहुँचि गेलै। मन पड़लै- चिमनीक ईंटा....चापाकल....घरक आगूक चौमास। मन गामक सीमापर अॅटकि गेलै। सीमा परसँ अंगना पहुँचैक साहसे ने होए। किएक तँ बाटेपर माएकेँ ठाढ़ भेल देखए। की कहैत हएत माए? साल भरि भऽ गेलै, ने एक्कोटा पाइ पठौलक आ ने एक्को खण्ड साड़ी। कहियो काल जे अस्सक पड़ैत हएत तँ के दवाइयो आनि कऽ दैत हेतै। पौरुकाँ जे चिट्ठी आएल, तइ दिनसँ दोसर चिट्ठियो ने आएलहेँ। हमहूँ तँ नहिये पठौलिऐ। छुच्छे चिट्ठिये लिखने की हेतै। मने-मन बुढ़िया सरापैत हएत। कहैत हएत जे छौंड़ा ढहलेलक ढहलेल रहिये गेल। मुदा हमहीं की करब? छुच्छे हाथे गामे जा कऽ की करब? टिकटो जोकर पाइ नञि अए। चिन्ता आ सोगसँ फेकुआक मन दबा गेल। कोनो बाटे ने सुझैत। मनक भीतर बिर्ड़ो उठि गेलै। बिर्ड़ोक हवामे फेकुआक मन सोंगक तरसँ निकलि गेल। मनमे एलै जे गाम तँ गाम छी। जइठाम लोक माघक शीतलहरी आगि तापि कऽ काटि लैत अछि। बिना कम्मल-सीरकक जाड़ बिता लैत अछि, गाछ तर जेठक रौद काटि लैत अछि। मुदा दिल्लीमे से हएत? साल भरिक कमाइ साल भरिक मौसमक अनुकूल कपड़ेमे चलि गेल। नहि लइतौं तँ सेहो नहि बनैत। लेलौं तँ गाम छुटि गेल। जहिना घनघोर बादलक फाँटसँ सूर्यक रोशनी छिटकैत, तहिना फेकुओक मनमे भेल। रतनाकेँ कहलक- “भैया, एकटा चिट्ठी लिखि दएह।
लगेमे रतनाकेँ सभ कुछ छलै। पोस्ट-कार्ड निकालि लिखैले तैयार भेल। फेकुआ लिखबए लगल-
दिल्ली
ता. ११.०८.२००८
माए,
गोड़ लगै छिऔ।
मनमे बहुत छल हेतौ जे तोरो बेटा दिल्लीमे नोकरी करैत छौ। मुदा सभ हरा गेल। सिर्फ एक्केटा चीज बँचल जे ऐठाम-दिल्लीसँ, ओइठाम-गाम धरि जीबैक रस्ता धरा देत। तेँ खुशी अछि। हाथ खाली अछि। गाम केना आएब?
फेकुआ

चारिये दिनमे चिट्ठी माएक हाथ पहुँचल। चिट्ठी हाथमे अबिते रामसुनरि निङहारि-निङहारि देखए लगलीह। छौड़ा कतौ अछि जीबैत तँ अछि। बेटा धन छी। कतौ रहह। आब तँ फूटि कऽ जुआन भऽ गेल हएत। जहिना चाह-पान खा-पी बड़का लोकक धोधि फूटि जाइ छै, तहिना तँ फेकुओकेँ भेल हएत। किएक तँ ओहो ने चाह-पान खाइत-पीबैत हएत। गोराइयो गेल हएत। मोछो-दाढ़ी भऽ गेल हेतै। जहिना भगवान घरसँ पुरुख उठा लेलनि, तहिना तँ फेरि दैयो देलनि। जुआन बेटापर नजरि पहुँचते रामसुनरिक मन खुशीसँ नाचि उठलै। मने-मन बुदबुदाए लगलीह- दस बर्खसँ घरमे पुरुख नञि छल तेँ की कोनो पुरुखक घरसँ हमर घर अधला चलल। संतोषे गाछमे मेबा फड़ैत छै। परसुका बात मन पड़लै। चाहक दोकानपर परसू पंडी जी कहैत रहथिन जे ऐबेर शुरूहे अगहनसँ घन-घनौआ लगन अछि। हमहूँ फेकुआक बिआह कइये लेब। बिआह मनमे अबिते सोचलक जे बहुत दिनसँ पाँच गोटेक अंगनामे हाथो नै धुऐलौं। सेहो कइये लेब। समाजक भोजमे तँ नै सकब मुदा जहाँ धरि सकड़ता हएत, तइमे पाछुओ नै हटब। लोक ई नै बुझै जे मसोमातक बेटाक बिआह होइ छै। डफरा-बौसली हवागाड़ी सेहो लइये जाएब। अनका जकाँ एक ढकियाक मुँह नै पसारब। अपना बेटी-जमाएकेँ जे देत से देत। हम किए मंगिऔ। जे आदमी पोसि-पालि कऽ एकटा मनुक्ख देबे करत तेकरासँ फेर की मंगिऔ? किछु नञि मंगबै। लूरि रहत तँ कामधेनु बना कऽ राखब नहि तँ माटिक मुरुत रहत। एकाएक रामसुनरिक नजरि चिट्ठीपर पहुँचल। पोस्ट-कार्ड निकालि हियासि-हियासि देखए लगलीह। फुटा-फुटा करिया अक्षर तँ नहि बुझैत मुदा कृष्ण जकाँ कारी मुरुत जरुर बूझि पड़ैत। चिट्ठी पढ़ाबै लऽ रामसुनरि बिदा भेल। अंगनासँ निकलिते मनमे उठलनि आब की कोनो पहिलुका जकाँ लोककेँ बारह बर्ख कटिया सोन्हबए पड़ै छै। आब तँ साले भरिमे लोककेँ धिया-पुता भऽ जाइत छैक। कहुना भेल तँ हमरो फेकुआ शहरे-बजारक भेल की ने। एते बात मनमे अबिते मुँहसँ हँसी निकलल। असकरे। तेँ कानकेँ सुनै दुआरे तेना रामसुनरि जोरसँ बजैत जेना दोसरकेँ कहैत होइ। फुसिओहोक बेटी युग जितलक। भाग तँ मुँह-कान नीक नञि छै। नञि तँ युगमे भूर करैत। बिआहक आठमे मासमे बेटी भऽ गेलै। ई तँ धन्यवाद ऐ समाजकेँ दी जे एक सूरे सभ बाजल जे सतमसुआ बच्चा छिऐ। जँ एना बिआहक विदागरीमे हएत तँ केहेन होएत? मुदा ओ बच्चा सतमसुआ नहि। समाज झूठो बाजि ओकरा सतमसुआ बच्चाक पालन-पोसनसँ बचेलक।
रविक दरबज्जा लग अबिते रामसुनरिक नजरि चिट्ठीपर पहुँचल। रवि दरबज्जेपर बैसि किछु लिखैत छल। रामसुनरिकेँ लग अबिते रबि उठि कऽ चौकीपर बैसबैत पुछलक- “काकी फेकू भाइक बिआह कहिया करबीही? हमहूँ बरिआती
जेबउ?”
रविक बात सुनिते रामसुनरिक मन बृन्दाबनक रास लीलापर पहुँचि गेलनि। कनिये काल कृष्णक रास-लीला देखि घुरि कऽ आबि चिट्ठी पढ़बो आ लिखबो लेल रबिकेँ कहलक। चिट्ठी पढ़ि कऽ रबि सुना देलकनि। पत्र लिखैले तैयार होइत बाजल- “की सभ लिखब?”
रामसुनरि लिखबए लागलि-
परमानपुर
ता. १५.०८.२००८
बौआ फेकू।
हम तोरा कमाइक कोनो आशा केने छी, जे पाइ नै छौ तँ गाम केना ऐमे? केकरोसँ पैंच-खोंइच लऽ कऽ चलि आ। तीन भुरकुरी धान-गहुम रखने छी, वएह बेचि कऽ दऽ देबै। आब तोहूँ चेतन भेलेँ। लोक कलंक जोड़त। हमरो आब ऐ दुनियामे नीक नै लगैए। तेँ सोचए छी जे अपन काज जल्दी पुरा ली। अगते अगहनमे चलि अबिहेँ। ताबे कनियाँ ठेमा कऽ रखबौ। अखन हमहूँ थेहगर छी मुदा ऐ जिनगीक कोन ठेकान छै। आब ई परिवारो आ दुनियो तोरे सबहक ने हेतौ। समएपर चलि अबिहेँ, जइसँ काज बिथुत ने होउ।
माए ।
माएक पत्र सुनि फेकुआ मने-मन खूब खुशी भेल। मनमे भेलै जे हमरो काज ऐ दुनियाँ, ऐ समाजमे छैक। मुदा मनमे खुशी बेसी काल टिकल नहि। लगले माघक कुहेस जकाँ बुधि‍ अन्हरा गेलै। कोन मुँह लऽ कऽ गाम जाएब। साल भरिक कमाइ माइयक हाथमे की देबै। ई बात सत्य जे हमरा भरोसे माए नहि जीबैत अछि। मुदा हमरा ओकर कोनो दायित्व नहि अछि, सेहो तँ नहि। हे भगवान कोनो गर सुझाबह।
पनरहे दिनक पछाति एकटा घटना घटल। फेकुआक नोकरी छुटि गेल। ओना नओ गोटेक संग फेकुआ काज करैत। मुदा आठो गोटे पुरना कारीगर समयानुसर अपनाकेँ बदलैत जाइत, नव-नव डिजानिक कपड़ा सिबैक लूरि सिखैत जाइत। फेकुआ अनाड़ी, तेँ शुरूहसँ सिलाइक काज सिखए पड़लै। साल भरिमे कहुना कऽ पुरना दिल्लीक कारीगर बनल। मुदा फैशनमे बिहाड़ि एने फेकुआ उड़ि कऽ कातमे खसल। ओना मालिकोक मनमे बेइमानी घोसिआएल रहै। बेइमानीक कारण छल पाइबलाक चसकल मन। एकटा अट्ठारह बर्खक लड़की कारीगर दू हजार दरमाहामे भेँट गेलै।
सवा बर्खसँ शहरमे रहैत-रहैत फेकुओक सूतल बुधि‍ जगि कऽ करोट लिअए लगलैक। जइसँ आत्मबलोक जन्म भऽ चुकल छलैक। मुदा खिच्चा। सक्कत बनिये रहल छलैक। जहिना मालिक नोकरीसँ हटैक बात कहलकै तहिना फेकुआ हिसाब मंगलक। हिसाब लऽ फेकुआ डेरा बिदा भेल। पाइ रहबे करै। रस्तेमे काॅफी पीबि डेरा आएल। डेरा आबि पंखा खोलि पलंगपर ओंघरा गेल। ओंघराइते मनमे अबै लगलै- ई शहर छी, गाम नहि। शहरमे जइ तेजीसँ मशीन, फैशन आ जीवन-शैली बदलि रहल अछि, ओइमे हमरा सन-सन मुरुखक कोन बात जे पढ़लो-लिखल लोक ओंघरनियाँ देत। नवका मशीन पुरना इंजीनियरकेँ धक्का देत। पुरना बुधि‍केँ नवका बुधि‍ धक्का देत। मुदा नीक-अधलाह के बुझत? सभ भोग-विलासक जिनगीक पाछू आन्हर बनि गेल अछि। बाप रे, ई तँ भुमकमक लक्षण छी। फेर मनमे एलै, भरिसक हमर माथ, नोकरी छुटने तँ ने चढ़ि गेलहेँ। ओह, अनका विषएमे अनेरे ओझराइ छी। जेकरा भोगए पड़तै ओकरा सुआस बूझि पड़ै छै, तँ हमरे की। ठनका ठनकै छै तँ कियो अपना माथपर हाथ लऽ साहोर-साहोर करैत अछि। फेर मनमे एलै जे हमहूँ तँ जूड़िशीतलक नढ़िये जकाँ भेल छी। एक दिस चारु भागसँ कुकूर दाँतसँ पकड़ि-पकड़ि तीड़ैत अछि तँ दोसर दिस शिकारी सभ लाठी बरिसबैत अछि। गामक लूरि सीखलौं नहि, सीखि लेलौं शहरक लूरि। तँ आब लिअ। क्वीन्टलिया बोरामे भरि-भरि रखने जाउ। फेकुआक मन औनाए गेल। दुबट्टियेमे हरा गेल। तिनबटिया-चारिबट्टिया तँ बाँकिये अछि। माएपर तामस उठलै। बुदबुदाए लगल- “ई बुढ़िया गछा लेलक जे शुरूहे अगहनमे चलि अबिहेँ। कनियाँ ठेमा कऽ रखबौ। बिआह कइये देबउ।
एक दिस केँचुआइल कनियाँक बदलैत रूप तँ दोसर दिस माइयक सिनेह। समुद्रक पानि जकाँ फेकुआक मनकेँ अस्थिर कऽ देलक। सोचए लगल जे माए नीक छोड़ि कहियो अधलाह नहि केलक आ ने कहियो सोचलक, ओकरापर आँखि उठाएब अनुचित छी। काल्हिये गाम चलि जाएब। बिआहो कइये लेब। दू गोटे पति-पत्नी ओहन लोक एकठाम होएब जे किछु कऽ सकैत अछि। “दू पाइ क आशा हृदएमे समेटि सौझुका गाड़ी पकड़ि, तेसर दिन गाम पहुँचि गेल।

अनेरुआ बेटा :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल



