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Wednesday, November 2, 2016

मुड़ियाएल घर (क. जगदीश प्रसाद मण्‍डल)

मुड़ियाएल घर

जागेश्‍वर काका दुनू परानी दरबज्‍जाक ओसारक चौकीपर बैस बेरुका चाह पीबै छला। फागुनक समए, परसु शिवराति छी। जाड़क सरपोख नहाएल समए वसन्‍ती रौद पेब सोलहन्नी तँ नहि मुदा आधासँ बेसी जाड़क जकड़न तियागि चुकल छल। एक तँ अढ़ाइ-तीन बजेक बेरुका समए, तैपर मन्‍द-मन्‍द पुर्बाक लहकी सेहो लहलहाइत। ओना चाहक रंग-रूप आ सुआदो आन दिनसँ नीक अछि। नीकक कारण अछि एक तँ बकेन महींसिक दूध तैपर जागेश्‍वर कक्काक भातीज जे दार्जिलिंगमे रहि चाहे कम्‍पनीमे नोकरी करै छैन, ओ आधा किलोक चाहक पॉकेट देने रहैन, वएह टटका चाहपत्ती। ओना, बनौनिहारि पुतोहुक लूरिमे कोनो बढ़ोत्तरी नइ भेल छेलैन। मुदा काजोक तँ शुभ संजोग होइते अछि। भरिसक सएह सुधनीकेँ भेलैन, जइसँ चाहक सेखियो आ रंगो-सुआद नीक बनलैन।
जिराएल मन जागेश्‍वर कक्काक, तँए पहिने चारि-पाँच घोंट चाह एक-लखाइत पीलैन। चारि-पाँच घोंट चाह पीला पछाइत जागेश्‍वर कक्काक मन फुरफुरेलैन। फुरफुराइते बजला-
चाह तँ निम्‍मन बनल अछि मुदा एहेन सभ दिन हुअए तखन ने।
जागेश्‍वर कक्काक बात सुनि रमणीकाकीक मन रमकलैन नहि, असथिरे भेलैन। असथिर होइते पुतोहुक लूरिपर मन पहुँच नचलैन। नचिते उठलैन- जँ परिवारक भनसिया नीक भोजन, नीक भोजनक अर्थ नीक वस्‍तुए-टा नहि सुआदो, बनबैथ तँ भोजन केनिहारक मनो आ पेटो परिपूर्ण हेबे करत।  जखने मनो आ पेटो परिपूर्ण हएत तखने ने बातो आ विचारोमे परिपूर्णता एबे करत, जइसँ खाइ-पीबैक झगड़ा परिवारसँ मेटेबे करत। मुँहक चाहकेँ कण्‍ठसँ निच्‍चाँ उताइर रमणीकाकी बजली-
गामक बहुत गोरे काल्‍हि जतरापर जेता।
ओना जागेश्‍वर काकाकेँ सेहो केते गोरे तीन-चारि दिनसँ कहलकैन अछि जे शिवराति दिन वाणीश्‍वरी भगवतीक दर्शन करए चलू। तीन-चारि घन्‍टाक रस्‍ता टेम्‍पूसँ अछि। शिवरातिसँ एक दिन पहिने दुपहरक पछाइत विदा हएब आ चारि-पाँच बजे तक पहुँच जाएब। ओत्तै रातिमे विश्रामो करब आ साँझमे शिव उपासक फलहारो करब। मुदा जागेश्‍वर काका सबहक बात सुनैत गेला, किनको किछु कहलखिन नहि। नइ कहैक कारण रहैन जे मने-मन उदयपुरक सभकेँ चिन्‍हते रहैथ, माने गौंआँ सभकेँ। जे केकरो जड़ि-छीपक ठेकान नइ अछि। बाजत किछ आ करत किछ। करनी-धरणी एहने रखने अछि आ दर्शन करत वाणीश्‍वरी भगवतीक। मुदा विचारसँ उतैर जागेश्‍वर कक्काक मनमे एलैन जे जखन गामक लोक सभ जाइए रहला अछि आ अपनो केते दिनसँ विचारैत आबि रहल छी जे वाणीश्‍वरी भगवतीक दर्शन दुनू परानी मिलि करब, मुदा ने कहियो गर लागल आ ने जा भेल। ..ओना रमणीकाकी वाणीश्‍वरी भगवतीक स्‍थानक चर्च नइ केने छेलखिन, मुदा जतरासँ वएह मतलब रहैन। तैपर, जवाबमे जागेश्‍वर काका कहलखिन-
जखन गामक भेड़िया-धसान लोक दर्शन करए जेबे करता तँ अपनो दुनू परानी अही लाटमे चलि कऽ दर्शन कऽ लिअ।
पतिक विचारसँ सहमत होइत रमणीकाकी मुड़ी डोलबैत बजली-
भेल तँ शिवरातिसँ एक दिन पहिने जाएब आ शिवरातिक परात भने चलिए आएब। मोटा-मोटी दू दिन भेल।
पत्नीक विचारमे सहमत जतबैत जागेश्‍वर काका बजला-
हँ से तँ सएह भेल। काल्‍हि बारह बजेक पछाइत निकलब आ तेसर दिन बारह बजेसँ पहिने घुमि कऽ आबिए जाएब।
पतिक विचारमे अपन विचार सटबैत रमणीकाकी बजली-
जखन दुनू परानी घरसँ निकैल बाहर जाएब तखन बेटो-पुतोहुकेँ जना देब नीक हएत। ओना अपनो दुनू परानी बहुत दिनसँ, बहुत दिनसँ कि सभ दिने वाणीश्‍वरी भगवतीक आराधना-उपासना करिते आबि रहल छी तँए भगवतीए धाममे उपासक फलहारो करब तँ जिनगीक परीछे देब हएत किने।
पत्नीक विचार सुनि जागेश्‍वर कक्काक मन फुला गेलैन। फुलाइते बजला-
जखन उदयपुरक लोक जाइक मन बना लेलैन तखन संग-साथमे अपनो दुनू परानीक जाएब उचिते हएत। मुदा ओ सभ अपन-अपन सवारीक बेवस्‍था करता, अपना दुनू गोरे अलग बेवस्‍था करब।
ओना जागेश्‍वर काका पत्नीक अभ्‍यन्‍तरक बात अपनो बुझै छला। अपना बुझैक कारण बेवहारिक छेलैन। बेवहारिक ई जे कहैले तँ सभ (गौंआँ) वाणीश्‍वरी भगवतीक दर्शन करए जेता मुदा घरसँ बाहर धरिक जे बोली-वाणीक रूप बना नेने छैथ, से की अपने वाणीश्‍वरी भगवतीक दर्शन करता, ओ तँ अप्‍पन दर्शन भगवतीकेँ देथिन। मुदा जे हौउ, एके गाममे सभ रहै छी, मुदा...।
अपन विचारकेँ तहियबैत अबोध जकाँ जागेश्‍वर काका बजला-
जेना-जे विचार हएत से करब।
शुरूमे उदयपुर छोटे गाम छल। मुदा मिथिलांचलक घर-घराड़ीकेँ कमला-कोसीक बाढ़ि कम उपटान उपटौलक सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। केतेको निम्‍मन गामक मनुखक घराड़ी चौर भऽ माछ-कौछुक घराड़ी बनि गेल अछि जेकरो तँ नकारल नहियेँ जा सकैए। मुदा तँए ईहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए जे बत्तीसोअना गाम अहिना भऽ गेल अछि। खएर जेतए जे भेल से भेल, मुदा उदयपुरक उदयमे सभ दिन बाढ़ि ऐछे। ने यमुना तीरक उपद्रव आ ने कोसी-कमला घाटक घटवारिसँ भेँट, जइसँ गाममे कहियो कोनो विघटन किए हएत। तँए दिन-दिन बढ़िते गेल। आने-आन गामसँ उजरल-उपटल लोको आ उदयपुरक महत बुझनिहारो तँ आबि-आबि उदयपुरमे बसले छैथ। तैसंग नव-नव एबो करिते छैथ। गाममे वास-भूमिक कमियोँ छइहे नहि जे घराड़ीक अभावक दुआरे कियो बसि नइ सकै छैथ, आकि अपनामे रग्‍गड़े-झग्‍गड़ करता। तँए कि गाममे निचरस खेत नइ अछि, कोनो धार-धूर नइ अछि, ओ गामे ने वास-भूमि भेल। तँए केतबो परिवार आन गामसँ आबि बसता तैयो उदयपुरमे वासक कमी नहियेँ हएत। ..अनुकूल मौसम बनने जहिना बरखा होइए, अनुकूल मौसम बनने जहिना वसन्‍त अबैए, अनुकूल मौसम बनने जहिना ठनका खसैए तहिना वास-भूमिक अनुकूलते ने घरवासकेँ गामवास सेहो बनबैए। जखने घरवास गामवास बनए लगैए तखनेसँ ने विचारवासी विवेकवासी बनि वास करए लगैए। से तँ गाममे ऐछे।
