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Tuesday, August 14, 2018

मानसरोवर यात्रा, साभार गपक पिलयाहुल लोक कथा संग्रह


मानसरोवर यात्रा
परिवारक सात भाँइक भैयारीमे वैज्ञानिक भाय–माने जीतनलाल भाय– जेठ छैथ, जे दिसम्बरमे सेवा निवृत्ति भऽ भाभा शोध संस्थानसँ गाम आबि गेला। बच्चेसँ प्रखर बुधिक रहने जीतनलाल भाय गामक स्कूलसँ एम.एस-सी.तक प्रथम स्थान पबैत रहला। ओना, शुरूमे माने हाइ स्कूलसँ कौलेज धरि मनमे यएह विचार रोपने छला जे एम.एस-सी.क पछाइत कौलेजमे नोकरी करब, प्रोफेसर बनब। मुदा एम.एस-सी.क रिजल्ट निकैलते भाभा शोध संस्थानमे भेकेन्सी भेल, जीतनलाल भाय अप्लाइ केलैन आ सलेक्ट भऽ गेला।
अड़तीस बर्खक सेवाक पछाइत वैज्ञानिकजी 5 दिसम्बरकेँ संस्थानसँ सेवा निवृत्ति भेला। जुलाई मासक पहिल सप्ताह, आद्रा नक्षत्र काल्हिये समाप्त भेल। सालक अखन तकक जे मौसम रहल माने बरसातक, ओ अनिश्चित रहल। अनिश्चित भेल जे ऐगला समय माने बरसातक केहेन हएत तेकर अनुमान ठीक-ठीक नइ लागब। जहिना भिनसुरका सुर्ज देखलासँ लोक अनुमान तँ कइये लइ छैथ जे औझुका दिन केहेन हएत। तहिना सालक तीनू मौसमक सेहो अछि। तीन मौसम भेल जाड़, गरमी आ बरसात। कोनो मौसमक, पूर्व पक्ष माने चारि मासक मौसममे शुरूक जे एक-सवा मास होइए, ओकर सीख-लीख पकैड़ लोक अनुमान लगा लइ छैथ जे मौसमक ऐगला रूप केहेन हएत, से नइ भेल। किए तँ अखन तक जे समय बीतल छल ओ ने रौदियाहेक आभास दइ छल आ ने तेहेन विकराल बरसातेक। शुरू जेठमे एकटा नमहर बरखा भेल जइसँ किसान सभ अपन गरमाधानक बीआसँ लऽ कऽ अगहनी-धानक बीआ तक पाड़ि लेलैन। ओना, बीआ पाड़ला पछाइत केते गोरेक मुहसँ निकलल छेलैन जे ऐबेरक समय सवारी हएत जइसँ मौसमो आ समयो नीक रहत। जखन मौसम नीक रहत तखन उपजा-बाड़ी सेहो नीक हेबे करत। संजोगवश जेठ मासक बीच-बीचमे दूटा हाली बरखा भेबो कएल, जइसँ धानक बीआक उपज नीक रहल। शुरू अखाढ़मे माने आद्रा नक्षत्रक पहिल दिन नीक बरखा भेल, जइसँ तीन-चारि दिन धुरझार धनरोपनी चलल, एक चौथाइसँ बेसी खेत अबाद भऽ गेल। मुदा पोखैर-झाँखैर नहि भरल तइसँ केते गोरेक अनुमान ईहो हुअ लगल छेलैन जे जँ आद्रामे भूमि भरल नहि तखन रौदियाहे समय मानल जाएत। ओना, ढेनुआर नक्षत्र सभ पछुआएले अछि, तँए पानिसँ भूमि भरैक सम्भावना समाप्ते भऽ गेल सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। आद्रा नक्षत्रक उतारमे सेहो एकटा बरखा भेल जइसँ दू दिन रोपनी चलल, मुदा पोखैर-झॉंखैर खालीक-खालिये रहि गेल। आद्राक शुरूक बरखामे जेतेक पानि पोखैरमे बेसियाएल छल ओ तेरह दिनक जेठुआ रौदमे सुखि कऽ कमियाइये गेल। ओना, आम-जामुनक सुभर पैदावार भेबे कएल अछि।
रेडियोओ-अखबारो सभसँ मान सरोवरक महात्मक भरपूर प्रचार शुरू भेल। गाम-घरक लोक तँ कम्मो मुदा महनथानो सबहक आ शहरो-बजारक लोक सभ आकर्षित भेबे केला। मानसरोवर जेबा-ले सभ तरहक सुविधो भइये गेल अछि। ओना, हवाई जहाजसँ लऽ कऽ हेलीकेप्टर आकि चरिचकिया गाड़ी सबहक रस्ताक बाबजूदो पएरे सेहो चलइ पड़ैए। मुदा से लोकक मनसँ घसैक गेल अछि। घसकबो केना ने करत, जैठामक विचारमे माघ सन जाड़क समयकेँ एक दिन बीतने लोकक मनमे बिसवास जगिते अछि जे गेल माघ उनतीस दिन बाँकी’, तैठाम जँ आधासँ बेसी रस्ताक सवारीक सुविधा मानसरोवरक लेल भइये गेल अछि। तँए, धापे-धाप पहुँचब असान भइये गेल अछि...।
जीतनलाल भाय मनमे रोपि लेलैन जे ऐबेर मान सरोबरक यात्रा करबे करब। दूरक यात्रा अछि तँए जँ एकटा संगी भऽ जाएत तँ ओ नीक रहत।
सातो भाँइक भैयारीमे जीतनलाल भाय लगा पाँच भाँइ बाहरे-बाहर नोकरी करै छैथ, खाली हम दुनू भाँइ माने हम आ जीवनलाल भाय गाममे रहै छी। हमर कोनो हिसाबे ने अछि, सातो भाँइमे सभसँ छोट रहने छबो पढ़ल-लिखल भाइयो आ वृद्ध पिताजी सेहो पढ़बै-लिखबैपर धियान नै देलैन, अनठा देलैन, जइसँ नामो-गाम आ किताबो पढ़ब तँ सीख लेलौं, मुदा गीता-भागवत पढ़ैक लूरि नहि भेल। ओना, धरमागती पुछी तँ हुनका सबहक दोख नहियेँ छैन। किए तँ अधबेसूए अवस्थामे माइयो मरि गेली आ पिताजी सेहो बिमारीक फेड़मे पड़ि गेला जइसँ हमरा पढ़ै-लिखैपर धियान नहि दऽ सकला। ओना, जेठ भाए सभ सक्षम छला जइसँ पढ़ा-लिखा सकिते छला मुदा ओ सभ कान-बात ऐ दुआरे नइ देलैन जे जखन सभ भाँइ नोकरी करिते छी, नीक कमाइ अछिए तखन घरक ओगरवाहियो-ले आ मातो-पिताक टहल-टिकोरा-ले तँ आदमी चाहबे करी, तइले भने भैयारीमे सातम भाय- सेवालाल अछिए। जखन नोकरी-चाकरी नहियेँ करैक छै तखन अनेरे किए पनरह-बीस बरख तक स्कूल-कौलेज धॉंगत...। तँए हम बौक-बकलेल रहिये गेलौं। ओना, हमरा सन ढेरो लोक गामोमे अछि आ देशोमे अछिए। दुनियाँक तँ कोनो हिसाबे नहि। ओना, जँ बुधिमान आ बौक-बकलेलक जनगणना ठीकसँ हुअए तँ एकोअना लोक बुधिमानक श्रेणीमे नइ औत, पनरहअनासँ बेसीए हमरे सन-सन लोकक अछि।