तेसरि साँझ। अन्हरियाक चौठ रहने चान तँ नञि उगल छै मुदा पूब दिस धाही छिटकए लगल छलै। सुनसान अन्हार देखि किछु क्षण पहिनहि एकटा कुमारि, समाजमे लोक-लाज बँचबैक खियालसँ दस दिनक जनमल बच्चाकेँ रस्ताक किनछरिमेे राखि अढ़े-अढ़ आंगन चलि गेलि। बच्चाकेँ नओ दिन तँ झाँपि-तोपि कऽ बीमारीक बहाना बना रखलक। मुदा घटना खुलैक दुआरे दसम दिन जी-जाँति कऽ फेकलक नहि, रस्ताक कातमे ओरिया कऽ रखि देलक। पाँचे-सात मिनटक पछाति गंगाराम हाटसँ घर अबैत रहए। जनमौटी बच्चाक जे रुदन गंगाराम सुनलक, एकाएक ओकर पएर अस्थिर भऽ गेलै। बीच बाटपर ठाढ़ भऽ ओ अवाज अकानए लगल। ई अवाज तँ कोनो जानवर वा जन्तुक वा चिड़ैक तँ नहि थिक। मनुक्खक बच्चाकेँ बोली बूझि पड़ैत अछि। मुदा ऐठाम मनुक्खक बच्चाकेँ बोली भऽ केना सकैत अछि? तहूमे केकरो देखबो ने करै छिऐ। बाँसक गारल खूँटा जकाँ गंगाराम बीच बाटपर ठाढ़। कने काल ठाढ़ रहि ओ आस्ते-आस्ते बच्चा दिस पएर बढ़बए लगल। झल-अन्हार रहने अधिक दूर देखबो ने करैत छल। खेतमे जेना कीड़ी-मकोड़ी। क्यो अपन माए-बापकेँ सोर पाड़ैत तँ क्यो अरामसँ गीत गबैत। तहिसँ सौंसे बाध अनघोल होइत रहै। बच्चाक लग पहुँचि गंगाराम बैसि बच्चाकेँ निहारै लगल। एकटा मन कहलकै- ई तँ मनुक्खक बच्चा छी। मुदा दोसर मन कहलकै- ऐठाम बच्चा आएल केना? तरकारीक झोरा दूबिपर रखि, दहिना हाथ बच्चाक देहपर दऽ हसोथै लगल। देह सिहरि गेलै। रोंइयाँ-रोंइयाँ ठाढ़ भऽ गेलै। मुदा मनमे खुशी उपकलै। मन थीर कऽ बच्चाकेँ दुनू हाथे उठा लेलक। उठा कऽ बच्चाकेँ पेटमे साटि, वामा हाथे बच्चाकेँ थाम्हि दहिना हाथे खढ़-पात पोछए लगल। बच्चा ओहिना पूर्ववते कनैत रहए। खढ़ पोछि गंगाराम कान्हपर सँ गमछा उतारि बच्चाकेँ लपेट लेलक। तरकारीक झोरा कान्हमे टाँगि छाती लगौने बच्चाकेँ अपना ओइठाम अनलक।
आंगन आबि गंगाराम हँसैत घरवालीकेँ कहलक- “आइ भगवान खुश भऽ एकटा बेटा देलनि।
पतिक बात सुनि अकचकाइत भुलिया लगमे दौगल आबि पतिक कोरासँ बच्चा अपना कोरामे लैत पुछलक- “कतए ई बच्चा भेटल? आ-हा-हा, बच्चा तँ बड़ दीव अछि।
“हाटसँ घुमैत काल बाटपर भेटल। एकर सेवा करु। जँ अप्पन बनि कऽ
आएल हएत तँ जीवे करत नञि तँ जहिना रस्ते-रस्ते आएल तहिना चलि
जाएत।
पतिक बात सुनि भुलिया मने-मन सोचए लागलि जे अपना तँ ने गाए अछि आ ने बकरी, जेकर दूध पिया बच्चाकेँ पालितहँु। अपने तँ दूध हेबे नञि करत किएक तँ बुढ़ाड़ीमे सभ अंग सुखा गेल। निराश मनमे भुलियाक आशा जगलै। मनमे अएलै जे अपन ने छाती सुखि गेल मुदा पितिऔत दियादनी तँ चिलकौर अछि। मन पड़िते भुलिया भगवानकेँ धन्यवाद दैत बाजलि- “जहिना भगवान सुखाएल बोनमे फूल फुलौलनि तहिना ओकर अहारोक ओरियान तँ वएह करथिन।
पचास बर्खक गंगाराम। अड़तालीस बर्खक भुलिया। मुदा जते थेहगर गंगाराम तहिसँ कम भुलिया। अड़तालीस बर्खक भुलिया साठि बर्खसँ उपर बूझि पड़ैत छलि। झुनकुट बूढ़ि जकाँ। बूढ़िक सभ लक्षण भुलियामे आबि गेल छलै मुदा कोरामे बच्चा देखि भुलियाक शरीरमे जुआनीक खून दौड़ए लगलै। नव उत्साह, नव-जीवन। आनन्दसँ विह्वल नजरिसँ भुलिया पतिकेँ देखैत आ गंगाराम पत्नीकेँ। दुनूक मनमे खुशीक हिलोर उठैत रहै। पानिक गुब्बारा जकाँ खुशी मँुहसँ निकलए चाहैत रहै। बच्चाकेँ चुप रहै दुआरे भुलिया अपन छातीमे बच्चाकेँ लगा लेलक। कनी काल बच्चा छातीमे लगि मुँह बन्न केलक मुदा दूध नहि भेटने फेर ओहिना कानए लगल।
गंगारामक घरक बगलेमे पितिऔत भाए रूपलालक घर। बच्चाकेँ छाती लगौने भुलिया रूपलालक आंगन पहुँचलि। रूपलालक स्त्री कबूतरी अपना बच्चाकेँ दूध पीयबैत रहए। तीन मासक बच्चा रहै कबूतरीक। भुलियाक कोरामे बच्चाकेँ कनैत देखि अपना बच्चाकेँ ओछाइनपर सुता भुलियाक कोरासँ बच्चाकेँ कोरामे लैत दूध पीयबए लागलि। भुखल बच्चा, हपसि-हपसि दूध पीबए लगल। बच्चाकेँ दूध पीबैत देखि भुलिया कबूतरी दियादनीकेँ कहलक- “भगवान तोरा सात गो बेटा आउरो देथुन।
भुलियाक बातकेँ हँसीमे उड़बैत कबूतरी बाजलि- “चारियेटा मे तँ अकछि गेलौं आ सातटा आरो पोसब पार लागत। अपन असिरवाद घुमा लौथु। जेतबे अछि तेकरे निमेरा होए तेहीसँ बहुत हएत। फेर बात बदलैत बाजलि- दीदी, बुढ़ाढ़ियोमे जे हिनका बेटा भेलनि से केहेन पोरगर छन्‍हि‍। हिनके जकाँ आँखि, मुँह, नाक लगै छन्‍हि‍। भैया जकाँ किछु ने बूझि पड़ैए।
भुलिया- “सभ दिन तू एक्के रंग रहि गेलैं। कहियो तोरा बजै-भुकैक लूरि नञि भेलौ। जेठ-छोटक विचार तँ बुझबे ने करै छीही। केकरो किछु कहि दै छीही। कोनो गत्तरमे लाज-सरम तँ छौहे नै।
हँसैत कबूतरी दोहरबैत बाजलि- “एँह दीदी, हिनका अखन की भेलनिहेँ, एकटा के कहाए जे जोड़ो लगि जेतनि।
कबूतरीक बातसँ भुलियाकेँ तामस नै उठै। बच्चाक आनन्द हृदएकेँ पानि जकाँ कोमल बना देने छलै। भुलिया- “तोरे भैयाकेँ हाटसँ अबै काल रस्तामे ई बच्चा भेटलै।
कबूतरी- “भेटुआ बच्चाक मँुह हिनका मुहसँ किअए मिलै छै। ई हमरासँ छिपबै छथि।
खौंझा कऽ भुलिया बाजलि- “अच्छा हो, हमरे भेल। आब तँ मनमे सबुर भेलौ।
बात बदलैत कबूतरी बाजलि- “दीदी, जहिना एकटा बच्चाकेँ दूध पीयबै छी तहिना अहू बच्चाकेँ दूध पिया देबनि। कोनो कि हमरा घरमे मौसरी नै अछि जे बच्चाकेँ दुधकट्टू हुअए देबनि। लोकेक काज समाजमे लोककेँ होइ छै किने। हिनका अन्हार घरमे दीप जरलनि। तइसँ कि हमरा खुशी नञि होइए।
कबूतरीक बात सुनि भुलियाक मन गद-गद भऽ गेलै। भुखाइल बच्चाकेँ पेट भरिते निन्न आबि गेलै। बच्चाकेँ बिछौनपर सुतबैत कबूतरी बाजलि- “दीदी, बच्चाकेँ एतै रहए देथुन। राति-विराति जखन भुख लगतै पिया देबै।
 “बड़बढ़ियाकहि भुलिया अपना आंगन आबि पतिकेँ कहलक- “आब बच्चा जीबे करत। बड़ दूध गोधनपुरवालीकेँ होइ छै। दुनू बच्चाकेँ पालि‍ लेत।
बच्चाक लेल गंगारामक मन कनैत। मुदा भुलियाक बात सुनि मन हरिया गेलै। मनमे एकटा शंका जरुर उठलै- “बच्चाकेँ अपना अंगना किअए ने नेने अएलौं? आन तँ आने छी।
पतिकेँ चोहटैत भुलिया कहलक- “अहाँ पुरुख छी, तँ की बुझबै? माएक की मासचर्ज होइ छै से स्त्रीगणे बूझि सकैए। जे माए एक दिन बच्चाकेँ छातीसँ लगा लेत ओ जिनगीमे कहियो ओइ बच्चाक अधला नै सोचत।
गंगाराम चुप भऽ गेल। मुदा एकटा बात मन पड़लै। बाजल- “अपने दुनू गोरे ने ओकर बाप-माए हेबै, तेँ कोनो नाम तँ रखि देबै कि ने।
पतिक बात सुनि भुलियाक मनमे छठियारक दृश्य आबि गेलै। मुस्की दैत बाजलि- “आन बच्चाकेँ तँ स्त्रीगण सभ मिलि कऽ नाओँ रखै छै। मुदा से तँ ऐ बच्चाकेँ नै भेलै। अपने दुनू गोरे मिलि कऽ नाम रखि दियौ।
भुलियाक विचार सुनि पति बिहुँसैत बाजल- “मंगल नाम रखि दिऔ।
सात मासक उपरान्त बच्चाक मुँहमे दाँतो जनमए लगल आ ठाढ़ भऽ कऽ डेगा-डेगी चलौ लगल। अन्न सेहो चाटए लगल आ पानि सेहो पीबए लगल। बच्चाक सिनेह एते अधिक दुनू परानीमे रहै जे कखनो आँखिक परोछ होअय, से नहि चाहए। भुलिया बोइन करब छोड़ि देलक। अंगना-घरक काज सम्हारि साबेक जौर ओसारेपर बैसि बॉंटए लागलि। ओकरे बेचि-बेचि दू पाइ कमा लैत छलि। अपना तँ साबे नहि रहै मुदा अधियापर बँटैक लेल गाममे साबे भेटै। दुनू परानी गंगारामकेँ एते उत्साह बढ़ि गेलै जते दस बर्ख पहिने छलै। भरि-भरि दिन काज करैत मुदा थाकनि बुझिये ने पड़ै। भुलियाकेँ जैखन मंगल माए कहए तैखन आनन्दसँ ओ उन्मत भऽ जाए।
पाँच बर्खक अवस्थामे मंगलक नाम पिता स्कूलमे लिखा देलक। मंगल पढ़ए लगल। पाँचे किलास तक पढ़ाइ गामक स्कूलमे होइत रहै। पँचमा तक मंगल पढ़ि लेलक। दस बर्खक भइयो गेल। मुदा दुनू परानीमे गंगारामक देह एत्ते अव्वल भऽ गेलै जे काज करैले लोक अढ़ौनाइ छोड़ि देलकै। कहुना-कहुना दुनू परानी जौर बाँटि-बाँटि गुजर करए। जिनगी भारी लागए लगलै। मुदा दसे बर्खक मंगलमे ज्ञानक उदए कनी-मनी भऽ गेलै। जहिना बच्चेमे हनुमान बाल सुर्जकेँ गीरि गेल छलाह, तहिना। मंगल बापकेँ कहलक- “बाबू अहाँ दुनू गोरे काज करै जोकर नै रहलौं। हमरा मन होइए जे चाहक दोकान खोली। अपने डेढ़ियापर एकटा एकचारी बान्हि दिअ, ओइमे हम दोकान खोलब।
गंगारामक मनमे जँचलै। मुदा चाह तँ गामक लोक पीबैत नहि अछि, तखन दोकान चलतै केना? मुदा तैयो एकचारी बान्हि देलक। बाड़ीमे एकटा जीमरक गाछ रहै ओकरा पच्चीस रूपैयामे बेचि, चाह बनबैक बरतन-वासन मंगल कीनि लेलक।
चाहक दोकान मंगल शुरू केलक। नव वस्तुक दोकान गाममे। मुदा पहिल दोकानकेँ तँ मोनोपोली माने एकाधिकार होइ छै। शुरूमे तँ गामक लोक नव चीज पेय बूझि सेहन्ते पीनाइ शुरू केलक। मुदा धीरे-धीरे दोकान जमि गेलै। जइसँ एत्ते कमाइ हुअए लगलै जे कहुना-कहुना गुजर चलऽ लगलै। तीन साल बीतैत-बीतैत दुनू परानी गंगाराम मरि गेल। जाधरि गंगाराम जीबैत छल ताधरि गाममे मंगलक प्रति कोनो तरहक घिरना नञि छलै मुदा गंगारामक मरलाक बाद लोकमे धिरना जागए लगलै। मुदा तैयो दोकानक बिकरीमे कमी नञि अएलै, किएक तँ समाजक लोक चाह-पानि पीयब शुरू कऽ देने छल।