जहिना श्रीपंचमीमे वीणा पुस्‍तक-धारिणी सरस्‍वतीक आ हाथ सजलक संग लक्ष्‍मीक पूजा[1] एके दिन एके समए– प्रभात वेलाक शुभ मुहूर्त्तमे लोक करै छैथ तहिना ने जिनगियोक प्रभात वेला अछि।
वाणीश्‍वरी भगवती धामक धरमशालामे दुनू परानी जागेश्‍वर काका एकटा कोठली सबा रूपैआ दैछना दऽ कऽ लेलैन। तीन मंजिला मकानक नमहर धरमशाला ऐछे, जइमे छोट-पैघ अनेको कोठली भीतर अछि। उदयपुरक तँ मात्र पनरहे-बीसटा यात्री छैथ जे आनो-आनो गामक अनेको यात्री रहितो धरमशालाक किछु कोठली खालीए अछि। ओना, धरमशालाक भाड़ा होटल आकि भाड़ाबला आन मकान जकाँ बेसी नहियेँ अछि। तेकर कारण अछि ई धरमशाला वाणीश्‍वरी भगवतीक स्‍थानक छिऐन। जे स्‍थानक चन्‍दा-चढ़ौआसँ बनल अछि। भाड़ा नामक किछु ने छै मुदा ओकर रख-रखावक जे बेवस्‍थामे खर्च होइ छै, बस ओही रूपक भाड़ा बनल अछि।
सूर्यास्‍त भऽ गेल। स्‍थानक अप्‍पन बिजली बेवस्‍था, माने जेनरेटरक बेवस्‍था तँए स्‍थान भरिमे माने वाणीश्‍वरी भगवती-मन्‍दिरक संग आरो केते छोट-पैघ मन्‍दिरो तँ ऐछे। तैसंग पण्‍डा-पुजेगरीक रहैक वासक संग नमहर धरमशलो अछि आ बीचक जे अगनेय अछि, जइमे रंग-रंगक दोकान-दौरी अछि, तैबीच भरि राति एके रंगक इजोतक बेवस्‍था तँ चाहबे करी, जे ऐछे। पावर-हाउसक बिजली जकाँ नहि, जे कखन रहत आ कखन नइ रहत। होइतो तँ ऐछे जे दिनमे जखन बिजली इजोतक जरूरत नइ रहै छै तखन बिजलियो रहैए आ रातिमे जखन अन्‍हार होइ छै तखन रहबे ने करैए। तइसँ सैयो कच्‍छे वाणीश्‍वरी भगवतीक स्‍थानक तँ ऐछे। दिनमे जखन इजोतक खगता नइ रहै छै तखन जेनरेटर बन्न रहल आ जखन जेते काल खगता भेल, तेते काल चलल। यएह ने जिनगीक ओ उपलब्‍धिक पड़ाव छिऐ जेतए लोककेँ अपन जिनगीक काज अपना हाथमे आबि जाइए, जइसँ अपन मनोनुकूल कार्यक्रमक बीच जिनगीक चक्की चलैत रहैए।
सूर्यास्‍त होइते भगवतीक सिंह दुआरिक घड़ी-घण्‍ट बाजल। घड़ी-घण्‍ट बजिते सभ उपासी–शिवक उपास केनिहार आकि केनिहारि–क मनमे उपासनाक फलहारक आशा जगलैन। जहिना तुलसी बाबा कहने छैथ जे, जेहने जेकर मनक भाव रहत तेहने रामक दर्शनसँ भेँट हएत। रामो रामो कहनिहारक कमी अछि, केतौ ठक-ठाकुर-चोर मिला जपैए तँ केतौ रस्‍ता-पेरामे रामक जप लुटाइए! लूटि लिअ जेकरा जे लूटैक अछि। भगवती स्‍थानक घण्‍टीक अवाज सुनि रमणीकाकीक मन चपचपाइत थलथला कऽ जलजला गेलैन। जलजलाइते पति दिस तकैत रमणीकाकी बजली-
गामेसँ फलहारक सभ फल अनने छी। पहिने दुनू परानी नहा कऽ नव वस्‍त्र पहिर लिअ, पछाइत डाली साजि भगवतीक मन्‍दिरमे फल चढ़ा दुनू गोरे शिवरातिक उपासनाक फलहार कऽ लेब।
होइते अहिना छै जे भूखल आगू किछु खेबाक वौस आ पियासल आगू पानि आबि गेलापर जहिना मनमे सब्रक बीजक अंकुर जगैए तहिना जागेश्‍वर काकाकेँ सेहो भेलैन। कोठलीक खिड़की खोलि जागेश्‍वर काका गौंआँ यात्रीक कोठली दिस तकला तँ देखलैन जे किनको अपन घरक फलहारक फल नइ छैन, तँए सभ झोरा लऽ लऽ दोकान दिस जा रहल छैथ...।
अवसरक लाभ उठबैक परियास करैत, समयक उपयोग करैत जागेश्‍वर काका बजला-   
नहेला पछाइत ने भगवतीक डाली सजब। अखन सभ यात्री फलहारक फल कीनैले दोकान-दौरी टहैल रहल छैथ, स्‍नानक घाट खाली अछि...।
दुनू परानी जागेश्‍वर काका नहेला पछाइत नव वस्‍त्र धारण केलैन। पुरना वस्‍त्र घाटपर खीच-फखारि कऽ पानि गाड़ि कोठरीमे पसाइर लेलैन।
थर्मशमे गाइक दूध, पाकल केरा, दारीम, आ खीरा मोटरीसँ निकालि रमणीकाकी काकाकेँ कहलखिन-
सभ अपने चास-वासक छी।
एक तँ यात्राक पछाइत स्‍नानक सुख, तैपर सँ वाणीश्‍वरी भगवतीक सरोवरक घाट टपल जागेश्‍वर काका रहबे करैथ, मन गुदगुदा गेलैन। गुदगुदाइते बजला-
भगवतियोकेँ अपन-चास-वासक फल देख मने-मन खुशी हेबे करतैन।
ओना जागेश्‍वर काका संगी-साथी जकाँ वाणीश्‍वरी भगवतीकेँ बुझि बजला मुदा से रमणीकाकीकेँ नीक नइ लगलैन। ओना, अनसोहाँतो नहियेँ लगलैन, मुदा एक धान एक चाउर होइतो किछु एहनो तँ ऐछे जे सुगन्‍धित अछि, एकर माने ईहो नइ जे सभ सुगन्‍धिते अछि। मुदा ईहो केना कहल जाएत जे चाउरक जे अपन सुगन्‍ध अछि ओ कोनो चाउरमे नइ अछि। ओ तँ उपरारिमे उपजल सतरिया धानक चाउर हुअए कि तुलसी फुलक आकि चौरीमे उपजल बेलौर-दसरिया आकि पाखैरे-पिच्‍चैर किए ने हुअए मुदा चाउरक जे अपन गुण-धर्म-सुगन्‍ध छै ओ तँ छइहे। ओना मने-मन जहिना जागेश्‍वर काका चाउर-गुड़ चिबबै छला तहिना रमणियोँ काकी चिबैबते छेली, मुदा बजली नहि, अपन फलहारक ओरियानमे अपनाकेँ लगौने सभ फलकेँ ओरिया-ओरिया सैंत-सैंत डाली सजबैत रहली।
..डाली सजिते जागेश्‍वर काका टोन मारलैन-  
जे सभ फल वाणीश्‍वरी माएकेँ चढ़ेबैन से तँ मंत्र जकाँ कहि देबैन किने?”