परसू वैज्ञानिक भाय मानसरोवरक यात्रापर निकलता। दूरक यात्रा, तँए एकटा संगीक खगता छैन्हे। ओना, अखन तक बहुतो यात्रा वैज्ञानिक भाय कऽ चुकल छैथ आ से देशक संग दुनियोँक, मुदा तइ सभ यात्रामे पत्नी संग दइ छेलैन। मुदा ऐ यात्रामे जीतनलाल भाय पत्नीकेँ संग नहि लऽ जाए चाहै छैथ। नइ लऽ जाइक विचारक पाछू कारण छैन जे एक तँ उमेरोक हिसाबसँ, दोसर अपन तँ फुहराम शरीरो छैन आ सभ दिन जे लोहा-लक्कड़क बीच काज केलैन तइसँ देहमे ताकतो छैन्हे। मुदा भौजी तँ भरि दिन डेरामे रहि खेबो-पीबो खूब करै छेली आ टी.बी., कम्प्यूटरक खेल देखैत-देखैत अथबलो भइये गेल छैथ, माने केतेको बिमारी सेहो पोसि नेने छैथ तँए वैज्ञानिक भायक मनमे शंका छैन जे जँ पत्नीकेँ संग करब तँ अपन मदत कि हएत जे अपने भरि दिन हिनकर टहल-टिकारो करए पड़त, तँए नहियेँ लऽ जाएब नीक। हमरा, ओना हमर नाओंए सेवालाल छी मुदा आब ओते ऊहिये ने रहल जे मानसरोवर सन रस्ताकेँ पार करब। ओहन-ओहन रस्ताक ठेकाने रहत, आकि दिशांसे नइ लागत सेहो ठीक अछि। तँए, जाइने कऽ वैज्ञानिक भाय हमरा नहि कहलैन। हँ, मैझला भाय–जीवनलाल भाय जे गामेमे रहि विद्यालयमे नोकरी करै छैथ। माने गामसँ कोस भरिपर विद्यालय छैन। तहूमे संस्कृत महाविद्यालय, जेकर की स्थिति अछि से केकरोसँ छीपलो नहियेँ अछि। विद्यार्थीसँ बेसी शिक्षके छैथ। जीवनलाल भाय अपन उपस्थिति बना, एक-आध घन्टा संगी सभसँ गप-सप्प करै छैथ आ घुमि कऽ अबै छैथ। यएह हुनकर सभदिना रूटिंग छैन। प्रोफेसरक दरमाहा सेहो पबिते छैथ जइसँ परिवारोक भरण-पोषण नीक जकाँ होइते छैन। तँए, जीवनलाल भाय बेसी उपयुक्त रहतैन। वैज्ञानिक भायकेँ सेहो जीवनलाल उपयुक्त संगी बुझि पड़लैन। जीवनलालकेँ लगमे बजा वैज्ञानिक जीतनलाल भाय कहलखिन-
बौआ, मानसरोवर जाइक विचार मनमे बहुत दिनसँ अछि मुदा समय नइ पबै छेलौं, तँए नहि गेल भेल। ऐबेर समय पेलौं हेन, जेबाक विचार भऽ गेल। दूरक यात्रा छी तँए जँ दुनू भाँइ संगे चलब तँ नीक रहत।
मानसरोवरक जे आध्यात्मिक परिचय अछि ओ जीवनलाल भाय जनै छैथ, तँए जेबाक कोनो तेहेन जिज्ञासा मनमे नहि जगलैन। ओना, नवकबरिये उमेरमे माने तीसे-बत्तीस बर्खक अवस्थामे जीवनलाल भाय मानसरोवरक यात्रासँ भऽ आएल छैथ जइसँ रस्ताक दुर्गमता अखनो ओहिना मनमे नचै छैन। मुदा वैज्ञानिक भाइक मनमे किए एहेन विचार ऐ उमेरमे एलैन ओ मने-मन जीवनलाल भाय विचारए लगला। मानसरोवरक एहेन रस्ता अछि जैठाम जेबा-ले केतबो गाड़ी-सवारीक सुविधा किए ने भेल मुदा पएरे तँ ओहन रस्ता चलै पड़त जइमे माघो मासक शीतलहरीक जाड़सँ बेसी जाड़ अछि। तेतबे नहि, रस्तो तेहेन उभर-खाभर अछि जे केतए पिछैड़ कऽ खसब आकि ठेँस लागत तेकरो ठीक नहियेँ अछि। ओहन जगहपर जँ जीतनलाल भायकेँ जेबाके छेलैन तँ ओइ उमेरमे जइतैथ जइ उमेरमे सभ किछु बरदास करैक शक्ति देहमे छेलैन। आब जखन बुढ़ भेला हेन, साठि बर्खक उमेर भेलैन हेन तखन मानसरोवर जाइले तैयार भेला हेन। एकरा नेनमैत कहब की नहि? मरै बेरमे जँ बुधिक बखारीए माथमे घोंसिया जेतैन तँ ओकरा लइये कऽ की करता? जाबे नियार-भास करता तइ बिच्चेमे जँ बखारी टुटि कऽ खसि पड़तैन तखन? तहूमे रस्तेमे जँ केतौ मरि-हरि गेला तखन तँ सेहो ने पेब सकता जे पबैक विचार मनमे जोर मारने छैन! मुदा जेठ भाय होइक नाते की बाजब से तँ विचार जीवनलाल भाइक मनमे उठिये गेल छेलैन। ओना, मन निर्णित छेलैन जे कोनो हालतमे जेबाक नहि अछि। मुदा जेठ भाय तँ पिता तुल्य होइ छैथ, आदेशो नइ मानब सेहो केहेन हएत। तँए मुँह बन्न केने जीवनलाल भाय मने-मन विचारैत वैज्ञानिक भाइक आगूमे ठाढ़ छला।
जीवनलाल भायकेँ गुम-सुम ठाढ़ भेल देख वैज्ञानिक भाय दोहरबैत बजला-
बौआ, किछु हँ-हूँ नहि बजलह?”
