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Sunday, March 25, 2018

आशापर पानि फेर गेल (कथाकार : जगदीश प्रसाद मण्डल)

परिवारमे जहिना कोनो विद्यार्थी कौलेजमे शिक्षा ग्रहण करए लेल प्रवेश करैए वा कोनो फलक गाछमे पहिल नव फल लगैए वा फूलक गाछमे पहिल फूल लगैए जइसँ जेहेन खुशीक लहैर जगैए तहिना ललित भाइक मनमे खुशीक लहैर जगलैन। जीवनमे जहिना नव कृत्ति वा नव बेवसाय एने मनमे आशाक किरण छिटकैए तहिना ललित भाइक मनमे आशाक किरण छिटकए लगलैन...।
ललित भाइक जीवन किसानी-जीवन छिऐन। पनरह बीघा खेत छैन आ भैयारीमे असगरे छैथ। ओना, तीन पीढ़ीसँ ललित भाइक ई पनरह बीघा खेत आबि रहल छैन। तेकर कारण अछि जे जहिना ललित भाइक बाबा भैयारीमे असगरे रहथिन तहिना पिता सेहो भेलखिन। गामक लोक एक-पुरखियाह परिवार बुझै छैन। परिवारमे बेटा-पक्ष तँ सभ दिन असगरक रहलैन मुदा बेटीक बाढ़ि नइ रहलैन से बात नहि अछि।
बी.ए. पास केला पछाइत ललित भाय किसानी जीवन धारण केलाह। ओना, आन-आन जकाँ ललित भाइक मनमे कहियो नोकरी-चाकरी नइ एलैन, जइसँ पढ़ैक क्रममे कहियो मनमे ई नइ जगलैन जे धुरफन्दा चालि पकैड़ नीक रिजल्ट पाबी। धुरफन्दा चालि भेल- नोकरीक हिसाबे पैरबी-पैगामसँ परीक्षाक रिजल्टक जोगार बैसाएब। ललित भाइक मनमे बच्चेसँ एहेन विचार जमि कऽ घर कए लेलकैन जे ज्ञान-ले पढ़ै छी। ओना, सभ ज्ञाने-ले पढ़बो वा लिखबो करै छैथ। तँए, ललित भाय ने कहियो ट्यूशनक भीर गेला आ ने नोट-चन्द्रिकाक भाँजमे पड़ला। सभ दिन मौलिक किताब कीनि पढ़लैन। शिक्षा ग्रहण करैसँ पूर्व जहिना ललित भाइक मन असथिर रहैन तहिना पढ़ाइक पछातियो असथिरे छैन। जहिना बिजनेसी परिवारमे बच्चाक मन असथिर बनल रहैए जे पढ़ाइक पछाइत माने स्कूल-कौलेज छोड़ला बाद, अपन पितृवत् बेवसायिक जिनगी पेबे करब, तहिना किसानोक परिवारमे अछिए। नोकरीदार परिवारमे वा पेशेवर राजनीतिक परिवारमे एहेन विचार जागह वा नहि जागह, मुदा वेपारी आ किसानी परिवारमे जागब सोभाविक अछिए। जहिना नोकरी करैबला परिवारमे दोसरक मातहतीक आशा बनैए– से चाहे सरकारीबला हुअ वा गैर सरकारी नोकरीबला, तहिना राजनीतिक परिवारमे सेहो होइते अछि। ऐठाम राजनीतिक परिवारक माने देश सेवा वा देश-भक्तिसँ नहि, बल्कि बेवसायिक प्रवृत्तिसँ अछि। देश-भक्तिक तँ विराट रूप अछि। विराट रूप ई भेल जे जहिना देशक अजादी-ले कियो फाँसीपर लटैक गेला तँ कियो जेलमे यातना सहैत अपन जीवन अन्त केलैन, तहिना कियो कश्मीर सन बर्फीली जगहमे पूस-माघ मासक जाड़क दिन कटै छैथ, तँ कियो समुद्रक पानिक तरमे अपन कर्तव्यक पालन सेहो कैये रहला अछि। मुदा की एतबे देश-सेवा आ देश-भक्ति भेल?
..जे शिक्षक स्कूलमे अपन कठिन श्रमक ज्ञान संचरण करैत अपन जीवन नव पीढ़ीक निर्माणमे लगा रहला अछि वा जाड़-बरसातमे आकि रौदमे जे किसान हर-कोदारि चला अन्न-पानि पैदा कए रहला अछि वा जे कियो पहाड़सँ पाथर काटि-तोड़ि कऽ सड़कक निर्माण कए रहला अछि वा जे कियो कोयलाक खानसँ कोयला निकालि सम्बन्धित खगताक पूर्ति कए रहला अछि, की हुनका सभकेँ देश-भक्त नहि कहबैन? देश-भक्त तँ वएह ने भेला जे देशक कोनो अंगमे अपन अंश-दान जोड़ि जीवन-बसर कऽ रहल छैथ।
जहिना कोनो देश एक-एक जन-गणक छी तहिना देशक एक-एक अंगकेँ समृद्ध बनाएब सेहो एक-एक जन-गणक दायित्वो छीहे। जखने दुनूक बीच सामंजसक मूर्ति बनि स्थापित हएत तखने देशमे समृद्धता औत, देश समृद्ध बनत। जखने देश समृद्ध बनत तखने जन-गणक बीच सेहो समृद्धता एबे करत, जइसँ मनुखक जिनगी अधिक-सँ-अधिक सुखमय आ आनन्दमय बनत। जे सभ कियो चाहितो छी।
नोकरीपर आश्रित परिवार जहिना आगू-पाछू आ ऊपर-निच्चाँ होइत चलैए तहिना राजनीतिक-परिवार सेहो चलिते अछि। आगू-पाछू वा ऊपर-निच्चाँ भेल- जहिना ऊपर श्रेणीक नोकरी करैबलाक बेटा, अनेको कारणे निच्चाँ श्रेणीक नोकरीक जीवन बना आगू बढ़ै छैथ, तहिना राजनीतिक परिवारमे सेहो होइते अछि, पैछला पीढ़ी आ भविसमे ऐगलो पीढ़ी ऊपर-सँ-निच्चाँ आ निच्चाँ-सँ-ऊपर सेहो होइते चलै छैथ। तँए बेवसायिक आ किसानी जिनगीक अपेक्षा राजनीतिक आ नोकरशाहीक परिवारक जीवन धारामे ई अन्तर अछिए। ओना, कुसमय भेने ओहू दुनू परिवारमे ऊपर-निच्चाँ नइ होइए सेहो नहियेँ कहल जा सकैत अछि। मुदा दुनूक बीच तात्त्विक अन्तर अछि। नइ चाहितो लोक करिते छैथ। ओना, ईहो अकाट्य नहियेँ अछि। किएक तँ मनुख अपन विचारानुकूल जीवन धारण करैत पीढ़ीगत जीवनसँ अलग होइत नव जीवन धारण करिते आबि रहल छैथ। जे समैयक गतिक संग गतिशीला गतिमानो तँ बनियेँ सकै छैथ।
ओना, धरतीपर जतेक मनुख छैथ सभकेँ अपन-अपन मनराजो छैन जे राजा मनो छैन्हे। जइ मन राजाकेँ मना चलए लेल तृप्तिक खगता छैन्हे। मुदा परिवारिक-समाजिक जीवनमे मनक तृप्तिक अनेको बाधा नइ अछि सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। ओना, जइसँ अतृप्त जिनगीकेँ तृप्तिक बाट भेटै छै ओ भेल सभसँ ऊपरक वस्तु, जेकरा धर्म सेहो कहै छिऐ आ लोक अपन जीवनकेँ ओही धारा दिस मोड़ि सेहो चलिते छैथ। मुदा परिवारिक जीवन तँ सामुहिक जीवन छी, भलेँ ओ वंशगते आधारित किए ने हुअए। जहिना परिवार मनुखक समूह छी तहिना पहाड़पर सँ झहरैत अनेको झरना आगू बढ़ैत समूहक रूप पकैड़ धार वा धारा नइ छी सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। सेहो तँ छीहे। ओना, परिवारक बीच दुनू धारा चलैए। एक नोकरशाही परिवारमे जहिना उच्चकोटिक कलाकार आकि गुणमान नइ होइ छैथ सेहो तँ नहियेँ अछि। गुणमन्तक संग धनमन्त वा जनमन्त नहि छैथ, सेहो केना कहल जा सकैए। ओना, स्कूल-कौलेजमे कलाकेँ अवैज्ञानिक विषय मानि कलाक छात्रकेँ अवैज्ञानिके मानल जाइए। मुदा दुनूक बीच व्यक्त आ अव्यक्त ज्ञानक दूरी तँ अछिए। माने एकटा भेल साइंस, जइमे फिजिक्स-कैमेस्ट्री इत्यादिक पढ़ाइ अछि, दोसर भेल कॉमर्स, जइमे बिजनेस पद्धतिक पढ़ाइ अछि आ तेसर भेल आर्ट, जइमे साहित्यसँ इतिहास-भूगोल धरिक पढ़ाइ अछि। मुदा तीनू विषयक बीच व्यक्त-अव्यक्त ज्ञान अछि कि नहि अछि ई तँ प्रश्न अछिए।
जहिना नदी पहाड़पर सँ उतैर धरतीपर आबि सामूहिक रूप धारण करैत एक स्वच्छ जलधारक रूपमे प्रवाहित होइत चलैए तहिना एक्के नोकरशाह परिवारमे रंग-रंगक विचारक लोकक सामंजसो अछिए जे अपन-अपन इष्टिक अनुकूल जीवन धारण केने चलिते अछि। एहेन खाली नोकरशाहे परिवारमे अछि सेहो बात नहि, वेपारियो परिवारमे अछि आ राजनीतिक वा किसानोक परिवारमे सेहो अछि। मुदा अछि ओ बिरल संख्यामे। अबिरल ओहन संख्या बेसी अछि जइमे एहेन स्वच्छ, निर्मल आ पवित्र धाराक प्रवाह नइ अछि। एकर माने ईहो ने भेल जे बाँकी सभ गदियाएले वा पँकियाएले अछि। ईहो तँ सोभाविके अछि जे पहाड़पर सँ झहरैत झरनाक पानि पाथरे-पाथरक रस्तासँ बहैत धरतीपर बल-बालुक रस्ता पकैड़ आगू बढ़ैए तँए ओइमे स्वच्छता छै। स्वच्छताक माने रंगक रूपमे अछि जे मीठगरो आ सादो तँ अछिए। मीठगरक माने भेल जे दोष रहित अछि। मुदा मटियाह पहाड़सँ निकलल धारा अपन रंग पकड़बे करत। जइमे पंकपन आ गदपन सेहो रहिते छै, जे धरतीपर उतैर अमृत-मृत्तिकाक बीच जे धारा प्रवाहित होइए, तइ दुनूक रंग-रूपमे अन्तर भाइये जाइए। किएक तँ हिमालय पहाड़पर जहिना वर्फक ढेर अछि तहिना माटियोक ढेर अछिए। तँए ओकरा दोषपूर्ण कहल जाए सेहो सोलहन्नी उचित नहियेँ हएत किने। खाएर...। ओइसँ ललित भायकेँ अखन कोन मतलब छैन। अपन परिवारिक जिनगी छैन आ खेती जीवन-धार छैन, ओहीमे परिवारजन सभ-तूर उमैकतो छैथ आ नहा-सोना मन पवित्र सेहो बनैबते छैथ। पवित्र भेने जहिना सबहक मनमे तृप्ति अबैए तहिना ललितो भायकेँ अबिते छैन। तँए, अपनाकेँ जगल बुझिते छैथ। मुदा तृप्तियो तँ तृप्ति छी किने, जे स्थायी आ अस्थायी दुनू अछि। जे अस्थायी तृप्ति अछि ओकर वृद्धि रूकि जाइ छइ। खाएर, तृप्ति-अतृप्तिक बीच जे अछि से अछि मुदा छी तँ दुनू भैयारीए। एक समुद्रमे मिलैए, दोसर क्षणिक अछि। क्षणभंगुर जकाँ लगले ताड़क गाछपर आ लगले साहोरक गाछपर चढ़ैत-उतरैत खसितो-पड़ितो रहिते अछि। लगले ताड़क गाछपर चढ़ि हकबाहि करए लगैए आ लगले साहोरक गाछपर सँ ‘साहोर-साहोर’ सेहो करिते अछि। मुदा जेकरा स्थायी तृप्ति कहै छिऐ ओ क्षीर सागर होइत अलौकिक सागरमे पहुँच जाइए।