चाहक दोकान केलाक उपरान्तो मंगलक मनमे पढ़ैक जिज्ञासा जीबिते रहै। खाइ-पीबैसँ जे पाइ उगड़ै ओइसँ ओ किताब, कागज, कलम कीनि-कीनि पढ़बौ करए आ लिखबो करै। मरै काल गंगाराम मंगलकेँ जन्मक इतिहास सुना देने रहै। जइसँ मंगलमे समाजक कुरीति, कुव्यवस्था जे करमी लत्ती जकाँ छाड़ने अछि, ओइ बिन्दुपर नजरि पहुँचि गेल छलै। तेँ किताबक अध्ययनक संग-संग समाजोक बेवहारक अध्ययन करए लागल। चाहक दोकान चलबैत तेँ दस गोटेक संग गप-सप्‍प करैक लूरि सेहो सीखि लेलक। ततबे नहि रूपचन गामक खिसक्कर। मुदा बड़ गरीब। साँझू पहरकेँ एक झोँक चाहक बिकरी खूब होइ, बादमे गहिकी पतरा जाइ। जखन गहिकी पतरा जाइ तखन रूपचन मंगलक दोकानपर अबै। दू गिलास चाह पिया मंगल रूपचनक दिमाग साफ कऽ दै। दू-चारिटा पछुऐलहा गहिकियो रहै, तइ बीच रूपचन पुरना खिस्सा उठाबै। एक घंटा, दू घंटा, तीनि-तीनि घंटा तक रूपचन खिस्सा कहै। खिस्सा सभ दिन बदलि-बदलि कऽ कहै। कहियो राजा-रानी, तँ कहियो रानी सरंगा तँ कहियो रजनी-सजनीक। कहियो गोनू झा तँ कहियो डाकक। कहियो अल्हा-रुदल तँ कहियो दीना-भद्री। कहियो लोरिक तँ कहियो सलहेसक।
ऐ रुपे मंगलक बुधि‍क बखारीमे किताबक ज्ञान, समाजक ज्ञान आ खिस्साक ज्ञान जमा हुअए लगलै। रातिमे जे खिस्सा सुनै ओ दिनमे जखन समए भेटै, लिखि लिअए। लिखैत-लिखैत पाँतियो सोझ-साझ हुअए लगलै आ जिज्ञासो बढ़ए लगलै।
एक दिन बेरि टगैत, एक गोटे मंगलक ऐठाम चाह पीबए आएल। देह-दशासँ बिल्कुल साधारण। हाथमे एकटा चमड़ाक बैग। ओ आदमी “भारत जागरणपत्रिकाक सम्पादक। गामक दशा-दिशाक अध्ययन करैक लेल गाम दिस आएल छल। मंगलसँ गप-सप्‍प करैत ओ सम्पादक हेरा गेलाह। उन्मत्त भऽ गेल। जेना मंगलक हृदए आ सम्पादकक हृदए एक ठाम भऽ कतौ सफरमे निकलल हुअए, तहिना।
भक्क टुटिते दुनू गोरे हँसए लगल। सम्पादक कहलखिन- “बौआ, अहाँ चाह बनाउ। अखन धरि हमहुँ आइ चाह नै पीने छलौं। आइ हम रहब। निचेनसँ गप-सप्‍प करब।
मंगल चाह बनबए लगल। चाह बनल। दुनू गोटे पीलक।
खेला-पीलाक बाद, रातिमे दुनू गोटे एक्के बिछानपर बैसि गप-सप्‍प करए लगल। जे किछु खिस्सा-पिहानी मंगल लिखने छल ओ हुनका–-सम्पादककेँ- आगूमे रखि देलक। उनटा-पुनटा सम्पादक जी देखए लगलथि। भाषा-शैली तँ नहि जँचलनि मुदा विषए-वस्तु हृदएकेँ पकड़ि लेलकनि। हँसैत बजलाह- “बड़ सुन्दर वस्तु सभ अछि। एकरे तकैले हम आएल छी।
कहि बैग खोलि किछु पत्रिका आ किछु किताब दैत कहलखिन- “ऐ मे
लिखैक तौर-तरीका निर्धारित कएल अछि। एकरा ठीकसँ पढ़ि जे आधार निर्धारित अछि, ओइ अधारपर लिखब। हम सम्पादक छी। मासिक पत्रिका चलबैत छी। अहाँक एक-एक कथा सभ मासक पत्रिकामे छापब। एक कॉपी अहूँकेँ पठा देल करब।
तीन-चारि घंटा धरि सम्पादक जी मंगलकेँ बुझबैत रहलखिन। भोरे सूति उठि चाह पीबि ओ चलि गेलाह।
मंगलक कथा पत्रिकामे मासे-मास छापए लगल। मंगलक अनेको पाठकमे एकटा लड़की सेहो। नाम सुनयना। दर्शन शास्त्रसँ एम.ए.मे पढ़ैत। पाँचम मासक पत्रिकामे सम्पादकजी मंगलक परिचएमे एकटा उपन्यासक चरचा सेहो कऽ देलखिन, नाम छलै “मरल गाम। सुनयनाक पिता वकील। सुनयनाक मन “मरल गाम नाम पढ़ि नाचए लागल। मनमे अाबए लगलै जे हमर देश तँ गामक देश छी। जखन गामे मरल अछि तखन देशकेँ की कहबै? ई विचार सुनयनाक मनमे उड़ी-बीड़ी लगा देलक। जे सुनयना पिताक सोझाँमे भरि मँुह बजैत नहि ओ सुनयना आइ पितासँ डिस्कस करैले तैयार भऽ गेलि।
कोर्टसँ आबि वकील सैहेब चाह पीबि टहलैले गेलाह। टहलि-बूलि कऽ दोसर साँझमे आबि कौल्हुका केसक तैयारीक लेल फाइल निकाललनि। पत्नी चाह आनि कऽ देलखिन। चाह पीबि, पान खा वकील सहाएब फाइल खोलैत रहथि आकि सुनयना आबि कऽ आगूक कुरसीपर बैसि बाजलि- “बाबूजी, एकटा सवाल मनमे घुरिया रहल अछि। ओ कने बुझा दिअ?”
 “की?”
“आइ पत्रिकामे पढ़ने छलौं जे सचमुच गाम मरल अछि? जँ गाम मरल अछि तँ देश गामक छी। देशकेँ की कहबै?”
सुनयनाक प्रश्नक गंभीरतापर नजरि नहि दऽ वकील सैहेब कहलखिन- “ई साहित्यकार लोकनिक समझ छि‍यनि‍, तेँ ऐ पर किछु नहि कहि सकै छिअह।
साहित्यकारो तँ अही समाजक लोक होइ छथि। हुनको आने लोक जकाँ जिनगी छन्‍हि‍। तखन ओ एहेन विचार किअए लिखलनि?”
“साहित्यकारक बात साहित्यकारे बूझि सकैत छथि। हम तँ बकील छी कानूनक बात बुझै छिऐ। अखन तूँ जा, हम एकटा केसक तैयारी करब।
सुनयना उठि कऽ चलि गेलि। अपना कोठरीमे बैसि कऽ विचार करए लागलि। जहि देशक गाममे ने पानि पीबैक ओरियान छै, ने खाइक लेल सभकेँ संतुलित भेाजन भेटै छै, ने भरि देह कपड़ा भेटै छै, ने रहैक लेल घर छै, ओइ देशकेँ मरल नै कहबै तँ की कहबै। एखनो लोक सरल पानि पीबैत अछि, कहुनाकेँ किछु खा दिन कटैत अछि, गाछक निच्चाँमे आगि तापि समए बितबैत अछि, हजारो रंगक रोग-व्याधिसँ घेरल अछि, ओइ देशकेँ की कहबै? हजारो बर्खक मनुक्खक इतिहासमे एखनो धरि सरस्वतीक आगमन सभ मनुक्ख धरि नै भेल अछि, ओइ देशकेँ की कहबै? ढेरो प्रश्न सुनयनाक आगूमे ठाढ़ भऽ गेल रहए। मन घोर-घोर हुअए लगलै। अचेत जकाँ सुनयना कुरसीपर ओंगठि सोचए लागलि। सोचैत-विचारैत अंतमे ऐ प्रश्नपर आबि अॅटकि गेलि जे किताबक भाँज लगा कऽ पढ़ी। मुदा किताब भेटत कत्तऽ। फेर मन एलै जे किताब लिखनिहारे लग पहुँचि किताबक भाँज लगाबी। पत्रिका निकालि लेखकक पता पुरजीपर लिखलक।
दोसर दिन सुनयना मंगलक भाँज लगबै बिदा भेल। नओ बजेक समए। भिनसुरका गहिकीकेँ सम्हारि मंगल केतली, टोपिया, ससपेन, गिलास इत्यादि बरतन दोकानक आगूमे रखि, चुल्हिसँ छाउर निकालि चुल्हि निपैत। सुनयना चाहक दोकानपर ऐ दुआरे पहुँचल जे ऐठामसँ सौंसे गामक लोकक भाँज लगि सकैए। दोकानपर पहुँचि मंगलकेँ पुछलक- “ऐ गाममे मंगल नामक एक व्यक्ति छथि, हुनकर घर बता दिअ।
अपन नाम सुनि मंगल चौंकि गेल। मुदा चुप्पे रहल। जेना मने-मन गाममे मंगलकेँ तकैत रहए। सुनयनो सएह बुझलक। कनी काल गुम्म रहि बाजल- “बहि‍न जी, अगर मंगल ऐ गाममे हएत तँ जरुर भाँज लगा देब। मुदा अखन हमरा ऐठाम आएल छी, तेँ बिनु खेने-पीने केना जाएब? ई तँ मिथिला छिऐ। जहिना घरवारीक लेल स्वागत करब अनिवार्य अछि तहिना तँ अतिथियो लेल।
मंगलक बात सुनि सुनयनाक मनमे जेना पियासलकेँ शीतल पानि भेटि जाइत, तहिना भेल। बाँसक फट्ठाक बनौल बेंचपर सुनयना बैसि गेलि। हाथ धोए मंगल सस्पेन अखारि, चुल्हि पजारि चाह बनबए लगल। ब्रेंच परसँ उठि सुनयना चुल्हि लग जाए चाहलक आकि कुर्तीक निचला कोन फट्टीमे फँसि गेलै, जइसँ फटि गेलै। मुदा तेकर चिन्ता नहि कऽ सुनयना मंगल लग बैसि गेल। लगमे सुनयनाकेँ बैसैत देखि पुछलक- “मंगलसँ कोन काज अछि?”
सुनयना- “मंगल साहित्यकार छथि। हुनकर लिखल एकटा उपन्यास “मरल गामछन्‍हि‍। ओइ पोथीक भाँज हम बजारमे लगेलौं मुदा कतौ नहि भेटल। तेँ लिखिनिहारेक भाँज लगबए एलौं।
सुनयनाक बात सुनि मंगल नमहर साँस छोड़ि बाजल- “मंगलकेँ अहाँ केना जनैत छी?”
सुनयना- “हुनकर लिखल कथा हम “भारत जागरणमे पढ़ैत छी ओइमे “मरल गामउपन्यासक चरचा देखलिऐक। जेकरा पढ़ैक इच्छा मनमे भेल। तेँ एलौंहेँ।
मंगल बूझि गेल। खुशीसँ मन ओलरि गेलै। मनमे अएलै जे पियासलकेँ पानि देब ओहने आवश्यक होइत अछि जेना भूखलकेँ अन्न। मुदा हमरा तँ एक्के काॅपी अछि जे लिखने छी। जँ ई काॅपी दऽ देबै तँ अपन साल भरिक मेहनत चलि जाएत। मुदा नहि देब तँ आरो महापाप हएत। फेर मनमे अएलै जे अपना ऐठाम पढ़ैले दऽ दियै आ कहि दियै जे जहिया हमर दिन-दुनियाँ घुरत तहिया छपाएब। छपेलाक उपरान्त अहाँकेँ देब। ताबे ऐठाम रहि पढ़ि लिअ।
तइ बीच चाह बनल। दुनू गोटे पीलक। चाह पीबि सुनयना बाजलि- “मंगलक भाँज लगा दिअ।
विस्मित भऽ मंगल बाजल- “हमरे नाम मंगल छी। हमहीं उपन्यास लिखने छी। मुदा छपाओल नहि अछि। सिर्फ लिखलेहे टा अछि। तेँ हम आग्रह करब जे ऐठाम रहि पढ़ि लिअ। जहिया छपाएब तहिया अहाँकेँ एक काॅपी जरुर देब।
मंगलक बात सुनि सुनयना अचंभित भऽ गेलि। पएरसँ माथ धरि मंगलकेँ निङहारए लागलि। आगिक धुँआ, चुल्हिक कारीखसँ मंगल बेदरंग भेल। देहक वस्त्र परसौतीक वस्त्र जकाँ, सौंसे देहसँ गरीबी झक-झक करैत। मंगलक बगए देखि सुनयनाक आँखि नोरा गेलै। नोर पोछैत सुनयना बाजलि- “ऐठाम रहि कऽ हम उपन्यास नहि पढ़ि सकब। किएक तँ कोनो पोथी पढ़ैक मतलब होइत अछि जे ओइ पोथीक विषए-वस्तुकेँ नीक जकाँ बुझब। से धड़-फड़मे केना संभव अछि?”
