Pages

Wednesday, July 5, 2017

भूतलग्‍गू आकि भविसलग्‍गू

जेठ मास। पाँच बजे बेरुका समय। मधुबनीसँ अबिते रही कि गामक कातेमे नेबुआवाली भौजी भेटली। बिस्‍टौल हाट जाइ छेली। सोम आ शुक्र दिनकेँ हाट लगैए। आइ शुक्र छी। भेटते बजली-
कनी साइकिल ठाढ़ करू।
ओना साइकिल नीक जकाँ ठाढ़ नइ केलौं मुदा जखने भौजी नजैरपर पड़ली तखनेसँ साइकिलक चालि थोड़ेक असथिर काइये देने छेलिऐ। बजलौं-
साइकिल ठाढ़ करैले किए कहलौं?”
साइकिलेपर चढ़ल रहलौं मुदा एकटा पएर रोपि ठाढ़ भेलौं। ठाढ़ होइते भौजी बजली-
घरवालीकेँ भूत लगल अछि आ अपने साइकिलपर चढ़ि छिरहारा खेलाइ छी!”
ओना, नेबुआवाली भैजीकेँ नइ बुझल छेलैन जे मधुबनीसँ अबै छी। किए तँ जहिना गाम-घरमे धोती-कुर्ता पहिरने आ कान्‍हपर तौनी रखै छी, तहिना झंझारपुरो-मधुबनी जाइ छी तँ रहैए, तँए भरिसक भौजी नहि बुझि पेली जे मधुबनीसँ अबै छी। ओना एक तँ साइकिलोक चालिसँ आ दोसर समैयोक हिसाबे देह-हाथ नइ घमाएल छल आकि चाइनपर सँ पसेनाक धार नइ बहै छल सेहो बात नहि, बहिते छल। मुदा तैपर भौजीक नजैर ऐ दुआरे नइ गेलैन जे रौदक चालिमे अपनो देह घमाएले छेलैन।
भिनसुरका कोर्ट चलैए, चारि बजे भोरे उठि तैयार भऽ मधुबनी गेल छेलौं। आ कोर्ट उसरला पछाइत अढ़ाइ बजेमे ऐगला तारीख लैत मुंशीजी सँ गप-सप्‍प करैत तीन बाजि गेल छल। सबा तीन बजे मधुबनीसँ विदा भेल छेलौं। ओना, कोर्टक काज ढीले-ढाल चलैए तँए मनमे कोनो तरहक तेहेन बातो नहियेँ छल जे मन केम्‍हरो घुसकैत-फुसकैत। असथिर छेलौंहे। ओना मनो घुसकै-फुसकैक कारण होइए जे कोर्टेसँ केकरो धनो भेटै छै आ केकरो जीवनो जाइते छै, मुदा से नहि अपन पैंतीस साल पुरान अगिलग्‍गी (436) केस अछि। जइ समैमे केस भेल ओइ समए खेत-पथारक झंझट गाम-गाममे पसरल छल। ओना, खेत-पथारक झंझट अखनो नइ अछि सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। अखनो अछिए, जँ से नहि अछि तँ जे छेहा गरीब अछिमाने जेकरा एको धुर अपना नामे जमीन नइ छैओकरा सरकारी घरो कहाँ छइ।
आने गाम जकाँ हमरो गाममे बहरबैया जमीनदारक जमीनपर झंझट भेल। दखल-दिहानीक दौड़मे अगिलग्‍गी केस भेल। जमीनमे टाट-फरक ठाढ़ कए जमीनदारक लगुआ-भगुआक द्वारा आगि लगौल गेल छल, जइ लगबैमे हम-सभ फँसौल गेल छेलौं। तीस आदमीक ऊपर केस भेल छल। तइ बीच जमीनक सभ दशा सेहो भेल। मुदा केस कचहरीमे लटकले अछि। सालमे दू बेर तारीख लइ छी आ मधुबनी जाइ-अबै छी। ओना, मधुबनी गेलापर बहुत बात मन पड़ैए। मन पड़ैए टीशन कातक होटल, मन पड़ैए कोर्टसँ जहल आ जहलसँ कोर्ट अबै-जाइ काल गाड़ीमे सिपाहीक पहरा, मन पड़ैए जही कोर्टसँ जहल जाइ छेलौं तेही कोर्टसँ छुटि कऽ अबितो छेलौं...।
ओना, जइ समए केस भेल छल तइ समैक स्‍थिति आ अखुनका स्‍थितिमे बहुत बदलाउ आबि गेल अछि। माने ई जे ओइ समैमे अगिलग्‍गी केसक बहुत महत छल। मास-मास, तीन-तीन मास केसक जमानत नइ होइ छल आ सेशन केसक रूपमे ओकर तहकीकात सेहो होइ छल मुदा आब से नहि रहल। ने अगिलग्‍गी केसे बेसी होइए आ ने ओइ रूपे ओकर तहकीकाते होइए। समए बदलने आब अपहरण आ राहजनीक घटना बढ़ि गेल अछि। आब एकर महत बढ़ि गेल अछि।
पैंतीस सालक बीच केस सेहो मधुबनी-झंझारपुर तीन केलक। तीन बेर करैक कारण भेल जे झंझारपुरमे कोर्ट बढ़ने (सेशन कोर्ट) मधुबनी कोर्टसँ केस झंझारपुर आबि गेल। मुदा किछुए दिनक पछाइत पुन: केस मधुबनी चलि गेल। तेकर कारण भेल साल भरिसँ सेशन कोर्ट खाली रहल, जजक अनुपस्‍थिति रहल। ओना मधुबनियोँ कोर्टक हालत तेहने रहल। अधिकतर कोर्ट जजक अनुपस्‍थितिमे खालीए रहौ लगल आ अखनो अछिए। मुदा किछु अछि तैयो ने कोर्ट हरदा बाजल अछि आ ने अपने हरदा बजलौं अछि।
नेबुआवाली भौजीक संग सम्‍बन्‍ध[1] बहुत पुरान नहियेँ अछि, हाले-सालक माने आठे-नअ बर्खक अछि। ओना सिंहेश्‍वर भाइक संग भैयारीक सम्‍बन्‍ध बच्‍चेसँ अछि, करीब पचास-पचपन बर्खसँ मुदा जहिया नेबुआवाली भौजी एली (दुरागमनक पछाइत) तहियासँ करीब बीस-पचीस बर्ख तक, दियर-भौजाइक जे सम्‍बन्‍ध अखन बनि गेल अछि, से नहियेँ छल। ओना टोका-टोकी कोनो काजे नइ होइत छल सेहो बात नहियेँ रहल अछि, मुदा ओ परिवारिक काजक अनुकूल रहल। असल दियर-भौजाइक बीच जे बेकता-बेकती सिनेह-सिक्‍त सम्‍बन्‍ध हेबा चाही ओ आठ-नअ बर्खसँ अछि। हुनको देहक समरथाइ निच्‍चाँ मुहेँ उतैर गेल छैन आ अपनो तँ सहजे उतरले अछि।
ओना, आठे-नअ बर्खक सम्‍बन्‍धमे भौजियो हमरा चीन्‍हि नेने छैथ आ हमहूँ हुनका नीक जकॉं चीन्‍हि नेने छिऐन। मुदा ओ अपना जगहपर चिन्‍हारए अछि। बजै-भुकैमे अरबा चाउरक बसिया भात जकॉं नेबुआवाली भौजी कनी बेसी फरहर छथिए। तँए मनमे बेसी झॉंट-बिहाड़ि नहियेँ उठल। माने ई जे नेबुआवाली भौजी जे बजली घरवालीकेँ भूत लगल अछि आ अपने छिड़हारा खेलाइ छी। तँए मन बेसी आगू-पाछू नइ भेल मुदा कनी-मनी झॉंट तँ मनमे लगबे कएल। झॉंट ई लगल जे उपकैर कऽ एना किए नेबुआवाली भौजी बजली? जँ परिवारक बात छी तँ ई ने कहक चाही छेलैन जे केते कालसँ घरसँ बहराएल छी। अनेरे तँ सभ बात सोझहामे आबि जाइत। मुदा घरवालीकेँ भूत लगल अछि, एहेन बात किए बजली? खाएर..। मनकेँ थतमारि बात बदलैत पुछलयैन-
एते रौदमे केतए जाइ छी?”