ओना वैज्ञानिको भायकेँ जीवनलालक गुम्मीक माने लगिते छेलैन, मुदा नइ बजैक माने नहियेँ भेल सेहो केना मानल जाए। तहिना जीवनो भाइक मनमे छेलैन्हे जे नइ जाएब कि जाएब से तँ किछु ने बजलौं हेन। ओना, जीवन भाय मने-मन ईहो सोचि रहल छला जे एहेन-एहेन लोहा-लक्कड़क बीच रहैबलाकेँ झूठ बाजि ठकलो जा सकैए, मुदा छैथ तँ जेठ भाय, जँ बुझि जेता तखन अनेरे चान जकाँ मनमे पहाड़क करिया धब्बा बैस जेतैन। से नहि तँ पहिने गैंची माछ जकाँ थालमे नुकाइक कोशिश करी, जँ सुतैर गेल तँ बड़बढ़ियाँ, नहि तँ दोसर रस्ता धड़ब...। जीवनलाल भाय बजला-
भाय साहैब! अखाढ़ मास चलि रहल अछि, गुरु पूर्णिमा आगूमे अछि, केते प्रेम आ मेहनतसँ  आमक कलम लगौने छी से तँ बुझले अछि। देखते छिऐ जे जहिना राइर, तहिना फैजली, तहिना मोहर ठाकुर अछि आ तहिना अम्रपाली सेहो बोनाएल अवस्थामे तरतर करैए, एकरा सभकेँ छोड़ि जाएब नीक हएत।
जीवनलाल भाइक विचारमे वैज्ञानिक भाय जेना बहि गेला तहिना बोहियाइत बजला-
मानसरोवर जाइमे बर बेसी तँ पनरह दिन लागत, तैबीच की सभ आम सठिये जाएत जे मन छह-पाँच करै छह?”
ओना, जीवनलाल भाइक मनमे उठि चुकल छेलैन जे वैज्ञानिक भाय भौतिक विज्ञान जनै छैथ, मुदा जीवन विज्ञान हमरा जकाँ थोड़े जनै छैथ जे हमर बात बुझता। भावातुर भऽ जीवनलाल भाय बजला-
भाय साहैब, प्रश्न जँ आमे खाएबक रहैत तखन अहाँक विचार सोल्होअना मानै-जोकर छल। किए तँ अखन गाछेमे आम लागल अछि। जँ आठ दिनक पछाइत तोड़लो जाएत तैयो पनरह दिन आरो रहबे करत। मुदा से बात तँ अछि नहि।
अपन विचारकेँ खण्डित होइत देख वैज्ञानिक भाय पुछलकैन-
तखन की अछि?”
जीवनलाल भाइक मन मानि लेलकैन जे प्रश्नक ने उत्तर देब अछि। जेठ भाय रहितो तँ प्रश्नकर्त्ते ने भेला। आह्लादित भऽ जीवनलाल भाय बजला-
भाय साहैब, जहिना वृन्दावनमे कृष्णक परोछ भेने राधिका सभ विरहाए लगै छेली, तइसँ की कम प्रेम हमर आमो आ आमक गाछोक प्रति अछि।
जीवनलाल भाइक विचारमे वैज्ञानिक भाय वौआ गेला। पुन: प्रश्न केलैन-
से की?”
सोलहन्नी गोटी लाल होइत देख जीवनलाल भाय बजला-
जहियासँ आमक पीपही रोपलौं तहियेसँ सिनेहक संग प्रेमो आमो आ आमक गाछियो संग बनि गेल अछि। गाछक संग जुआन हारि गेल छी जे जाबे अपने जीबैत रहब ताबे तोरो जीबैत रखबौ! अपने मानसरोवर जाएब, जइमे कमसँ कम पनरह दिन लागत आ तइ बिच्चेमे जँ चोरे-चहार चोरा कऽ आम तोड़ि लिअए तखन ओकर रक्षा कऽ सकलिऐ? जखन चीजे विरहा जाएत तखन ओकरा संग जे प्रेमक वादा केने छिऐ से रहत?”
भौतिक जुगक भौतिकवादी वैज्ञानिक भाय- जिनक ज्ञान सेवा निवृत्तिक पछाइत जखन विज्ञानक रूपमे लतड़लैन तखन सज्ञानक बाट हुनका मनमे उठलैन। सेवा निवृत्तिक माने काजसँ मुक्त, अर्थात् हाथसँ काज चलि गेल वा छीना गेल। काजुल लोककेँ जखन हाथक काज छीना जाइए तखन अबैबला जिनगी मृतप्राय बनि जाइए। तँए, ओ अपना-जोकर काजक पाछू वौआए लगिते अछि। सएह वैज्ञानिक भायकेँ भेलैन। एक दिस ज्ञान एते प्रखर भऽ गेलैन जे दुनियाँक खोजी बनि गेला। दोसर दिस अपन ज्ञानकेँ विज्ञानक दिशामे बढ़ौलैन आ तेसर दिस विज्ञान, समाज आ शास्त्रक बीचक खाधिमे तेना पड़ला जे मन बबलाकऽ मानसरोवरक यात्राक लहैरमे हेलए चाहि रहल छैन। गणितक गणना करैबला वैज्ञानिक भाय जीवन, समाज आ दुनियाँक जखन गणना करए लगै छैथ तँ हिसाबे गड़बड़ा जाइ छैन। जइसँ कोन हिसाबकेँ सही मानी आ कोन हिसाबकेँ गलत, अही गलत-सहीक बीच मन फँसि गेल छैन। अन्तत: जेकर एकेटा उपाय सुझि रहल छैन जे अपन ऑंखिक देखलकेँ सही मानब। तँए मानसरोवरक यात्रा मनमे गहींर तक धँसि गेल छैन...। वैज्ञानिक भाय बजला-
बौआ जीवन, जेते आम नोकसान हेतह ततेक दाम हम दए देबह।
वैज्ञानिक भाइक विचार सुनि जीवनलाल भायकेँ अपन विचारक रस्ता कटैत बुझि पड़लैन। मने-मन गर अँटबए लगला जे आब की करब। मुदा लगले एकटा जुक्ति फुरलैन। फुरलैन ई जे वैज्ञानिक भाय कि मानसरोवरकेँ शीतल, कोमल, पवित्र हृदय रूपी सरोवर थोड़े बुझि रहला अछि ओ तँ एकटा भौगौलिक स्थान बुझि रहला अछि। ओकरा देखबकेँ काज बुझि रहला अछि। काजकेँ तँ काजेसँ रोकल जा सकैए। से नहि तँ ओहने जब्बर काज जँ आगूमे दिऐन तँ जरूर मन मानि जेतैन आ अपन छुट्टी भऽ जाएत। जखने अपन छुट्टी हएत तखने ने दुनू गोरे छुट्टा भऽ जाएब आ अपना-अपना मने अपन काज सम्हारब, पछाइत अपन विचारता जे केना करब...। जीवनलाल भाय बजला-
भाय साहैब, अहाँ जखन गाम आएलो ने रही तहियेक काज आगूमे सिरचढ़ भऽ गेल अछि, की ओकरा छोड़ि देब उचित हएत?”
वैज्ञानिक भाइक मन कनी ठमकलैन। बजला-
ओ तँ काज-काजपर निर्भर अछि। काजोक तँ अपन माप-तौल अछि। नमहर[i] काजक आगू छोट काजकेँ कम वजन भेल।
जीवनलाल भाइक मनमे खुशी उपैक गेलैन। ओ मने-मन बुझि गेला जे जहिना सत् बात लत्ती जकाँ लतड़ल रहैए तहिना बहानाक लेल झूठोक लत्ती तँ अछिए। मुदा ठाँहि-पठाँहि झूठोक लत्तीकेँ लताड़बसँ नीक जे सामनजस करैत लताड़ी। जीवनलाल भाय बजला-
भाय साहैब, अपनेक संग पूरैमे कनी असोकर्ज भऽ रहल अछि। ने तँ एक संग दू-दूटा महतपूर्ण कर्तव्य अछि तेकरासँ मुँह मोड़ब आकि मुँह घोकचाएब नीक थोड़े भेल?”