ओना जागेश्‍वर कक्काक मनमे होइत रहैन जे भरिसक पत्नीकेँ ईहो बात नीक नइ लगतैन, मुदा से विपरीत भेल, रमणीकाकीकेँ नीक लगलैन। दुनू खीरापर हाथ रखि बजली-
ई भेल लत्तीक फल। जेकरा डाँड़मे, अपन फल जकाँ तागतो ने छै जे अपने भरे ठाढ़ो हएत मुदा फल तँ एहेन ऐछे जे गाछक सैयो फलसँ नम्‍हरो आ सुअदगरो ऐछे।
बिच्‍चेमे टोन दैत जागेश्‍वर काका बजला-
मुदा खीरा मीठ कहाँ होइए?”
रमणीकाकीकेँ सुतरलैन। बजली-
मीठ केकरा कहै छै से अखैन नइ कहब। जाबे आन यात्री नहेता-सोनेता तइसँ पहिने अगुआ कऽ भगवतीक दर्शन करब बेसी नीक हएत।
हत्‍थो भरि गौरिया केराकेँ दहिना हाथसँ उठा रमणीकाकी निंगहारि-निंगहारि देखए लगली जे पाल परक कलकतिया-आम जकाँ ठाम-ठीम खोंइचा दगि गेल अछि। बिच्‍चेमे जागेश्‍वर काका टोनियबैत बजला-
केरा सड़ल जकाँ बुझि पड़ैए!”
झपटैत रमणीकाकी बजली-
सड़ल नइ अछि, परसाएल अछि। असल तँ यएह भेल जे परसाद बनि परसाइबला सेहो छी। तोहूमे आम-लतामक गाछ जकाँ कि कोनो हड्डी-पसलीबला गाछक फल छी। जल-जल, थल-थल, पल-पल गाछक पेटसँ निकलल फल छी।
ओना रमणीकाकीक बात सुनि जागेश्‍वर काका भकचका गेला। भक-चकीमे पड़ल मनकेँ जाबे सोझरबैथ तइ बिच्‍चेमे दारीमकेँ देखबैत रमणीकाकी बजली-
केते सुन्‍दर पृथ्‍वी अकारक गोल फल झाड़-झाड़ीमे नुकाएल रहैए।
रमणीकाकीक मुहसँ निकैलते जागेश्‍वर काका बजला-
कोनो कि झाड़ीक-झाड़मे फलेटा नुकाएल रहैए, फलक तरोमे फलहार नुकौने रहैए। तेहेन भारी चोर अछि जे खीरा आकि लताम जकाँ गुद्दा-बीआ आकि रस-खोंइचा एकबट्ट केने रहैए, सजनी जकाँ कोठरी बना-बना अपनाकेँ सजने रहैए।
ओना रमणीकाकीक मनमे उपकैत रहैन जे कहिऐन- मुँहक दाँत जहिना रजो छी आ चोरो छी, तहिना ने दारिमो अछि, मुदा बकबासमे समैकेँ हाथसँ छोड़ब नीक नहि, तँए रमणीकाकी चुपे रहि थर्मश निकालि दूधक रंग देखए लगली। बकेन गाइक दूध...।
डाली साजि रमणीकाकी जागेश्‍वर काकाकेँ कहलखिन-
चलू, भगवती-माइक दर्शन काइए ली। फलहारोक बेर उनैह जाएत।
रमणीकाकीक बात सुनि जागेश्‍वर काका बजला-
हम तँ नहेला पछाइतेसँ दर्शन करैले तैयार छी मुदा बीचमे अहीं ने लटघाँइर लगौने छी।
पतिक बात रमणीकाकी सोल्‍होअना नइ सुनि पेली। आँखि उठा तकली तँ सोझे पतिक मुँह पटपटाइत देखली, जेना मने-मन कियो मंत्र-जप करै छैथ, तहिना। वाणीश्‍वरी भगवती जेना आगू आबि ठाढ़ भऽ अपन रूप दर्शन करबए लगल होनि तहिना रमणीकाकी अनसून भऽ गेली। अनसून होइते मन नाचए लगलैन। नचिते आँखिक सोझमे भगवतीक तीन रूप चमकए लगलैन। मनुखमे देव जोग वएह ने भेल जे विचारकेँ विवेकक कसौटीक मुखाड़ी बान्‍हि बाइन बना भूमिक रणभूमिमे जीवन यात्रा करैत चलए।  
वाणीश्‍वरी भगवतीक दर्शन आ फलहार केला पछाइत दुनू परानी जागेश्‍वर काका धरमशालाक ओइ कोठरीमे आबि बैसला, जे सवा रूपैआ दैछना दऽ दू दिन रहैले नेने छला। भरल मन दुनू परानीक रहबे करैन। रौतुका खेबोक खगता नहियेँ बुझि पड़ैन। जागेश्‍वर काका पत्नीकेँ कहलखिन-
एक बेर गौंओं-घरूओकेँ देख अबए चलू।
एक तँ ओहुना रमणीकाकी पति भक्‍त, तैपर वाणीश्‍वरी भगवतीक स्‍थान, बिनु हँ हूँ बजने उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेली। दुनू परानी जखन कोठरीसँ निकैल आनो-आनो यात्री आ अपन गौंआँ-यात्रीकेँ देखलैन तँ मने-मन हँसी लागए लगलैन। मुदा ने कियो हँसबे केला आ ने किछु बजबे केलैन। चुपचाप देख-सुनि कऽ अपन कोठरी आपस आबि गेला।
जहिना अनुकूल मौसम पौने प्रकृतिमे सेहो अनुकूलता आबि जाइ छै, तहिना दुनू परानी जागेश्‍वर काकाक बीच सेहो ऐलैन।
..पत्नी दिस देखैत जागेश्‍वर काका बजला-
अनेरे दुनियाँक नीक-अधला देखै पाछू अपन जिनगी आ कर्तव्‍य छोड़ि मुँह तकैत रही, हमरा बुझने से नीक नहि।
जहिना केकरो-केकरो ठोरेपर बरी पकैए, माने कोनो बातक विचार लगले कऽ देब, तहिना रमणीकाकीकेँ सेहो भेलैन। बजली-
एकरा के काटत।