नेबुआवाली भौजी बजली-
कनी हाटपर जाइ छी। तेहेन ने रौदियाह समए भऽ गेल अछि जे तीमन-तरकारी दुआरे काल्‍हि रातिमे अँचारे संगे रोटी खेलौं।
ओना भौजीक बोल तेलमे डुमल तीन सलिया आमक अँचार जकॉं सोहनगर अखनो बुझि पड़ै छल, मुदा परिवारक बात सुनि मन कनी खसिये रहल छल। बजलौं-
की करबै, समैये जखन एहेन रौदियाह भऽ गेल तखन दोसर उपाइये की अछि।
कहि साइकिल आगू बढ़ेलौं। नेबुआवाली भौजी सेहो उत्तर मुहेँ हाट दिस बढ़ली।
ओना, मनमे कनी-कनी बिनबिनी उठिये रहल छल, जे कनी खरियारि कऽ आरो आगू-पाछूक बात पुछि लितिऐन मुदा चीन्‍हल लोक नेबुआवाली छथिए जे तिलकेँ तार आ झूठकेँ सत्‍ बनबैमे हजार बेर किए ने बोलीक वाणी बदलैक जरूरत पड़ैन, ओ मुहे-मुहीं बदैल लइते छैथ, तँए मनमे जेहेन मर्मक स्‍थिति बनक चाही, से नहियेँ बनल।
लग्‍गी भरि जखन आगू बढ़लौं तखन मनमे उपकल जे एकबेर पाछू उनैट भौजीकेँ आरो बात पुछिऐन, मुदा दोसर मन पहिल मनकेँ रोकलक। रोकलक ई जे जखन भरि दिनक बहराएल छी तइ बीचमे जँ कियो किछु तेहेन बात पत्नीकेँ कहि देने हेतैन आ ओ बजैत-बजैत बताहिक रूप बना नेने हेती, सएह रूप देख जँ नेबुआवाली भौजी बाजल हेती तखन किछु अंशमे सहियो तँ भेबे कएल। ओना विचारक दौड़मे से नहि भेल, किए तँ तत्त्वदर्शी चिन्‍तक क्षणेमे छतपर चढ़ि जाइ छैथ आ पलेमे पताल पहुँच जाइ छैथ...। मने-मन विचारितो रही आ साइकिलो चलिते रहल।
चारि लग्‍गी आगू बढ़ैत-बढ़ैत मन पत्नीक नैहर दिस बढ़ि गेल। नैहर दिस बढ़िते मनमे भेल जे जँ पत्नी भूतलग्‍गू रहितैथ तँ नैहरेसँ लगैत आएल रहितैन। मुदा से कहाँ कहियो लगलैन? लगले भेल जे रौदमे चालीस किलो मीटर साइकिलसँ एलौं हेन, भरिसक तइसँ चेहराक रूप बदैल गेल अछि तँए चिक्कारीमे ने तँ नेबुआवाली भौजी बजली? ओना, चारू दिस नजैर खिड़ाबी जे कोनो दोसरो-तेसरो कारण तँ नइ ने अछि। मुदा से कोनो गरेपर ने चढ़ए।
नैहरसँ पत्नीकेँ सासुर एला कहुना-कहुना तँ तीस-पैंतीस बर्ख भाइये गेल हेतैन, तैबीच जेते धिया-पुता हेबा चाही सेहो भाइये गेलैन। कहियो किछु ने देखलौं। तखन किए नेबुआवाली भौजी कहली..! मन उनटल। उनैटते उठल- समाजमे एहनो लोकक तँ कमी नहियेँ अछि जे चाहे पति-पत्नीक बीच हुअए आकि भाइ-भाइक बीच आकि दियादिनी-दियादिनीक बीच वा बाप-बेटाक बीच झूठ-फूस बात गढ़ि मतभेद नइ पैदा करैए। करिते अछि आ खूब करैए। समाजो तँ समाज छी किने, केकरो मुँह छै तँ नॉंगैर नहि, आ केकरो नॉंगैर छै तँ मुँह नहि, मुदा तैयो घरक धारण नइ केने अछि सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए।
थोड़ेक आगू बढ़लौं कि धक-दे मनमे उठल। जेठ मास छी दशराहा परसुए भेल। भूत-प्रेतक बास गाछी-बिरछीमे होइ छइ। अखन तँ दू माससँ सभ गाछी-बिरछीमे आम-जामुनक ओगरवाह बैसले हएत, तखन तँ भूतो-प्रेत ने ओगरवाहक डरे पड़ा गेल हएत। ओना, जखन आम-जामुन गाछमे लटकल रहैए आ ओगरवाह बीच गाछीमे मचान बना जगलो रहैए आ सुतलो रहैए तखन कहाँ केकरो भूत लगै छइ? जखन आम-जामुन गाछी-बिरछीमे नइ रहल तखन पतखरड़नी सभकेँ कहियो काल बँसबिट्टीमे चुड़ीन-तुड़ीन लगितो अछि, मुदा सेहो मास तँ नहियेँ छी..!
केतबो मनकेँ असथिर करी तैयो किछु-ने-किछु उपकिये जाए। अपना घरसँ कनी पाछूए रही कि मनमे फेर उठल- जँ कहीं नेबुआवाली भौजी झुठे कहने हेती, तखन? फेर लगले भेल जे भूतो तँ भूत छी, कोनो कि एक्के रंगक आकि एक्केटा अछि। रंग-बिरंगक अछि। मुदा कोन रंगक अछि ओ तँ देखला-बुझला पछातिये फरिछाएत, तइले अनेरे मनकेँ भरियौने छी। मन हल्‍लुक होइते लोकक मनकेँ मन देखए लगल। लोकक मनपर मन पड़िते मन थीर भेल। थीर होइते उठल- कहूसमए ओते आगू बढ़ि गेल जे लोक अँगनाक मड़बासँ ऊपर उठि हवाइये जहाजमे बिआहो करैए, भोजो-भात करैएमुदा गाम-घरमे अखनो भूत-प्रेत लगिते छइ! एक्कैसमियो सदीमे जँ अहिना भूतमे लोक भुतियाइत रहत तखन ओझा-गुनी केतए-सँ औत। मन ठमैक गेल।
ठमैकते मनमे उठल, परसू जेठक दशराहा छल। एक तँ तीन माससँ एको बून पानि नहि पड़ल, ओहिना वायुमण्डल गर्म अछि, तैपर रौदो तेहेन होइए जे माटिक रस तेना चुइस नेने अछि जे रसे-बेरस भऽ गेल छइ। दिनक दसे बजेसँ बाध-बोनमे लू चलए लगै छइ। भऽ सकैए जे कोनो काजे पत्नी बाध दिस गेल हेती आ लू-तू पकैड़ नेने होनि जइसँ मन गरमा गेल होनि आ बताहि जकाँ आकि भूतलग्‍गू जकाँ बोलीक बानि भऽ गेल होनि। किएक तँ मौसमक हिसाबसँ सभ किछु नहियोँ तैयो बहुत किछु तँ बदलियो जाइए। ओना, मौसमो-मौसमोक अपन-अपन चालि-प्रकृति छइ। बरसातक पछाइत जे स्‍वाती नक्षत्र अबैए आ ओकर जे बून छै ओ जँ केराक मुँहपर पड़त तँ कपूर बनत, सिप्‍पीक मुँहपर पड़त तँ मोती बनत आ साँपक मुँहपर पड़त तँ बीखे बनत किने। भलेँ एक्के नक्षत्र आ एक्के बर्खाक बून किए ने हौउ। तहिना ने जाड़क पछातिक मौसमक बून आकि गरमीक पछातिक मौसमक बूनमे सेहो अन्‍तर हेबे करत..?