जिनगीक शुरूहेमे ललित भायकेँ नवपनक रोग जहिना धेलकैन तहिना अखनो धेनहि छैन। नवपनक रोग भेल दैनंदिनक जिनगीमे किछु-ने-किछु नव उपार्जन करैक इच्छा। जँ से नहि तँ जिनगी या तँ ठमैक जाएत वा ऐगला हवाक झोंकक परिवेशमे पाछू ससैर जाएत। मुदा हवो तँ हबे छी, कखनो तेज गतिये चलि ठाढ़ो मनुखकेँ खसा दइए आ कखनो किछु ने बिगाड़ि पबैए। तहूमे मनुख तँ अखज वंशक छीहे। जे, या तँ फेर उठि कऽ ठाढ़ भऽ जाइए वा केहनो हवाक झोंकमे अपन ठौर पकड़ने ठाढ़े रहैए।
एक तँ किसानी जीवन गुलाब फूलक गाछ जकाँ अछि जे डारियो छोड़ैए आ जड़िसँ गाछो छोड़िते अछि। जइसँ मात्र गाछेटा झमटगर नइ होइए बल्कि गाछक समूहे झमटगर बनि जाइए। तेहने अछि किसान आ किसानी जीवन। आ ओही परिवारक छैथ ललित भाय।
दस बर्ख पूर्व, जहिया ललित भाय जखन हाइ स्कूलमे प्रवेश केने छला तहियो मनमे यएह रहैन जे अपन भविस किसानी जिनगीमे अछि, किए तँ वंशगत अपन किसानी परिवार रहल अछि। दोसर जीविकाक जे साधन अछि ओ किसानोन्मुखी अछिए। किएक तँ कल-कारखानाक विकास दस सालक बीच जइ तेजीसँ रूप बदललक अछि ओ किसानी जिनगीक परिवेशे बदैल देलक अछि। ओना, अपन जिनगीक जे समृद्धताक कारक तत्त्व अछि ओइपर जहिना प्राकृतिक कुठाराघात भेल तहिना मानवीय कुठाराघात नै भेल सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। दुनू दिससँ होइत रहल अछि। जहिना एक दिस धार-धुरसँ गामक-गाम नष्ट भेल आ ओइसँ जे गामवासीक गति भेल से तँ वएह ने नीक जकाँ बुझि रहल अछि। तहिना दोसर दिस महेशवाणीए आ नचारीए ने गबै छैथ..! खाएर जे जेतए अछि से तेतए अछि। ललित भाय गाममे छैथ, जइ देने आइ धरि कोनो धार बहबे ने कएल अछि। ओना, बाढ़ि-बरखा होइते अछि। जखन ललित भाय असगरेमे बैइसै छैथ आ अपन बालपनक रूप देखै छैथ तखन ईहो मन पड़िये जाइ छैन जे गामक स्कूलमे जखन छेलौं स्कूलक आगूमे जे फुलवाड़ी छल तइमे पुबरिया-दछिनबरिया कोण परक कियारी हमरे छल, जइमे गेन्दा, गुलाब सभ लगबै छेलौं। ओ आइ परती मैदान बनि क्रिकेटक फील्ड बनि गेल अछि..!
भरलपर ने मन भरिआइए मुदा जरलपर तँ जड़िएबे करत। जखने मन जड़ियाएत तखने बोखार चढ़त आ जेना-जेना बोखारक ज्वर तेज हएत तेना-तेना ओ बकबे करत।
रेडियो, अखबार, पत्रिका सभमे सुर्जमुखी खेतीक चर्च जोर पकड़लक। जखन हवा बहै छै तखन घरमे रहू कि ओसारपर रहू, हवाक सिहकी वा झोंक लगबे करत, लगिते अछि। से ललितो भायकेँ लगलैन। प्रचारेक हवामे ललित भाय धँसि गेला। मुदा डुमै-ले नइ धँसला, हेलैले धँसला। भाय! के एहेन अभागल हएत जे पोखैरसँ धार होइत समुद्रमे नइ हेलए चाहत। ओहुना लोक जगरनाथपुरीक समुद्रक कातमे ढुसि-स्‍नान करिते अछि। यएह छी शाब्दिक ज्ञान आ अनुभवात्मक ज्ञानक बीचक दूरी।
दस कठबा चौमास जे ललित भाइक अपन दरबज्जाक आगूमे छैन, ओइमे सुर्जमुखीक खेती करैक विचार ललित भाय मनमे रोपलैन। खेती करैक विचारकेँ नीक जकाँ पत्रिको आ रेडियोओक माध्यमसँ सुनि-पढ़ि मन सक्कत बनाइये नेने छला। समस्तीपुर फार्मसँ बीआ आनि नियत समयपर खेती करैक जोगार ललित भाय केलैन। ओना, समयमे किछु ढीलपन छेलइ। ढीलपन ई जे वसन्तक आगमनक बीस दिनक पछातियो खेतीक अनुकूल मौसम नहि बनि पएल छेलइ।
शिवरात्रिक प्रात। आइ ललित भाय सुर्जमुखीक खेती करता। माने बीआ माटिमे देथिन। खादक संग कीटनाशी दबाइ खेतमे मिला चुकल छला। खुरपीसँ अपने रोपता। किए तँ गाममे बोनिहार रहितो काजक अनुभवी नइ अछि। केतेक माटिक तरमे बीआ पड़त आ केतेक दूरीपर पाँत लगौल जाएत से ललित भाय किताबसँ सीखि नेने छला। दोसर कियो करताइत रहबे ने केलैन। काल्हि साँझूए पहर ललित भाय कहलैन-
“बौआ किसुन, काल्हि नव काज लऽ कऽ नव किसानक रूपमे अवतरित हएब।”
पुछलयैन-
“से की यौ भाय?”
ललित भाय कहलैन-
“बीस सालक अपन किसानी जीवनमे सेरसो-तोर आ तोरीसँ आगू तेलहनमे नइ बढ़ल छेलौं, मुदा ऐबेर दस कट्ठा सुर्जमुखीक खेती करब।”
सुर्जमुखीक खेती तँ कहियो ने केने रही मुदा तैयो जहिना गीत-गाइनक पलङ्गाइ होइए तहिना बजलौं-
“भाय, शुद्ध सेरसो-तोरक जे तेल होइए तहूसँ बेसी पौष्टिक सुर्जमुखीक तेल होइए। तेतबे नहि, तोर-तोरीसँ सुर्जमुखीक उपजो बेसी होइए आ दानामे तेलक मात्रा सेहो सेरसो-तोरीसँ बेसी होइए।”
हमर बात ललित भाय कोन काने सुनलैन से तँ ललित भाय जानैथ मुदा बुझि पड़ल जे अपन काजक प्रशंसे सुनि रहल छला तँए मन भीतरे-भीतर खुशी होइते छेलैन।
दोसर दिन भोरे ललिते भाय मन पड़ला। अबैले कहने छैथ। सात बजेसँ काजमे हाथ लगेता। जाएब अछि। मुदा लगले मन मनाही केलक जे केकरो काज करैक काल महाकाल छी, तँए ओइठाम जा काजमे बाधा उपस्थित करब नीक नहि। अपना लूरिये की अछि जे घन्टो-दू-घन्टा रोपैमे मदतिये करबैन। नीक हएत जे साँझू-पहर घुमै-फिरै बेरमे जाएब आ रोपलकेँ देखब।
मास दिन बीत गेल। बीत-बीत भरिक गाछ भऽ गेल। ढकनाएल पातसँ खेत लह-लहा उठल। ओना, एते सतरकी ललित भाय केनहि छला जे जखने गाछ जनैम कऽ धरियाए लगल तखने दड़ी सभकेँ नीक जकाँ देख खोभि नेने छला। तँए कोनो पतिआनीमे एक्को गाछक कमी नहि भेल।
पहिल पटौनी कऽ लेलैन। खेतक उपजाक ओहन रूखि बनि गेल जे साक्षात् लक्ष्मीक वासभूमि बनि रहल छैन।
दू मास बीतैत-बीतैत सौंसे खेतक गाछ भकरार भऽ फुला गेल। मुदा वाह रे हम सभ..! जहिना भोला बाबाकेँ भाँग-धथुरसँ पूजा करै छी तहिना सुर्जमुखी फूलो तँ छीहे। ओतेटा फूल कोन देवताक चानिपर अँटतैन! तँए छोड़िये देब नीक।
दानासँ फूल भरए लगल। ललित भाय नियमित लोक छथिए। तहूमे गीताक बात सेहो मानिते छैथ जे मनुख कर्मे तकक भागी अछि। पछाइत ओकर हिस्सा कटि जाइ छइ। तँए साँझ-भोर दू बेर नित्य खेतक चारू आड़ि घुमि-फीरि देखबे करै छैथ।
मिथिलांचलक के कहए जे सौंसे दुनियाँक सुग्गाक आगमन खेतमे भऽ गेल! सुग्गाक उपद्रव ललित भाय देख रहल छला। मुदा उपाय नइ सुझि रहल छेलैन। हमरा देखते बजला-
“किसुन, आशापर पानि फेर गेल..!”
पुछलयैन-
“से की भाय?”
ललित भाय बजला-
“एक्को कनमा दाना नइ हएत, सभटा सुग्गा खा गेल!”
बजलौं-
“किनकोसँ पुछि नइ नेने छेलिऐन?”
सुखाएल मुहेँ ललित भाय बजला-
“किताबेक बातमे रहि गेलौं। नइ बुझि पेलिऐ।”
¦
शब्द संख्या : 2047, तिथि : 9 मार्च 2018
ई कथा-
‘आशापर पानि फेर गेल’
सगर राति दीप जरय- 97म कथा गोष्ठीकेँ
समर्पित