नीकक संग अधलो तँ लगले रहैए, वैज्ञानिक भाय सेहो जिनगी भरि यएह ने तर्क करैत सिद्धान्त मनमे रोपने छैथ जे कोनो वस्तुक साक्षेप-निरपेक्ष दुनू होइए। यएह विचार मनमे जगि गेलैन। बजला-
एकरा के नीक कहत?”
एकरा के नीक कहतसुनिते बाढ़िक पानिक पाहिपर चढ़ल रोहु माछ जकाँ जीवनलालकेँ बुझि पड़लैन। मुस्की दैत बजला-
भाय साहैब, जिनगीक कोनो ठेकान अछि जे केते दिन सेवा करैक मौका भेटत। तखन तँ भेल जे जखने सेवा करैक गर लागए कि ओकरा करैत चली, निमाहैत चली मुदा तइमे अपना थोड़ेक खाँच भऽ रहल अछि।
वैज्ञानिक भाय बजला-
बौआ, की खाँच भऽ रहलह हेन?”
मनकेँ मसोसैत मुहकेँ चिकुरियबैत जीवनलाल भाय बजला-
भाय साहैब, छह मास पहिलुके बात छी, एके दिसम्बरकेँ अपना सारिकेँ ऑपरेशन करबए डाक्टर ऐठाम गेल रही। पेटक भीतरक ऑपरेशन रहइ। बिमारीक नाओं बिसैर गेल छी। तेते भीड़ ओइ डाक्टर ऐठाम देखलिऐ, जे की कहूँ। छह-छह मासक नम्बर लगैए। हिनकर नम्बर चारिम दिनक छैन, आब अहीं जे कहब से करब।
वैज्ञानिक भाइक मन मानि गेलैन जे अपने ने घर-दुआर, गाम-समाज छोड़ि बाहर रहलौं, मुदा जीवनलाल तँ सभ दिन गामेमे रहि आर्थिको उपारजन केलक आ समाजक सेवो केलक। तँए, ओकरो अपन जीवनो छै आ जीवनक गतिविधियो तँ छइहे। वैज्ञानिक भाइक मनमे धाँइ-दे खसलैन- केकरो जीवनमे बाधा उत्पन्न करब सभसँ पैघ अपराध छी। तहूमे जँ ऐ सालक (माने जनवरीक पछातिक) काज रहैत तँ ओकरो आगूओ बढ़ाएल जा सकै छल, जेना लोक सराधक (श्राधक) भोजो आ किरियो-कर्म बरखी दिन-ले रखि लइए। मुदा ई तँ जीवन-मृत्युसँ जुड़ल अछि। ओना, जीवन-मृत्युसँ जुड़ल अनेको प्रश्न जुड़ल अछि। मुदा जीवनक प्रति लोकोक तँ अपन-अपन नजैर अछिए। जहिना करोड़ो-अरबो लोक अछि तहिना करोड़ो-अरबो नजैर सेहो अछिए। कियो पानिसँ हल्लुक हवाकेँ आ कियो माटिसँ हल्लुक पानिकेँ तँ कियो पाथरसँ हल्लुक माटिकेँ बुझैए। मुदा अपन-अपन जगहपर सभ भारियो अछि हल्लुको अछिए। पानिक जँ समुद्र छी, माने पानियेँ समुद्र छी तहिना पाथरेक पहाड़ो छी, माने पहाड़े पाथरो छीहे। तही बीच ने झंझटो अछि आ मिलान सेहो अछिए। अफ्रीकाक जंगल कहियौ कि सहाराक मरूभूमि कहियौ आकि रामवन कहियौ कि वृन्दावनक कृष्णवन, सबहक बीच तँ जीवन चलिये रहल अछि..! वैज्ञानिक भाय अपन विचारक अस्तित्वकेँ असथिर कइये ने पेब रहल छैथ। मनक ओजकेँ शरीरक ओजसँ मेल-मिलाप भइये ने रहल छैन। असोथकित होइत वैज्ञानिक भाय बजला-
बौआ, मनमे जखन रोपि नेने छी जे मानसरोवर जेबे करब तखन तँ भेल जे एकटा संगी रहने कने नीक होइ छइ।
वैज्ञानिक भाइक सहमैत विचार देख जीवनलाल भाय बजला-
भाय साहैब, व्यक्तिगत हमर खगता नइ ने अछि, संगी चाही, तइले अहाँ चिन्ता जुनि करू। अखने हम गाम दिस जाइ छी, मानसरोवर चलैक हरविर्ड़ो कऽ देबइ। पुरुख-पातर जँ संगी नहियोँ हेता तैयो दसटा जनीजाति संगी हेबे करती।
ओना, जीवनलाल भाइक विचार सुनि वैज्ञानिक भाइक मन जुड़ेलैन, मुदा शंका ईहो भेलैन जे जँ दसटा जनीजाति संगी भऽ जाएत तखन दसोक हिसाब-बारी लगबैमे दस गुणा काज बढ़िये जाएत...।
सामंजस करैत वैज्ञानिक भाय बजला- जँ दसटा भऽ जाथि तखन तँ सर्वोत्तम भेल। नहि तँ एकोटा जँ भऽ जाथि तैयो एक मानसरोवर कि जे सइयो मानसरोवर जाएब असान भऽ जाएत किने।
जीवनलाल भाय बजला- भाय साहैब, हम ते असगरे गेल रही, कहाँ केतौ भियौन लागल?”
भियौनसुनि वैज्ञानिक भाइक मन सुरखुरेलैन। सुरखुराइते मनमे उठलैन- नारदजीकेँ कोन संगी छेलैन जे चौदहो भुवन आ तीनू लोक घुमै छला..? नारदजीक घुमब मनमे अबिते वैज्ञानिक जीतन भाइक चेहरापर स्वीकारोक्तिक भाव झलकए लगलैन। जेकरा देखते जीवनलाल भाय बजला-
अहाँ अपन तैयारी ठीक राखू संगी भेटबे करत। जखन चोरोकेँ संगी भेटै छै, झूठो बजनिहारकेँ संगी भेटै छै तखन सौध (शुद्ध) केँ किए ने संगी भेटत।
q
शब्द संख्या : 2576, तिथि : 31 जुलाई 2018




[i] भारी

Tuesday, February 20, 2018

सुभिमानी जिनगी


सुभिमानी जिनगी

भोरे सुति-उठि जीवन काका दरबज्जासँ गाम दिसक रस्ता जे फुटल अछि तैठाम अपन डेढ़हत्थी ठेंगासँ डाँरि खिंचैत बुदबुदेला-
परिवार आकि समाज एक दिस जुटि आगूमे किए ने ठाढ़ हुअए मुदा एको इंच पाछू अपन विचारसँ नइ घुसकब।
ओना, जहिना आन दिन तीन बजे भोरे नीन तोड़ि ओछाइनेपर पड़ल-पड़ल जीवन काका अपन बीतल दिनक हिसाब जोड़ि अबैबला दिनक मुँह-मिलानी करैत भरि दिनक हिसाब लगा लइ छला तहिना आइयो केलैन। मुदा आन दिनक हिसाब आ औझुका हिसाबमे किछु अन्तर आबि गेल छैन। माने ई जे आन दिन जीवन काका अपन भरि दिनक हिसाब परिवारक लीलामे रखै छला मुदा आइ से नइ केलैन। परिवारक संग समाजोक चलैक रस्तापर ठाढ़ भऽ अपन विचारक लकीर खिंचलैन। ओना, जीवन कक्काक अपन विचार ई छैन जे जहिना सभ दिन नव सुर्जक उदय होइए तहिना अपनो जिनगीमे सभ दिन हुअए। जखने दूध नवनीत[1] बनि घृत बनैक दिशामे ऐ आशाक संग बढ़ैए जे अपनो जिनगी घीवाह बनत आ जखन जिनगी घीवाह बनत तखने ने ओकर सार्थकता हएत।
अपन संकल्पक विचार मनमे रोपि जीवन काका डेढ़ियापर डेढ़हत्थी ठेंगासँ डाँरि खींचि दरबज्जाक चौकीपर आबि बैसला। बैसते व्रती जकाँ अपन व्रत मनमे रोपि दृढ़ हुअ लगला जे दुनियाँ किए ने एकभाग भऽ जाए मुदा पर्वतेश्वर[2] जकाँ एक्को डेग पाछू नइ घुसकब। पाछू नइ घुसकैक दृढ़ विचार मनमे रोपाइते जीवन कक्काक नजैर अपन तेसर सन्तान- श्यामापर गेलैन। श्यामा..! श्यामा मनमे अबिते विचड़लैन-श्यामो तँ हमरे सन्तान छी..!’