रंग-रंगक विचार मनमे उठिये रहल छल ता घर लग पहुँच गेलौं आ पत्नीकेँ दलानक आगूमे ठाढ़ देखलयैन। चुप-चाप ठाढ़ छेली तँए बोलक बाइनिक कोनो आभास नहियेँ भेल। ओना, अखन धरिक जिनगीमे दुनू परानीक बीचक जे सम्‍बन्‍ध रहल अछि ओइमे कहियो कोनो खटास नहियेँ आएल अछि जइसँ कोनो छोटो-क्षीण अबिसवास जगैत। ओना, वैचारिक रूपमे कहियो काल विचार-भेद जरूर होइए मुदा ओकर समाधान तँ परिवारक चलैत जिनगीक धारक क्रियाक रूपमे भाइये जाइए।
हमरा देखते पत्नी बजली- 
एते रौदमे किए चललौं। कनीकाल मधबनियेँमे बिलैम जाइतौं से नहि?”
ओना मने नहि देहो-हाथ थकियाएले छल तँए जेहेन उत्तर पत्नीकेँ दिअक चाही से नइ दऽ पेलिऐन। मनमे छल जे कहिऐन- जँ लोक जाड़क डरे आकि रौदक डरे आकि झाँट-पानिक डरे घरसँ निकलबे छोड़ि दिअए तखन ओकर जिनगीक गाड़ी केना चलतै। ओना, ई दीगर अछि जे जखन समय असहज भऽ जाइए तखन ओकर अनुकूल लोक अपन जिनगीकेँ धड़ियबैत चलैए। मुदा से नहि, हारल सिपाही जकाँ अपनाकेँ समरपित करैत कहलयैन-
आब कि कोट-कचहरीमे एको क्षण रहैक मन होइए, तहूमे मधुबनीमे। जेतेकाल काज छल तेतेकाल काजमे हेराएल छेलौं। काज होइते पड़ेलौं।
ओना आन स्‍त्रीगण जकॉं पत्नी गपकेँ बेसी नहि नमरा बजली-
कनी काल छाहैरमे ठंढा लिअ, पछाइत किछु खाइयो-पीब लेब चाहे पहिने नहाइये लेब।
ओना मनमे नेबुआवाली भौजीक गप नचैत रहए। मुदा अगुआ कऽ बाजबो तँ नीक नहियेँ होइत। पत्नीक विचार हुनके मुहेँ किए ने सुनब जे आन स्‍त्रीगणक मुँहक बाते जँ दुनू परानीमे झगड़े भऽ जाए, सेहो केहेन हएत। तँए मनकेँ थतमारि कऽ राखबे नीक बुझलौं। ओना, मनमे ईहो हुअए जे नेबुआवाली भौजी जे भूत लागब कहने छली आ जँ लगल हेतैन तँ बोलिये वाणीसँ ने बुझि जाएब।
कुरता-गंजी निकालि रौदमे दैत पत्नीकेँ कहलयैन-
कनी पंखा नेने आउ।
ऑंगनसँ पंखा आनि पत्नी ठाढ़े-ठाढ़ चलबए लगली। दसे हौंकैनमे मन शान्‍त भऽ गेल। मन शान्‍त होइते बजलौं-
नेहेनाइ तँ अछिए मुदा पहिने पानि पीब, चाह पीब आ पान खाएब तेकर पछाइत बुझल जेतइ।
बड़बढ़ियाँ कहि पत्नी ऑंगन दिस बढ़ि गेली।
ओना, नेबुआवाली भौजीक विचार मुहसँ निकलैले धानक गम्‍हरा जकॉं घोघमे तरतर करैत छल मुदा अपन थकानो आ चालिक गरमियोँसँ गप-सप्‍प करैक इच्‍छा मनमे नइ होइत रहए। ओना पत्नीक मुँहक चुहचुहीसँ बुझि पड़ै छल जे किछु बात पेटमे एहेन छैन जे बजैले लुस-फुसा रहली अछि मुदा हमरा रौदाएल बुझि ऐ दुआरे ओकरा पेटमे थतमारि कऽ रखने छैथ। भऽ सकैए मनमे ई होइत हेतैन जे रौदाएलमे कहने गरमाएलमे जँ कहीं बुझैयेमे तल-विचल भऽ जेतैन आकि अपन बजैयेमे भऽ जाएत तखन तँ ओकर अरथो अनर्थ हएत। जइसँ उत्तरो ओहने हएत। नीक उत्तर तँ तखन भेटैए जखन ओकर चारू कोण समगम रहल। किए तँ अही दुनियॉंमे ने रहैयोक अछि जइ दुनियॉंमे चारू कोणक लोक अछि।
ओना बेसी उमेर भेला पछातियो पत्नीक देहक पानि अखनो ओहने जलजलौ छैन जेहेन एहेन उमेरक हेबा चाही। मोटा-मोटी यएह बुझू जे देहमे आसकैत ओते नइ छैन जेते आन बत-बनौन स्‍त्रीगणमे रहैए।
चुल्‍हिपर चाहक केतली चढ़ा ऑंचकेँ नीक जकॉं लगा लोटामे पानि नेने पत्नी पहुँचली। ओना, अपन मन रहए जे ठेहुनसँ निच्‍चो आ भरि बाँहि पहिने धोइ ली जे थाकैन मारक होइए, मुदा मन असकता गेल। पत्नीक हाथसँ लोटा लऽ दू बेर कुर्रा केलौं आ भरि छॉंक पानि पीलौं। तैबीच पत्नियोँ चाह नेने पहुँचली। एक गिलास चाह पीब पत्नीकेँ चाबस्‍सी दैत बजलौं-
जेहने चाह पीबैक इच्‍छा छल तेहने बनेबो केलौं!”
ओना, चाह आने दिन जकॉं छल मुदा देहक थकानक भूख बढ़ने वस्‍तुक (पीबैक) सुआद सेहो बढ़ाइये देने छल मुदा पत्नीकेँ बातक उन्‍टा अर्थ लागि गेलैन। उन्‍टा अर्थ ई जे हम तँ चाहक सुआद पेब बाजल रही मुदा पत्नीकेँ भेलैन जे व्‍यंग्‍य स्‍वरूप बजला। मुदा लगले ईहो होनि जे जखन सभ दिन अही चुल्‍हीपर अही हाथे चाह बनबैत आबि रहल छी तखन आन दिन की इच्‍छा नइ भरै छेलैन जे एना बजला? मुदा अपन जे विचार पतिकेँ कहैक रहैन ओइ आगू एकरा (माने चाहक गपकेँ) तुच्‍छ बुझलैन तँए मने-मन दबैत बजली-
हाथमे कि पाँचो ओंगरी एके-रंग अछि, तहिना ने पाँच दिनमे पॉंचो रंगक चाह तँ भाइये सकैए। अहाँकेँ केहेन चाह पीबैक मन अछि आ हमरा केहेन चाह बनबैक विचार अछि ओ गुम्‍मा-गुम्‍मीसँ थोड़े काज चलत। जँ सएह छल तँ कहि दइतौं जे कनी बेसी लीकरे आकि कोनो आने वस्‍तु बेसी करि कऽ आकि कम करि कऽ देबइ।
पत्नीक झपटसँ बुझि पड़ल जे जाबे अपनो ओहने नइ बनब ताबे ठीक-ठीक काज चलैबला नहि अछि। चाह पीब पान खा नेने छेलौं। बजलौं-
गामक हाल-चाल नीक अछि किने?”
गामक हाल-चाल सुनि पत्नीक मनमे जेना दुपहरियाक बात नाचि उठलैन। बजली-
नाँहकमे सौंसे गामसँ झगड़ा भऽ गेल!”
पत्नीक बात सुनि मनमे उठल जे कोनो समाजिक बात जरूर अछि। जँ से नहि रहैत तँ एक गोरेसँ ने झगड़ा होइतैन। सौंसे गामसँ किए भऽ गेलैन। मुदा प्रश्‍नक जड़िमे केतौ-ने-केतौ समाजक धारा जरूर छीपल अछि तँए समाजिक धारामे तँ नहि, मुदा मजकियल धारामे बजलौं-
सौंसे गामक लोकसँ झगड़ा केलौं आ झोंट ओहिना देखै छी, तखन झगड़े की भेल?”