पत्नीक समरथनमे जागेश्‍वर कक्काक मन हरिया गेलैन। हरिया ई गेलैन जे विधातो नारी-पुरुखक भेद रचि दुनूकेँ दू दिशामे मोड़ि देलैन। तैठाम जँ पति-पत्नी ओइ भेदकेँ सहीट बनबैत जिनगीक संगी बनि जीवन-यात्रा करै छैथ तँ ओ निसचिते ने नीक भेल।
जागेश्‍वर काका बजला-
बेकती रूपमे नर आ नारी भेल, दुनूक सम्‍बन्‍धे ने घर-परिवारक निर्माण करत। जे सभ नरक जिनगीक दायित्त्व बनिते अछि।
बिच्‍चेमे रमणीकाकी बजली-
पुरुख-नारीक सम्‍बन्‍ध ओइ परिवार-ले अनिवार्य भेल जे अतीत-सँ-भविस धरिक परिवार भेल, मुदा परिवार तँ असगरोक होइ छै आ निसचिन्‍तसँ लोक जीवन-यात्रा करैए।
पत्नीक विचार सुनि जागेश्‍वर काका बजला-
हँ, से तँ भेल मुदा ओ चलन्‍त परिवार भेल। चलन्‍त परिवार ई जे जेत्तै रहब तेत्तै परिवार भेल, कोनो गाम-समाज आकि देश-कोस नइ भेल। मुदा जे भेल से भेल, अपना तँ से नहि अछि। तँए जे अछि तहीले ने विचारबो करब आ करबो करब।
जागेश्‍वर कक्काक विचार रमणीकाकीकेँ जँचलैन। जँचिते बजली-
अखन जइ धाममे छी ओ तँ तखने धर्मस्‍थल हएत जखन ओइ मर्मकेँ मर्मस्‍थलमे बसा कर्मस्‍थलमे समरपित करब।
रमणीकाकीक विचार नीक जकाँ जागेश्‍वर काका नइ बुझला। एकर माने ई नहि जे जागेश्‍वर काकाकेँ बुझैक अवगैत नइ छेलैन। विचार व्‍यक्‍त कएल जाइए पात्रक माध्‍यमसँ। जँ एक रंग पात्र रहल तँ एक-धारामे चलैए आ जँ पात्रमे भेद रहल, अन्‍तर रहल तँ केतौ-केतौ बाधा-रूकाबट होइते अछि। सएह जागेश्‍वर काकाकेँ भेलैन। मुदा कनियेँ-कालक पछाइत जेना मनक ओझरी सोझरा गेलैन तहिना मन विहुँसलैन। विहुँसैत जागेश्‍वर काका बजला-
जहिना नर-नारीक बीच परिवार बनल अछि तहिना ने एक नर दोसर नरक धारा भेल।
ओना रमणीकाकी अखन तक नरक माने पुरुख बुझै छेली आ नारीक माने महिला। मुदा जागेश्‍वर काका नरक अद्वैत रूपमे चर्च केने छला, द्वैत रूपमे नहि। माने ओकर खण्‍डित रूपमे नहि। तँए रमणीकाकीकेँ कनी बुझैमे भेद भेबे केलैन।
निर्मल-निरजल रमणीकाकीक हृदय, बजली-
नीक नहाँति नइ बुझि पेलौं।
हँसैत जागेश्‍वर काका कहलखिन-
द्वैत-अद्वैतक बीच परिवार चलैए। कखन द्वैत अद्वैत हएत आ अद्वैत द्वैत’, यएह ने..?”
पतिक विचार सुनि रमणीकाकी रमैत जिनगीमे रमि गेली।
शब्‍द संख्‍या : 2352, तिथि :  11 अक्‍टुबर 2016


[1] कृषि कार्य हेतु हर ठाढ़ कएल जाइए

'भाइक सिनेह' (क. जगदीश प्रसाद मण्‍डल) अर्द्धांगिनी लघु कथा संग्रहक दोसर संस्‍करणसँ...

भाइक सिनेह

बारहसँ बेसी राति‍ ढहि‍ चुकल मुदा एक नै बजल छल। अगहन मासक अन्‍हरि‍याक चतुर्दशी। एक तँ डम्‍हाएल अन्‍हार तैपर झक्‍सी जकाँ ओस खसैत। आँखि‍क रोशनी एते दुबरा गेल जे अपनो देह भरि नै देख‍ पबै छेलौं। जाड़क राति‍, तँए लोक सबेरे सीरक सेरि‍या कऽ ओछाइन पकैड़‍ लइ छल। पहि‍ल नीन पूरि कऽ टुटिते शि‍ष्‍टदेवक मन छोट भाएपर पहुँचलैन। सभ तरहेँ श्रेष्‍ठ रहि‍तो आँखि‍क सोझहेमे परि‍वार टुटि‍ गेल। जि‍नगी तँ ओहन जाल नहि, जइमे ओझराएब अनि‍वार्य अछि। वि‍धाता तँ सभ कि‍छु दऽ मनुखकेँ पठबै छथि‍न तहन किए लोक मकड़ा जकाँ अपने करनीसँ ओझरा जाइत अछि! आ वि‍वेकमे केना भूर भऽ जाइ छै जे हंस नइ बनि‍ कऽ कार-कौआ बनि‍ जाइत अछि! खएर.., परिवार भलेँ फुट भऽ गेल हुअए मुदा वि‍चारनाथ तँ छोटे भाए छी, आ अपने पि‍तातुल्‍य छि‍ऐ। ई कि‍यो बुझए वा नइ बुझए मुदा अपने तँ जरूर बुझै छी। अखन धरि‍ जेते दुनि‍याँ आ उगैत सुरूजक दर्शन हमरा भेल अछि ओतेक तँ वि‍चारनाथकेँ नहियेँ भेलैहेँ। परि‍वार टुटैक दोख केकरा लगतै? पि‍तातुल्‍य तँ प‍रि‍‍वारमे अपने छिऐ। मनुखक जि‍नगीक गाड़ी समैक संग चलैत आएल अछि आ आगुओ चलि‍ते रहत...।
सोचैत-वि‍चारैत शि‍ष्‍टदेवक हृदए बर्फ जकाँ पघिल‍-पघिल‍ पानि‍ हुअ लगलैन। पि‍पनीमे अँटकल नोरक बून सरस्‍वती नदीक धार जकाँ पहाड़पर सँ समतल भूमि‍मे बहए लगलैन। नोरक संग भाइक सि‍नेह सेहो उमड़ए लगलैन। जि‍नगीक सभ बाटमे वि‍चारनाथ पाछू अछि तँए ओकर बाँहि‍ पकैड़‍ आगू खिंचब। अपना पाँच समांग कमेनि‍हारक परिवार अछि। ओ दुइए परानी अछि। घरक कोनो वस्‍तु नि‍कालि‍ कऽ देलासँ पत्नी देख‍ लेती मुदा खरिहाँनक धानक बोझ तँ नइ देखती।