श्यामाक प्रति विचार मनमे जगिते जीवन कक्काक देहमे जेना उमंगक फुनफुनी जगलैन। फुनफुनी जगिते देह कँप-कँपा उठलैन जइसँ एक दिस दुनियाँ[3]क भय आगूमे ठाढ़ भेलैन तँ दोसर दिस अपन दृढ़ संकल्प सेहो समकक्ष भऽ जिनगीक सोझमे ठाढ़ भेलैन।
जीवन कक्काक तेसर सन्तान श्यामाक लिंग परिचय अखन धरि स्पष्ट नहि भेल छल। बालपनक जिनगी रहने श्यामाकेँ ने खाइ-पीबैमे कोनो तरहक असोकर्ज आ ने मल-मूत्र तियाग करैमे। बच्चा सबहक संग खेलबो करैए आ पढ़ैले स्कूलो जाइते अछि। ओना, रंग-रंगक समाचार अखबार-रेडियोमे अबिते रहैए जे अमुख डॉक्टर ऐठाम लड़का-लड़की भऽ गेल आ लड़की लड़का...।
दस बर्ख बीतला पछाइत आने बाल-बच्चा जकाँ श्यामाक शरीरमे सेहो किशोरी-रूप झलकी दिअ लगल। शरीरो फौदाए लगलै आ मनक झुकाव सेहो लड़की सभ दिस झुकए लगलै। ऐठाम एकटा प्रश्न अछि, प्रश्न अछि जे बच्चा बाल-बुधि धरि लड़का-लड़की संग-संग संगी जकाँ खेलबो-धुपबो करैए आ खाइतो-पीबितो अछिए। ओकरा सभमे लिंग-भेदक कोनो आशंका मनमे रहिते ने छइ। तत्पश्चात लड़काक झुकाव लड़का दिस आ लड़कीक झुकाव लड़की दिस हुअ लगै छइ। ई अवस्था लड़का-लड़कीक प्रेम-मिलनक अवस्थासँ पूर्वक छी। ओना, श्यामाक शरीर-गठनमे नवपन आएल मुदा आनसँ भिन्न रूपमे। अखनो ई स्पष्ट नहि भेल जे श्यामा लड़का छी आकि लड़की। ओना, श्यामाक अपन उमेरक आकर्षण लड़की दिस बढ़ि रहल छल जइसँ केश बढ़ाएब, कनियाँ-पुतराक खेल-खेलाएब इत्यादि-इत्यादि श्यामाक मनक संग बेवहारमे आबए लगलै। अखन धरि परिवारोक नजैरमे श्यामाक असल रूप आ गामो-समाजक नजैरमे झँपाएल छल।
आइ आठ दिनसँ जीवन काकाकेँ हुनक पत्नियोँ आ दुनू बेटो मुँह फोरि कऽ तँ नहि, मुदा कात-करोटसँ सुना-सुना बाजए लगलैन-
श्यामा हमरा परिवारक नहि, हिजरा परिवारक भेल..!’
मंगली काकीमाने श्यामाक माए–जखन असगरमे बैस विचारै छेली तँ देखै छेली जे जहिना जेठ दुनू सन्तानकेँ पेटमे नअ मास सेवलौं तहिना ने श्यामाकेँ सेहो सेवने छी। मुदा..!, ऐमे हमर कोन दोख अछि..? सभ लीला तँ भगवानक छिऐन..!
मुदा लगले जखन बेटा-पुतोहु वा सर-समाज श्यामाक प्रति कहैन जे ई अपना सबहक सन्तान नहि, तखन मंगली काकी सेहो ओही विचारमे भँसिया समाज दिस तकैत श्यामाकेँ अपन नहि बुझि तियाग करैले तैयार भऽ जाइथ..! माइक दिल’, माइक दिल तँ दिन-राति अनघोल होइते अछि, मुदा ओकर बेवहारिक पक्ष की अछि से के देखत..!
श्यामाक प्रति अखन धरि समाजक अधिकांश लोकक यएह धारणा बनल रहल छल जे श्यामा लड़का छी। ओना दुनू परानी जीवन काकाक मनमे बच्चेसँ शंका उठलैन जइसँ केतेको डॉक्टर आ केतेको ओझा-गुनीसँ श्यामाकेँ देखा-सुना चुकल छला। ओझा-गुनी तँ घरक देवताक दोख लगा अपन-अपन पल्ला झाड़लक। मुदा डॉक्टरी जाँच-परताल करौला पछाइत अपन हारि कबुल कऽ डॉक्टर सभ जीवन काकाकेँ कहि देलकैन जे हमरा साधसँ बाहर अछि मुदा अहाँक तँ सन्तान छी, अहाँकेँ ते केतौ भगैक रस्ता नहि...।
डॉक्टरी विचारक पछाइत जीवन काका लड़का-लड़कीकेँ मनसँ हटा सन्तानक सीमापर ठाढ़ भऽ गेला। मनमे कखनो काल किन्नर परिवारक रूप-रेखा अबैन। किन्नर परिवारक रूप-रेखा देख मनक संग देहो काँपि उठैन जे ओ परिवार तँ समाजक हँसियापर अछि! अपना परिवारमे बाप-पुरखाक देल बीस बीघा जमीन अछि, किसान परिवार छी, किसानी जीवन अछि। जेकर धर्म रहलै जे अपन परिवारक भरण-पोषणक कोन बात जे दरबज्जापर आएल आनो-आन खगलोकेँ आ बाटो-बटोहीकेँ खाइ-पीबैक परहेज नहि अछि। धार्मिक वृत्ति समाजक परिवारमे रहबे कएल अछि जे जिनका जएह विभव छैन ओ ओहीमे परिवारक सभ मीलि-बैस खाइ-पीबी। व्यास बाबाक समाज तँ आइ अछि नहि, जे बुझत- लूटि लाउ, कुटि खाउ, प्रात भने फेर जाउ...।
अप्पन आइ धरिक परिवारक जिनगीक धाराकेँ देख जीवन कक्काक मनमे भोरेसँ जहिना दृढ़ता उठलैन जे अपन आँखिक सोझमे अपन सन्तानकेँ भिखमंगा परिवारमे किन्नौं नइ जाए देब, चाहे ऐ खातिर जे हुअए। परिवारे आकि समाजे की कहत। की समाज ई नइ जनैए जे श्यामा हमर तेसर सन्तान छी..?