खिसिया कऽ पत्नी बजली-
से की?”
सोझरबैत बजलौं-
जाबे स्‍त्रीगण झोंटा-झोंटौबैल नइ केलक ताबे ओकर झगड़ाक कोनो मानि नहि। ओ कोनो खेलक सर्ड़ी भेल।
पत्नीक रूप बदललैन। बजली-
भदुआरवाली कुम्‍हैन आएल छेली, परसू दशराहा रहै, लोक अपन-अपन घोड़ा चढ़ौलक। उधारे लोक एक-एकटा घोड़ा कुम्‍हैन ऐठामसँ लऽ अनलक।
बिच्‍चेमे बजा गेल-
मर्रई की भेल! एहेन तँ सभ साल होइते अछि।  
सम्‍हारैत पत्नी बजली-
सभ दिनसँ घोड़ाक दाम तँइ छल, जइ हिसाबे आन साल दइ छेलखिन।
बजलौं-
ऐ बेर की भेल?”
पत्नी बजली-
भदुआरवाली कुम्‍हैन अरि कऽ ठाढ़ भऽ गेली जे आब सभ किछु महग भऽ गेल, हमरो रंग-टीप करैमे खरच बढ़ि गेल अछि, तँए ओइ हिसाबे घोड़ाक दाम लेब।
पत्नीक बात सुनि मन हूमरल। मनकेँ हुमैरते विचार गुम्‍हरल। बजलौं-
ई तँ उचिते भेल।
उचित सुनि पत्नी छड़ैप कऽ बजली-
हमहूँ तँ सएह कहलिऐ। मुदा एक दिस ठाढ़ीवाली, ननौरवाली आ तमोरियावाली भऽ गेली आ दोसर दिस नेबुआवाली आ धेपुरावाली भऽ गेली। दुनू दिससँ कौआ जकॉं लूझए लगली।
बजलौं-
पछाइत की भेल?”
पत्नी बजली-
तामसमे कहा गेल जे तोरा सभकेँ भूत खिहारने छह, तँए भुतियाएल छह।
पत्नीक बात सुनि मनमे भेल जे भरिसक अहीक उपराग नेबुआवाली देने छेली।
शब्‍द संख्‍या : 2470, तिथि : 23 जून 2017


[1] दियर-भौजाइक

मर्माहत, कथाकार : जगदीशप्रसादमण्‍डल, Jagdish Prasad Mandal

जोगारी भायकेँ गामक सभ जनै छैन जे ओ ओहन लोक छैथ जे अपन जिनगी चलबैक सभ जोगार अपने रखने छैथ। जहिना कुशल किसान अपना खुट्टापर बरद-महींसक संग खेतीक सभ समचा–माने हर-कोदारि, खुरपी-हँसुआसँ लऽ कऽ टेंगारी-कुरहैर होइत दमकल-बोरिंग तक–अपना हाथमे रखि नियमित जिनगी बना, नियमवद्ध चलै छैथ तहिना जोगारी भाय सेहो छथिए। जखन दुनियॉंक बीच मनुख बनि जीवन धारण केलौं तखन जँ अपन जिनगी समेट चलैक तँ दोसरोक सेवा नइ भेल तखन भक्‍ति की आ भजन की? आ जँ भक्‍ति-भजन करैत जिनगी नइ चलल तखन जिनगिये की। जिनगीक लेल जे आवश्‍यकता अछि, आवश्‍यकता अछि जिनगीक अनुकूल, माने ई जे केहेन जिनगी बना चलए चाहै छी। जेहेन जिनगी रहत ओइ अनुकूल ओकर आवश्‍यकता सेहो अछिए।
चालीस बर्ख पूर्व जोगारी भाय तीन कट्ठा बँसवारि लगौलैन। पिताक देल जे बँसवारि छेलैन ओ ताम-कोर आ ताक-हेरक दुआरे उपैट जकॉं गेल छेलैन। जइसँ अपन आवश्‍यकता पूर्ति होइक संभावना नइ देखलैन। बाँसक खगतो तँ कम नहियेँ अछि। घर-घरहटसँ लऽ कऽ टाट-फरक, बाड़ी-झाड़ी-ले मचानक संग बरेब-बाड़ी-ले सेहो खगता होइते अछि। तहूमे हम सभ ओहन किसान परिवारमे जन्‍म नेने छी, जइ परिवारमे बॉंस उपजबैक साधन–माने जमीनसेहो अछिए। बॉंस-गाछी गामक ओहन जमीनक पैदावार छी जे ऊँचरस हुअए। बाढ़ि-बर्खाक इलाका अपन छीहे जैठाम गामक आधासँ बेसी जमीन या तँ चौरी अछि वा ओहन नीचरस जमीन अछि, जइमे बॉंस गाछ नइ लागि सकैए। बॉंस ओहन खेतक पैदावार छी जे घराड़ीक सदृश हुअए। जइ गाममे घर बनबैले जमीन सभकेँ नइ छै तइ गाममे बॉंस-गाछ लगबैक जोगार केतए-सँ औत। जोगारी भायकेँ से नइ छैलैन। पुरना बँसवारि तीन-चारि साल रखि तैबीच ओइसँ काज चलौलैन, ओना सभ काज ओइ पुरना बँसवारिसँ नइ चलै छेलैन मुदा तैयो बिकरी-बट्टा नइ भेने अपन काज तँ चलिते छेलैन। ओना बँसवारि निच्‍चॉं मुहेँ हहैरिये रहल छल जइसँ आगू बाधा उपस्‍थित हेबे करतैन। यएह सोचि जोगारी भाय नवका बँसवारि लगबैक विचार केलैन।
जुड़शीतल पाबैन, चैत-बैशाखक बीचक सिमान छीहे। जहिना चैतक गाछी आ माघक बाछी निरोग होइए तहिना बॉंसो अछिए। जेहेन बॉंस रोपल जाइए ओइमे नव बॉंसक कोंपर सेहो निकैलते अछि। रोपला पछाइत जँ नियमित ओकर पटौनी होइ तँ ओ अपन कोंपरकेँ जोगा नव बॉंसक रूपमे ठाढ़ करबे करैए। लोटा-बाल्‍टीसँ लोक गाछी-कलममे जलधार करिते छैथ मुदा तुलसी सन छोट गाछ-ले जँ एक कलश–माने एक डाबा–पानिक खगता प्रतिदिन होइ छै तैठाम नमहर गाछ-ले तँ ओइसँ बेसी खगता हेबे करत। ओना, तुलसीक छोट गाछ होइ छै, जइसँ ओकर मुसरो आ सिरो सभ धरतीक ऊपरके परतमे रहैए। जमीनक ऊपरका हाल[1] जे चाहे तँ निच्‍चॉं मुहेँ ससैर जाइए वा सुखिये जाइए जइसँ माटि बेरस भाइये जाइए। बेरस भेने सुखैक संभावना सेहो भाइये जाइ छइ। मुदा नमहर गाछक मुसरो आ सिरो तँ बेसी तर[2] तक जाइते अछि तँए ओइसँ बेसी (माने तुलसीसँ बेसी) जीबैक संभावना रहिते अछि तँए जँ एक लोटा पानि ओकरा[3] जड़िमे जुड़शीतल पाबैन दिन पड़ौ वा नहि पड़ौ, ओइसँ ओकर कोनो हर्ख-विस्‍मय नहियेँ होइ छै मुदा तैयौ किसान अपन पाबनिक विधान, नइ पान तँ पानक डन्‍टियोसँ पुरबैक विचारानुकूल एक लोटा जलधार करिते अछि।