सुनयनाक विचारमे गंभीरता देखि मने-मन मंगल सोचए लगल। आत्माक उत्साह बढ़ए लगलै। सुनयना दिस तकलक। सुनयनाक आँखिमे पढ़ैक भूख जोर पकड़ने देखलक। मनमे एलै जे हमहूँ तँ अनके लेल लिखने छी। तखन छपौलासँ हजारो हाथ जेतै मुदा अखन तँ एक्के हाथ जा रहल अछि। मनमे सबुर अएलै जे कमसँ कम एक्कोटा पढ़निहारक हाथ तँ जाएत। तइ बीच सुनयना बाजलि- “जहिना हम काॅपी ऐठामसँ लऽ जाएब तहिना पढ़लाक बाद घुमा देब। तेँ पोथी हरेबाक कोनो संभावने नै अछि। ऐठाम रहि पढ़ैमे हमरो लाचारी अछि। लाचारी ई अछि जे भरि दिन तँ हम कतौ रहि सकै छी मुदा सूर्यास्तक बाद घर पहुँचब जरुरी अछि।
मंगलक विचारमे कने सि‍नेह एलैै। बाजल- “बड़बढ़ियाँ, हम अहाँकेँ पोथी दऽ दै छी। आगूक बात अहाँ जानी।
हाथमे पोथी अबिते सुनयनाक मनमे खुशी अएलै। एक टकसँ पोथी देखि मंगल दिस ताकि मुस्किया देलक। मने-मन मंगल सुनयनाकेँ पढैत आ सुनयना मंगलकेँ। सुनयना हँसैत बिदा भऽ गेलि।
सुनयना एम.ए. नीक जकाँ पास केलक। नारी अधिकारक सर्मथक वकील साहेब। मुदा मन ओतए ओझरा जानि‍ जेतए देखथि जे नारी सिर्फ एक्के-आध बिन्दुपर नहि, जीवनक सभ क्षेत्रमे जकड़ल अछि। जेकरा मेटाएब धिया-पुताक खेल नहि। कठिन संघर्षसँ हएत। कतौ वैचारिक संघर्ष करै पड़त तँ कतौ बलक। ऐ विचारमे वकील साहब कुरसीपर बैसि सोचैत रहथि। साँझक समए। पत्नी चाह बनौने एेलखि‍न। टेबुलपर चाह राखि, बगलक खाली कुरसीपर बैसि कहलखि‍न- “अपना सबहक पढ़ल-लिखल समाजक परिवारमे सुनयना अछि तेँ ने मुदा जँ एहेन बेटी किसानक घरमे रहतै तँ लोक ओकरा एना उन्मुक्त रहए दैतै!चाहक चुसकी लैत वकील साहेब पुछलखिन- “अहाँ की कहए चाहैत छी, कने खोलि कऽ बाजू।
“सुनयनाक बिआह कऽ लिअ। तखन तँ मनोज रहत की ने ओ तँ बेटा धन छी। बेटा-बेटीक बिआह करब माए-बापक अनिवार्य कर्तव्य छी। मुदा हमरा मनमे एकटा नव विचार अछि। ओ ई जे सुनयनाकेँ सेहो पूछि लिऐ।
सुनयनासँ पूछैक बात सुनि पत्नी ढोढ़ साँप जकाँ हनहनाइत बाजलि- “लोक की कहत? आइ धरि केकरा देखलिऐ जे माए-बाप बेटा-बेटीसँ पूछि कऽ बिआह करैत अछि।
पत्नीक विचार सुनि वकील साहेब मने-मन सोचए लगलाह जे नारीकेँ मात्र पुरुखे नहि नारियो दाबि कऽ रखै चाहैत अछि। अजीब घेरा-बंदीमे नारी फँसल अछि। मुदा अपन विचारकेँ मनेमे राखि सुनयनाकेँ सोर पाड़लखिन। अपना कोठरीसँ निकलि सुनयना आएल। कुरसीपर बैसलि। सुनयना माए दिस देखए लागल। तामसे माए पति दिस देखैत। वकील साहेब सुनयनाकेँ कहलखि‍न- “बाउ, आब तूँ एम.ए. पास कइये लेलह। माए-बापक दायित्व होइत छैक बेटा-बेटीक बिआह करब। तेँ हमहूँ अपन भार उतारए चाहै छी। तोरो किछु बजैक छह।
पिताक बात सुनि सुनयनाक देहमे कँप-कँपी आबि गेलै। मनमे थोड़े ओज। मुदा असथिरसँ बाजलि- “बाबूजी, बि‍आह तँ सभ पुरुष-नारीक लेल अनिवार्य प्रक्रिया छिऐ। जइसँ सृष्टिक विकास प्रक्रियामे सहयोग होइ छै। रहल बात जे बि‍आह केहेन होअए। अखन जे देखि रहल छी ओ नब्बे-पनचानबे प्रतिशत अनमेल बिआह होइत अछि। कतौ धनक मिलानीसँ तँ कतौ दहेजक चलैत, कतौ कुल-मूलक चलैत तँ कतौ किछु। मुदा हमरा विचारसँ बिआह हेबाक चाही मनक मिलानीसँ। जे टिकाउएटा नहि आनन्दमय सेहो हएत।
सुनयनाक बात सुनि माए उत्तेजित होइत बाजलि- “बेटी, हमरा सबहक मिथिलाक परम्परा रहल अछि जे ई बि‍आह काज माए-बापक विचारसँ होइ नै की बेटा-बेटीक विचारे। किन्तु जँ बेटा-बेटीक विचारसँ बिआह हएत तँ समाज ढनमना जाएत।
सुनयना बाजलि- “बड़ सुन्नर बात कहलीही माए मुदा परम्पराक भीतर जे दुरगुण छैक ओहूपर नजरि देमए पड़तौ।
मुँहपर हाथ देने वकील सहाएब चुप-चाप सुनैत रहथि। सुनयनाक तर्कक आगू माए कमजोर पड़ैत गेलीह। मुदा तैयो चुप होइले तैयारे नहि छलीह। सामंजस्य करैत वकील सैहेब सुनयनाकेँ कहलखिन- “बाउ, तूँ अप्पन विचार दएह?”
सुनयना बाजलि- “अहाँ खर्च कत्ते करए चाहै छी बाबूजी?”
खर्चक नाम सुनि वकील सहाएब चौंकि गेलाह। मुदा अपनाकेँ स्थिर राखि कहलखिन- “बाउ, अप्पन की ओकाइत अछि से तोहूँ जनिते छह। मुदा जे ओकाइत अछि ओइमे हम कंजूसी नै करबह। दू भाए-बहि‍न छह। ई सम्पत्ति तँ तोरे सबहक छिअह।
सुनयना बाजलि- “बाबूजी, मनुक्ख देहे आ धने पैघ नहि होइए, पैघ होइए ज्ञान आ कर्तव्ये। सभ स्त्री चाहैए जे हमर जीवन-संगी बुधियार आ कर्मठ हुअए। अखन हम अहाँकेँ अंतिम निर्णए नहि दऽ रहल छी मुदा एते जरुर कहब जे सोनपुरमे मंगल नामक एकटा चाहक दोकानदार अछि। ओकरा कियो ने छै। मुदा ओकर जे काज आ बुधि‍ छैक ओ ओकरा एक दिन महान साहित्यकारक रूपमे दुनियाँक बीच अनतै। अखन ओकरा गरीबी जरजर बनौने छै। गरीबीक जालमे ओ एना ओझरा गेल अछि जइसँ निकलब कठिन छैक। किन्तु जँ ओकरा ओइ गरीबीक जालसँ निकालल जाए तँ ओ जरुर उगैत सूर्य जकाँ अकासमे चमकए लगत।
वकील सहाएब कहलखिन- “बाउ, यदि तूँ हृदएसँ ओकरा चाहैत छह तँ हमरा दिससँ कोनो आपत्ति नहि। मुदा अखन समए रहैत विचारि लैह।
सुनयना बाजलि- “अनेक विषमता रहितो हमरा दुनू गोटेक बीच आत्माक समता अछि। हमहूँ नारीक संबंधमे किछु लिखए चाहै छी। किएक तँ अपना ऐठाम नारीक प्रति जे अदौसँ अखन धरि अन्याय होइत रहल अछि ओ हमरा हृदएकेँ दलमलित कऽ देने अछि। दुनियाँक सुन्दरसँ सुन्दर वस्तु हमरा फीका लगि रहल अछि।
वकील सहाएब कहलखिन- “बाउ, हम तोहर विचारकेँ मानि लेलियह। तूँ अपनेसँ जा कऽ देखि आबह जे कते मदतिसँ ओ मंगल उठि कऽ ठाढ़ हएत। हम ओते मदति कऽ देबै।
पिताक विचार सुनि सुनयना हँसैत अपना कोठरी दिस बिदा भेल। सुनयनाक विचारपर वकील सहाएब मने-मन गौर करए लगलथि। मुदा पत्नीक मनक तामस आरो बढ़िते गेलनि।

पीरारक फड़ :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल



गोल-गोल हरियर-हरियर भुआ जकाँ सोहरी लगल डारिमे जेहने हरियर पात तेहने फड़, थिक पीरारक फड़। पाँचेटा पुरान गाछ गाममे, बड़का-बड़का आम, जामुन सीसो गाछक जन्म ओ पाँचो पीरारक गाछ देखने। सए बरखक करिया बाबा कहैत जे जहियासँ मोन अछि ओ पाँचो गाछ ओहिना बूझि पड़ैत अछि। एते ठनका खसल, बिहाड़ि आएल मुदा ओइ पाँचो गाछक रुइयाँ भग्न नहि भेलै। दस गजसँ नमहर नहि, ने मेघडम्मर जकाँ बहुत पसरल आ ने छिड़िआएल। छोट-छीन बरखाकेँ रोकि पानिक बुन्नकेँ माटिक मुँह नहि देखै दैत घनगर पात सजा कऽ सजल। सहतक कोथी जकाँ चोखगर काँट, डारि रूपी पहरुदारकेँ सजौने। छड़गर-छड़गर डारिमे चौरगर-चौरगर पात जेना इन्द्रकमल वा तगड़ फूलक होइत। तहिना फूलो।
पाँचो पीरारक गाछ सइयो बिहाड़ि, हजारो बरखा, नमहरसँ छोट धरि सइयो बेर पाथरक चोट खेलक, बाढ़ि रौदीकेँ हँसैत-हँसैत सहलक। जहिना गामक उत्तरबरिया बाधमे एक्के आड़िपर पतिआनी लगा पाँचो गाछ ठाढ़। देखबोमे पाँचो एक्के रंग। ने नमहर ने छोट डारि, जे एक-दोसरसँ हक-हिस्सा लेल झगड़ैत। पाँचोमे अटुट प्रेम। जखन पाँचो फूलसँ सजैत तखन बूझि पड़ैत जे एक-दोसरक जुआनीक रंग देखि हृदयसँ खिलखिला-खिलखिला हँसैत होअए। एतेक नमहर जिनगीमे ने कियो जड़िकेँ तामि-कोड़ि पानि देलक आ ने ठारिकेँ छकड़ि-छुकड़ि गाछकेँ सुन्दर बनौलक। सोलहो आना देखभाल भगवानेक उपर। तेँ पाँचो गाछ स्वाभिमानसँ भरल जे केकरो एहसान रूपी कर्ज जिनगीमे नहि लेलौं। सदिखन पाँचो हँसैत-इठलाइत मन्द हवामे झुमैत।
पहिने पाँचो गाछक फूल फुला कऽ फड़ बनि झड़ि जाइत। बादमे फड़
पूर्ण जिनगीक सुख भोगि अंतिम अवस्थामे पकलापर पवन रूपी न्योतहारीकेँ पठा
चिड़ै-चुनमुनीकेँ बजा अपन शरीर दान करैत, यएह पाँचो गाछक जिनगी भरिक धर्म रहल।
ओइ गाछसँ हटिये कऽ लोक सभ खेतक जोत-कोर कऽ उपजबैत। जे ओइ गाछपर सुगवा साँप रहैत छैक। सुगवा साँप लोककेँ देखैमे अबिते ने छैक ओ हरियर-लत्ती जकाँ रहैत छैक। जेकरा कटलासँ स्वर्ग-नरकक द्वार अनेरे खुजि जाइत छैक। बीचमे कतौ कोनो रुकावट नहि होइत छैक।
उत्तरवारि बाधक रखबारि रतना करैत छल। दू साल पहिने दुनू परानी मरि गेल। दू सालसँ क्यो बाधक रखबारि करैले तैयारे ने होइत। डर होइत जे पीरारक गाछपर सुगवा साँप रहैत छैक तेँ के अपन जान गमौत, दू-चारि सेर अन्न सालमे हेतै की नहि।
साल भरि पहिने पिचकुन नोकरी करैले मोरंग गेल। रौदियाह समए भेने किसानोक दशा नीक नहि। जन-बोनिहारक चर्चे की। साँझक-साँझ चुल्हि नहि पजरैत। गरीब-गुरबा गाए-बकरी बेचि-बेचि मोरंग, सिलीगुड़ी, आसाम नोकरी करए गेल। पिचकुनमा सेहो रखवारीवाली नवकी कनियासँ पनरह रूपैया कर्जा लऽ गेल रहए। अखन धरि गाममे पिचकुनमाकेँ बकलेले-ढहलेेले बुझैत छल। जते गोटेक मेड़िया नोकरी करए गेल छल ओइमे सँ किछु गोटे विराटनगर, किछु गोटे रंगैली, किछु गोटे सिलीगुड़ी आ किछु गोटे आसाम गेल। पिचकुनमाकेँ बकलेल बूझि सभ छोड़ि अपन-अपन गर लगबै गेल। असकरे पिचकुनमा इटहरी चौकसँ थोड़े आगू जा एकटा गाछक निच्चाँमे बैसि चूड़ा आ घुघनी खाए लगल। खाइते छल आकि दू गोटेकेँ उत्तर मुँहे जाइत देखि चूड़ा-घुघनीकेँ गमछाक खोंचड़ि बना खाइते संगे बिदा भेल। खेबो करै आ गप्पो-सप्प करै।