Tuesday, February 20, 2018

सुभिमानी जिनगी


सुभिमानी जिनगी

भोरे सुति-उठि जीवन काका दरबज्जासँ गाम दिसक रस्ता जे फुटल अछि तैठाम अपन डेढ़हत्थी ठेंगासँ डाँरि खिंचैत बुदबुदेला-
परिवार आकि समाज एक दिस जुटि आगूमे किए ने ठाढ़ हुअए मुदा एको इंच पाछू अपन विचारसँ नइ घुसकब।
ओना, जहिना आन दिन तीन बजे भोरे नीन तोड़ि ओछाइनेपर पड़ल-पड़ल जीवन काका अपन बीतल दिनक हिसाब जोड़ि अबैबला दिनक मुँह-मिलानी करैत भरि दिनक हिसाब लगा लइ छला तहिना आइयो केलैन। मुदा आन दिनक हिसाब आ औझुका हिसाबमे किछु अन्तर आबि गेल छैन। माने ई जे आन दिन जीवन काका अपन भरि दिनक हिसाब परिवारक लीलामे रखै छला मुदा आइ से नइ केलैन। परिवारक संग समाजोक चलैक रस्तापर ठाढ़ भऽ अपन विचारक लकीर खिंचलैन। ओना, जीवन कक्काक अपन विचार ई छैन जे जहिना सभ दिन नव सुर्जक उदय होइए तहिना अपनो जिनगीमे सभ दिन हुअए। जखने दूध नवनीत[1] बनि घृत बनैक दिशामे ऐ आशाक संग बढ़ैए जे अपनो जिनगी घीवाह बनत आ जखन जिनगी घीवाह बनत तखने ने ओकर सार्थकता हएत।
अपन संकल्पक विचार मनमे रोपि जीवन काका डेढ़ियापर डेढ़हत्थी ठेंगासँ डाँरि खींचि दरबज्जाक चौकीपर आबि बैसला। बैसते व्रती जकाँ अपन व्रत मनमे रोपि दृढ़ हुअ लगला जे दुनियाँ किए ने एकभाग भऽ जाए मुदा पर्वतेश्वर[2] जकाँ एक्को डेग पाछू नइ घुसकब। पाछू नइ घुसकैक दृढ़ विचार मनमे रोपाइते जीवन कक्काक नजैर अपन तेसर सन्तान- श्यामापर गेलैन। श्यामा..! श्यामा मनमे अबिते विचड़लैन-श्यामो तँ हमरे सन्तान छी..!’
श्यामाक प्रति विचार मनमे जगिते जीवन कक्काक देहमे जेना उमंगक फुनफुनी जगलैन। फुनफुनी जगिते देह कँप-कँपा उठलैन जइसँ एक दिस दुनियाँ[3]क भय आगूमे ठाढ़ भेलैन तँ दोसर दिस अपन दृढ़ संकल्प सेहो समकक्ष भऽ जिनगीक सोझमे ठाढ़ भेलैन।
जीवन कक्काक तेसर सन्तान श्यामाक लिंग परिचय अखन धरि स्पष्ट नहि भेल छल। बालपनक जिनगी रहने श्यामाकेँ ने खाइ-पीबैमे कोनो तरहक असोकर्ज आ ने मल-मूत्र तियाग करैमे। बच्चा सबहक संग खेलबो करैए आ पढ़ैले स्कूलो जाइते अछि। ओना, रंग-रंगक समाचार अखबार-रेडियोमे अबिते रहैए जे अमुख डॉक्टर ऐठाम लड़का-लड़की भऽ गेल आ लड़की लड़का...।
दस बर्ख बीतला पछाइत आने बाल-बच्चा जकाँ श्यामाक शरीरमे सेहो किशोरी-रूप झलकी दिअ लगल। शरीरो फौदाए लगलै आ मनक झुकाव सेहो लड़की सभ दिस झुकए लगलै। ऐठाम एकटा प्रश्न अछि, प्रश्न अछि जे बच्चा बाल-बुधि धरि लड़का-लड़की संग-संग संगी जकाँ खेलबो-धुपबो करैए आ खाइतो-पीबितो अछिए। ओकरा सभमे लिंग-भेदक कोनो आशंका मनमे रहिते ने छइ। तत्पश्चात लड़काक झुकाव लड़का दिस आ लड़कीक झुकाव लड़की दिस हुअ लगै छइ। ई अवस्था लड़का-लड़कीक प्रेम-मिलनक अवस्थासँ पूर्वक छी। ओना, श्यामाक शरीर-गठनमे नवपन आएल मुदा आनसँ भिन्न रूपमे। अखनो ई स्पष्ट नहि भेल जे श्यामा लड़का छी आकि लड़की। ओना, श्यामाक अपन उमेरक आकर्षण लड़की दिस बढ़ि रहल छल जइसँ केश बढ़ाएब, कनियाँ-पुतराक खेल-खेलाएब इत्यादि-इत्यादि श्यामाक मनक संग बेवहारमे आबए लगलै। अखन धरि परिवारोक नजैरमे श्यामाक असल रूप आ गामो-समाजक नजैरमे झँपाएल छल।
आइ आठ दिनसँ जीवन काकाकेँ हुनक पत्नियोँ आ दुनू बेटो मुँह फोरि कऽ तँ नहि, मुदा कात-करोटसँ सुना-सुना बाजए लगलैन-
श्यामा हमरा परिवारक नहि, हिजरा परिवारक भेल..!’
मंगली काकीमाने श्यामाक माए–जखन असगरमे बैस विचारै छेली तँ देखै छेली जे जहिना जेठ दुनू सन्तानकेँ पेटमे नअ मास सेवलौं तहिना ने श्यामाकेँ सेहो सेवने छी। मुदा..!, ऐमे हमर कोन दोख अछि..? सभ लीला तँ भगवानक छिऐन..!
मुदा लगले जखन बेटा-पुतोहु वा सर-समाज श्यामाक प्रति कहैन जे ई अपना सबहक सन्तान नहि, तखन मंगली काकी सेहो ओही विचारमे भँसिया समाज दिस तकैत श्यामाकेँ अपन नहि बुझि तियाग करैले तैयार भऽ जाइथ..! माइक दिल’, माइक दिल तँ दिन-राति अनघोल होइते अछि, मुदा ओकर बेवहारिक पक्ष की अछि से के देखत..!
श्यामाक प्रति अखन धरि समाजक अधिकांश लोकक यएह धारणा बनल रहल छल जे श्यामा लड़का छी। ओना दुनू परानी जीवन काकाक मनमे बच्चेसँ शंका उठलैन जइसँ केतेको डॉक्टर आ केतेको ओझा-गुनीसँ श्यामाकेँ देखा-सुना चुकल छला। ओझा-गुनी तँ घरक देवताक दोख लगा अपन-अपन पल्ला झाड़लक। मुदा डॉक्टरी जाँच-परताल करौला पछाइत अपन हारि कबुल कऽ डॉक्टर सभ जीवन काकाकेँ कहि देलकैन जे हमरा साधसँ बाहर अछि मुदा अहाँक तँ सन्तान छी, अहाँकेँ ते केतौ भगैक रस्ता नहि...।
डॉक्टरी विचारक पछाइत जीवन काका लड़का-लड़कीकेँ मनसँ हटा सन्तानक सीमापर ठाढ़ भऽ गेला। मनमे कखनो काल किन्नर परिवारक रूप-रेखा अबैन। किन्नर परिवारक रूप-रेखा देख मनक संग देहो काँपि उठैन जे ओ परिवार तँ समाजक हँसियापर अछि! अपना परिवारमे बाप-पुरखाक देल बीस बीघा जमीन अछि, किसान परिवार छी, किसानी जीवन अछि। जेकर धर्म रहलै जे अपन परिवारक भरण-पोषणक कोन बात जे दरबज्जापर आएल आनो-आन खगलोकेँ आ बाटो-बटोहीकेँ खाइ-पीबैक परहेज नहि अछि। धार्मिक वृत्ति समाजक परिवारमे रहबे कएल अछि जे जिनका जएह विभव छैन ओ ओहीमे परिवारक सभ मीलि-बैस खाइ-पीबी। व्यास बाबाक समाज तँ आइ अछि नहि, जे बुझत- लूटि लाउ, कुटि खाउ, प्रात भने फेर जाउ...।
अप्पन आइ धरिक परिवारक जिनगीक धाराकेँ देख जीवन कक्काक मनमे भोरेसँ जहिना दृढ़ता उठलैन जे अपन आँखिक सोझमे अपन सन्तानकेँ भिखमंगा परिवारमे किन्नौं नइ जाए देब, चाहे ऐ खातिर जे हुअए। परिवारे आकि समाजे की कहत। की समाज ई नइ जनैए जे श्यामा हमर तेसर सन्तान छी..?
दरबज्जाक ओसारक चौकीपर जीवन काकाकेँ अकलवेरा[4]मे उमंगित बैसल देख मंगली काकीक मनमे ओहिना हुमरलैन जहिना जेठ मासक रौदक जरल मेघमे हनहनाइत तूफानी दौड़मे करिया मेघ ऊपर चढ़ए लगैए जइसँ धरतियोपर हवा-बिहाड़ि, पानि-पाथर अबैक सम्भावना बनियेँ जाइए तहिना भेलैन। मुदा लगले मन थीर भऽ गेलैन। तैबीच दरबज्जापर पहुँच मंगली काकी जीवन काकाकेँ पुछलकैन-
चाहे पीब आकि पानियोँ पीब?”