बि‍नु ठेकानल राति‍मे शिष्‍टदेवे जकाँ विचारनाथक नीन सेहो टुटल। नीन टुटिते मनमे उठलै जे जइ भैयाक संग चन्‍देसर, विदेसर आ जागेसर स्‍थान संगे जाइ छेलौं आ महादेवोक दर्शन करै छेलौं, मेलौ घुमै छेलौं।  की बेटो-भातिज संगे जाएत? एहेन टूट परिवारमे केना भेल? जहि‍यासँ ज्ञान-परान भेल तहि‍यासँ जहि‍ना भैयाक संग रहैत एलौं तहिना भीन होइसँ पहिनौं धरि ओहि‍ना रहलौं। मुदा कोन रोग परि‍वारमे केमहरसँ घुसि‍ आएल जे दुनू भाँइ महींस‍क सींग जकाँ भऽ गेल छी? मुदा भैयाक दोख कहाँ केतौ छैन। दू परि‍वारसँ दुनू दि‍यादि‍नी आबि‍ दुनू भाँइकेँ दू दि‍याद बना देलक! दुनू भाँइमे जेठ-छोटक बेवहार कहाँ अछि। दुनू भाँइ तँ भैये-बच्‍चा छी मुदा दि‍यादि‍नीमे से कहाँ छइ? माए तुल्‍य भौजीक दोख केना लगेबैन‍ मुदा की ओ छोट दि‍यादि‍नीकेँ छोट बहि‍न बुझै छथि‍न‍..? मनुखोक अजीब गति‍ अछि। जाधैर‍ सम्‍मि‍लि‍त परि‍वार रहैए ताधैर‍ दुनि‍याँक सभ रोग परि‍वारकेँ पकड़ने रहै छै मुदा परि‍वार टुटिते रोग पड़ा जाइ छइ। खएर जे हौउ, जाधैर‍‍ जीबै छी ताधैर‍ भैयाकेँ भैये बुझबैन‍, भलेँ ओ जे बुझैथ‍। जहि‍ना आमक वंशकेँ बढ़ैक दू रस्‍ता अछि। डारि‍सँ गाछ जोड़ि‍ कऽ–जे कलम बनैए‍–जइमे आगूओ पुन: वएह आम रहैए‍, आ आँठीक जन्‍मल गाछ सेहो होइए जे दिनानुदिन अपन रूप बदलैत-बदलैत सभ कि‍छु बदैल‍ लैत अछि। खएर.., एक हिस्‍सा रहि‍तो भैयाकेँ पाँच गोरे खेनि‍हारो छैन आ तीनू भाए-बहिन‍केँ पढ़बैयोमे खर्च होइ छैन। हमर तँ नापल-जोखल अढ़ाइ गोटेक परि‍वार अछि। एक सम्‍पैतमे भैयाक दोबर खर्च छैन। सहोदर रहैत जँ भैयाक दुख हम नइ बुझबैन तँ आन थोड़े बुझतैन‍? जइ धरतीपर राम-लक्ष्‍मण सन भैयारी भऽ चुकल अछि, की हम ओइ धरतीपर जन्‍म नइ लेने छी?
चुपचाप ओछाइनपरसँ उठि‍ खरिहाँन जा धानक जाकमे सँ एक बोझ उठा भाइक खरिहाँन दि‍स विचारनाथ विदा भेल। तहीकाल शिष्‍टदेवो अपना खरिहाँनसँ धानक बोझ उठा‍ वि‍चारनाथक खरिहाँन दि‍स चलल। दुनू भाँइक खरिहाँनक मुँह दू दि‍स रहने कि‍छु क्षणक रस्‍ताक दूरी बनि‍ गेल। बीच बाटपर दुनू दि‍ससँ दुनू भाँइ बोझ उठौने एक दोसराक आगूमे ठाढ़ भऽ गेल। मुदा अन्‍हार राति‍क दुआरे कि‍यो केकरो चिन्‍हलक नहि, दुनूक मनमे चोरक शंका भेल। मुदा हल्‍लो केना करैत, दुनू तँ छल अखन चोरे। भलेँ अपने धान किए ने छेलइ। मक्‍खन चोर कृष्‍ण तँ नै छल जे चोरा कऽ खाइयौ लैत आ झूठ बाजि‍ छि‍पाइयो लि‍तए। ..खरहोरि‍क कड़ची जकाँ दुनू भाँइ सजीव रहि‍तो नि‍र्जीव आ नि‍र्जीव रहि‍तो सजीव ठाढ़ रहल। किनको मुँहमे बोल नहि, आँखि‍मे नोर नहि। अमरलत्ती जकाँ दुनूक हृदए ओझरा कऽ लटपटा गेल। एक क्षण-ले जेना सरस्‍वती नदीक धार बहब छोड़ि‍ असथि‍र भऽ मोटाए लगल।
मुड़ी उठा शि‍ष्‍टदेव अकास दि‍स तकैत उतरे-दछिने डगहरकेँ देखैत माथसँ थोड़ेक नि‍च्‍चाँ सतभैंयाकेँ पच्‍छिम दि‍स हिया-हिया कऽ देखए लगला। सतभैंयापर सँ नजैर‍ नि‍च्‍चे ने उतरैत रहैन। तैकाल उतरबरि‍या गाछपर चकबी-चकेबाक झूण्‍ड देह डोलबैत भोरक इशारा करैत बोली देलक। चकवीक अवाज सुनि‍ते शि‍ष्‍टदेवक मनमे उठलैन- हो-ने-हो कहीं पत्नी जागि‍ ने गेल होथि! हाँइ-हाँइ मुड़ी निच्‍चाँ करैत शिष्‍टदेवक मुहसँ फुटलैन-
के?”
बोलीक अवाज अकाइन विचारनाथ बाजल-
हम।
हम सुनि शि‍ष्‍टदेवक मन कहलकैन- ई तँ वि‍चारनाथ छी!’ मुदा तर्क कहलकैन- एत्ती राति‍मे बोझ उठौने केतए जाइए? ताड़ियो-दारू तँ नहियेँ पीबैए जे पसिखन्नो जाएत कि‍ भट्ठीखाने जाइत हएत। सामंजस करैत शिष्‍टदेवक मुहसँ जहिना निकललैन-
बौआ!”
तहिना विचारनाथक मुहसँ बहराएल-
भैया!”
बौआ भैयाक पछाइत दुनूक मुँह एक्केबेर बाजल-
हँ!”