ओना आइ जुड़शीतल पाबैन छी, तँए किसान परिवारमे आरो बेसी काज अछिए। काजक हिसाबे औझुका दिन[4] छोट पड़ि जाइए। किए तँ भोरे सुति उठि गाछी-कलम, बाड़ी-झाड़ीकेँ जुड़बैतमाने जलधार करैत–माल-जालकेँ नहौनाइ-धोनाइसँ लऽ कऽ घरक केबाड़, बक्‍सा-बुक्‍सीकेँ धोनाइक संग-संग ऑंगन-घरक रस्‍ता-पेरा जुड़ौनाइक संग पोखरिक घाट आ इनारकेँ सेहो उराहब रहिते अछि। तैसंग चैतक रान्‍हल बैशाखमे खा कऽ पुरौनाइ सेहो अछिए। तेतबे किए, समाजक संग महादेव-पार्वतीक नाच, जय शिव-जय शिव करैत सौंसे गाम घुमनाइ सेहो अछिए। एते तँ एक उखड़ाहाक–माने दुपहरसँ पहिनुक–भेल, दोसर उखड़ाहाक तँ पछुआएले अछि जेकरा सॉंझ धरि पुरबैक अछि। ई तँ भेल पहिल प्रकरण, दोसर प्रकरण तँ तेते नमहर अछि जे सॉंझ तक पुराएबो कठिन। ओ अछि किसानी जिनगीक उपद्रवी जानवरक शिकार सभकेँ गामक बोन-झाड़सँ रेबाड़ि-रेबाड़ि सीमा टपा-टपा भगाएब। तहूमे जँ सीमा टपबैकाल दोसर गामक शिकारीक संग भिड़ानी भऽ गेल तखन तँ आरो बेठेकान काज भऽ गेल। मुदा जे हुअए, जोगारी भाय मनमे ओही दिन रोपि लेलैन जे जहिया बॉंस रोपैक मुहूर्त बनत तहिया तीन कट्ठा बॉंस जरूर रोपब। ओना बॉंस रोपैक मुहूर्त जुड़ेशीतल पाबैन दिनटा नहि छी ओइसँ पहिने ओते दिन अछि जेते ओकर पछातिक अछि। दुनू कातक पलड़ामे दू परिस्‍थिति सेहो अछिए। एक दिस जँ पानिक (पटौनीक) खगता कम अछि तँ दोसर दिस पानिक खगता ओते बेसी अछि। यएह सोचि जोगारी भाय तँइ कऽ लेलैन जे जुड़शीतल पाबैन दिन किसानीक आन काज छोड़ि पाबैन मनबैत तीन कट्ठा बॉंस रोपब। बॉंस रोपब आकि बँसवारि लगाएब? मुदा अखन तँ ओ बॉंसे रोपब हएत, लगला पछाइत ने ओ बँसवारि हएत। जहिना कोनो वैचारिक संस्‍थाकेँ पहिने विचारमे आनल जाइए पछाइत नीब लेल जाइए। तहिना जोगारी भाय जिनगीक मूल खगताकेँ पहिने मनमे रोपि पूर्तिक विचार ठानि लेलैन।
ओना, बीटमे[5] पुरान-सँ-पुरान पाकल-झुरुरक संग पकि-पकि सुखलो रहबे करैए मुदा वंश वृद्धिक लेल तँ ओहने ने रोपल जाएत जइमे कोंपरक ऑंखि होइ आ रोपला पछाइत ओ कोंपर दिअए। ओहन बॉंस तँ नहियेँ रोपल जाएत जेकर ऑंखिये भथा गेल होइ। पुरना बँसवारिसँ नवका–माने भौर परहक–बॉंस ठिकिया जोगारी भाय पहिनहि रखि नेने छला। चालीसटा बॉंस रोपब छैन, जेकरा बीटसँ उखाड़बोक छैन। नमगर-चौड़गर काज रहितो जोगारी भाइक मनसूबामे मिसियो भरि कमी नहियेँ छेलैन। एते बिसवास बनले छेलैन जे एकटा-एकटाकेँ उखाड़ि रोपलासँ बेसी समैक नोकसानी हएत तँए एक झोंकमे पहिने चालीसोटा उखाड़ि लेब आ दोसर झोंकमे रोपि, तेसर झोंकमे पटौनी करैत सबेर-सकाल घरपर आबि जाएब। सएह केलैन।
आने खेती-बाड़ी जकॉं जोगारी भाइक बँसवारि सेहो नीक छैन्‍हें। पुरना बीटक बॉंस समाप्‍त होइत-होइत जोगारी भाइक नवका बीटक बॉंस शुरू भऽ गेलैन। किसानी जिनगीक तँ नगदी खेती बॉंस छीहे। तहूमे गाम-गाम बजार बनल अछिए। किछुए किसान उपजौनिहार छैथ मुदा खगता तँ सौंसे गाममे रहिते अछि।
अखन तकक जिनगीमे जोगारी भायकेँ बॉंस सहयोगी पूजीक रूपमे संग दइते आबि रहल छेलैन। मुदा दिनो-दिन गमैया बजार टुटए लगल। किछु लोक ईंटाक घर बनौलैन तँए बॉंसक खगता कमल। मुदा तेतबे नहि ने भेल। बॉंसक दोसर जरूरत जे बरेब-बाड़ीमे होइ छल आ बरसाती तरकारीक मचानमे सेहो होइत छल। उहो कमि गेल।
बॉंस लगौलाक पॉंचे बर्खक पछाइत जोगारी भायकेँ नीक बँसवारि बनि गेलैन। ओना बॉंसक बँसवारि हुअए आकि शीशोक शिशबोनी आकि आने गाछक गाछी लगबैक दिनमे लगौनिहारकेँ विशेष जिज्ञासा रहिते अछि मुदा किछुए लगौनिहार ओहन होइ छैथ जे धनबल बुझि ओकर धनि रखै छैथ, बल्‍कि अधिकतर ओहने लगौनिहार होइ छैथ जे एक-झोंकाह होइ छैथ। झोंकाहो कि कोनो एके रंगक अछि। सभ कथुमे, माने सभ काजमे सब रंगक झोंकाह होइते छैथ। जेना देखै छी जे किछु पढ़निहार अपनाकेँ पढ़ाइ दिस तेना झोंकि दइ छैथ जे या तँ दुनियॉंसँ हेरा जाइ छैथ वा दुनियेँ हेरा जाइ छैन। तहिना धन उपारजनमे सेहो किछु गोरे अपनाकेँ तेना झोंकि दइ छैथ जे या तँ भोगीए बनि जाइ छैथ जइसँ नीक-अधलाक विचारे मनसँ हेरा जाइ छैन वा जोगिये बनि जाइ छैथ जे जेतबे दिनमे खगता देखै छैथ ओतबे दिनमे उपारजनो करै छैथ। खाएर जेतए जे अछि मुदा जोगारी भायकेँ से नइ छेलैन। ओ बॉंसकेँ अपन उपयोगी वस्‍तु बुझैत किसानी जिनगीक नगदी पैदावार सेहो बुझै छैथ।
बॉंस रोपलाक तीन सालक पछाइत, जहिना बाबाक अमलदारी अबैत-अबैत मृत्‍युक संभावना मनुखमे आबए लगैए तहिना बॉंसोक तँ अछिए। माने, पुरान बॉंसकेँ बीटसँ निकालब अनिवार्य भाइये जाइए, नहि तँ मनुखे जकॉं भऽ जाएत। माने ई जे जँ पैछलो पीढ़ी बाबा-परबाबा आ तोहूसँ ऊपरका बाबा सभ जँ परिवारमे जीविते रहता तँ ऐगला पीढ़ीक बाढ़िमे बाधा उपस्‍थित भाइये जाइए। तहिना बॉंसोक अछिए। तीन-चारि पीढ़ीक पछाइत जँ बीटसँ पैछला बॉंस निकालल नहि जाएत तँ ऐगला बॉंस प्रभावित होइते अछि। मुदा जोगारी भायकेँ अछैते आमदनी रहितो आमदनीमे खलल पसि गेलैन। खलल ई पैसलैन जे अपन परिवारमे जेते उपयोगक खगता छेलैन ओकर अतिरिक्‍त जे बिकरी-बट्टाक उत्‍पादित वस्‍तु छेलैन, ओइमे कमी एलैन। जइसँ अछैते धनबल रहितो जोगारी भाय धनहीन हुअ लगला। वस्‍तुक हिसाबसँ गाममे लेबाल कमए लगल। जइसँ समुचित लाभमे कमी एलैन। तेकर कारण जे किछु लोककेँ गामसँ बहरेनौं आ बरेब-बाड़ीक काज कमने बॉंसक खगता कमए लगल। दोसर दिस नव-नव योजनाक अन्‍तर्गत सेहो आ किछु लोक अपनो कमा-खटा कऽ पजेबाक घर बनबए लगला तइसँ घर-घरहटमे सेहो बॉंसक काज कमने बॉंसक बिकरीमे मन्‍दी एबे कएल जइसँ जोगारी भाय सेहो प्रभावित भेबे केला।
चालीस बर्खक पछाइत जोगारी भाय दरबज्‍जापर बैस अपन किसानी जिनगीक समीक्षा कऽ रहला अछि। समीक्षा कए रहला अछि जे जिनगीक कोन लाभ बँचल अछि आ कोन हेरा गेल। तइमे सघन बँसवारिक की स्‍थिति अछि...। तही बीच पत्नी आबि बजली-
मन-तन गड़बड़ अछि जे मन्‍हुआएल देखै छी?”