ओना आजुक परिवेशमे एहेन विचार मनुखाह बनि मरखाह बनि सकैए। किएक तँ पानि नहि, पीबैक माने किछु खेलाक पछाइत पानि पीबसँ अछि। मुदा से नहि, कृषक बीच अखनो एहेन चलैन अछि जे सभसँ पहिने मुँह-कान धोनौं वा बिनु धोनौं खाली पानि पीबाक चलैन अछि। बिनु मुँह धोनेक माने भेल बाइसे मुहेँ बसिया पानि पीब। तँए हुनकर खतियान एहेन बनि गेल छैन जे भोरमे सभसँ पहिने मन भरि पानि पीबी। पछाइत चाह-पान चलत। तैठाम चाहक संग पानिक चलैन किए रहत? मुदा से नहि, मंगली काकीक मन जीवन कक्काक रूप देख थरथरा गेल रहैन तँए बाजल छेली।
जीवन काका मंगली काकी दिस टकटक देखए लगला जे यएह माए अपन कोखिक सन्तानकेँ भिखमंगाक सन्तान बनबए चाहि रहली अछि। मुदा मनक विचारकेँ मनेमे अरोपि बजला-
चाहो पीब आ किछु गपो-सप्प करब। तँए अपनो चाह एतै नेने आउ। संगे-संग पीबो करब आ...।
ओना संगे-संग चाह पीबैक साहस मंगली काकीक मनमे घटि रहल छेलैन। तँए बहन्ना बनबैत पहिने हिनकेटा-ले गिलासमे चाह नेने पहुँचली।
पतिक हाथमे गिलास पकड़ा मंगली काकी अपने चोटे घुमि आँगन आबि गेली। आँगन आबि चाह तँ पीबए लगली मुदा मन थरथराइते रहैन। मन थरथराइक कारण रहैन दुनू गोरेक बीचक ने परिवार छी, तखन चाहमे किए..?
मंगली काकी घोंटे-घोंटे चाहो पीबैथ आ मनकेँ घटे-घट सकतेबो करैथ। चाह पीला पछाइत दरबज्जापर आबि जीवन कक्काक आगूमे ठाढ़ भेली। ओना, तैबीच काकीक मनमे ईहो जगि चुकल छेलैन जे जहिना पति छैथ तहिना ने बेटो अछि। जहिना पतिकेँ खुश राखब अप्पन दायित्व छी तहिना ने बेटोकेँ राखए पड़त। तँए निर्भिक रूपमे मंगली काकी जीवन कक्काक आगूमे ठाढ़ भेली।
पत्नीकेँ आगूमे ठाढ़ देख जीवन कक्काक मन चकभौर लिअ लगलैन। जहिना धारक मोनिक चकभौरमे कियो-कियो डुमबो करैए, तहिना अकासमे गीध चकभौर लैत चारू दिशा देखबो करैए आ पाहि लगा पहियेबो करिते अछि। जीवन कक्काक मनमे पहिल दिशाक चकभौरमे जगलैन जे पति-पत्नीक बीचक ने परिवारो छी आ सन्तानो छी। मुदा तँए सोभावमे अन्तर नहि अछि सेहो केना मानल जाएत। पुरुखक सोभाव होइए जे जँ अपने वा परिवारक सन्तानेक आगू अबैत बाधा[5]मे सन्तानकेँ संरक्षण दैत अपने आगूमे ठाढ़ भऽ सामना करब, भलेँ परिणाम जेहेन होइ, मुदा पत्नीक की ई सोभाव नइ अछि जे आक्रमिक आगूमे ठाढ़ भऽ सन्तानकेँ दुनू हाथे दुनू हाथ पकैड़ मारि खुआ दइए। ओना, ऐठाम एहेन प्रश्न अछिए जे संरक्षणक रूप केहेन अछि?
फेर दोसर चकभौर जीवन कक्काक मनमे उठलैन। उठलैन ई जे श्यामाक जहिना पिता भेलिऐ तहिना ने पत्नियोँ माए भेलखिन। तैठाम अप्पन चाह की अछि आ पत्नीक चाह की छैन? केकरो बात सुनला पछाइत ओइपर नीक जकाँ विचारबो तँ जरूरी अछिए। विचारक पछाइत हँ-नइक ने निर्णय करब। आकि कियो बाजल जे कौआ कान नेने जाइए आ ओकरा सुनि अपन कान बिनु देखनहि जँ कौआक पाछू-पाछू दौगब, ई केहेन हएत..?
दू भौक टपैत-टपैत जीवन कक्काक मन कनी थमलैन। ओना, ने जीवन काका किछु बजै छला आ ने मंगलीए काकी किछु बजै छेली। मुदा भीतरे-भीतर दुनू बेकतीक मनमे समुद्री तूफान चलिये रहल छेलैन। पत्नीक अलिसाएल-मलिसाएल चेहराक रंग देख जीवन कक्काक मन सेहो पसीज रहल छेलैन। जे एकाएक मन बिहुसि उठलैन। जीवन काका बजला-
एकटा पनचैती अहाँसँ कराएब अछि, घरक बात छी तँए पहिने घरेक लोक ने ओइपर विचार करत। जँ घरमे नइ फरिछाएत तखन ने समाज आकि संसार देखब।
पतिक विचार सुनि मंगली काकीक मनमे एकाएक चमक एलैन। चमक अबिते मनमे उठलैन जे परिवारेक विषयमे ने पतियो विचार करए कहि रहल छैथ। जखने परिवारमे पति-पत्नी मिलि, वैचारिक एकरूपता आनि परिवार चलौत तखने ने ओ परिवार अपना बले ठाढ़ हएत। जइसँ जिनगीक धारा एकबट्ट होइत आगू बढ़ैत चलत। ओना, तैबीच परिस्थितिवश तोड़-जोड़ सेहो चलिते रहत। परिस्थितिक अर्थ भेल- परि+स्थिति’, तँए, जखने परक स्थिति आगूमे औत तखने कनी-मनी डोल-पात हेबे करत...।
मंगली काकी बजली-
बाजू, की कहै छी?”
मंगली काकीक विचार सुनि जीवन काका समधानल प्रश्न रखैत बजला-
अपना दुनू गोरेक बीच केते सन्तान अछि?”
मंगली काकी बजली-
तीन।
बजैक क्रममे तँ मंगली काकी बाजि गेली मुदा लगले मन बेटाक संग समाज दिस बढ़ि गेने तत-मत करए लगली।
पत्नीक ततमती देख जीवन काका बुझि गेला जे पछुआ दाबि रहल छैन। ठिकिया कऽ जीवन काका दोसर प्रश्न रखला-
एतेटा दुनियाँमे अहाँकेँ सभसँ लग के अछि?”
अतीतोमे जे अतीत अछि। जेकर जेहेन परतीत तेकर तेहने ने अतीतो। किए कियो अपन छोड़ि अनका-ले मरैए आ किए कियो अनका छोड़ि अपना-ले मरैए..? धरती-अकासक बीचक क्षितिजमे जहिना केहनो-केहनो उड़न-चिड़ैया फँसि जाइए तहिना मंगली काकीक मन एकाएक फँसि गेलैन। दुनियाँमे सभसँ लग के? अतीतमे वौआइत मंगली काकीकेँ बिआहक अपन मरबा मन पड़ि गेलैन। मन पड़लैन जे ओही मरबापर ने माए-बापक संग समाजो पतिक हाथ पकड़ा कहलैन जे दुनियाँ मेटि जाए मुदा पतिक संग नइ छोड़ब...।
मंगली काकी बजली-
बुझलो बात अनठा किए बजै छी। हमरा बकलेल-ढहलेल बुझै छी?”
मंगली काकीक चपचपाएल बोल सुनि अपन चपचपी मिलबैत जीवन काका बजला-
अहाँ केना बुझि गेलिऐ जे हम अनठा कऽ बजलौं हेन। जे कहैक अछि से पहिने चेतौनी दैत चेता देब।
जीवन कक्काक वाणीमे जेहेन ओज छेलैन तेहने मनो ओजस्वी छेलैन्हे जइसँ मंगली काकीक मनमे भय सेहो जगलैन। भयकेँ जगिते ज्वर-बुखार नपैबला थर्मामीटरक पारा जहिना गरमी पेब चढ़ैए आ ठण्ढी पेब उतैरतो अछि तहिना मंगली काकीकेँ भेलैन। बजली-
अहाँसँ हम कोनो हटल छी। जे कहै छी, जेना कहै छी तहिना ने सुनबो करै छी आ करबो करै छी।
पत्नीक विचार सुनि जीवन कक्काक मनमे उठलैन जे आइ जे समस्या परिवारक सोझामे उपस्थित भऽ गेल अछि ओ नान्हिटा नहि अछि। पत्नीसँ परिवार होइत समाज धरिक बीचक समस्या छी, तँए नान्हि-नान्हिटा विचारमे ओझराएब उचित नहि...।
जीवन काका बजला-
सुनबामे आएल अछि जे अहूँ श्यामाकेँ अपन सन्तान नहि बुझि तियाग करैले तैयार छी?”
पतिक बात सुनि मंगली काकी सहैम गेली। करेजक संग विचारो डोलायमान हुअ लगलैन। की बाजब आ की नइ बाजब तैबीच मंगली काकीक विचार ओझराए लगलैन। किछु बजैक साहसे ने भऽ रहल छेलैन।
मंगली काकीकेँ चुपी साधल देख जीवन काका बजला-
चुप रहने काज चलत! मुँह खोलि बाजू जे अहाँ की चाहै छी। कियो अपने विचारक ने मालिक अछि।
थरथराइत मने मंगली काकी बजली-
अपन बेटो आ समाजोक लोक श्यामाकेँ अपन नहि बुझि दोसराक कहि रहल अछि! तैबीच..?”
पत्नीक झूकैत विचार सुनि जीवन काका दृढ़ भऽ बजला-