शि‍ष्‍टदेव बजला-
एहेन काजर सन कारी राति‍मे बोझ केतए नेने जाइ छहक?
जहिना सि‍नेह अपना हृदैसँ लगा कारीखमे चमक आनि दैत अछि, आ आँखिक गुण बढ़बैत अछि तहिना विचारनाथक हृदए-आँखि चमकल-
भैया, अहाँक खर्च देख‍ मन कहलक जे पाँच बोझ धान दए अबहुन
दुनू भाँइक मनमे उठल-
भीन किए..?
जाधैर‍‍ सदनदेव आ श्रद्धावती जीबैत रहैथ‍ ताधैर‍ स्‍वर्गक परि‍वार छेलैन‍। अपन अमलदारीए-मे सदनदेव दुनू बेटाकेँ गामक स्‍कूल धरि‍ पढ़ा बि‍आह-दुरागमन करा जि‍नगीक लीलासँ नि‍चेन भऽ गेल छला। सोलह बीघा जमीनक कि‍सान परि‍वार, बाढ़ि‍-रौदीक बीच रहि‍तो दोसराक सेवाकेँ कर्ज बुझि‍‍ अपन परि‍वारकेँ सालक आमदनीक भीतरे खर्च कऽ रखि‍ उगरल आमदनीसँ काति‍क मास भागवत-कथाक संग भोज कऽ अगहनसँ नव जि‍नगीमे पएर रखै छला। ने बेटाकेँ कि‍छु अढ़बैत रहथिन आ ने पत्नीकेँ। अढ़बैक प्रयोजने नइ रहैन। परि‍वारकेँ संस्‍था बुझि‍‍ अपन-अपन समैक उपयोग अपना-अपना शक्‍ति‍क अनुकूल सभ कि‍यो काजमे लगबैत रहै छला। अपने अनुकूल परि‍वार देख‍ सदनदेव दुनू भाँइक बि‍आह केने छला। शि‍ष्‍टदेवक बि‍आह बीस बीघाबला लालबाबूक परि‍वारमे आ वि‍चारनाथक बारह बीघाबला श्रमदेवक परि‍वारमे भेलइ।
तइ समए महि‍ला शि‍क्षा अवैध रहने कैकेयी सेहो नि‍अमक पालन करैत रहली। जइसँ पि‍तो–लालबाबू–खुश भेला। माल-जाल पोसैले एकटा नोकर छेलैन आ खेती जने-हरबाहक हाथे होइन। अँगनाक मालि‍क पत्नीए रहथिन। खाइ-पीऐक चहैट‍ पत्नीकेँ नैहरेसँ लगल रहैन जइ दुआरे बेटी-पुतोहुकेँ रहि‍तो भानस अपने करै छेली। खाली गठुलासँ बेटी जारैन‍ आनि‍ दइ छेलैन‍ आ घरसँ बरतन-बासन आनि‍ पुतोहु चूल्हि‍‍‍ लग दऽ दैन। अपने तँ तरकारीए बनबए, चाउरे फटकए आ दालियेक खोंइचा बीछैमे पसेना पोछैत रहै छेली। चूल्हि‍‍‍क एक भाग पुतोहुकेँ आ दोसर भाग बेटीकेँ बैसा बीचमे अपने बैस‍ सभ दि‍न नैहरक खिस्‍सा सुनबैत रहली जेकरे चलैत ने बेटी परबाबाक नाओं आ ने ददि‍या ससुरक नाओं पुतोहु बुझै छेलैन‍।
बाढ़ि‍क उपद्रवसँ परि‍वार चलब कठि‍न बुझि‍‍ श्रमदेव पितियौत भायकेँ सातो बीघा खेत सुमझा परिवारक संग कलकत्ता चलि गेल। माए-बापक संग साते बर्खक दमयन्‍ती सेहो चलि गेली। रि‍सरा जूट मि‍लमे श्रमदेव नोकरी ज्‍वाइन केलैन। पक्का आठ घन्‍टाक ड्यूटी रहैन। रस्‍ताक समए श्रमि‍कक। डेराक बगलेक स्‍कूलमे दमयन्‍तीक नाओं लि‍खा देलखिन। संगी-साथी सभसँ पँइच रूपैआ लऽ कऽ दस कि‍लो दूधवाली गाए कीनि‍ पत्नी-ले सेहो काज ठाढ़ कऽ लेलैन। बच्‍चेसँ माने साते बर्खसँ दमयन्‍ती थैर-गोबर करैत‍-करैत‍ गाए पोसनि‍हारि‍ भऽ गेली‍। आठ बरख नोकरीक उत्तर मि‍लमे वेतन-ले श्रमि‍क सभ हड़ताल केलक। मिलमे ताला लटैक‍ गेल। नोकरीक डगमगाइत स्‍थि‍ति‍ देख‍ श्रमदेव अपन अरजल सभ कि‍छु बेच‍ पुन: घर घुमि‍‍‍ एला। सस्‍त जमीन रहने पाँच बीघा जमीनो आ तीनटा गाइयो कीनि‍ दोहरी काज ठाढ़ केलक।
..समैक संग चलि‍ दुनू भाँइ शि‍ष्‍टदेव सेहो परि‍वारक गाड़ीकेँ पटरीपर चढ़ा अपन गति‍ए चलबैत रहला।  
अँगनाक मालि‍क कैकेयी आ सहयोगीक रूपमे दमयन्‍ती रहए लगली। जेठ होइक नाते कैकेयी मुँहक बले जुइतो चलबए लगली आ हाथ-पएरकेँ अरामो दिअ लगली। वएह अराम काल भऽ भीन करौलकैन..! मुदा दुनू भाँइक बीचक सि‍नेह पुन: एकाकार कऽ देलकैन।
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शब्‍द संख्‍या : 1201

Monday, October 31, 2016

केना जीब?‍ (कथाकार- जगदीश प्रसाद मण्‍डल)

केना जीब?

