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Monday, October 31, 2016

केना जीब?‍ (कथाकार- जगदीश प्रसाद मण्‍डल)

केना जीब?

सेवा निवृत्तिक सातम सालक सातम मास, सातम मासक सातम दिन, सात बजे साँझमे दू-जनियाँ सोफापर दुनू परानी प्रोफेसर शंकर कुमार ओंघराएल छला। दुनू बेकतीक मन खटाएल रहैन। दस बजेक करीब दिनेमे सुनने छला जे संगीक संगिनी चूल्हिक गैसक रिसावसँ झड़ैक अस्पतालक सीटपर चिकैर-चिकैर कानि रहल छैथ। सत्तैर बर्खक अवस्थामे संगी अपने दौग-धूप कऽ रहल छैथ‍! मुदा अस्पतालक डाक्टर, नर्स आ कम्पाउण्डरो जी-जानसँ रोगीकेँ बँचबै पाछू लगल छथिन! तेकर कारण अछि जे एक तँ पाइक कमी नहि, आ दोसर पहुँचो नीके छैन। संगिनीक घटनाकेँ सरस्वती लगसँ तँ नइ देखने छेली मुदा समाचारक रूपमे सुनने छेली। सुनिते करेज तेना दहैल गेलैन जे साँसक गतिसँ छातीक धुकधुकी बढ़लैन ओ असथिरे ने भऽ रहल छेलैन। जेना नस-नसमे भयक भूत समा गेलैन। अन्हारक वाण जकाँ चारू कातसँ मृत्‍युक तीर बेधए लगलैन। जहिना वैरागी रागसँ डरैत आ जोगी भोगसँ तहिना मृत्‍युक भयसँ सरस्‍वती डरए लगली।
पाँच साए एम.एल.बला ह्वि‍स्कीक बोतल प्रोफेसर शंकर कुमारकेँ बेअसर बुझि‍ पड़लैन। मनक चिन्ता रूपी तीर ह्वि‍स्कीक असरकेँ रस्तेमे रोकने छल। लग अबै ने दैन‍। कछ-मछ करैत शंकर पत्नीकेँ कहलखिन-
एकबेर चाह...।
सरस्वतीक मन चाह पीऐसँ सुरक्षित चूल्हि नै जराएब बुझैन। अपन अज्ञाक उल्लंघन होइत देख‍ शंकरक मन महुराए लगलैन। जहिना भोज्य-पदार्थक बरतनमे गिरगिट खसि महुरबैत तहिना। बेअसर सरस्‍वतीकेँ देख डेग भरि पाछू घुसैक शंकर मुस्की दैत दोहरा कऽ बजला-
चलू, हमहीं चाह बनाएब। कीचेनक तँ सभ किछु देखल नै अछि, खाली अहाँ देखा-देखा देब।
जिनगीक अन्‍तिम अवस्थामे पतिपर जीत‍ देख‍ ढेंग सन देहकेँ उठा सरस्‍वती कीचेन दिस बढ़ली।
चाह बना शंकर कीचेनेमे पीबए लगला। मुदा तैयो गप-सप्‍प करैक मन किनको ने होइन। मनक सोग नव विषयकेँ मनमे अबै ने दैन। जहिना घी नइ अरघनिहारकेँ थारीमे देख‍ते जीह ओकिऐ लगैत तहिना नव विचार अबि‍ते जी-मन पचपचाए लगैन। चाह पीब दुनू गोरे कोठरीमे आबि फेर सोफेपर पड़ि‍ रहला। गुम-सुम्‍म! जहिना साधक साधनामे लीन भऽ समाधिस्‍थ होइ छैथ‍‍ तहिना दुनू गोरे अपन-अपन विचारक दुनियाँमे औनाए लगला।
सरस्वतीक नजैर पाँच बर्खक अवस्थापर पहुँचलैन। की छेलए माए-बापक राज..! खेनाइ, खेलनाइ, पढ़नाइक संग पाबैनमे उपास केनाइ आ फूल तोड़ि पूजा केनाइ.., बस यएह छल जिनगी। मनमे सुख-दुखक जन्‍मो कहाँ भेल छल। सोहनगर वातावरणमे बि‍आह भेल। नैहरसँ सेवा करए नोकरनी आएल छल। सासुरो सम्पन्ने रहए। कथुक अभाव नहि। नोकरे पानियोँ भरै छल आ भानसो करै छल। अपनो प्रोफेसरे छला। पाइक संग प्रतिष्ठो बनौने छला। विद्यार्थीसँ शिक्षक धरिक बीच सम्मानित छला। अपनासँ बीसे बेटोक पढ़ैपर खर्च केलैन। आब जे महगाइ शिक्षामे आबि गेल अछि तइसँ इमानदार कमेनिहारक धि‍या-पुता-ले शि‍क्षा असंभव भऽ गेल अछि। दरमाहासँ तँ नहियेँ मुदा पिताक देल सम्‍पैतसँ एते जरूर केलैन। अमेरिकामे बेटाकेँ पढ़ा लिलसा मेटौलैन। मुदा अखन की देखै छी? ऐ अवस्थामे दिन-राति तीन मंजिलापर उतरब-चढ़ब पार लगत? ओहि‍ना तँ हाथ-पएर बिनबिनाइत रहैए। देह भारी बुझि‍ पड़ैए। तैपर परिवारक सभ काज! ऐ उमेरमे बुढ़-कनियाँ बनि जीब रहल छी। ..तरे-तर सरस्‍वतीक देहसँ पसेना चलए लगलैन। अनासुरती मुहसँ निकललैन-  