जाइत-जाइत धनकुटासँ कोस भरि पाछुए पहुँचल। जहि दुनू गोड़ेक संग रहै ओ दुनू किसान। एक गोटे मंगत राम पिचकुनकेँ नोकरी रखि लेलक। मरद-मौगी मिला पचासोटा जन मंगतराम खटबैत। सखुआक तीन महला घर बनौने। किछु खेत पहाड़ोपर रहै। जइमे मड़ुआ, सामी-कौनी उपजैत। नेबो सनतोला सबहक गाछ सेहो रहैक। पहाड़क उपरमे रौद देखि पिचकुन उजड़ा पहाड़ बुझै। छोट-छोट गाछसँ लऽ कऽ पैघ-पैघ गाछक जंगल। छोट-छोट पहाड़सँ लऽ कऽ नमहर-नमहर पहाड़ देखि पिचकुन मने-मन सोचए जे दोसर दुनियाँमे चलि एलौं। मुदा रास्ताक ठेकान रहने भरोस रहै जे तीन दिनमे अपन गाम चलि जाएब। बड़का-बड़का बखारी, नारक टाल देखि पिचकुन मने-मन खुशी होइत जे मालिक खूब धनिक अछि। कहियो नोकरीसँ हटाओत नहि। जब गाम जाइक मन हएत छुट्टी लऽ कऽ चलि जाएब आ फेरो चलि आएब। रस्तो तँ देखले अछि।
साल भरि नोकरी केलाक बाद पिचकुनकेँ गाम अबैक मन भेलै। जहियासँ पिचकुन नोकरी कऽ रहल एक्को पाइ घर नहि पठौलक। पठबिते केना? ने डाकघरक ज्ञान रहै आ ने केकरो अबैत-जाइत देखै। एकटा थारुनसँ पिचकुनकेँ लाट-घाट भऽ गेलै। अठारह-उन्नैस बरखक ओ थारुन। मंगते रामक जन। ओकर नाम धनिया। पिचकुनक संग अबैले धनिया राजी भऽ गेलि। साल भरिक बाद पिचकुन गाम आओत तेँ माए लेल ऊनी स्वीटर, चद्दरि आ अपनाे लेल फुलपेंट भरि बाँहिक स्वीटर चद्दरि सेहो कीनि लेलक। समाज सभ लेल सनतोला किनलक। कपड़ा, सनातोलाक मोटरी बान्हि, रूपैयाकेँ फुलपेंटक जेबीमे लऽ मोटरीमे सेहो बन्हलक। बटखरचा लेल मुरही लऽ लेलक। धनिया अपन धएल-धड़ल रूपैया कपड़ा सभ बान्हि रातियेमे तैयार भऽ गेलि। जंगल-झारक दुआरे रातिमे नहि निकलल। भुरुकवा उगिते दुनू गोटे अपन-अपन मोटरी लऽ चुपचाप बिदा भऽ गेल। जही रस्तासँ पिचकुन गेल रहए ओही रस्तासँ विदा भेल। इटहरी आबि दुनू गोटे बस पकड़लक। बससँ बथनाहा आबि पएरे बिदा भेल। कोसीमे नाहपर पार भऽ निरमली तक पएरे आएल। निरमलीमे गाड़ी पकड़ि गाम आएल।
फुलपेंट कमीज, पएरमे चप्पल पहिरने, बाबरी उनटौने कान्हपर मोटरी लेने आगू-आगू पिचकुन आ पाछू-पाछू धनिया आबि माएकेँ गोड़ लगलक। टोल-पड़ोसक लोक पिचकुनकेँ चिन्हबे ने करैत। पिचकुन माएकेँ गोड़ लागि ओलतीमे चप्पल रखि माएकेँ घर लऽ जा मोटरी खोलि रूपैयाक गड्डी चुपचाप देखौलक। ऊसरमे दूबि जनमि गेल। रूपैयाक गड्डी देखि माएक मोन उड़ि गेलै। हसोथि-पसोथि कऽ सभ कपड़ा समेटि, रुपैया तरमे घोंसिया मोटरी बान्हि धरैनपर रखलक। धनिया ओसारपर बैसलि। धनियाक संबंधमे माए पिचकुनकेँ पूछलक- “ई कनियाँ के छथुन?”
मुसकी दैत पिचकुन कहलक- “तोरे पुतोहु। ओतै बिआह कऽ लेलौं।
एक्के-दुइये टोलक जनिजाति आबए लागलि। पिचकुनक माए सभकेँ एक-एकटा सनतोला देलक। एकटा दसटकही जेबीसँ निकालि पिचकुन माएकेँ दैत कहलक- “माए भूख लागल अछि। जो दोकानसँ बेसाहि सभ कुछ लऽ आन। पहिने भानस कर। ताबे हम नहा लै छी। तीन दिनक रस्ताक झमारल छी, ओंघीसँ देह भसिआइत अछि।
पुतोहु देखि पिचकुनक माए मुनेसरी सौंसे टोल पुतोहु देखैले हकार देलक। जातिकेँ भोजो गछलक।
सातम दिन पिचकुन दुनू परानी साँझकेँ सोमनी दादी ऐठाम गेल, आंगनमे बिछान बिछा सोमनी दादी पोता-पोती सभकेँ खेलबैत रहथि। दादीकेँ पिचकुन गोड़ लागि इशारासँ धनियाकेँ सेहो गोड़ लगै लऽ कहलक। धनिओ दादीकेँ गोड़ लगलक। ओछाइनिक कोनपर बैसि पिचकुन आँखिक इशारासँ दादीकेँ जाँतै लेल कहलक। धनिया सोमनी दादीकेँ जाँतए लागलि। पिचकुन सोमनी दादीकेँ कहए लगल- “दादी, गाममे तँ सभ बकलेले-ढहलेल बुझैत छलाए। साल भरि पहिने मोरंग गेलौं। कमेबो केलौं आ ओतै बिआहो कऽ लेलौं। आब गामेमे रहब। गाममे अहाँ सभसँ पैघ छी दुनू परानीकेँ असिरबाद दिअ।
उत्तरवारि बाधमे, सभसँ बेसी खेत सोमनी दादीक। जहि बाधमे दू सालसँ रखवार नहि। पिचकुनकेँ दादी उत्तरवारि बाध रखवारि करैले कहलक। संगे पाँच कट्ठा खेत बटाइओ करैले कहलक। रोजी देखि पिचकुन गछि लेलक। पिचकुनकेँ खोपड़ी बन्हैले दादी दूटा बाँस, एक बोझ खढ़ आ एक मुट्ठी सावे गछलक।
दोसर दिन पिचकुन दुनू परानी उत्तरवारि बाध जा कऽ खोपड़ी बन्हैक जगह टेबलक। एकटा उचगर परती छल जइपर बरसातोमे पानि नहि अटकै। धनियाक नजरि पीरारक गाछपर पड़लै, गाछ लग जा धनिया गाछमे फड़ तजबीज करए लागलि। फड़ देखि धनिया साड़ी कऽ फाँड़ बान्हि गाछपर चढ़ि गेलि। गाछमे लुबधल पीरारक फड़ देखि धनियाक मोन चपचपा गेलै। तीमन करैले दसटा तोड़िओ लेलक। जना केकरो माटिमे गड़ल रूपैयाक तमघैल भेटलासँ खुशी होइत तहिना धनियाक मोन खुशी। पिचकुन कोदारिसँ परतीकेँ छिलए-बनबए लगल। मने-मन धनिया एक मनसँ उपरे फड़ एक-एकटा गाममे ठिकलक। खुशीसँ धनियाक मुहसँ गीत निकलए लगल। गीत गुनगुनाइत पिचकुनकेँ सोर पाड़ि धनिया कहलक- “तकदीर जागि गेल। देखै छिऐ गाछमे कोंकची लागल फड़ छै। काल्हिसँ तोड़ि हाट लऽ जाएब। खूब महग बिकाएत।
 पिचकुनकेँ बुझले ने। धनियाक बातपर बिस्वासे ने करै। खिसिया कऽ पिचकुन पुछलक- “अहाँ चिन्है छिऐ जे की छिऐ? जँ लोक खइतै तँ एहिना लुधकी लगल रहितै?”
 पीरार देखि मने-मन धनिया अपन गरीबीकेँ खुशहाली दिस‍ बढ़ैत देखति‍। गरीबी मनमे अमीरीक ज्योति अबैत देखलक। धनियासँ रक्का-टोकी नहि कऽ पिचकुन बाजल- “हमरा हाट-बजार करैक लूरि नै अछि। केना बेचब?”
धनिया नैहरोमे हाट-बाजार करैत छलि। खेतीक सभ काजक लूरि सेहो रहै। हाँस-बत्तक पोसबो करै आ हाट जा बेचबो करै। निर्भीक भऽ धनिया कहलक- “एकटा कड़चीक लग्गी बना कऽ सभ दिन तोड़बो करब आ बेचबो करब। अहाँ संगमे रहब।
आसिन आबि गेल। बरखा ठमकल। सबारी समए। अधिक बरखा भेने खेत सभमे धान उपरा-उपरी। जत्ते धरि नजरि जाइत तते धरि एकरंग हरिअर धान बूझि पड़ैत। बेर टगिते धानक पातपर ओसक बुन्न चमकए लगैत। जहिना कोनो बाला हरियर साड़ी हरियर आंगी पहिर माथमे मंगटीका पहिर देखबामे लगैत तहिना खेत रूपी बाला देखैमे लगैत। पुरबाक मन्द-मन्द हवा चलए लगल। जेतै बैसू तेत्तै आलस आबि जाइत। बाधमे तीन ठाम पानिक बहावक कटारि। जइसँ उपरका खेतक पानि निचला खेत दिस‍ बहैत। पिचकुन तीनू कटारिकेँ दुनू भागसँ बान्हि अपिआरी बनौलक। अपिआरीक पानि उपछिते अनेरुआ माछ कूदि-कूदि अाबए लगल। धनिया अपिआरियो ओगरै आ माछो बिछै। पिचकुन छिट्टामे लऽ हाटो जा बेचै आ गामोमे घूमि-घूमि बेचए लगल। दोसर-दोसर माछ बेचनिहार पिचकुनकेँ एकटा साइकिल कीन लै लेल कहलक। माथपर माछक छिट्टा लऽ घुमने देहो महकै। साइकिलक नाम सुनि पिचकुनक सूतल मन फुरफुरा कऽ उठल। मुदा साइकिल चढ़ब नहि आबि पिचकुन थतमतमे पड़ि गेल। मने-मन पिचकुन सोचलक जे जखन साइकिल भऽ जाएत तखन चढ़ब सिखबो करब आ जाबे सीखल नै हएत ताबे पैछला सीटपर छिट्टा राखि गुरकाइये कऽ घूमि-घूमि बेचब। हाटसँ घुमैत काल पिचकुन धनियाकेँ कहलक- “अधपुराने एकटा साइकिल कीनि लेब।
आमदनीक खुशी धनियाकेँ रहबे करै। मुस्कुरा कऽ कहलक- “जखन साइकिले कीनब तँ अधपुरान किऐक कीनब? नबके कीनि लिअ।
जितिआ पावनि। मड़ुआ रोटी माछक पावनि। एक दिन पहिने पिचकुनकेँ माछक बेना लोक सभ दऽ गेल। सुतली रातिमे पिचकुन चहा-चहा कऽ उठै आ घरवाली धनियाकेँ कहै- “अपिआरीक सभ माछ बीछि लेलक।कहि सपना बूझि फेरि सूति रहै। अन्हरोखे दुनू परानी पिचकुन टौहकी छिट्टा लऽ अपिआरी लग गेल। अन्हार रहने माछ देखबे ने करै। एकटा अपियारी लग पिचकुन बैसल। दोसर लग धनमा। बीड़ी लगा-लगा पिचकुन पीबैत। फरिच्छ होइते एकटा मे पिचकुन आ दोसरमे धनिया माछ बिछए लागलि। माछ हएत की नहि तइ दुआरे लोक-सभ अपिआरिये लग पहुचए लगल। तराजू-बटिखारा नहि रहने पिचकुन अन्दाजेसँ बेचए लागल। छिट्टासँ उपरे माछ बिक गेलै। बचलाहा माछ दुनू परानी आंगन नेने आएल। अधासँ बेसिये अंगनोमे बिकल। पावनिक दिन रहने हाटक भरोसे रहब पिचकुन नीक नहि बूझि धनियाकेँ कहलक- “झब दे जलखै बनाउ। अखने माछ बेचए जाएब।
हाँइ-हाँइ कऽ धनिया रोटी पका माछक सन्ना बनौलक। साइकिलपर छिट्टा
लादि पिचकुन अंगने-अंगने माछ बेचए लगल। बारह बजैत-बजैत सभटा माछ बिक
गेलै।
रउदो तीखर। पिचकुन माछ बेचि पसीखाना पहुँचि‍ गेल। पसीखाना ताड़ी पिआकसँ भरल। दुनू परानी पासी गैहिकी सम्हारैमे तंग-तंग रहै। बैसैक जगह नहि देखि पिचकुन पासी लग जा एक बम्मा ताड़ी लऽ ठाढ़े-ठाढ़ पीबि कैंचा दऽ साइकिलपर चढ़ि बिदा भेल। धनियाकेँ भाँज लगि गेलै जे पिचकुन ताड़ी पीबैत अछि। दूरेसँ पिचकुनकेँ साइकिलपर अबैत देखि धनिया ओसारपर ओछाइन ओछा सुजनी ओढ़ि कुहरै लागलि। आंगन अबिते पिचकुन धनियाकेँ कुहरैत देखलक। धनियाक लगमे जा पिचकुन पुछलक- “की-इ-इ होइ-इ-इ अए-ए-ए?”