सेवा निवृत्तिक सातम सालक सातम मास, सातम मासक सातम दिन, सात बजे साँझमे दू-जनियाँ सोफापर दुनू परानी प्रोफेसर शंकर कुमार ओंघराएल छला। दुनू बेकतीक मन खटाएल रहैन। दस बजेक करीब दिनेमे सुनने छला जे संगीक संगिनी चूल्हिक गैसक रिसावसँ झड़ैक अस्पतालक सीटपर चिकैर-चिकैर कानि रहल छैथ। सत्तैर बर्खक अवस्थामे संगी अपने दौग-धूप कऽ रहल छैथ‍! मुदा अस्पतालक डाक्टर, नर्स आ कम्पाउण्डरो जी-जानसँ रोगीकेँ बँचबै पाछू लगल छथिन! तेकर कारण अछि जे एक तँ पाइक कमी नहि, आ दोसर पहुँचो नीके छैन। संगिनीक घटनाकेँ सरस्वती लगसँ तँ नइ देखने छेली मुदा समाचारक रूपमे सुनने छेली। सुनिते करेज तेना दहैल गेलैन जे साँसक गतिसँ छातीक धुकधुकी बढ़लैन ओ असथिरे ने भऽ रहल छेलैन। जेना नस-नसमे भयक भूत समा गेलैन। अन्हारक वाण जकाँ चारू कातसँ मृत्‍युक तीर बेधए लगलैन। जहिना वैरागी रागसँ डरैत आ जोगी भोगसँ तहिना मृत्‍युक भयसँ सरस्‍वती डरए लगली।
पाँच साए एम.एल.बला ह्वि‍स्कीक बोतल प्रोफेसर शंकर कुमारकेँ बेअसर बुझि‍ पड़लैन। मनक चिन्ता रूपी तीर ह्वि‍स्कीक असरकेँ रस्तेमे रोकने छल। लग अबै ने दैन‍। कछ-मछ करैत शंकर पत्नीकेँ कहलखिन-
एकबेर चाह...।
सरस्वतीक मन चाह पीऐसँ सुरक्षित चूल्हि नै जराएब बुझैन। अपन अज्ञाक उल्लंघन होइत देख‍ शंकरक मन महुराए लगलैन। जहिना भोज्य-पदार्थक बरतनमे गिरगिट खसि महुरबैत तहिना। बेअसर सरस्‍वतीकेँ देख डेग भरि पाछू घुसैक शंकर मुस्की दैत दोहरा कऽ बजला-
चलू, हमहीं चाह बनाएब। कीचेनक तँ सभ किछु देखल नै अछि, खाली अहाँ देखा-देखा देब।
जिनगीक अन्‍तिम अवस्थामे पतिपर जीत‍ देख‍ ढेंग सन देहकेँ उठा सरस्‍वती कीचेन दिस बढ़ली।
चाह बना शंकर कीचेनेमे पीबए लगला। मुदा तैयो गप-सप्‍प करैक मन किनको ने होइन। मनक सोग नव विषयकेँ मनमे अबै ने दैन। जहिना घी नइ अरघनिहारकेँ थारीमे देख‍ते जीह ओकिऐ लगैत तहिना नव विचार अबि‍ते जी-मन पचपचाए लगैन। चाह पीब दुनू गोरे कोठरीमे आबि फेर सोफेपर पड़ि‍ रहला। गुम-सुम्‍म! जहिना साधक साधनामे लीन भऽ समाधिस्‍थ होइ छैथ‍‍ तहिना दुनू गोरे अपन-अपन विचारक दुनियाँमे औनाए लगला।
सरस्वतीक नजैर पाँच बर्खक अवस्थापर पहुँचलैन। की छेलए माए-बापक राज..! खेनाइ, खेलनाइ, पढ़नाइक संग पाबैनमे उपास केनाइ आ फूल तोड़ि पूजा केनाइ.., बस यएह छल जिनगी। मनमे सुख-दुखक जन्‍मो कहाँ भेल छल। सोहनगर वातावरणमे बि‍आह भेल। नैहरसँ सेवा करए नोकरनी आएल छल। सासुरो सम्पन्ने रहए। कथुक अभाव नहि। नोकरे पानियोँ भरै छल आ भानसो करै छल। अपनो प्रोफेसरे छला। पाइक संग प्रतिष्ठो बनौने छला। विद्यार्थीसँ शिक्षक धरिक बीच सम्मानित छला। अपनासँ बीसे बेटोक पढ़ैपर खर्च केलैन। आब जे महगाइ शिक्षामे आबि गेल अछि तइसँ इमानदार कमेनिहारक धि‍या-पुता-ले शि‍क्षा असंभव भऽ गेल अछि। दरमाहासँ तँ नहियेँ मुदा पिताक देल सम्‍पैतसँ एते जरूर केलैन। अमेरिकामे बेटाकेँ पढ़ा लिलसा मेटौलैन। मुदा अखन की देखै छी? ऐ अवस्थामे दिन-राति तीन मंजिलापर उतरब-चढ़ब पार लगत? ओहि‍ना तँ हाथ-पएर बिनबिनाइत रहैए। देह भारी बुझि‍ पड़ैए। तैपर परिवारक सभ काज! ऐ उमेरमे बुढ़-कनियाँ बनि जीब रहल छी। ..तरे-तर सरस्‍वतीक देहसँ पसेना चलए लगलैन। अनासुरती मुहसँ निकललैन-  
ऐ जीवनसँ मरब नीक।
पत्नीक बात सुनि शंकर कुमारक भक्क टुटलैन। अखन धरि चेतनाहीन भेल शंकरो अपन पैछला जिनगी देखै छला। गामक स्कूल...। केते सिनेहसँ पिताजी घरक देवताकेँ गोड़ लगा, कन्हापर चढ़ा सरस्वती माताक जयकहि‍ आँगनसँ निकैल सरस्वतीक मन्‍दिरमे लऽ गेल छला। की हम ओइ‍सँ  कम अपना बेटाकेँ केलौं? कथमपि नहि। डेरामे गाड़ल देवता तँ नइ अछि मुदा देबालमे टाँगल फोटो आ अष्टद्रव्यक बनौल मुरती तँ ऐछे। बाड़ीक वसन्ती गुलाब तँ नहि, मुदा मह-मह करैत भकराड़ रूपमे बनल प्लास्टिकक फूल तँ चढ़ौनहि छिऐन। धुमन-सररक धूपक बदला गुगुल आ अगरबत्ती तँ चढ़ैबते छिऐन। मोटर-साइकिलपर चढ़ा शहरक सभसँ नीक विद्यालयमे पढ़ेबे केलिऐन। पिताजी जेतेक हमरा पढ़ौलैन आ एक सीमा धरि पहुँचा देलैन, तहिना तँ हमहूँ केलिऐन। नोकरी भेलापर ताधैर पत्नी गाममे रहली जाधैर‍ बाबू-माए जीबैत रहला। मरि‍तोकाल धरि माए संगे खाइले कहैथ। संगे तँ नहि खाइ, मुदा एकठीम बैस कऽ जरूर खाइ। मुदा बेटाकेँ जहिए-सँ कनभेन्‍टमे नाओं लिखेलौं तहिए-सँ एके शहरमे रहनौं फुट-फुट रहए लगलौं! समैक संग शिक्षो बदलल। ..एकाएक शंकरक नजैर आगू बढ़ि अपन जिनगीक अवस्थापर पड़लैन। चारिम अवस्था। जइ अवस्थामे सभ कथूसँ सम्पन्न भऽ अभावकेँ निर्मूल-नष्ट कऽ परिवारसँ ऊपर उठि समाजमे मि‍लि‍ जाएब होइ छइ। हमर समाज केहेन? जइ समाजमे मनुखक संग-संग जीव-जन्तु, माटि-पानि, घर-दुआर धरि एक-दोसरकेँ नीक-अधला, सुख-दुखमे संग दैत अछि। जैठाम एकठीम बैस सभ भोज-काजमे खेबो करैए, दसगरदा उत्सवो हँसी-खुशीसँ मनबैए, ढोल-डम्फापर होरी गाबि-गाबि नचबो करैए, जुड़शीतलमे इनार-पोखैर उड़ाहबो करैए, शिव-पार्वती बना बजाक संग गामो घुमैए...।  
बेटाकेँ अमेरिकामे पढ़ेलौं। ओ ओइ‍ समाज आ संस्कृतिमे तेना मि‍लि‍ गेल जे अपन सभटा बिसैर गेल। आइ जँ हम अमेरिका जा रहए लगी तँ ओइ‍ठामक जिनगी दुनू बेकतीकेँ केतेक दिन जीबए देत? की दुनियाँमे मृत्‍यु छोड़ि हमरा-ले सभ-ले किछु शेष नै बँचल अछि! निराश मनमे एलैन करनी देखिहह मरनी बेर।जिनगीमे केतए चूक भेल? जँ चूक नइ भेल तँ ऐ अवस्थामे पहुँच‍ केना गेल छी?  