चाहे ओ बेटा हुअए वा समाज, कान खोलि कऽ सभ सुनि लिअ जे श्यामा हमर सन्तान छी, सन्तान बनि रहत। ई हमहूँ बुझै छिऐ जे श्यामा नि:सन्तान रहत, मुदा तँए ओ मनुख नहि छी आ मनुखक जिनगी नहि जीब सकैए, हम तेकरा मानैले तैयार नहि छी।
पतिक दृढ़ विचार सुनि मंगली काकीक मनमे सेहो दृढ़ता आबए लगलैन, एकाएक अपन कोखिक संतप्त श्यामापर मन एकाग्र हुअ लगलैन। एकाग्र होइते मनमे उठलैन- श्यामेटा एहेन सन्तान थोड़े छी, दुनियाँमे एहेन बहुत लोक अछि जेकरा प्रकृत्ति प्रकोपसँ सन्तानोत्पतिक शक्ति नइ छइ। तँए ओकरा परिवार वा समाजसँ वहिष्कृत करब कहाँ धरि उचित हएत...।
तैबीच जीवन काका बजला-
पहिने अहाँ ई कहू जे अहाँक मनमे की अछि। की श्यामाकेँ अपन सन्तान नइ बुझि छोड़ैले तैयार छी?”
पतिक दृढ़ विचार पेब बिना किछु आगू-पाछू तकने मंगली काकी बजली-
श्यामा की कोनो हमरेटा सन्तान छी आ अहाँक नहि छी।
ढलानपर सँ टघरैत पानिक रोकाबतेँ देख जीवनानुभवी लोक जहिना छील-छील कऽ चिक्कन बना-बना एकबट्ट करैत छिड़ियाएल पानिकेँ धरिया धाराक रूपमे आगू बढ़बै छैथ तहिना जीवन काका मंगली काकीक छिड़ियाएल विचारकेँ समेट बजला-
पूबक सूर्ज पच्छिम किए ने उगइ, जमीनक पानि अकास सिर किए ने चढ़इ मुदा श्यामाकेँ अपन सन्तान छोड़ि ने अनकर बुझब आ ने अनका हाथ जाए देब।
विस्मित होइत मंगली काकी बजली-
लोक की कहत..!”
मंगली काकीक विचार सुनि जीवन कक्काक अन्तरात्मा जेना ओहन बिजलोका जकाँ चमकलैन जेहेनमे ठनका खसैए। बजला-
लोक की कहत! लोक पहिने अपन ठेकान करह। जेकरा अपन ठेकान नइ से अनकर ठनका रोकि सकैए आकि अपनाकेँ बँचा सकैए।
पतिक विचार सुनि मंगली काकी सिरसिराए लगली। एकाएक देहमे सिरसिराएल कँपन हुअ लगलैन। कँप-कँपाइत पुछलखिन-
की लोकक ठेकान?”
पत्नीक जलियाएल विचार सुनि जीवन कक्काक मनमे कुवाथ नहि भेलैन। तेकर कारण अछि जे जीवन कक्काक विचार सागरमे लहैर जकाँ उठि गेल छेलैन। लहराइत विचारमे आबि रहल छेलैन जे जँ मनुख छोट-सँ-छोट आ पैघ-सँ-पैघ अपन जिनगीक रस्ताक बाधाकेँ अपना आँखिये ठिकिया मनसँ हटबए चाहत तँ ओ जरूर हटा जिनगीकेँ बाधामुक्त कऽ सकैए। जखने जिनगी बाधामुक्त भेल तखने ने ओ जिनगी घोड़ाक चालिमे सरपट दौड़ लगौत...।
जीवन काका बजला-
जे समस्या अपना परिवारमे उपस्थित भऽ गेल अछि ओ खाली अपने परिवार-टा मे भेल आकि आइये भेल अछि आ पहिने नइ भेल हएत से केना बुझै छिऐ? सभ दिन होइत आबि रहल अछि आ आगूओ होइत रहत। महादेवकेँ सेहो अर्द्धनारीश्वर कहल जाइ छैन। जखने अर्द्धनारीश्वर तखने ने सन्तान विहीन! कार्तिक आ गणेश तँ तखन भेलैन जखन महादेव आ पार्वती दुनू दू छला। मुदा जखन दुनू सटि एक भेला तखन कोनो सन्तान नइ ने भेलैन। तँए की हुनका देववंशसँ कियो हटा देलकैन आकि हटा देतैन?”
ओना, मंगली काकीकेँ महादेव-पार्वतीक ओ कथा (माने अर्द्धनारीश्वरबला कथा सुनल रहैन मुदा एना भऽ कऽ नहि, ई नइ बुझल रहैन जे अर्द्धनारीश्वर की। तँए, धार-कातक पँकियाएल चपचपीमे जहिना चँङ्गुराएल चिड़ौयो आ पैरबला जानवरक संग लोको चपि कऽ गड़ि जाइए, तहिना मंगली काकी सेहो चपि कऽ गड़ि मुँहपर हाथ लैत बजली-
ऐँ.अ..अ..!”
जीवन काकाकेँ जेना सहगर खेतक लभगर हाल भेटलैन तहिना बजला-
ऐँ-टेँ नइ करू! वएह शिवजी महादेव छैथ जे देखलखिन जे जे कृष्णजी महिला संगठनक नेता छैथ ओ महिला छोड़ि पुरुखक प्रवेश रोकने छैथ, तखन ओ की केलैन से बुझल अछि?”
विचारक बोनमे हेराएल-भोथियाएल बेटोही जकाँ मंगली काकी बजली-
नइ! अहूँ ने तँ कहियो कहने छेलौं।
जीवन काका बजला-
कोनो कि एकेटा गप अछि जे ओ छुटि गेल ते बड़ जुलुम भऽ गेल। जखने जागी तखने परात..!”
उत्सुकाएल मंगली काकी बजली-
पहिने शिवशंकर दानीक कथा कहि दिअ।
पत्नीक चपचपी देख चपचपाइत जीवन काका बजला-
शिवसँ शिबानी बनि कृष्णजीक महिला संगठनमे शामिल भऽ गेला..!”
मंगली काकीकेँ जेना एकाएक भक् खुजलैन तहिना बजली-
एहेन बात जे अहाँ पेटमे रखने छेलौं आ कहियो एतबो सिनेह नइ भेल जे हमरो कहितौं..!”
पत्नीक झुझुआइत मनकेँ जीवन काका पकैड़ बिच्चेमे बजला-
पेटमे कि एतबे अछि। अच्छा जखन अहाँ पेटक बात लिअ चाहै छी ते सुनू। ई तँ शिवशंकर महादेवक विषयमे कहलौं। आब सुनू महाभारतक विषय।
महाभारतक नाओं मंगली काकी सुनने जरूर छैथ आ द्रौपदीक चिरहरणक सिनेमो देखने छैथ। तँए, महाभारतक नओं सुनि आरो जिज्ञासा बढ़ि गेलैन। बजली-
सुनाइये दिअ। जिनगीक कोनो ठेकान अछि, जँ मन लगले चलि जाएत तखन तँ अनेरे ने भूत बनि लपकबै।
मुस्की दैत जीवन काका बजला-
जखन महाभारत होइत रहै ने, तइमे एकटा वीर रहै शिखंडी, ओहो अपने श्यामा जकाँ छल। ओ की केलकै से बुझल अछि?”
मुड़ी डोलबैत मंगली काकी बजली-
नइ..!”
जीवन काका बजला-
कृपाचार्योकेँ आ कृतवर्मोकेँ छेरा-छेरा भरौलक!”
मंगली काकीक मनमे जेना आत्मबल फुलाए लगलैन तहिना बिहुसैत बजली-
अरे वा..!”
जीवन काका मंगली काकीक मनमे पसि बजला-
ऐँ., एतबेमे हदिआइ छी! भगवान राम जखन बोन जाए लगला तँ अन्तिम विदाइ अयोध्यावासी लैत-दैत पुरुख-नारी कहि तँ सभकेँ विदा कऽ देलखिन आ अपने दच्छिन मुहेँक रस्ता धेलैन, आ बीचमे किछु गोरे ओहिना ठाढ़े रहि गेल, ओ की केलक से बुझल अछि?”
मंगली काकी बजली-
नइ..!”
जीवन काका बजला-
ओ सभ–जे ठाढ़ छल से–के सभ छल? जे पुरुख-नारीक बीचक अछि। जेकरा शखा-सन्तान नइ हएत। जखन रामचन्द्रजी, लक्ष्मण आ सीताक संग घुमि कऽ अयोध्याक आड़िपर पहुँचला तखन वएह सभ दुनू भाँइक गट्टा पकैड़ कहलकैन जे अहाँ हमरा किए ने विदाइ देलौं? जइ आशामे अहीं जकाँ चौदह बर्ख हमहूँ सभ टपला खेलौं?”
मंगली काकीक मनो आ शरीरो जेना शान्त भऽ गेलैन। बजली-
जे अहाँ करबै सएह ने हमहूँ करब।
रणभूमिक संगी पेब जीवन काका बजला-
श्यामा हमर सन्तान छी। अपना जीबैत ओकरा भीख माँगैत देखब, की ओहन लाजक विचार लोक अपने नइ करत। दुनियाँ एक दिस भऽ जाए, मुदा...। जाबे धरि श्यामा पढ़ए चाहत, समांग बुझि सहयोग देबइ। जहिया ओ पढ़ाइ छोड़त तहिया अपना आँखिक सोझमे ओकरा मनोनुकूल जीबैक साधन बना देबइ। अपना पैरपर ठाढ़ कऽ समाजक ओहन मनुख बना देबै जे अपन श्रमसँ अपन सुभिमानी जिनगी बना जीबत आ ओकर रक्षा करैत रहत।
¦
शब्द संख्या : 2767, तिथि : 28 जनवरी 2018