पिचकुनक बोली सुनि धनिया आरो जोर-जोरसँ कुहरए लागलि। धनियाक मुँह उघारि पिचकुन फेर पुछलक। नकिआइत धनिया बाजलि- “मरि जाएब। बड़का दुख पकड़ि लेलक। छाती दुखाइत अछि। जाउ दोकानसँ कड़ू तेल नेने आउ। सगरे देह मालिस करू, तखने छूटत।
लटपटाइते पिचकुन शीशी लऽ दोकानसँ तेल आनि धनियाकेँ मालिस करै लगल। कर घूरि-घूरि धनिया पिचकुनसँ भरि पोख मालिस करौलक। जखन पिचकुनकेँ हाथ दुखा गेलै तखन धनिया बाजलि- “कन्नी कऽ मन हल्लुक लगै अए।
मन हल्लुक सुनि पिचकुनक मनमे आशा जगै। पुनः मालिस करै लगै। धीरे-धीरे पिचकुनोक निशाँ उतड़ै आ धनियोक तामस कमै। पिचकुन खुशी जे घरवाली बँचि गेलै आ धनिया खुशी जे ताड़ी पीबैक नीक सजा देलिअनि।
आसिन कातिकक आमदनीसँ पिचकुनक जिनगीक नींव पड़ल, पीरारसँ लऽ कऽ माछ तकमे नीक कमेलक। जहि पिचकुनक जिनगी गरीबीसँ जर्जर छल जे जानवरोसँ बत्तर जिनगी जीबैत छल। जहिना मनुख जानवरक विकसित रूप छी तहिना पिचकुनो जानवरक जिनगी टपि मनुखक जिनगीमे प्रवेश केलक। जहिना हमर पूर्वज खोपड़ी बना रहैत छलाह आ धीरे-धीरे आइ नीक मकानमे रहैत छथि तहिना पिचकुन माटिक भीतक देवालक घर बनबैक विचार केलक। ओना पानियोक अपना कोनो उपाए नहि अछि जेकरा लेल आगू साल जोगार करैक विचार दुनू परानी मिलि केलक। सिर्फ घरे आ पानियेक दिक्कत पिचकुनकेँ नहि। ने घरमे सुतैक लेल चौकी आ ने भानस करैले बरतन छलै जे सभ रसे-रसे जोगार करैक विचार केलक।
सौंसे बाधमे धान फूटि लबल। हरियर उज्जर लाल कारी शीशसँ बाध चमकए लगल। दुनू परानी पिचकुन घर-आंगन छोड़ि भरि-भरि दिन बाधेमे रहए लगल। जँ बाधमे नहि रहैत तँ साँढ़-पाड़ाक उपद्रव, घसवहिनीक उपद्रवसँ गिरहस्तक मुँहे फज्झति सुनैत।
साँझू पहरकेँ धनिया सोमनी दादी लग जा खेतमे लुबधल धानक प्रशंसा करैत। सोमनी दादी हृदएसँ धनियाकेँ असिरवाद दैत। सामा पाबनि भऽ गेल। गोट-पङरा खेतक धान सेहो पाकए लगल। बैसारी देखि धनिया पिचकुनकेँ कहलक- “पीरारक गाछक जड़िकेँ तामि-कोड़ि कऽ सरिआ दिऔ जे आगू नीक-नहाँति फड़त।
धनियाक बात सुनि पिचकुन बढ़ियाँ जकाँ पीरारक गाछक जड़िकेँ तामि बकरी भेरारी मिलल छाउर पाँचो गाछमे चारि-चारि पथिया दऽ दू-दू घैल पानि सेहो देलक। पनरहे दिनक बाद पाँचो गाछक रंग बदलि हरियर-कचोर भऽ गेलै। सभ मूड़ीमे नवका कलश सेहो भेलै। जहिना मनुख अपन बच्चाकेँ सेवा करैत, तहिना दुनू परानी पिचकुन पीरारक गाछकेँ करए लगल। अपन सेवा देखि पाँचो पीरारक गाछ हृदएसँ दुनू परानी पिचकुनकेँ असिरवाद देमए लगल।

भैंटक लावा :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल


पछिला बाढ़ि। मोन पड़िते देह भुटुकि जाइत अछि। रोइयाँ-रोइयाँ ठाढ़ भऽ जाइत अछि। बाढ़िक विकराल दृश्य आँखिक आगू नाचए लगैत अछि। घोड़ोसँ तेज गतिसँ पानि दौगैत। बाढ़ियो छोटकी नै, जुअनकी नै, बुढ़िया। बुढ़िया रूप बना नृत्य करैत। केकरा कहू बड़की धार आ केकरा कहू छोटकी, सभ अपन-अपन चिन्ह-पहचिन्ह मेटा समुद्र जकाँ बनि गेल। जेम्हर देखू तेम्हर पाँक घोराएल पानि, निछोहे दछिन मुँहेँ दौगल जाइत। कतेक गाम-घर पजेबाक नै रहने घर-विहीन भऽ गेल। इनार, पोखरि, बोरिंग, चापाकल पानिक तरमे डुबकुनियाँ काटए लगल। एहेन भयंकर दृश्य देखि लोककेँ डरे छने-छन पियास लगलोपर पीबैक पानि नै भेटैत। जीवन-मरण आगूमे ठाढ़ भऽ झिक्कम-झिक्का करैत बुझाए। घर खसल, घरक कोठी खसल, कोठीक अन्न भसल। जेहने दुरगति घरक तेहने गाइयो-महींस, गाछो-बिरीछ आ खेतो-पथारक।
घरक नूआ-बिस्तर आ आनो-आन समानक मोटरी बान्हि माथपर लऽ अपनो डाँड़मे दू भत्ता खरौआ डोरी बान्हि आ बेटोक डाँड़मे बान्हि आगू-आगू मुसना आ पाछू-पाछू घरवाली जीबछी, बेटी दुखनीकेँ कोरामे लऽ कन्हा लगौने पोखरिक ऊँचका महार दिस चलल। अखन धरि ओ महार बोन-झाड़ आ पर-पैखानाक जगह छल। जइमे साँप-कीड़ा बसेरा बनौने, बाढ़ि ओकरा घराड़ी बना देलक। जहिना इजोतमे छाँह लोकक संग नै छोड़ैत, तहिना बरखा बाढ़िक संग छोड़ए लेल तैयार नै। निच्चाँ पानिक तेज गति आ ऊपरसँ बरखाक नमहर बुन्न। महारपर मुसनाकेँ पहुँचैसँ पहिने बीस-पच्चीस गोटे अप्पन-अप्पन धिया-पुता, चीज-बस्तु आ माल-जालक संग पहुँचि चुकल छल। महारपर पहुँचि मुसना रहैक जगह हियाबए लगल। शौच करैक ढलान लग खाली जगह देखि मुसना मोटरी रखलक। मोटरी राखि बिसनाइरिक डारि‍ तोड़ि खरड़ा बनौलक। ओइ खरड़ासँ खरड़ए लगल। एक बेर खरड़ि कऽ देखलक तँ मनमे पड़पन नञि भेलइ।
फेर दोहरा कऽ खरड़ि चिक्कन बनौलक। चिक्कन जगह देखि दुनू बेकतीक मनमे चैन भेलै। मोटरी खोलि मुसना एकटा बोरा निकालि चारिटा बत्तीक खूँटा गाड़ि, खरौआ जौरसँ चारु खूट बान्हि, बत्तीमे बान्हि कऽ घर बनौलक। दोसर बोरा निच्चाँमे ओछा धियो-पुतोकेँ बैसौलक आ मोटरियोक समान रखलक। चिन्तासँ दुनू परानीक मूँह सुखाएल रहै। एक दिस दुनू बच्चाकेँ मुसना देखए आ दोसर दिस गनगनाइत बाढ़ि। माथपर दुनू हाथ दऽ जीबछी मने-मन कोसी-कमला महरानीकेँ गरिऐबो करैत आ जान बचबै लेल निहोरो करैत। दुनू बच्चो कखनो कऽ बाढ़ि देखि हँसैत तँ कखनो जाड़े कनैत।
बाढ़िक वेगमे एकटा घर भसिआएल अबैत देखि मुसना बाँसक टोन आ कुड़हरि लऽ दौगल। पानिमे पैसि हियाबे लगल जे कोन सोझे घर आओत। ठेकना कऽ हाँइ-हाँइ पाँचटा खुट्टा ठोकलक। आस्ते-आस्ते घर आबि कऽ खुट्टामे अड़कल, खूटामे अड़ल घर देखि घरवालीकेँ सोर पाड़ि कहलक- “हाँसू नेने आउ। घरक समचा सभ उघि-उघि लऽ जाउ।
घरक ऊपरमे एकटा कुकूर सेहो भसैत आएल। ओ लोकक सुन-गुन पाबि कूदि कऽ महारपर चलि गेल। ठाठक बत्तीमे जहाँ मुसना हाँसू लगौलक आकि एकटा साँप लप दऽ हाथेमे हबक मारि देलकै। घरक भार थालमे गरल खुट्टा नै सम्हारि सकल। पाँचो खुट्टा पानिमे गिर पड़लै। घर भसि गेलै। खूब जोरसँ मुसना कनबो करैत आ हल्लो करैत जे हौ लोक सभ, दौड़ै जाइ जा हौ, हमरा साँप काटि लेलक। मुसनाक कानब सुनि घरवाली सेहो बपहारि काटए लागलि। बपहारि कटैत घरवालीकेँ मुसना कहलक- “हे गए दुखनी माए, नाग डसि लेलकौ। छाती लग बिख आबि गेल। कनिये बाकी अछि कंठ छुबै ले। धिया-पुताकेँ सोर पाड़ि कनी मूँह देखा दे। आब नै बचबौ।
जीबछी हल्लो करै आ घरबलाक बाँहि पकड़ि उपरो करैत। महारक किनछरिमे पहुँचि जहाँ उपर हुअए लगल आकि दुनू गोटे पिछड़ि कऽ तरे-उपरे निच्चाँमे खसल। दुनू परानी भीजल तँ रहबे करै, आरो नहा गेल। मुदा तैयो ओरिया-ओरिया कऽ उपर भेल। महारपर आबि जीबछी चूनक कोहीसँ चून निकालि दाढ़मे लगौलक। साँपक बिख झाड़निहार गाममे एकोटा नै। मुदा रौदिया ऐ बेर दसमीमे चनौरा गहबरमे चाटी सिखने छल। सभ कियो रौदियाक खोज करए लगल। ओ रौदिया माछ मारए लेल सहत लऽ कऽ बाध दिस गेल छल। एक गोरे ओकरा बजा अनलक। अबिते रौदिया सहत कातमे रखि हाथ-पएर धोए मुसना लग आबि बाजल- “हौ भाय, हमर चाटी सिद्ध नै भेल अछि, किक तँ हम अखन धरि गंगा स्नान नै केलौंहेँ। मुदा तैयो बिसहाराकेँ सुमरि देखै छिऐ।
मुसनाकेँ आगूमे बैसा रौदिया हाथेसँ जगहकेँ झाड़ि चाटी रखलक। सभ रौदिया दिस देखैत। मुदा चाटी चलबे ने कएल। बाढ़िक दुआरे आन गामसँ झाड़निहार आ चट्टिवाहकेँ बजाएब महाग मोसकिल रहै। सभ निराश भऽ गेल। छाती पीटि-पीटि जीबछी कनबो करै आ देवी-देवताकेँ कबुलो करै। मुदा ढोढ़ साँप कटने रहए तेँ बिख लगबे ने केलै।
गोसाइ लुक-झुक करए लगल। गामक ढ़ेरबा, बूढ़ि आ जुआन स्त्रीगण, चंगेरीयो आ चंगेरोमे काँच माटिक दिआरी लऽ पोखरिक घाट लग जमा भऽ कमला महरानीकेँ साँझ दऽ गीत गाबए लागलि‍। बच्चा सभ ज-जकार करैत। तइ बीच लुखिया कमला महरानीकेँ पाठी कबुला केलक, सुबधी एक सेर मधुर। दोसरि साँझ धरि गीत-गाबि सभ घुरि कऽ आंगन आएल।
एक रफ्तारमे बाढ़ि पाँच दिन रहल। मुदा पोह फटिते छठम दिन पानि कमए लगल। बाढ़िक पानि जहिना हुहुआ कऽ अबैए, तहिना जाइए। बेर झुकैत-झुकैत घर-अंगनाक पानि निकलि गेलै। मुदा थाल-खिचार रहबे करै। सातम दिनसँ लोक घर ठाढ़ करए लगल। बाढ़ि सटकिते लोक परदेश दिस पड़ाए लगल। गाममे ने एक्कोटा धानक गब बँचल आ ने खेत रोपए लेल बिरार। नारक टाल सभ कतए भसि कऽ गेल तेकर ठेकान नै। गहुमक भुस्सी भुसकाँरेमे सड़ि-सड़ि गोबर बनि गेल। मनुक्खसँ बेसी दिक्कत माल-जालकेँ भऽ गेलै। आमक पात, बाँसक पात आन-आन गाछ सबहक पात काटि-काटि माल-जालकेँ खुआबए लगल। आन-आन गामसँ नार, भुस्सी कीनि-कीनि अानए लगल। मुदा माल-जाल तैयो अन-धुन मुइलै। जे बँचल रहै, ओहो सुखा कऽ संठी जकाँ भऽ गेलै। तइ परसँ रंग-बिरंगक बीमारी सभ सेहो आबि गेलै। केकरो खुरहा तँ केकरो पेटझड़्ड़ी। किछु गोटे अपन सभ मालकेँ कुटमैती सभमे दऽ आएल।