दरबज्जाक ओसारक चौकीपर जीवन काकाकेँ अकलवेरा[4]मे उमंगित बैसल देख मंगली काकीक मनमे ओहिना हुमरलैन जहिना जेठ मासक रौदक जरल मेघमे हनहनाइत तूफानी दौड़मे करिया मेघ ऊपर चढ़ए लगैए जइसँ धरतियोपर हवा-बिहाड़ि, पानि-पाथर अबैक सम्भावना बनियेँ जाइए तहिना भेलैन। मुदा लगले मन थीर भऽ गेलैन। तैबीच दरबज्जापर पहुँच मंगली काकी जीवन काकाकेँ पुछलकैन-
चाहे पीब आकि पानियोँ पीब?”
ओना आजुक परिवेशमे एहेन विचार मनुखाह बनि मरखाह बनि सकैए। किएक तँ पानि नहि, पीबैक माने किछु खेलाक पछाइत पानि पीबसँ अछि। मुदा से नहि, कृषक बीच अखनो एहेन चलैन अछि जे सभसँ पहिने मुँह-कान धोनौं वा बिनु धोनौं खाली पानि पीबाक चलैन अछि। बिनु मुँह धोनेक माने भेल बाइसे मुहेँ बसिया पानि पीब। तँए हुनकर खतियान एहेन बनि गेल छैन जे भोरमे सभसँ पहिने मन भरि पानि पीबी। पछाइत चाह-पान चलत। तैठाम चाहक संग पानिक चलैन किए रहत? मुदा से नहि, मंगली काकीक मन जीवन कक्काक रूप देख थरथरा गेल रहैन तँए बाजल छेली।
जीवन काका मंगली काकी दिस टकटक देखए लगला जे यएह माए अपन कोखिक सन्तानकेँ भिखमंगाक सन्तान बनबए चाहि रहली अछि। मुदा मनक विचारकेँ मनेमे अरोपि बजला-
चाहो पीब आ किछु गपो-सप्प करब। तँए अपनो चाह एतै नेने आउ। संगे-संग पीबो करब आ...।
ओना संगे-संग चाह पीबैक साहस मंगली काकीक मनमे घटि रहल छेलैन। तँए बहन्ना बनबैत पहिने हिनकेटा-ले गिलासमे चाह नेने पहुँचली।
पतिक हाथमे गिलास पकड़ा मंगली काकी अपने चोटे घुमि आँगन आबि गेली। आँगन आबि चाह तँ पीबए लगली मुदा मन थरथराइते रहैन। मन थरथराइक कारण रहैन दुनू गोरेक बीचक ने परिवार छी, तखन चाहमे किए..?
मंगली काकी घोंटे-घोंटे चाहो पीबैथ आ मनकेँ घटे-घट सकतेबो करैथ। चाह पीला पछाइत दरबज्जापर आबि जीवन कक्काक आगूमे ठाढ़ भेली। ओना, तैबीच काकीक मनमे ईहो जगि चुकल छेलैन जे जहिना पति छैथ तहिना ने बेटो अछि। जहिना पतिकेँ खुश राखब अप्पन दायित्व छी तहिना ने बेटोकेँ राखए पड़त। तँए निर्भिक रूपमे मंगली काकी जीवन कक्काक आगूमे ठाढ़ भेली।
पत्नीकेँ आगूमे ठाढ़ देख जीवन कक्काक मन चकभौर लिअ लगलैन। जहिना धारक मोनिक चकभौरमे कियो-कियो डुमबो करैए, तहिना अकासमे गीध चकभौर लैत चारू दिशा देखबो करैए आ पाहि लगा पहियेबो करिते अछि। जीवन कक्काक मनमे पहिल दिशाक चकभौरमे जगलैन जे पति-पत्नीक बीचक ने परिवारो छी आ सन्तानो छी। मुदा तँए सोभावमे अन्तर नहि अछि सेहो केना मानल जाएत। पुरुखक सोभाव होइए जे जँ अपने वा परिवारक सन्तानेक आगू अबैत बाधा[5]मे सन्तानकेँ संरक्षण दैत अपने आगूमे ठाढ़ भऽ सामना करब, भलेँ परिणाम जेहेन होइ, मुदा पत्नीक की ई सोभाव नइ अछि जे आक्रमिक आगूमे ठाढ़ भऽ सन्तानकेँ दुनू हाथे दुनू हाथ पकैड़ मारि खुआ दइए। ओना, ऐठाम एहेन प्रश्न अछिए जे संरक्षणक रूप केहेन अछि?
फेर दोसर चकभौर जीवन कक्काक मनमे उठलैन। उठलैन ई जे श्यामाक जहिना पिता भेलिऐ तहिना ने पत्नियोँ माए भेलखिन। तैठाम अप्पन चाह की अछि आ पत्नीक चाह की छैन? केकरो बात सुनला पछाइत ओइपर नीक जकाँ विचारबो तँ जरूरी अछिए। विचारक पछाइत हँ-नइक ने निर्णय करब। आकि कियो बाजल जे कौआ कान नेने जाइए आ ओकरा सुनि अपन कान बिनु देखनहि जँ कौआक पाछू-पाछू दौगब, ई केहेन हएत..?
दू भौक टपैत-टपैत जीवन कक्काक मन कनी थमलैन। ओना, ने जीवन काका किछु बजै छला आ ने मंगलीए काकी किछु बजै छेली। मुदा भीतरे-भीतर दुनू बेकतीक मनमे समुद्री तूफान चलिये रहल छेलैन। पत्नीक अलिसाएल-मलिसाएल चेहराक रंग देख जीवन कक्काक मन सेहो पसीज रहल छेलैन। जे एकाएक मन बिहुसि उठलैन। जीवन काका बजला-
एकटा पनचैती अहाँसँ कराएब अछि, घरक बात छी तँए पहिने घरेक लोक ने ओइपर विचार करत। जँ घरमे नइ फरिछाएत तखन ने समाज आकि संसार देखब।
पतिक विचार सुनि मंगली काकीक मनमे एकाएक चमक एलैन। चमक अबिते मनमे उठलैन जे परिवारेक विषयमे ने पतियो विचार करए कहि रहल छैथ। जखने परिवारमे पति-पत्नी मिलि, वैचारिक एकरूपता आनि परिवार चलौत तखने ने ओ परिवार अपना बले ठाढ़ हएत। जइसँ जिनगीक धारा एकबट्ट होइत आगू बढ़ैत चलत। ओना, तैबीच परिस्थितिवश तोड़-जोड़ सेहो चलिते रहत। परिस्थितिक अर्थ भेल- परि+स्थिति’, तँए, जखने परक स्थिति आगूमे औत तखने कनी-मनी डोल-पात हेबे करत...।
मंगली काकी बजली-
बाजू, की कहै छी?”