[1] मक्खन
[2] चन्द्रगुप्त नाटक- जयशंकर प्रसाद
[3] परिवार-समाजक
[4] अकलबेराक माने ऐठाम भेल, भिनसुरका समैयक जे क्रिया-कलाप अछि, तइसँ भिन्न
[5] सन्ताप

Sunday, December 17, 2017

किछु ने फुरैए

प्रस्तुत अछि, छिआनबेअम सगर राति दीप जरयमे पठित पहिल कथा-

किछु ने फुरैए

अढ़ाइ मासपर गोपीलाल इलाज करा कऽ पटनासँ घुमल छल। पटनाक इलाज सुनि अचरजो लागल आ खुशियो भेल। अचरज ई जे पटना सन शहरमे अढ़ाइ मास तक रहि, गामक एकटा अदना आदमी अपन शरीरक इलाज करौलक। मुदा ई तँ गामक उपलब्धि भेबे कएल तँए खुशी भेल। जे गोपीलाल दू पीढ़ीसँ, अंग्रेजक जमानासँ लऽ कऽ आइ धरि गामक चौकीदारक रूपमे जिनगी बितौलक ओ आइ केतए अछि, तँए कनी बुझैक जिज्ञासा सेहो भेल। तैसंग ईहो भेल जे समाजक रूपमे अपनो किछु दायित्व बनैए। गोपीलालसँ भेँट करए, पटनासँ एलाक दोसर दिन गेलौं।

गोपीलालकेँ भीतघर। ओना, दरबज्जो भीतेक अछि, बड़ सुन्नर, बड़ बेस, दस गोरेक बैइसैबला। दरबज्जा खाली देख मन झुड़झुड़ा गेल। झुड़झुड़ा ई गेल जे भरिसक गोपीलाल बेमारी लइये कऽ घुमल अछि, जँ दऽ कऽ घुमल रहैत तँ दरबज्जापर रहितए। मुदा जखन भेँट करए एलौं, तखन बिनु भेँट केने घुमबो केहेन हएत। तहूमे जँ अढ़ाइ मासमे रोग आरो मोटा गेल होइ तखन तँ आरो जरूरी भेँट करब भाइये जाइए। फेर भेल जे डॉक्टर लग रहि रोग मोटा जाएत, तँ ऐमे डॉक्टरक कोन दोख। ओना, अपनो दोख नहियेँ। जेते चीनी देबै तेते ने मीठ हेतइ। आ जँ नहियेँ देबै, आकि थोड़े-थाड़ चीनी देबै आकि नूनू मिला देबै ई तँ अपन भेल किने। दस रंगक दवाइ जहिना दस रंग काज करैए, तइमे कोनो जरूरी छइ जे मलेटरी जकाँ कतार बन्दी चलए। तीर्थ स्थानक मेला छी, लोकक भीड़ रहबे करत, तइमे ऍंड़ी-दौड़ी लगबे करत किने। तहूमे डॉक्टर रोग छोड़बैबला दवाइ तँ नहि छी, तखन दोखे किए...। तैबीच जीबछ भायकेँ देखलयैन जे गोपीलालक भेँट करए ओहो आबि रहला अछि।

जीबछ भायकेँ देख मनमे आरो हूबा भेल। फरिक्केसँ बजलौं-

“गोर लगै छी जीबछ भाय।”

दरबज्जेपर ठाढ़ रही, पारखी जीबछ भाय बुझि गेला। कहलैन-

“ऐठाम किए ठाढ़ छह?”

कहलयैन-

“दरबज्जा देख धकमका गेलौं?”