चारिक अमल। पिसुआ भांग पीबि श्रीकान्त मैदान दिससँ आबि दलानपर बैसि चाह पीबैत रहथि। सोगसँ अधमरु जकाँ भेल। मने-मन सोचथि जे महाजनी तँ चलिये गेल आब अपनो साल भरि की खाएब? अगते धान सबाइ लगा देलौं। बड़ पैघ गलती भेल जे एक्को बखारी पछुआ कऽ नै रखलौं। मुदा एक बखारी रखनहि की होइत। के केकरा मदति करत। ठीके कहब छै जे सभकेँ अपना भरोसे जीबाक चाही। भने दुआर परक बखारीक धान सठि गेल। कियो दरबज्जापर आओत तँ देखा देबै। मुदा अपनो तँ जरुरत अछि, से कतए सँ आनब। लऽ दऽ कऽ घरक कोठीमे चाउर अछि, ओतबे अछि। एक्को धुर धान नञि बँचल अछि जे अगहनोक आशा होइत। आब अबाद कएल नै हएत। आगू रब्बीयेक आशा। जे सभ दिन कीनि-बेसाहि कऽ खाइत अछि ओकरा तँ कोनो नै, मुदा हमरा लोक की कहत? चाह पीबिते-पीबिते श्रीकान्तकेँ चौन्ह अाबए लगलनि। मन पड़लनि जे बाबा कहने रहथि जे दरबज्जापर जँ क्यो दू-सेर वा दू-टका मांगए लेल आबए तँ ओकरा ओहिना नहि घुमबिहक। ओइसँ लछमी पड़ाइ छथि। जीबछीकेँ अबैत देखि श्रीकान्त सोर पाड़लखिन। सालो भरि जीबछी हुनके कुटाउन कऽ गुजर करैत छलि। चाउर-चूड़ा कुटैमे जीबछी गाममे सभसँ बेसी लूरिगर। श्रीकान्तक लग आबि जीबछी हँसैत कहलकनि- “एत्ते किए सोगाइल छथि कक्का, हिनका एत्ते छन्‍हि‍ तखन एते दुख होइ छन्‍हि‍, हमरा तँ किछु ने अछि तेँ कि मरि जाएब।
जीबछीक बात सुनि भखरल स्वरमे श्रीकान्त कहलखिन- “जहिना सभ किछु बाढ़िमे दहा गेल तहिना जँ अपनो सभ तुर भसि जइतौं, से नीक होइत। जाबे परान छुटैत, ततबे काल ने दुख होइत। आगू तँ दुख नहि काटए पड़ैत।मुस्की दैत जीबछी बाजलि- “एक्केटा बाढ़िमे एत्ते चिन्ता करै छथि काका, कनी नीक की कनी अधलाह, दिन तँ बितबे करतनि।
चीलम पीबैत मुसना ओसारपर बैसल। कसि कऽ दम खींचि मने-मन सोचए लगल जे दू मास अगहन-पूस मुसहनि खुनि-खुनि गुजर करै छलौं। दस सेर जमो भऽ जाइ छल आ गुजरो कऽ लैत छलौं। ओहो चलि गेल। ने एक्को गब कतौ धान बँचल आ ने गाममे एकोटा मूस। दोसर दम खींचि धूँआकेँ घोटिते मनमे एलै जे मूसक तीमन आ धुसरी चाउरक भात जँ जाड़क मासमे भेटए तँ ऐ सँ नीक दोसर की हएत। एहेन खेनाइ तँ रजो-महरजोकेँ सिहिन्ते लागल रहतनि। ओ-हो-हो, भगवान गरीबेक सुख छीनि लेलनि।
मुसनाक पहिलुका नाम मकसूदन छल। मुदा मूस आ मुसहनिसँ बेसी सिनेह रहने लोक ओकरा मुसना कहए लगल। जीबछी आंगनक चुल्हिपर रोटी पकबैत। इनारपर हाथ-पएर धोय मुसना लोटामे पानि नेने आंगन आबि जलखै करै लऽ बैसल। टिनही छिपलीमे रोटी-नून जीबछी घरबलाक आगूमे देलक। अंगनामे दुखबाकेँ नहि देखि मुसना जोरसँ शोर पाड़लक। पिताक अवाज सुनिते दुखबा दौगल आबि धुराइले हाथे-पएरे खाइले बैसि रहल। दुनू बापुत खाए लगल। चुल्हिये लगसँ मुस्की दैत जीबछी बाजलि- “केकरो किछु होउ, जेकरा लूरि रहतै ओ जीबे करत। ऐठाम तँ देखै छिऐ जे एक्के दहारमे किदनि बहारक खिस्सा अछि। सभ हाकरोस करैए।
मुँहक रोटी मुसना हाँइ-हाँइ चिबा जीबछी दिस देखि कऽ बाजल- “तते ने माछ भसि-भसि आएल अछि जे खत्ता-खुत्तीमे सह-सह करैए। कने पानि तँ कम होउ। जखने पानि कम भऽ उपछै जोकर भेल आकि मछबारि शुरू कऽ देब। खेबो करब आ बेचबो करब। सदिखन दू पाइ हाथेमे रहत।
अपन नहिराक बात मन पड़िते जीबछी कहए लागलि- “हमरा नैहरमे पूबसँ कोसी आ पछिमसँ गंडकक बाढ़ि सभ साल अबैत छल। ऐ बीच जे धार अछि ओकर पानि तँ घुमैत-फिरैत रहिते छल। सगरे गाम साउनेसँ जलोदीप भऽ जाइ छल। टापू जकाँ एकटा परती टा सुखल रहैत छल। ओइपर सौंसे गामक लोक बरसाती घर बना कऽ रहैत छल। कातिक अबैत-अबैत खेत सभ जागए लगैत छलै। तकर बाद लोक खेती करैत छल। गहिंरका खेत आ खाधि-खुधिमे भैंटक गाछ सोहरी लागल जनमै छल। अगहन बीतैत-बीतैत ओ तोड़ैबला हुअए लगैत छल। हम सभ ओइ भैंटकेँ तोड़ि-तोड़ि आनी, ओकरे दाना निकालि सुखा कऽ लावा भूजी। तते लावा हुअए जे अपनो खाइ आ बेचबो करी। काल्हि गिरहत कक्काक ओइठाम जाएब आ कहबनि जे चौरीमे मनसम्फे भैंट जनमल अछि, ओ हमरा दऽ दिअ।
अखन धरि दुनू परानी मुसना, चाउर आ चूड़ाक कुट्टी करैत छल, सेहो ढ़ेकीमे। किएक तँ गाममे एक्कोटा छोटको मशीन धनकुटियाक नहि छल। अधिकतर परिवार अपन-अपन ढेकी-उखड़ि रखैत छल। मुसना सेहो कुट्टीक दुआरे अपन ढेकी-उखड़ि रखने अछि। नीक चाउर बनबैमे जीबछीक लोहा सभ मानैए। ऐ बेरि तँ धनकुट्टी चलत नहि। मुदा बाढ़िमे आन गामसँ तते भैंट दहा कऽ चौरीमे आएल जे सापरपिट्टा गाछ सौंसे चौरीमे जनमि गेल अछि। तेँ जीबछी मने-मन चपचपाइत। दोसरकेँ भैंटक भाँज बुझले नहि छलै।
सभ दिन नहाइ बेरिमे जीबछी चौरी जा भैंट देखि-देखि अबैत छलि। चौरगर-चकरगर पात सौंसे चौरीकेँ छेकने। गोटि-पङरा फूल हुअए लगलै। फूल देखि जीबछीक मनमे होइ जे एत्तेटा फुलवारी इन्द्रो भगवानकेँ हेतनि की नहि। पाँचे दिनमे सौंसे चौरी फूल फुला गेल। अगता फूलक पत्ती झड़ि-झड़ि खसए लागल, फूलमे नुकाएल फड़ निकलए लगल। गोल-गोल, हरियर-हरियर। फड़ देखि जीबछी आमदनी बूझि, चौरी कातमे बैसि, नव-नव योजना मने-मन बनबए लागलि। ऐबेर एकटा खूब निम्मन महींस कीनब। जँ महींस जोकर आमदनी नै हएत तँ दूटा गाऐ कीनि लेब। अप्पन तँ सम्पति भऽ जाएत। ओकरे खूब चराएब-बझाएब। ओहीसँ तँ चारु परानीक गुजर चलत। जिनगी भरि तँ कुटौने करैत रहलौं मुदा ऐ बेर कमलो महरानी आ कोसियो महरानी दुख हेरि लेलथि। मने-मन जीबछी दुनूकेँ गोड़ लगलकनि। अपन धन हएत, तइ परसँ मेहनत करब तँ कोन दरिदराहा दुख आबि कऽ हम्मर सुख छीनि लेत? मजगूत घर बान्हब, बेटा-बेटीक बिआह करब। नाति-पोता हएत, बाबा-दादी बनि कऽ जते दिन जीबी ओ कि देवलोकसँ कम भेलै। अही लए ने सभ हेरान अछि। कएलासँ सभ किछु होइ छै, बिनु केने पतरो फुसि।
घनगर गाछ देखि जीबछीक मनमे अएलै जे बीच-बीचमे सँ जँ गाछ उखारि देबै तँ सौरखियो करहर भऽ जाएत आ छेहर गाछ रहने फड़ो नमहर हएत। जइसँ दानो नीक हएत। एखनेसँ आमदनी शुरू भऽ जाएत। उत्साहित भऽ जीबछी कमठौन शुरू केलक। मुदा करहर उखारैमे तते डाँड़ दुखाइ जे हूबा कमि गेलै। कमठौन छोड़ि देलक। देखते-देखते फड़मे लाली पकड़ए लगलै।
अगता फूल अगता फड़ भेल। नमहर-नमहर, पोछल-पोछल, गोल-गोल पुष्ट। रंगल फड़ देखि जीबछी बूझि गेल जे आब ई तोड़ैबला भऽ गेल। दोसर दिनसँ फड़ तोड़ैक विचार जीबछी मने-मन कऽ लेलक।
दोसर दिन भोरे जीबछी रोटी पका, दुनू बच्चो आ अपनो दुनू परानी
खा प्लास्टिकक बोरा लऽ फड़ तोड़ैले बिदा हुअए लगल आकि धक दऽ मन पड़लै
जे बोरामे तँ फड़ राखब, मुदा पानिमे तोड़ि-तोड़ि कतए राखब। फड़ तोड़ैले
तँ झोराक जरुरत हएत। झोरा तँ अपना अछि नहि! आब की करब? लगले
जीबछी पुरना साड़ीकेँ फाड़ि दूटा झोरा सीलक। झोरा सीबि बोरो आ झोरोकेँ
चौपेत एकटा झोरामे राखि, दुनू बच्चो आ दुनू गोटे अपनो चौर दिस बिदा
भेल।
फड़क रूप-रंगसँ जीबछीक मन गद-गद। मुदा अनभुआर काज बूझि मुसना तर्क-वितर्क करैत। चौरक कात पहुँचि उपरका खेत जे सुखाएल छल मे दुनू बच्चो, बोरो आ रोटी-पानिकेँ रखि दुनू परानी भैंट तोडै़ले पानिमे पैसल। पानिमे पैसिते जीबछीक नजरि भैंटक फड़क उपरे-ऊपर नाच लगल। जहिना केकरो रूपैयाक थैली भेटलासँ खुशी होइ छै, तहिना जीबछीक मनमे भेलै। एक टकसँ देखि जीबछी दुनू हाथे हाँइ-हाँइ फड़ तोड़ए लागलि। खिच्चा फड़ देखि जीबछी पतिकेँ कहलक- “जुएलके फड़ टा तोड़ब। अजोहा अखन छोड़ि दियौ। पछाति तोड़ब।
भरिते जीबछी ऊपर आबि-आबि बोरामे रखैत। मुसनो सएह करैत। दुनू बोरा भरि गेल। ऊपर आबि जीबछी पतिकेँ कहलक- “कनी काल सुस्ता लिअ। पानिमे निहुड़ल-निहुड़ल डाँड़ो दुखा गेल हैत। अहाँ एत्तै रहू, हम एक बेर अंगनासँ रखने अबै छी।
जीबछी एकटा बोरा उठा आंगन बिदा भेल। एक तँ पानिक भीजल, दोसर ओजनगर बस्तु। मुदा जीबछी भारी बुझबे ने करए। किएक तँ सम्पत्तिक मोटरी रहै किने। आंगन आबि ओसारपर बोरा रखि पुनः जीबछी चौर दिस रमकल विदा भेल। चौर पहुँचि पतिकेँ कहलक- “हम बोरा लै छी, अहाँ दुनू बच्चो आ डोलोकेँ सम्हारने चलू।
गू-आगू मुसना बेटीकेँ कोरामे दोसर हाथमे डोल आ बेटाकेँ लऽ चलल। पाछू-पाछू जीबछी माथपर बोरा लेने। थोड़े दूर बढ़लापर जीबछी पतिकेँ कहलक- “भगवान दुःख हेरि लेलनि।
मुदा स्त्रीक बात सुनि मुसनाकेँ ओ खुशी नञि एलै जे जीबछीकेँ रहै।
आंगन आबि जीबछी पहिलुके बोरा लग दोसरो बोरा रखि भानसक ओरियान करै लागलि।
चारिम दिन पहिलुके खेप भैंट तोड़ै काल मुसनाकेँ एकटा ठेंगी बाँहिमे पकड़ि लेलकै। जे ओ देखबे ने केलक। मुदा जखन ठेंगी भरि पोख खून पीबि भरिया गेलै, तखन मुसनाक नजरि पड़लै। ठेंगीकेँ देखिते ओकर परान उड़ि गेलै। थर-थर कापए लगल। खूब जोरसँ घरवालीकेँ कहलक- “बाप रे बाप! देहक सभटा खून ठेंगी पीबि लेलक। कोन पाप लागल जे ऐ मौगियाक भाँजमे पड़लौं। एक तँ बाढ़िक मारल छी जे भरि पोख अन्न नै होइए। सुखा कऽ संठी भेल छी। तइपर जेहो खून देहमे छलए सेहो ठेंगिये पीबि गेल। झब दे आउ ने तँ हम पानियेमे खसि पड़ब।
मुसनाक बातकेँ अनठबैत जीबछी हाँइ-हाँइ फड़ो तोड़ैत आ मने-मन बजबो करैत- “जना नाग डसि नेने होइ, तहिना अड़राइए। भभटपन ने देखू। एहने-एहने पुरुख बुते परिवार चलत?”