अपन बेथाकेँ छिपबैत जोगारी भाय बजला-
मन्‍हुआएल नइ छी भकुआएल छी। चाह पीलाक पछाइत मन फरहर भऽ जाएत।
पतिक चाहक बात सुनिते फुलकुमारी बजली-
चाहे बना कऽ तँ हम देखए आएल छेलौं जे दरबज्‍जापर छी की नहि।
ओना जोगारी भाइक मनमे पत्नीक बात सुनि कनी-मनी कुवाथ भेबे केलैन। कुवाथ ई भेलैन जे जखन हुनका मनमे शंका भेलैन जे दरबज्‍जापर छैथ की नहि, तखन ओ अनठेकानी चाहे किए बनौली! जँ हम दरबज्‍जापर नइ रहितौं तखन ओ चाह पानियेँ बनैत किने! मुदा लगले मनमे उठलैन, एक तँ हथियारक काटल घाव तैपर जँ नून छीटब तँ ओ बुड़िबकी छोड़ि आरो की हएत। एक तँ ओहिना घावक टीस अछि तैपर जँ नूनक मिस कऽ दिऐ तखन तँ ओ आरो टहकत किने। तइसँ नीक जे पोल्‍हाइए कऽ किए ने अपन मनक बेथा पत्नीकेँ सुना दिऐन। अर्द्धांगिनी छैथ जँ अदहो दरद हेरि लेलैन तँ अदहे ने बँचत, अदहा तँ कमबे करत...। यएह सोचि जोगारी भाय बजला-
शुभ काजमे जेते देरी करब ओते ओ अशुभ भेल, तँए पहिने चाह पिआउ।
हलशल-कलशल पतिक विचार सुनि फुलकुमारी मुस्‍की दैत चाह आनए ऑंगन गेली।
दरबज्‍जापर सँ फुलकुमारीकेँ हटिते जोगारी भाइक मन फेर ओहिना बदरीहन हुअए लगलैन जेना सौन-भादोमे पुर्बाक लहकीपर मेघकेँ वादल पाबि होइए। मनमे पुन: उठि एलैन- अपन जिनगीक अमूल्‍य समए, श्रमशील समए ओहिना नष्‍ट भऽ जाएत..!
अपन श्रमकेँ नष्‍ट होइते देखते जोगारी भाइक मनक विचार आगू बढ़लैन। आगू बढ़िते मनमे उठलैन- की बॉंसक एतबे उपयोग अछि जे अपन कठिन श्रम कएल पूजी नष्‍ट भऽ जाए? जोगारी भाइक मन ठमकलैन। ठमैकते मन आगू घुसकए लगलैन। जेते काज अखन तक बॉंसक हम सभ करैत एलौं अछि, ओ छेहा किसानी जिनगीक उपयोग केलौं अछि। मुदा जखन जिनगी आगू बढ़त तखन मशीनक जरूरत सेहो हेबे करत। दुनियॉंक दृश्‍य आइ ओहन भऽ गेल अछि जे जेकरा जेते अगुआएल मशीन छै ओ ओते शक्‍ति सम्‍पन्न देश बनल अछि। बॉंसेक तँ अनेको उपयोगी वस्‍तु–कागज, कपड़ा इत्‍यादि–बनिते अछि जेकर उपयोग आइये नहि, आगुओ होइते रहत। मुदा बॉंसक उत्‍पादन तँ मात्र ओत्तैटा नहि हएत जेतए अनुकूल वातावरण छइ। माने बॉंस उपजैक समुचित भूमि आ समुचित मौसम जेतए छइ, कम-सँ-कम कपड़ा आ कागजक खगता तँ सभ जगह छइहे...। तही बीच फुलकुमारी चाह नेने दरबज्‍जापर आबि गेलखिन।
पत्नीक हाथमे चाहक गिलास देखते जोगारी भाइक मनमे विचारक चाह सेहो जगि चुकल छेलैन। ओना विचारक गंभीर वन–वनक सघन रूप–मे जोगारी भाइक मन तेना सघन हुअ लगल छेलैन जे पत्नीक हाथक चाहपर नजैर ओइ रूपे पड़बे ने केलैन जेहेन मन बनौने फुलकुमारी चाह नेने आएल छेली। मुदा तैयो पत्नीक हाथसँ चाह लैत जोगारी भाय ऑंखि-पर-ऑंखि जरूर फेड़लैन।
ऑंखि-पर-ऑंखि पड़िते फुलकुमारी बजली-
बड़ीकालक बनौल चाह छी, देखियौ जे सुआदमे ने ते बाइसपन आएल अछि।
पत्नीक बात सुनि जोगारी भाइक मुहसँ बहरेलैन-
बाइसपन आबह कि तेइसपन, चाह तँ चाह छी।
ओना, जोगारी भाइक विचार फुलकुमारी नीक जकाँ नहि बुझली मुदा अपन हाथक बनौल चाहक प्रशंसा तँ सुनबे केली। प्रशंसा सुनि फुलकुमारी ऑंगन दिस मुड़ैत बजली-
ताबे अहॉं चाह पीबू, लगले हम आँगनसँ अबै छी।
तैबीच दू घोंट चाह जोगारी भाय पीब नेने छला, मनमे संतुष्‍टिक तुष्‍टि पनैप गेले छेलैन तँए मुस्‍कुराइत बजला-
ऑंगनसँ ओहिना किए आएब, चाह पीने आएब।
ओना पतिक विचारसँ फुलकुमारीकेँ मिसियो भरि कुवाथ नइ भेलैन, किएक तँ जे बात झॉंपन दऽ बाजल छेली ओ पति उघारि देलकैन, तेतबे ने। से तँ सभ जनिते अछि जे पति-पत्नीक बीच हुअए वा आन छोट-पैघक बीच, मुदा किछु विचार तँ ओहन होइते अछि जे लोक झॉंपन-तोपन दऽ कऽ बजैए।
चाह पीब पान खाइते जोगारी भाइक मनमे धक्का जकॉं लगलैन। धक्का लगिते मन धड़कए लगलैन। धड़कए ई लगलैन जे आइये नहि, सभ दिन मिथिलांचलक अनमोल उपयोगी वस्‍तु बॉंस रहल, जे अनुकूल वातावरण पेब अदौसँ फुलाइत-फड़ैत रहल अछि। हजारो बीघाक कृषि पैदावार रहल अछि। जे ग्रामीण उपयोगिता कमिते बीटक बीट बॉंस सुखि-सुखि नष्‍ट भऽ रहल अछि। दुर्भाग्‍य तँ मिथिलांचलक रहबे कएल जे बुधिक शीर्षपर बसैबला मिथिलावासी अपनो नीक-बेजा बुझैले अखनो तैयार नहियेँ छैथ। आइ जँ गामक वस्‍तु सभ जे अनुपयोगी भेल जा रहल अछि, ओकर जँ समुचित उपयोग होइत तँ कि जएह मिथिला बुझै छी सहए रहैत..?