मंगली काकीक विचार सुनि जीवन काका समधानल प्रश्न रखैत बजला-
अपना दुनू गोरेक बीच केते सन्तान अछि?”
मंगली काकी बजली-
तीन।
बजैक क्रममे तँ मंगली काकी बाजि गेली मुदा लगले मन बेटाक संग समाज दिस बढ़ि गेने तत-मत करए लगली।
पत्नीक ततमती देख जीवन काका बुझि गेला जे पछुआ दाबि रहल छैन। ठिकिया कऽ जीवन काका दोसर प्रश्न रखला-
एतेटा दुनियाँमे अहाँकेँ सभसँ लग के अछि?”
अतीतोमे जे अतीत अछि। जेकर जेहेन परतीत तेकर तेहने ने अतीतो। किए कियो अपन छोड़ि अनका-ले मरैए आ किए कियो अनका छोड़ि अपना-ले मरैए..? धरती-अकासक बीचक क्षितिजमे जहिना केहनो-केहनो उड़न-चिड़ैया फँसि जाइए तहिना मंगली काकीक मन एकाएक फँसि गेलैन। दुनियाँमे सभसँ लग के? अतीतमे वौआइत मंगली काकीकेँ बिआहक अपन मरबा मन पड़ि गेलैन। मन पड़लैन जे ओही मरबापर ने माए-बापक संग समाजो पतिक हाथ पकड़ा कहलैन जे दुनियाँ मेटि जाए मुदा पतिक संग नइ छोड़ब...।
मंगली काकी बजली-
बुझलो बात अनठा किए बजै छी। हमरा बकलेल-ढहलेल बुझै छी?”
मंगली काकीक चपचपाएल बोल सुनि अपन चपचपी मिलबैत जीवन काका बजला-
अहाँ केना बुझि गेलिऐ जे हम अनठा कऽ बजलौं हेन। जे कहैक अछि से पहिने चेतौनी दैत चेता देब।
जीवन कक्काक वाणीमे जेहेन ओज छेलैन तेहने मनो ओजस्वी छेलैन्हे जइसँ मंगली काकीक मनमे भय सेहो जगलैन। भयकेँ जगिते ज्वर-बुखार नपैबला थर्मामीटरक पारा जहिना गरमी पेब चढ़ैए आ ठण्ढी पेब उतैरतो अछि तहिना मंगली काकीकेँ भेलैन। बजली-
अहाँसँ हम कोनो हटल छी। जे कहै छी, जेना कहै छी तहिना ने सुनबो करै छी आ करबो करै छी।
पत्नीक विचार सुनि जीवन कक्काक मनमे उठलैन जे आइ जे समस्या परिवारक सोझामे उपस्थित भऽ गेल अछि ओ नान्हिटा नहि अछि। पत्नीसँ परिवार होइत समाज धरिक बीचक समस्या छी, तँए नान्हि-नान्हिटा विचारमे ओझराएब उचित नहि...।
जीवन काका बजला-
सुनबामे आएल अछि जे अहूँ श्यामाकेँ अपन सन्तान नहि बुझि तियाग करैले तैयार छी?”
पतिक बात सुनि मंगली काकी सहैम गेली। करेजक संग विचारो डोलायमान हुअ लगलैन। की बाजब आ की नइ बाजब तैबीच मंगली काकीक विचार ओझराए लगलैन। किछु बजैक साहसे ने भऽ रहल छेलैन।
मंगली काकीकेँ चुपी साधल देख जीवन काका बजला-
चुप रहने काज चलत! मुँह खोलि बाजू जे अहाँ की चाहै छी। कियो अपने विचारक ने मालिक अछि।
थरथराइत मने मंगली काकी बजली-
अपन बेटो आ समाजोक लोक श्यामाकेँ अपन नहि बुझि दोसराक कहि रहल अछि! तैबीच..?”
पत्नीक झूकैत विचार सुनि जीवन काका दृढ़ भऽ बजला-
चाहे ओ बेटा हुअए वा समाज, कान खोलि कऽ सभ सुनि लिअ जे श्यामा हमर सन्तान छी, सन्तान बनि रहत। ई हमहूँ बुझै छिऐ जे श्यामा नि:सन्तान रहत, मुदा तँए ओ मनुख नहि छी आ मनुखक जिनगी नहि जीब सकैए, हम तेकरा मानैले तैयार नहि छी।
पतिक दृढ़ विचार सुनि मंगली काकीक मनमे सेहो दृढ़ता आबए लगलैन, एकाएक अपन कोखिक संतप्त श्यामापर मन एकाग्र हुअ लगलैन। एकाग्र होइते मनमे उठलैन- श्यामेटा एहेन सन्तान थोड़े छी, दुनियाँमे एहेन बहुत लोक अछि जेकरा प्रकृत्ति प्रकोपसँ सन्तानोत्पतिक शक्ति नइ छइ। तँए ओकरा परिवार वा समाजसँ वहिष्कृत करब कहाँ धरि उचित हएत...।
तैबीच जीवन काका बजला-
पहिने अहाँ ई कहू जे अहाँक मनमे की अछि। की श्यामाकेँ अपन सन्तान नइ बुझि छोड़ैले तैयार छी?”
पतिक दृढ़ विचार पेब बिना किछु आगू-पाछू तकने मंगली काकी बजली-
श्यामा की कोनो हमरेटा सन्तान छी आ अहाँक नहि छी।
ढलानपर सँ टघरैत पानिक रोकाबतेँ देख जीवनानुभवी लोक जहिना छील-छील कऽ चिक्कन बना-बना एकबट्ट करैत छिड़ियाएल पानिकेँ धरिया धाराक रूपमे आगू बढ़बै छैथ तहिना जीवन काका मंगली काकीक छिड़ियाएल विचारकेँ समेट बजला-
पूबक सूर्ज पच्छिम किए ने उगइ, जमीनक पानि अकास सिर किए ने चढ़इ मुदा श्यामाकेँ अपन सन्तान छोड़ि ने अनकर बुझब आ ने अनका हाथ जाए देब।
विस्मित होइत मंगली काकी बजली-
लोक की कहत..!”
मंगली काकीक विचार सुनि जीवन कक्काक अन्तरात्मा जेना ओहन बिजलोका जकाँ चमकलैन जेहेनमे ठनका खसैए। बजला-
लोक की कहत! लोक पहिने अपन ठेकान करह। जेकरा अपन ठेकान नइ से अनकर ठनका रोकि सकैए आकि अपनाकेँ बँचा सकैए।
पतिक विचार सुनि मंगली काकी सिरसिराए लगली। एकाएक देहमे सिरसिराएल कँपन हुअ लगलैन। कँप-कँपाइत पुछलखिन-
की लोकक ठेकान?”