दुन झोरा भरिते जीबछी मुसना लग आबि हाथेसँ ठेंगी पकड़ि एकटा चिचोरमे बान्हि देलक। मुदा जइ ठाम ठेंगी पकड़ने रहै तइ ठामसँ छड़-छड़ खून बहैत। अपन दहिना औंठासँ जीबछी दाबि देलक। कनिये कालक बाद खून बन्न भऽ गेलै। जीबछी फेर फड़ तोड़ैले पानिमे पैसल। तोड़ि कने काल बाद जीबछी कहलक- “आउ ने, आब किछु ने हएत।
जीबछीक बात सुनि मुसना आँखि गुड़रि कऽ बाजल- “ई मौगिया जान मारैपर लगल अछि। जे कहुना मरि जाए। हमरा की दुनियामे सैँएक कमी छै? दोसर कऽ लेब। दुनू बच्चा दिस देखैत बाजल- मुदा ऐ टेल्हुक सबहक की हेतै? बिलटि कऽ मरत की नहि?” पति दिस देखि पत्नी मुस्की दैत बाजलि- “नञि तोड़ब तँ नञि तोरु। ओतै बैसि बच्चा सभकेँ खेलाउ।
दुनू बोरा भरि जीबछी आंगन अनलक। सभकेँ सम्हारने मुसना सेहो आएल। आंगन आबि जीबछी चुल्हि पजारि, भानस कऽ दुनू बच्चो आ अपनो दुनू परानी खेलक। खा कऽ जीबछी हाँसू लऽ भैंटक फड़ चीरि-चीरि दाना निकालए लागलि। लाल-लाल, गोल-गोल। मुसना सेहो दाना निकालए लगल। दुनू बच्चा दुनू भाग बैसि दूटा फड़केँ गुड़कबैत। दानाकेँ एकटा चटकुन्नीपर थोपि-थोपि रखैत जाए। मुदा कनिये काल बाद मुसनाकेँ चीलम पीबैक मन भेलै। ओ उठि कऽ चुल्हि लग जा आगियो तपए लगल आ चीलमो पीबए लगल। दानाक ढेरी देखि जीबछी गर अँटबए लागलि जे एत्ते कत्त कऽ राखब। गुनधुन करैत। एकाएक नैहरक बात मन पड़लै। मन पड़िते मूहसँ हँसी फुटलै। जीबछीकेँ हँसैत देखि मुसना अह्लादित भऽ कहलक- “ऐँ गै, कोन सोनाक तमघैल तोरा भेटि गेलौहेँ जे एना खिखिआइ छेँ।
मुदा पाशा बदलैत जीबछी बाजलि- “एखैन तँ अन्हार भऽ गेलै, काल्हि भोरे एकटा खाधि टाटक कात अंगनेमे खुनि देबै।
भोरे मुसना ढक जकाँ गोल-मोल खाधि खुनलक। जीबछी दू-लेब कऽ कऽ लेबि, सुखौलक। ओइमे भैंटक दाना सुखा-सुखा रखैत गेल। ऊपरसँ टाटक झँपना बना मुसना दऽ देलक।
मास दिनक मेहनतिसँ जीबछीक आंगन भैंटक दानासँ भरि गेल। अनभुआर चीज तेँ चोरी-चपाटीक डरे नहि। भरल आंगन देखि जीबछीक मनमे समुद्रक लहरि जकाँ खुशी हिलकोर मारए लगलै। कनडेरिये आखिये मुसना दिस देखि जीबछी मुस्किया देलक। घरवालीक मुस्की देखि मुसना खिसिया कऽ बाजल- “हमरा देखि-देखि तोरा हँसी लगै छौ। हँसि ले, जते हँसमे से हँसि ले। जाबे जीबै छियौ ताबे। भगवान केलखुन आ मरलियौ तखैन तोहर हँसी नगरक लोक देखतौ।
मुदा जीबछीक लेल धैन-सन। किएक तँ खुशीसँ मन एते भरल रहै जे घरबलाक बात ओइमे पैसिबे ने केलै। मने-मन जीबछी लावा भुजैक विचार करए लागलि। लावा भुजै लेल एकटा नम्हर खापड़ि चाही। बालु रखैले एकटा कोहा चाही। लारनि तँ अपनो खरहीसँ बना लेब। बाउलो नदी कातसँ लऽ आनब। जखन कुम्हनि ओइठाम जाएब तँ कचकुह ताकि कऽ एकटा नमहर तौला लऽ लेब। ओकरे खापड़ि बना लेब। बालु धिपबैले मझोलको कोहासँ काज चलि जाएत। एकटा सरबाक काज सेहो पड़त। किएक तँ बालु जे देबै से तँ हाथसँ नञि हएत। ओइमे एकटा बत्तीक डाँट लगबए पड़त। लगा लेब। मुसनाकेँ कहलक- “लाबा भुजै लेल जारनक ओरियान करए पड़त।
लावाक नाम सुनि मुसनाक मनमे खुशी भेलै। मुस्कुराइत उत्तर देलक- “अखन टेंगारी सुढ़िया लै छी। बेरु पहर गिरहत कक्काक गाछीसँ बाँझियो आ सुखल ठौहरियो सभ आनि देब।
भरि दिनमे दुनू परानी जीबछी सभ कथूक ओरियान कऽ लेलक।
लावा भुजब जीबछी शुरू केलक। दू चुल्हिया चुल्हि। एक मूहमे खापड़ि, दोसरमे कोहा। खापड़िमे भैंटक दाना भुजैत आ कोहामे बालु धिपैत। पहिल घानी भुजि जीबछी एक चुटकी चुल्हिमे दऽ दोसर घानी भुजब शुरू केलक। दोसर घानीक लावा देखि जीबछीक मन तर-उपर करए लागल। पहिलुका घानीक लावा चंगेरीमे लऽ दुनू बच्चो आ घरोबलाकेँ आगूमे देलक। आगूमे लावा देखि मुसना मने-मन सोचए लगल जे ई मौगिया बड़ लूरिगर अछि। एहेन स्त्री भगवान सभकेँ देथुन। कहू जे एखैन तक हम जे बुझितो ने छलौं से आइ खाइ छी। धिया-पुताकेँ पोसब कोन बड़का भारी बात छि, समाजो लेल लोक बहुत किछु कऽ सकैत अछि।
लावाक गमक पुरबा हवामे मिलि गामकेँ सुगंधित कऽ देलक। सुगंध पाबि टोलोक आ गामोक स्त्रीगण सभ लावा कीनैक लेल एक्के-दुइये जीबछीक आंगन अाबए लगल। मुदा एक्केटा जबाब जीबछी सभकेँ दैत- “पहिने गिरहत कक्काकेँ खुएबनि, तखन केकरो देब। भरि दुपहर जीबछी लाबा भुजलक। दू छिट्टा। दुनू छिट्टा लावा घरमे रखि ओइमे सँ एक मुजेला लऽ साड़ीसँ झाँपि जीबछी मुसनाकेँ कहलक- “हम गिरहत कक्का ओइठाम जाइ छी। अहाँ अंगनेमे रहब। कहि जीबछी माथपर मुजेला लेने श्रीकान्त ऐठाम बिदा भेल।
जीबछीक माथपर मुजेला श्रीकान्त गौरसँ देखि मुस्कुराइत कहलखिन- “बड़ खुशी देखै छी लछमी महरानी। मुजेलामे की चोराकऽ अनलौंहेँ। कने हमरो देखए दिअ?”
अनसुनी करैत जीबछी मुस्की दैत आंगन जा गिरहतनीक आगूमे मुजेला रखि कहलकनि- “काकी, थोड़े कऽ लाइ बना लिहथि। अखन थोड़े नोन-मरीच-तेल मिला कऽ देथु। जे कक्काकेँ दऽ अबै छिएनि।
छिपलीमे लावा नेने जीबछी दरबज्जापर जा श्रीकान्तक आगूमे देलकनि। ओ छिपलीमे उज्जर-उज्जर रमदानाक लावा जकाँ लावाकेँ निहारि-निहारि देखए लगलाह। जीबछी कहलकनि- “काका, की निङहारै छथिन, पहिने एक मुट्ठी मुँहमे दऽ कऽ देखथुन ने। भैंटक लावा छिऐ।
एक मुट्ठी उठा श्रीकान्त मुँहमे देलखिन। लावाक कोमलता आ सुआद बूझि श्रीकान्त पत्नीकेँ सोर पाड़ि कहलखि‍न- “एत्ते सुन्नर वस्तुकेँ अखन धरि जनितौं नहि छलौं। धन्य अछि जीबछीक ज्ञान आ लूरि जे एहेन सुन्नर हराएल बस्तुकेँ ऊपर केलक। साक्षात् देवी छी जीबछी। जाउ, सन्दुकमे सँ एक जोड़ साड़ी आ आंगी निकालने आउ। जीबछीकेँ अपना ऐठामसँ पहिरा कऽ बिदा करब। गरीब-दुखियाक देवी छी जीबछी।
सभ दिन जीबछी लावा भुजैत छलि आ अंगनेसँ लोक सभ कीनि-कीनि लऽ जाइत। पनरह दिनक जमा कएल रुपैयो आ फुटकुरियो जीबछी मुसनाकेँ गनै लेल आगूमे देलक। पाइ देखि मुसनाक मन उड़ि गेल। मूहसँ ठहाका निकलल। एक टकसँ मुसना जीबछी दिस देखि, कैँचा गनए लगल।