एन.एच. सतावन बनल। जइसँ सभ गाम तँ नहि मुदा मिथिलांचलक बहुतो गामक सम्‍पर्क सूत्र देशक आन-आन भागसँ बनल। गाड़ी-सवारीक सुविधा बढ़ल। पैघ-पैघ वेपारीक नजैर बॉंसपर पड़ल। लोकोकेँ माने बॉंस उपजौनिहारोकेँ गाड़ाक घेघ बॉंस बनिये गेल अछि। पड़ाएल चोरक किदैन नफा, एहने मनोभाव लोककेँ उदय भेल। मजबूरीक भरपूर लाभ उद्योगपतिकेँ उठबैक अवसर भेटल।
अपन जिनगीक संग जोगारी भाय समाजोक जिनगी देख रहला अछि। चालीस बर्ख पूर्वक रोपल सघन बँसवारि–माने नीक लाभक–देख जोगारी भाइक मन पाछू दिस भागि रहल छैन। साइयो बीघाक डुमैत समाजक सम्‍पैत देख जोगारी भाइक मनक विचार हहैर-हहैर अलिसाएल फूल जकॉं झड़ि-झड़ि खसि रहल छैन। मुदा उपाइये की? तही बीच लक्ष्‍मीनाथ एकटा वेपारीक संग पहुँचल। अनभुआर बेकतीकेँ देख जोगारी भाय लक्ष्‍मीनाथकेँ पुछलखिन-
हिनका नइ चिन्‍हलयैन?”
ओना वेपारी चुपे रहला मुदा लक्ष्‍मीनाथ बाजल-
काका, ई बॉंसक वेपारी छैथ। गाममे जेते बॉंस अछि, सभटा कीन लेता। 
गामक जेते बॉंस अछि, सभटा कीन लेता। सुनि जोगारी भाइक मनमे खुशीक लहैर उठलैन। मुदा लगले मनमे उठि गेलैन जे करोड़ोक सम्‍पैत बॉंस गाममे अछि, अखन तक जे बॉंसक विकरीक दर रहल अछि, ओइ दरे कीनता आकि..? मुदा अपन विचारकेँ मनेमे दाबि जोगारी भाय बजला-
ई तँ नीक बात भेल जे जे सम्‍पैत नष्‍ट भऽ रहल अछि ओकर उपयोग हएत।
अपन बात रखैत लक्ष्‍मीनाथ बजला-
काका, हिनकर कहब छैन जे सुखाएल आ खिच्‍चा बॉंस छोड़ि हरदर सभ एक रेटमे कीन लेब।
लक्ष्‍मीनाथक बात सुनि जोगारी भाइक मनमे उठलैन जे अनेको किस्‍मक बॉंस गाममे अछि, जे साइजो आ गुणेमे अनेक रंगक अछि, तखन एक दर केना हएत? विचारकेँ बहकबैत बजला-
टके सर भाजी, टके सेर खाजा।
मुस्‍कुराइत लक्ष्‍मीनाथ बाजल-
हँ, से सहए बुझू।
जोगारी भाय वेपारीकेँ पुछलखिन-
अहॉं केतए रहै छी?”
जहिना मैथिलीमे जोगारी भाय पुछलखिन तहिना मैथिलियेमे वेपारी सेहो उत्तर देलकैन-
हमर घर सकरी अछि। असल वेपारी दिल्‍लीक छैथ।
जोगारी भाय-
अहॉंकेँ पार्टनरशिप अछि आकि..?”
वेपारी बाजल-
नइ, पार्टनरशिप केना हएत। ओ–माने उद्योगपति–बहुत पैघ कारोबारी छैथ। हम एकटा अदना आदमी छी, तैबीच पार्टनरशिप केना हएत।
जोगारी भाय पुछलखिन-
तखन अहॉं?”
वेपारी बाजल-
ट्रकक हिसाबसँ कमीशन भेटैए।
जोगारी भाय-
गामक सभ बॉंस कीन लेब?”
वेपारी-
गामे किए, इलाकाक सभ कीना जाएत। हमरा सन-सन साइयो गोरे कमीशनपर काज कए रहला अछि।
जोगारी भाय-
की रेटमे बाँस कीनै छी?”
वेपारी- ओना, जे रोड साइड माने एन.एच.क बगलमे अछि ओकर दर अस्‍सी रूपैआ–एक बॉंसक–अछि। मुदा जे जेते हटि कऽ अछि, ओकर दर ओते कम होइत जाइए।
अपन गामक हिसाब अन्‍दाजि मने-मन जोगारी भाय जोड़लैन तँ बुझि पड़लैन जे जे बॉंस दू साए रूपैये बीकैए ओ सत्तैर-पचहत्तैर रूपैये भेल, अढ़ाइ-बड़ कम! मुदा दोसर उपाइयो तँ नहियेँ अछि। साले-साल सुखि-सुखि नष्‍ट होइत जाइए...।
जोगारी भाय बजला-
मिथिलांचलक संस्‍कार रहल अछि जे जे दरबज्‍जापर आबि जाथि हुनकर मन दुखा कऽ विदा नइ करिऐन। तहूमे अहॉं ने पड़ोसी छी मुदा असल जे कारोबारी छैथ ओ तँ हजार कोस दूरक छथिये। केना कऽ मन दुखेबैन। जेते बॉंस अछि ओइमे एकटा बीटक अपना-ले रखि लेब, बाँकी सभ दऽ देब।
वेपारीक संग लक्ष्‍मीनाथ सेहो उठि कऽ विदा भेल। जहिना अभावीकेँ करजो रूपैआ हाथमे एने क्षणिक खुशी होइते छै तहिना जोगारी भायकेँ सेहो भेलैन।
तही बीच फुलकुमारी दरबज्‍जापर पहुँचली। हड्डी चुसैत कुत्ता जहिना अपने मुँहक खूनक सुआदसँ मन तृप्‍ति करैत तिरपित होइए, तहिना जोगारी भायकेँ भेलैन। पत्नीकेँ कहलखिन-
गाड़ाक उतरी उतरल।
शब्‍द संख्‍या : 2523, तिथि : 29 जून 2017


[1] नमी
[2] गहराइ
[3] नमहर गाछक जड़िमे
[4] पाबनिक दिन 
[5] बॉंसक बीटमे 

Monday, June 26, 2017

94वेअम कथा-साहित्‍य सम्मेलन : लौफा

94वेअम कथा-साहित्‍य सम्मेलन : लौफा

1990 इस्‍वीमे आरम्‍भ भेल मैथिली साहित्‍यक प्रमुख कथा-संगोष्‍ठी सगर राति दीप जरयक 94म आयोजन जाल्‍पा मध्‍य विद्यालय परिसर- लौफा (मधेपुर)मे 24 जून 2017 संध्‍या 6 बजेमे शुरू भ भिनसर 6 बजेमे सम्‍पन्न भेल। डॉ. योगेन्‍द्र पाठक वियोगी (वैज्ञानिकजी) केर संयोजकत्‍वमे आयोजित ऐ सगर रातिक कथा संगोष्‍ठीक उद्घाटन केलैन मैथिली साहित्‍यक सर्वश्रेष्‍ठ रचनकार श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल। श्री अरविन्‍द ठाकुर, डॉ योगानन्‍द झा, श्री केदार नाथ झा, डॉ. शिव कुमार प्रसाद एवम्‍ डॉ. योगेन्‍द्र पाठक वियोगीक संग दीप प्रज्‍वलन कार्यक्रमकेँ आगाँ बढ़ौल गेल। श्रीमती कुशुलता झा, श्री फुलेन्‍द्र पाठक, राम सेवक ठाकुर एवम्‍ श्री राम किशोर सिंह स्‍वागत गीत एवम्‍ डॉ. योगेन्‍द्र पाठक वियोगीक स्‍वागत भाषणक संग पोथी लोकार्पण सत्रमे प्रवेश भेल।