रेहल-खेहल जीबछ भाय छथिये, धड़धड़ाइत आँगन दिस बढ़ैत बजला-

“अखन अँगने ने दरबज्जो बनि गेल अछि। तखन तँ एतबे परहेज करब जे चारि डेग पाछूए-सँ हिया कऽ देख लेब जे कोन गप केकरा मुहेँ केहेन चलि रहल अछि, तइ अनुकूल अपनाकेँ समाहित करब।”

जीबछ भाइक विचार नीक लागल। पाछू-पाछू विदा भेलौं। अँगनाक मुहसँ चारि डेग पाछुए रही कि पुबरिया घरक ओसारक एक भागक चौकीपर बैसल गोपीलालकेँ देखलयैन आ दोसर भागमे आठ-दसटा बैसल स्त्रीगण। बेसीकाल सँ बैसल स्त्रीगण सबहक दरबारमे गोपीलालक बेमारीक विचार तर पड़ि गेल छल आ अपन-अपन जिनगीक गप चलि रहल छल।

जीबछ भाय आगूमे ठमैक कऽ ठाढ़ होइत आँखिक इशारासँ हमरा सचेत केलैन। भोजपुरवाली आ सुपौलवालीक बीच अपन-अपन मातृभूमिक बड़ाइ दुनू गोरे अपना-अपना ढंगे करैत छेली, जइ बीच भाषा आबि झगड़ा ठाढ़ केने छल। छुच्छे मुँहक गप झूठो भऽ सकैए मुदा जे लिखितमे अछि ओ केना झूठ हएत। दुनूकेँ अपन-अपन पढ़ल रहबे करैन। जखने भाषा औत तखने भोजन औत आ जखने भोजन औत तखने ओकर सुआद सेहो एबे करत। सुआद अबिते भोजपुरवाली बजली-

“मिरचाइक सुआदक जेवरात ओकर तीतपन छिऐ।”

सुपौलवालीकेँ अनसोहाँत लगलैन। अनसोहाँत ई लगलैन जे जँ मिरचाइक सुआदकेँ ‘तीत’ कहबै तँ करैलाक सुआदकेँ की कहबै? बजली-

“अपना मनक मौजी आ बौहकेँ कहलौं भौजी..! अहींटा केँ कहलासँ नइ ने हएत।”

ओना, कहा-कहीमे आठो-दसो स्त्रीगण दस दिस छिड़ियाल तँए अपना बेथे सभ बेथाएल। जइसँ चुपा-चुपी पसरले छल, मुदा ई दुनू[1] अपन राग-तान तँ पकड़नहि छेली...।

खखास करैत जीबछ भाय अँगना पहुँचला, आ बिनु खसासे जीबछ भाइक पीठपर अपनो पहुँचलौं।

आठो-दसो स्त्रीगणकेँ बैसल देख बजलौं-

“जीबछ भाय, लोकमे काफी जागरूकता आबि गेल। एना जँ बर-बेमारीमे जिगेसा-बात हुअए तँ तेलोसँ चिक्कन हएत किने?”

‘तेल’क नाओं सुनि तिलियाइत जीबछ भाय बजला-

“कोन तेलसँ केते चिक्कन हएत से कहाँ कहलह, जे खाइबला तेलसँ चिक्कन हएत कि पीबैबलासँ, आकि मालिस करैबला तेलसँ हएत कि देह-हाथमे सभदिन लइबलासँ। मुदा अखन एकरा छोड़ह।”

चामक मुँह छीहे बजबजा गेल। ओना, चामोक मुँह चान सन सेहो अछि मुदा से नहि, बजा गेल-

“जीबछ भाय, जँ सोझे महककेँ एना छोड़ैत जेबै, सेहो नीक नहियेँ।”

हमर बातसँ जीबछ भायकेँ कुवाथ नइ भेलैन। मुस्की दैत बजला-

“सभ दिन तोहू अनाड़ी-के-अनाड़ीए रहि गेलह..!”

जीबछ भाइक मुहेँ ‘अनाड़ी’ सुनि मनमे परपन शुरू भेल। मन हरियाए लगल, खुशियाए लगल। जइसँ जेहने खुशी मनमे खुशियाएल तेहने ठोरसँ निकलल-

“दुनियाँमे जेते ढोल अछि भाय, ओते तँ बजौनिहारो ने अछि।”

ओना, जहिना बहैत धारमे सड़लसँ पाकल धरि सभ-पानि एकेगतिये भँसियाइत चलैए तहिना सड़लसँ पाकल धरि सबहक रस्तो नमहर अछि किने। तँए, सभकेँ एक्के गुण-धरम मानल जाएत..?

बजैत-बजैत जीबछ भाय बिच्चे धारमे रूकि गेला। पाछूसँ धकियबैत बजलौं-

“भाय साहैब, बिच्चे पाँतरमे किए रूकि गेलौं, गाड़ीक पेट्रोल सठि गेल?”

जहिना हम धकियौने छेलिऐन तहिना ओहो धकियबैत बजला-

“अपन एकटा बात बीचमे आबि गेल से पहिने कहै छिअ। पैछला बातकेँ ताबे पराग्राफ बना थामह। एक दिन कानमे टनकी उठल। हहाइत-फुहाइत जा ओछाइपर पड़ि रहलौं। पड़ल देख पत्नी जोरसँ बजली- ‘की भेल?’ बगले घरक दोसर गोरे रस्तेपर ठाढ़ सुनली, ओहो कनी जोर लगा बजली। सौंसे टोल समाचार पसैर गेल। काने टनक छल। एके-दुइये सतरहटा जनानी जिगेसा करए पहुँचली। पुरुख सुनला कि नहि, मुदा एको गोरे नइ पहुँचला। अपन जिगेसा छल तँए सबहक बातक संग विचारो सुनए पड़त। सतरहो गोरे सतरह रंगक दवाइ बता देलैन। तखन बुझि पड़ल जे दुनियाँमे कोनो साइंस बढ़ल तँ ओ मेडिकल साइंस बढ़ल। जेते मनुख तेते डॉक्टर..! बता तँ देलैन मुदा एकटा भेटत हिमालय पहाड़मे आ दोसर भेटत जगरनाथ लगहक समुद्रमे, मुदा आनत के? लंकासँ जे हनुमानजी आमक आँठी-सभ फेकलैन, से रोपने के केते अछि..!”

जीबछ भाइक बात सुनि जेना अपनो मनमे भेल जे दुनियाँक साए बेबकूफमे एकटा हमहूँ छी, जे एलौं हेन गोपीलालक बीमारीक जिगेसा करए आ सुनि रहल छी मौग-मेहरीक इलाज..!

ओना, सौंसे ओसार भरल लोक छल तँए किछु बजलौं नहि, तैबीच जीबछ भाय गोपीलालकेँ पुछलखिन-

“गोपी, रोगक की हाल?”

गोपीलालक मन रोगसँ रोगियाएल छल आकि लोक देख मन सोगियाएल छल से तँ गोपीलाल जानए। मुदा अनजानमे आकि जानि कऽ गोपीलाल बाजल-

“भाय साहैब, किछु ने फुरैए..!”

गोपीलालक बात सुनि जीबछ भाय चौंकला। मनमे फुटलैन- ‘अरे बाप! ई तँ परती खेतक भाँजमे पड़ि गेलौं! ओ हमर अगुताइ मानत..?’

जीबछ भाय बजला-

“गोपी, अखन अपनो चैन नइ छी आ बहुत लोक बैसलो छैथ, तँए अखन छुट्टी दएह। काल्हि तँ कनी मधबनी जाएब, परसू भिनसुरके पहर आबि सभ गप करब।”

जीबछ भाय तँ कनछी काटि कौल्हुका भॉंज मेटा लेलैन मुदा असगरे जीबछ भाय नइ ने छैथ, अपनो छी किने। मनमे उठल- एक तँ जिगेसा करए एलौं, सेहो जँ नीक जकाँ नहि कऽ पेलौं तखन एबे किए केलौं। गोपीलालकेँ की कहबै? मुदा लगले फेर भेल जे जखन जिगेसा करए एलौं, तखन जँ जिज्ञासु मनमे बिनु धाराक धारक चहटी जकाँ प्रवाहे रूकि जाएत तखन धरियाएत केना? बजलौं-

“गोपीलाल, जीबछ भाइक परसुका भाँज भेलैन आ हमर कौल्हुका रहल।”

दुनू हाथ जोड़ने गोपीलाल ओसारपर ठाढ़े रहल दुनू गोरे विदा भेलौं।

आँगनसँ निकैलते जीबछ भाय बजला-

“श्याम, गोपीलालक वंशक खेरहा केते बुझल छह?”

जीबछ भाइक बात सुनि दलिदर भीखमंगा जहिना बजैए जे तीन दिनक भूखल छी, तोहूसँ टपैत बजलौं-

“भाय साहैब, गोपीलालकेँ सोझे बुझै छी जे गामक चौकीदारो छी आ घरो गामेमे अछि।”

गोपीलाल गामक चौकीदारक पीढ़ीमे दोसर नम्बरमे छैथ। पहिल नम्बरपर हुनकर पिता रहथिन जे अंग्रेजक हुकूमतक समए नियुक्त भेल छला। निम्न जातिक परिवार, कहैले पनरह रूपैया दरमाहा रहैन मुदा ओ रहै बेठेकान, एक तँ मासे-मास भेटै नहि, दोसर- सरकारी तंत्रसँ जुड़ल सेहो नहि रहै, सर्किलक हिसाबसँ असेसर होइत रहै जे ओइ क्षेत्रक जमीनदार सबहक परिवारसँ जुड़ल रहैत। चौकीदारी टैक्सक रूपमे गामक किसान सभसँ तसीलल जाइत आ चौकीदारकेँ दरमाहाक रूपमे भेटैत छल। पहचानक रूपमे एकटा मुरेठाक कपड़ा सेहो देल जाइत रहइ।

पहिल पीढ़ीक अन्त भेल, देशो अजाद भेल। मुदा ओ ओहिना-के-ओहिना, माने जेहने जिनगी जीबै छल तेहने रहि गेल। ओही चौकीदारक दोसर नम्बरक माने दोसर पीढ़ीक चौकीदार गोपीलाल छी।

स्वतंत्र भेला पछाइत देशमे उथल-पुथल भेबे कएल। किछु ऊपर उठल, किछु निच्चॉं धँसल। मुदा जे भेल, जेतए भेल...।