पत्नीक जलियाएल विचार सुनि जीवन कक्काक मनमे कुवाथ नहि भेलैन। तेकर कारण अछि जे जीवन कक्काक विचार सागरमे लहैर जकाँ उठि गेल छेलैन। लहराइत विचारमे आबि रहल छेलैन जे जँ मनुख छोट-सँ-छोट आ पैघ-सँ-पैघ अपन जिनगीक रस्ताक बाधाकेँ अपना आँखिये ठिकिया मनसँ हटबए चाहत तँ ओ जरूर हटा जिनगीकेँ बाधामुक्त कऽ सकैए। जखने जिनगी बाधामुक्त भेल तखने ने ओ जिनगी घोड़ाक चालिमे सरपट दौड़ लगौत...।
जीवन काका बजला-
जे समस्या अपना परिवारमे उपस्थित भऽ गेल अछि ओ खाली अपने परिवार-टा मे भेल आकि आइये भेल अछि आ पहिने नइ भेल हएत से केना बुझै छिऐ? सभ दिन होइत आबि रहल अछि आ आगूओ होइत रहत। महादेवकेँ सेहो अर्द्धनारीश्वर कहल जाइ छैन। जखने अर्द्धनारीश्वर तखने ने सन्तान विहीन! कार्तिक आ गणेश तँ तखन भेलैन जखन महादेव आ पार्वती दुनू दू छला। मुदा जखन दुनू सटि एक भेला तखन कोनो सन्तान नइ ने भेलैन। तँए की हुनका देववंशसँ कियो हटा देलकैन आकि हटा देतैन?”
ओना, मंगली काकीकेँ महादेव-पार्वतीक ओ कथा (माने अर्द्धनारीश्वरबला कथा सुनल रहैन मुदा एना भऽ कऽ नहि, ई नइ बुझल रहैन जे अर्द्धनारीश्वर की। तँए, धार-कातक पँकियाएल चपचपीमे जहिना चँङ्गुराएल चिड़ौयो आ पैरबला जानवरक संग लोको चपि कऽ गड़ि जाइए, तहिना मंगली काकी सेहो चपि कऽ गड़ि मुँहपर हाथ लैत बजली-
ऐँ.अ..अ..!”
जीवन काकाकेँ जेना सहगर खेतक लभगर हाल भेटलैन तहिना बजला-
ऐँ-टेँ नइ करू! वएह शिवजी महादेव छैथ जे देखलखिन जे जे कृष्णजी महिला संगठनक नेता छैथ ओ महिला छोड़ि पुरुखक प्रवेश रोकने छैथ, तखन ओ की केलैन से बुझल अछि?”
विचारक बोनमे हेराएल-भोथियाएल बेटोही जकाँ मंगली काकी बजली-
नइ! अहूँ ने तँ कहियो कहने छेलौं।
जीवन काका बजला-
कोनो कि एकेटा गप अछि जे ओ छुटि गेल ते बड़ जुलुम भऽ गेल। जखने जागी तखने परात..!”
उत्सुकाएल मंगली काकी बजली-
पहिने शिवशंकर दानीक कथा कहि दिअ।
पत्नीक चपचपी देख चपचपाइत जीवन काका बजला-
शिवसँ शिबानी बनि कृष्णजीक महिला संगठनमे शामिल भऽ गेला..!”
मंगली काकीकेँ जेना एकाएक भक् खुजलैन तहिना बजली-
एहेन बात जे अहाँ पेटमे रखने छेलौं आ कहियो एतबो सिनेह नइ भेल जे हमरो कहितौं..!”
पत्नीक झुझुआइत मनकेँ जीवन काका पकैड़ बिच्चेमे बजला-
पेटमे कि एतबे अछि। अच्छा जखन अहाँ पेटक बात लिअ चाहै छी ते सुनू। ई तँ शिवशंकर महादेवक विषयमे कहलौं। आब सुनू महाभारतक विषय।
महाभारतक नाओं मंगली काकी सुनने जरूर छैथ आ द्रौपदीक चिरहरणक सिनेमो देखने छैथ। तँए, महाभारतक नओं सुनि आरो जिज्ञासा बढ़ि गेलैन। बजली-
सुनाइये दिअ। जिनगीक कोनो ठेकान अछि, जँ मन लगले चलि जाएत तखन तँ अनेरे ने भूत बनि लपकबै।
मुस्की दैत जीवन काका बजला-
जखन महाभारत होइत रहै ने, तइमे एकटा वीर रहै शिखंडी, ओहो अपने श्यामा जकाँ छल। ओ की केलकै से बुझल अछि?”
मुड़ी डोलबैत मंगली काकी बजली-
नइ..!”
जीवन काका बजला-
कृपाचार्योकेँ आ कृतवर्मोकेँ छेरा-छेरा भरौलक!”
मंगली काकीक मनमे जेना आत्मबल फुलाए लगलैन तहिना बिहुसैत बजली-
अरे वा..!”
जीवन काका मंगली काकीक मनमे पसि बजला-
ऐँ., एतबेमे हदिआइ छी! भगवान राम जखन बोन जाए लगला तँ अन्तिम विदाइ अयोध्यावासी लैत-दैत पुरुख-नारी कहि तँ सभकेँ विदा कऽ देलखिन आ अपने दच्छिन मुहेँक रस्ता धेलैन, आ बीचमे किछु गोरे ओहिना ठाढ़े रहि गेल, ओ की केलक से बुझल अछि?”
मंगली काकी बजली-
नइ..!”
जीवन काका बजला-
ओ सभ–जे ठाढ़ छल से–के सभ छल? जे पुरुख-नारीक बीचक अछि। जेकरा शखा-सन्तान नइ हएत। जखन रामचन्द्रजी, लक्ष्मण आ सीताक संग घुमि कऽ अयोध्याक आड़िपर पहुँचला तखन वएह सभ दुनू भाँइक गट्टा पकैड़ कहलकैन जे अहाँ हमरा किए ने विदाइ देलौं? जइ आशामे अहीं जकाँ चौदह बर्ख हमहूँ सभ टपला खेलौं?”
मंगली काकीक मनो आ शरीरो जेना शान्त भऽ गेलैन। बजली-
जे अहाँ करबै सएह ने हमहूँ करब।
रणभूमिक संगी पेब जीवन काका बजला-
श्यामा हमर सन्तान छी। अपना जीबैत ओकरा भीख माँगैत देखब, की ओहन लाजक विचार लोक अपने नइ करत। दुनियाँ एक दिस भऽ जाए, मुदा...। जाबे धरि श्यामा पढ़ए चाहत, समांग बुझि सहयोग देबइ। जहिया ओ पढ़ाइ छोड़त तहिया अपना आँखिक सोझमे ओकरा मनोनुकूल जीबैक साधन बना देबइ। अपना पैरपर ठाढ़ कऽ समाजक ओहन मनुख बना देबै जे अपन श्रमसँ अपन सुभिमानी जिनगी बना जीबत आ ओकर रक्षा करैत रहत।
¦
शब्द संख्या : 2767, तिथि : 28 जनवरी 2018


[1] मक्खन
[2] चन्द्रगुप्त नाटक- जयशंकर प्रसाद
[3] परिवार-समाजक
[4] अकलबेराक माने ऐठाम भेल, भिनसुरका समैयक जे क्रिया-कलाप अछि, तइसँ भिन्न
[5] सन्ताप