पत्नीक बात ऐ जीवनसँ मरब नीकसुनि धड़फड़ा कऽ उठि प्रोफेसर शंकर कुमार बजला-
अखन सुतैबेर अछि जे सुति रहलौं?”
सूतल कहाँ छी। भानस करैसँ मन असकताइत अछि।
तँ की भुखले रहब?”
शंकर कुमार बाजि तँ गेला मुदा मन पाछू घुमि‍ कऽ तकलकैन। एक तँ ओहिना मरैक बाट धेने छी, तहूमे जे दस-बीस बरख जीबो करितौं से तेहेन रोग भेल जाइ छैन जे भुखले मरब। जँ खाएब नइ तँ रातिमे नीन केना हएत? जँ नीन नइ हएत तँ जीब केतेक दिन?
पत्नी-
केता-दिन कहलौं जे नोकर रखि लिअ?”
नोकर सुनि शंकर अमती काँटक ओझरीमे पड़ि गेला। देखैमे नान्हि-नान्हिटा मुदा छाँह जकाँ छोड़ैले तैयार नहि। मनमे जोर मारलकैन जे अपने जिनगी भरि नोकरी केलौं। बेटो-पुतोहु–दुनू इंजीनियर–अनके नोकरी करैए आ अपने नोकर रक्खू। जहन ड्यूटी करै छेलौं, बेसी तलब उठबै छेलौं तहन नोकरे ने रखलौं। कारणो छल जे पत्नी थेहगर छेली आ बेटो-पुतोहुक आशा छल। सरस्‍वती थोड़े बुझै छेली जे बुढ़ाड़ी एहेन हएत। आइ-काल्हि नोकर केते महग भऽ गेल अछि से थोड़े बुझै छैथ। तकलीफ हेतैन तँ बजबे करती। भलेँ हमरा बुते पुरौल हुअए वा नहि। पहिले जकाँ पाँच-रूपैआ-दस-रूपैआमे नोकर भेटत? तहूमे बाल-बोधकेँ थोड़े रखि सकै छी। अनेरे लेनी-के-देनी पड़त। घरक सुख जहलमे भेटत। जँ सिआन राखब तँ तीन हजारसँ कम लेत? तहूमे कि कोनो स्कूल-कौलेज आकि मि‍ल-फैक्टरीक नोकरी हेतइ। घरमे काज करत तँ खाइले नै देबै से हएत? तहूमे नीक-निकुत बेसी वएह खाएत। तेहेन समए आबि गेल जे कहीं सम्‍पैते ने दुनू बेकतीक जानो लऽ लिअए! ..जानपर नजैर पड़िते शंकरक आँखि ढबढबाए लगलैन। जाने नइ तँ जहान की? ..जहिना वीणाक तार टुटलापर अवाज खनखना कऽ निकलै छै तहिना टुटल जिनगीक स्वरमे शंकर कुमार सरस्‍वतीकेँ कहलखिन-
अहाँक मन असकताइत अछि तँ पड़ू। कहुना-कहुना कऽ क्षुधा तृप्त करै-जोकर अपनेसँ टभका लइ छी।  
मने-मन सरस्वती बजली-  
केना जीब?”
¦¦
शब्‍द संख्‍या : 1039 
अर्द्धांगिनी लधु कथा संग्रहक दोसर संस्‍करणसँ साभार...।

Wednesday, October 19, 2016

जगदीश प्रसाद मण्‍डल :: संक्षिप्‍त परिचय (साहित्‍यिक)

जगदीश प्रसाद मण्‍डल :: संक्षिप्‍त परिचय (साहित्‍यिक)
जन्‍म : 5 जुलाई 1947., पिताक नाओं : स्‍व. ल्‍लू मण्‍डलमाताक नाओं :   स्‍व. मकोबती देवी। पत्नी : श्रीमती रामसखी देवी।
पता : मूलगाम- बेरमा, भाया- तमुरिया, प्रखण्‍ड- लखनौर, जिला- मधुबनी, (बिहार) पिन : 847410,
मो. 9931654742, 9570938611.
मातृक : मनसारा, भाया- घनश्‍यामपुर, जिला- दरभंगा
जीवि‍कोपार्जन : कृषि (मुख्‍यत: तरकारी खेती)
शिक्षा : एम.. द्वय (हिन्‍दी, राजनीति शास्‍त्र)
साहित्‍य लेखन : 2001 ईस्‍वीक पछाइतसँ...
सम्‍मान/ पुरस्‍कार : टैगोर लिटिरेचर एवार्ड’, ‘विदेह भाषा सम्‍मान’, विदेह बाल साहित्‍य पुरस्‍कार’, वैदेह सम्‍मान तथा कौशिकी साहित्‍य सम्‍मान।
मौलिक रचना :
गीत संग्रह : 1. गीतांजलि, 2. सुखाएल पोखरि‍क जाइठ, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता।
कविता संग्रह : 5. इंद्रधनुषी अकास, 6. राति‍-दि, 7. सतबेध।
एकांकी संचयन : 8. पंचवटी।
नाटक : 9. मिथिलाक बेटी, 10. कम्‍प्रोमाइज, 11. झमेलिया बिआह, 12. रत्नाकर डकैत, 13. स्‍वयंवर।
उपन्‍यास : 14. मौलाइल गाछक फूल, 15. उत्‍थान-पतन, 16. जिनगीक जीत, 17. जीवन-मरण, 18. जीवन संघर्ष, 19. नै धाड़ैए, 20. बड़की बहि, 21. भादवक आठ अन्‍हार, 22. सधबा-विधवा, 23. ठूठ गाछ।
एकांकी : 24. कल्‍याणी, 25. सतमाए, 26. समझौता, 27. तामक तमघैल, 28. बीरांगना।
विहैन कथा संग्रह : 29. तरेगन, 30. बजन्‍ता-बुझन्‍ता।
दीर्घ कथा संग्रह : 31. शंभुदास, 32. रटनी खढ़।
लघु कथा संग्रह : 33. गामक जिनगी, 34. अर्द्धांगिनी, 35. सतभैंया पोखरि, 36. गामक शकल-सूरत, 37. अपन मन अपन धन, 38. समरथाइक भूत, 39. अप्‍पन-बीरान, 40. बाल गोपाल, 41. भकमोड़, 42. उलबा चाउर, 43. पतझाड़, 44. लजबि‍जी, 45. उकड़ू समय, 46. मधुमाछी, 47. पसेनाक धरम, 48. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 49. फलहार, 50. खसैत गाछ, 51. एगच्‍छा आमक गाछ, 52. शुभचिन्‍तक, 53. गाछपर सँ खसला, 54. डभियाएल गाम, 55. गुलेती दास, 56. मुड़ियाएल घर