पाँच गोट पोथीक लोकार्पण भेल। जइमे पहिल पोथी छल डॉ. योगेन्‍द्र पाठक वियोगीक द्वारा अनुदित- रोबो। रोबो चेक भाषामे कारेल चापेक द्वारा लिखित ‘RUR’ नामक नाटक अछि, जेकर अंग्रेजी अनुवाद पॉल सेल्‍वर नामक लेखक केलैन। रोबोक लोकार्पण श्री अरविन्‍द ठाकुर हाथे भेल। दोसर एवम्‍ तेसर पोथी छल श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक मौलिक कृति लघुकथा संग्रह- बेटीक पैरुख तथा क्रान्‍तियोग। बेटीक पैरुखक लोकार्पण केलैन- डॉ. शिव कुमार प्रसाद एवम्‍ क्रान्‍तियोगक लोकार्पण कर्ता छला- श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डलजी। चारिम पोथी छल श्री राम विलास साहुक रचित काव्‍य संग्रह- कोसीक कछेर’, जेकर लोकार्पण केलैन- श्री राजदेव मण्‍डल आ पाँचम पोथी छल श्री बेचन ठाकुर द्वारा रचित नाटक संचयन- नबघरनबघरक लोकार्पण केलैन डॉ. शिव कुमार प्रसाद।
लोकार्पित पाँचू पोथीक सन्‍दर्भमे लोर्कापण कर्ता अपन-अपन संक्षिप्‍त मनतव्‍य व्‍यक्‍त केलैन। रोबोक सन्‍दर्भमे श्री अरविन्‍द ठाकुर कहलैन- आइसँ करीब साए बर्ख पूर्व ऐ पोथीकेँ चेक



भाषामे लिखल गेल छल, जेकरा  मैथिली साहित्‍यमे डॉ. वियोगी भावा अनुवाद केलैन। रोबॉटक कपल्‍पना कारेल चापेक आइसँ साए बर्ख पूर्व केने छला जे आइ अपना सबहक सोझ अछि। नाटकमे ईहो देखौल गेल अछि जे केना रोबॉट मानवक संहार करैए...।
बेटीक पैरुख कथा संग्रहक सन्‍दर्भमे डॉ. शिव कुमार प्रसाद कहलैन- बेटीक पैरुख संग्रहक सभटा कथा महिला सशक्‍तीकरणपर आधारित अछि। जँ पाठक आत्‍मसात् करैथ तँ स्‍वत: हुनकामे आत्‍मनिर्भता केना जागि जेतैन यएह ऐ पोथीमे संकलित सभ कथाक उत्‍ष अछि।
क्रान्‍तियोग लघु कथा संग्रहक सन्‍दर्भमे श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल कहलैन- बेकती अपने-आपमे अपन गुण-दोष केना चिन्‍हित करता तथा दोष मुक्‍त केना हेता, समयक संग चलबाक खगताकेँ केना बुझता तथा समयक संग मानवीय चेतनाकेँ जगबैत चलैले केना आ कोन बाटपर चलता इत्‍यादि ऐ संग्रहमे कथाकार अपन कथाक माध्‍यमे कहलैन अछि।
कोसीक कछेर काव्‍य संग्रहक सन्‍दर्भमे श्री राजदेव मण्‍डलजी कहलैन- कवि राम विलास साहुजी कोसी कातक वासी छैथ, कोसीक कछेरमे जीवन-यापन करै छैथ, अपन जीवनक अनुभवकेँ श्री साहुजी अपन काव्‍य सभमे बिना कोनो छान-बान्‍हक एव धरी-धोखाक रखलैन अछि।
नबघर पोथीक सन्‍दर्भमे डॉ. शिव कुमार प्रसाद कहलैन- ऐ पोथीमे चारि गोट नाटक/एकांकी अछि। चारू रचनामे वर्तमान समाजक दशा-दिशाकेँ नाटकरकार देखबैत अछि।
लोकार्पण सत्रक पछाइत कथा सत्रमे प्रवेश भेल। अध्‍यक्ष मण्‍डलक गठन भेल। श्री नारायण यादव, डॉ. योगानन्‍द झा, श्री अरविन्‍द ठाकुर आ श्री जगदीश प्रसाद मण्डल चयनित भेला। एवम् मंच संचालन हेतु डॉ. योगेन्‍द्र पाठक वियोगी’, श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल, उमेश मण्‍डल तथा श्री नन्‍द विलास राय।
कुल सात पालीमे प्राय: तीन-तीन गोट कथा पाठ भेल एवम्‍ पठित कथा सभपर आलोचक लोकैन आलोचना केलैन। विवरण निम्न अछि-
पहिल पालीमे-
1.       हमर भीतरका सियाना : अरविन्‍द ठाकुर
2.      आशीर्वाद : राम विलास साहु        
3.      कौआ के बौआ : प्रीतम निषाद
प्रथम पालीक पठित कथापर आलोचना केलैन-
डॉ. शिव कुमार प्रसाद, नन्‍द विलास राय, डॉ. योगानन्‍द झा।
दोसर पाली-
4.     विघटन : जगदीश प्रसाद मण्‍डल
5.     दिलजान आंटी : शम्‍भु सौरभ
6.     कृतघ्‍न : आनन्‍द मोहन झा
आलोचना- कमलेश झा, नारायण यादव, दुर्गानन्‍द मण्‍डल।
तेसर पाली-
7.      सरकार हम पापी छी : नन्‍द विलास राय
8.     संवेदनाक शरण : आनन्‍द कुमार झा
9.     घरवालीक झिरकी : लक्ष्‍मी दास
आलोचना- राजदेव मण्‍डल, अरविन्‍द ठाकुर, राम विलास साहु तथा दुर्गानन्‍द मण्‍डल।
चारिम पाली-
10.  जएह अपन सएह आन : अजय कुमार दास पिन्‍टु
11.    गामे बीरान भऽ गेल : कपिलेश्वर राउत
12.   पथिक : विद्याचन्‍द्र झा
आलोचना- गोविन्‍दाचार्य, कमलेश झा, उमेश मण्‍डल, योगान्‍द झा।
पाँचिम पाली-
13.   उपरारि जमीन : उमेश मण्‍डल
14.  होनी-अनहोनी : नारायण यादव
15.  स्‍वार्थान्‍ध : बेचन ठाकुर
आलोचना- योगेन्‍द्र पाठक वियोगी’, राजदेव मण्‍डल, दुर्गानन्‍द मण्‍डल।
छठम पाली-
16.  जुड़शीतल : शारदा नन्‍द सिंह
17.   निर्णय : योगेन्‍द्र पाठक वियोगी
18.  मानव आ माछ : राधाकान्‍त मण्‍डल
आलोचना- कपिलेश्वर राउत, प्रीतम निषाद, नन्‍द विलास राय।
सातम पाली-
19.  स्‍वाभिमान : उमेश पासवान
20.  विश्वास : आनन्‍द मोहन झा
21.   होइ छै गोहाय : शारदा नन्‍द सिंह
22.  कर्मक फल : दुर्गानन्‍द मण्‍डल
आलोचना- कमलेश झा, आनन्‍द झा, संजीव कुमार शमा डॉ. शिव कुमार प्रसाद।
ऐगला आयोजन अर्थात्‍ सगर राति दीप जरय95म खेपक आयोजन लेल माला उठौलैन श्री नारायण यादवजी। नारायण यादवजी अवकाश प्राप्‍त शिक्षक छैथ, कथाकार एवं आलोचक सेहो छैथ। जयनगरमे रहै छैथ, डुमरा घर छिऐन। श्री यादवजी दीप-पंजी हस्‍तगत करैत कहलैन- ओना तँ हम रहै छी जयनगरमे मुदा जहिना सगर राति दीप जरयक यात्रा किछु दिनसँ गाम दिस मुखर अछि तहिना हमहूँ गामेमे अर्थात्‍ जलसैन डुमरामे पनचानबेअम आयोजन कराएब।
हलाँकि भावी संयोजक आयोजनक तिथि सेहो निर्धारित क लेलाह मुदा ओ अखन दूमर्जा अछि तँए संभावित तिथि- सितम्‍बर मासक पहिल शनि।