गोपीलाल जेहने छोट खुट्टीक तेहने देहोक एकहारा तँए जुआनो होइमे देरी लगलैन आ जुआन भेला पछाइत जुआनियोँ बेसी दिन टिकबे केलैन अछि। जँ जन्म-कुण्डली ठीक-ठाक रहितैन तँ आठ बर्ख पहिनहि सेवा-निवृत्ति भऽ गेल रहितैथ, मुदा से नहि, अड़सैठ बर्खमे चलितो गोपीलालक अखन तीन साल नोकरी आरो बाँकी छैन।

दोसर दिन, भिनसुरका पहरक चाह-पान केला पछाइत जखन दिनक रूटिंग मिलेलौं तँ काजक सूचीमे पहिल नम्बर गोपीलालक बेमारीक जिगेसा करब छल। जे उचितो छल। जीवनमे जहिना भोजनकेँ प्रमुखता रहितो बेमारीकेँ प्रमुख मानल जाइए तहिना, बेमार गोपीलालक जिगेसा करबकेँ प्रमुख मानि विदा भेलौं।

संजोग नीक बैसल। महिला जगतकेँ भानस-भात, नोकरी-चाकरी करैक पहर रहने गोपीलालक ऐठाम मेला-ठेला जकाँ भीड़-भार कम छेलैन्हे। अनुकूल मौसम पेब मन खुशी भेल जे भरि पोख गप-सप्प करैक सुसमय भेटल।

जइ चौकीपर गोपीलाल बैसल छल तहीपर जा बैसलौं। ओना, गोपीलालक नातिन कुरसी अनलक, भाय! बेमारीक अवस्थामे जँ डॉक्टर-ओकील जकाँ बैसैक कुरसी तकता तखन तँ भेल रोगक इलाज! ओना, अपना ऐठाम एहनो तँ धारणा बनल ऐछे जे पैघसँ पैघ रोगकेँ छुतहा रोग[2] बुझि लोक रोगी लग जाइसँ परहेज करए चाहैए। चौकीपर बैसिते गोपीलाल बजला-

“भाय साहैब, किछु ने फुरैए..!”

गोपीलालक बात सुनि मन पड़ल जे काल्हियो यएह बात गोपीलाल बाजल छल आ आइयो यएह बात बाजल। जरूर किछु तेहेन विचार रोगक जड़िमे अछि जे बेर-बेर गोपीलालक मनमे अँकुर रहल छइ। ओना, अँकुरो-अँकुरोमे अन्तर अछि। तँए केकरो डिम्ही, केकरो अँकुर, केकरो अँखुआ आ केकरो गाछ कहले जाइए, तँए केकरो केलहा मन पड़ै छै तँ केकरो करैक इच्छा मन पड़ै छै आ केकरो संकल्पित काज पछुआइत देख मन पड़ै छइ। खाएर जे छै, जेतए छइ से तेतए छइ, ऐठाम गोपीलालक बात अछि।

बजलौं-

“गोपी, अपने तँ अनुभव करैत हेबह ने जे एना किए पछड़लौं?”

हमरा पुछैसँ पहिनहि गोपीलालक मन बेसी बेथित रहै आकि पुछला पछाइत भेलै, ई गोपीलाले जानत, मुदा तैयो हुब-हुबाइत बाजल-

“भाय साहैब, जखन पुछलौं तँ सभ बात कहिये दइ छी।”

बजैत-बजैत बिच्चेमे पत्नीपर गरैज उठल-

“भाय साहैबकेँ एक घन्टासँ बेसी एना भऽ गेलैन आ हिनका चुल्हिकेँ लोहारक लोहा छुबि देने छैन!”

हमरा रोचे आकि घरबलाक रोचे बेचारी नातिनक हाथे लगले दू कप चाह पठा देली।

एक घोंट चाह पीब गोपीलाल अपन दहीन हाथ देखबैत बाजल-

“भाय साहैब, ऐ हाथसँ बहुत काज जिनगीमे केलौं।”

काजक चर्च होइते बजा गेल-

“वाह, वाह बहादुर।”

पहड़िया बहादुर बुझि आकि अपन बहादुरी बुझि गोपीलाल बाजल-

“जहिना बाबू पनरह रूपैआक नोकरीक संग परिवारो देलैन तहिना हमहूँ आइ धरि निमाहैत एलौं। भाय सभ छँटगर होइत गेल, परिवार अलग करैत गेल। पाँचटा अपनो बेटा-बेटीकेँ पोसि-पालि, बिआह-दान करा देलिऐ।”

बजलौं-

“यएह सभ ने परिवारकेँ जीवित रखैक जीवन देब भेल। अही जीवनसँ ने परिवारक संग समाजो जीबैए, जैपर समाजक नींव सेहो ठाढ़ होइए।”

गोपीलाल पाशा पलैट बाजल-

“भाय साहैब, जहियासँ नोकरी शुरू केलौं, तहियासँ कि कोनो एक्केटा हुज्जैत भेल, बुझि पड़ैए जेना गाममे सभसँ हुजतिया हमहीं छी। जेना हम सभ आन देशक लोक होइ तहिना ने अपनो देशमे गुलामीक गनजन होइते अछि।”

गोपीलालक विचारधारा देख मनमे भेल जे भरिसक गोपीलालक सभ रोग छुटि गेल अछि। बजलौं-

“से की?”

गोपीलाल बाजल-

“पनरह रूपैआक नोकरी आइ पनरह हजार भेल, से कि अहिना भेल। नीक जकाँ ते मन नइ अछि मुदा सात-आठ बेर जहल जरूर गेल हएब। ओना जहलोमे कम दुर्गैत भेल सेहो नहि। जहिना नरकोमे ठेलम-ठेल होइए तहिना जहलोमे भेल। चिन्हरबा चोर सभकेँ जखैन सोझा पड़ियै आ कि चारिटा गारि ओहो पढ़ए आ चारिटा हमहूँ पढियै।”

बजलौं-

“एक्के घरमे सभ रहै छेलहक?”

गोपीलाल बाजल-

“सरकारक ने जहल छी, सभकेँ ने एक्के रंग अधिकार अछि।”

गोपियेलालक बातकेँ उनटबैत बजलौं-

“गोपी, ई नहि बुझि पेलौं जे किए कहलह जे किछु ने फुरैए?”

जेना गोपीलालो अपन बात कहैले तैयारे रहए तहिना बाजल-

“भाय साहैब, ऐ बातक जवाब पछाइत देब, पहिने दोसर सुनि लिअ।”

हुँहकारी भरैत बजलौं-

“बड़बढ़ियाँ बाजह।”

एकाएक जेना गोपीलालक चेहराक रंग उतरए लगल। जेना ट्यूवेल वा बोरिंगक पाइप धरतीमे गाड़ैकाल तर मुहेँ सरसराइतो आ केतौ-केतौ ठमैकतो बढ़ैए तहिना गोपीलालक मन सेहो अपन बेमारी दिस बढ़ए लगल। बाजल-

“भाय साहैब, तीन सालसँ जहिना दरमाहा बेसी भेल तहिना दुनू परानी तेना रोगा गेलौं जे खरचे बेसिया गेल। मुदा संतोख अछि जे कर्जा-बर्जा नइ होइए, कहुना काज ससारैत चलै छी।”

बजलौं-

“यएह ने भेल तोरा सन काबिल लोकक काज।”

‘काबिल’ सुनि जेना गोपीलालक कबिलैती घोंसरए लगलै तहिना बाजल-

“भाय साहैब, दरमाहा लोभे नोकरी नइ छोड़ै छी, तीन सालसँ दवाइयो चलैए आ ड्यूटियो करै छी। मघारिमे केहेन शीतलहरी भेल से ते देखले अछि। सात दिनक ड्यूटी एनएचपर भऽ गेल। तेहेन ठंढी लागल जे जान बँचब कठिन भऽ गेल। तखन पटना गेलौं, ओतुके इलाजसँ अखनो जीबै छी।”

बजलौं-

“बेटाकेँ किए ने नोकरी दऽ दइ छहक?”

गोपीलाल बाजल-

“तीनटा बेटा अछि। भैयारीमे हम जेठ छेलिऐ तँए बाबू हमरे नोकरी देलैन आ हमहूँ भाय सभकेँ परिवार ठाढ़ कऽ देलिऐ।”

बजलौं-

“ई की कोनो चोरौल बात अछि।”

‘चोरौल बात’ सुनि जेना गोपीलाल हिया हारि देलक तहिना बाजल-

“बाबूक अमलदारीमे चारू भाँइ एकठाम छेलौं, तँए बँटवारामे कोनो राहु-केतु नइ लागल। मुदा अपन तीनू बेटा भीन अछि! अखन काजुल छी तखन तँ कियो देखते ने अछि आ काज छुटलापर के देखत।”

वजनदार विचार गोपीलालक बुझि पड़ल। मुदा जँ कहीं नोकरीक बिच्चेमे मरि गेल तखन तीनू बेटाक बीच की हएत? बजलौं-

“नीक हेतह जे अपना जीविते तय-तसफिया कऽ लेबह।”

गोपीलाल बाजल-

“तही ओझरीमे तेना ओझरा गेल छी जे किछु फुरबे ने करैए।”


शब्द संख्‍या : 2091, तिथि : 12 नवम्बर 2017


[1] भोजपुरवाली, सुपौलवाली

[2] छुतहा रोगक माने संक्रामक रोग।