ऐ जीवनसँ मरब नीक।
पत्नीक बात सुनि शंकर कुमारक भक्क टुटलैन। अखन धरि चेतनाहीन भेल शंकरो अपन पैछला जिनगी देखै छला। गामक स्कूल...। केते सिनेहसँ पिताजी घरक देवताकेँ गोड़ लगा, कन्हापर चढ़ा सरस्वती माताक जयकहि‍ आँगनसँ निकैल सरस्वतीक मन्‍दिरमे लऽ गेल छला। की हम ओइ‍सँ  कम अपना बेटाकेँ केलौं? कथमपि नहि। डेरामे गाड़ल देवता तँ नइ अछि मुदा देबालमे टाँगल फोटो आ अष्टद्रव्यक बनौल मुरती तँ ऐछे। बाड़ीक वसन्ती गुलाब तँ नहि, मुदा मह-मह करैत भकराड़ रूपमे बनल प्लास्टिकक फूल तँ चढ़ौनहि छिऐन। धुमन-सररक धूपक बदला गुगुल आ अगरबत्ती तँ चढ़ैबते छिऐन। मोटर-साइकिलपर चढ़ा शहरक सभसँ नीक विद्यालयमे पढ़ेबे केलिऐन। पिताजी जेतेक हमरा पढ़ौलैन आ एक सीमा धरि पहुँचा देलैन, तहिना तँ हमहूँ केलिऐन। नोकरी भेलापर ताधैर पत्नी गाममे रहली जाधैर‍ बाबू-माए जीबैत रहला। मरि‍तोकाल धरि माए संगे खाइले कहैथ। संगे तँ नहि खाइ, मुदा एकठीम बैस कऽ जरूर खाइ। मुदा बेटाकेँ जहिए-सँ कनभेन्‍टमे नाओं लिखेलौं तहिए-सँ एके शहरमे रहनौं फुट-फुट रहए लगलौं! समैक संग शिक्षो बदलल। ..एकाएक शंकरक नजैर आगू बढ़ि अपन जिनगीक अवस्थापर पड़लैन। चारिम अवस्था। जइ अवस्थामे सभ कथूसँ सम्पन्न भऽ अभावकेँ निर्मूल-नष्ट कऽ परिवारसँ ऊपर उठि समाजमे मि‍लि‍ जाएब होइ छइ। हमर समाज केहेन? जइ समाजमे मनुखक संग-संग जीव-जन्तु, माटि-पानि, घर-दुआर धरि एक-दोसरकेँ नीक-अधला, सुख-दुखमे संग दैत अछि। जैठाम एकठीम बैस सभ भोज-काजमे खेबो करैए, दसगरदा उत्सवो हँसी-खुशीसँ मनबैए, ढोल-डम्फापर होरी गाबि-गाबि नचबो करैए, जुड़शीतलमे इनार-पोखैर उड़ाहबो करैए, शिव-पार्वती बना बजाक संग गामो घुमैए...।  
बेटाकेँ अमेरिकामे पढ़ेलौं। ओ ओइ‍ समाज आ संस्कृतिमे तेना मि‍लि‍ गेल जे अपन सभटा बिसैर गेल। आइ जँ हम अमेरिका जा रहए लगी तँ ओइ‍ठामक जिनगी दुनू बेकतीकेँ केतेक दिन जीबए देत? की दुनियाँमे मृत्‍यु छोड़ि हमरा-ले सभ-ले किछु शेष नै बँचल अछि! निराश मनमे एलैन करनी देखिहह मरनी बेर।जिनगीमे केतए चूक भेल? जँ चूक नइ भेल तँ ऐ अवस्थामे पहुँच‍ केना गेल छी?  
पत्नीक बात ऐ जीवनसँ मरब नीकसुनि धड़फड़ा कऽ उठि प्रोफेसर शंकर कुमार बजला-
अखन सुतैबेर अछि जे सुति रहलौं?”
सूतल कहाँ छी। भानस करैसँ मन असकताइत अछि।
तँ की भुखले रहब?”
शंकर कुमार बाजि तँ गेला मुदा मन पाछू घुमि‍ कऽ तकलकैन। एक तँ ओहिना मरैक बाट धेने छी, तहूमे जे दस-बीस बरख जीबो करितौं से तेहेन रोग भेल जाइ छैन जे भुखले मरब। जँ खाएब नइ तँ रातिमे नीन केना हएत? जँ नीन नइ हएत तँ जीब केतेक दिन?
पत्नी-
केता-दिन कहलौं जे नोकर रखि लिअ?”
नोकर सुनि शंकर अमती काँटक ओझरीमे पड़ि गेला। देखैमे नान्हि-नान्हिटा मुदा छाँह जकाँ छोड़ैले तैयार नहि। मनमे जोर मारलकैन जे अपने जिनगी भरि नोकरी केलौं। बेटो-पुतोहु–दुनू इंजीनियर–अनके नोकरी करैए आ अपने नोकर रक्खू। जहन ड्यूटी करै छेलौं, बेसी तलब उठबै छेलौं तहन नोकरे ने रखलौं। कारणो छल जे पत्नी थेहगर छेली आ बेटो-पुतोहुक आशा छल। सरस्‍वती थोड़े बुझै छेली जे बुढ़ाड़ी एहेन हएत। आइ-काल्हि नोकर केते महग भऽ गेल अछि से थोड़े बुझै छैथ। तकलीफ हेतैन तँ बजबे करती। भलेँ हमरा बुते पुरौल हुअए वा नहि। पहिले जकाँ पाँच-रूपैआ-दस-रूपैआमे नोकर भेटत? तहूमे बाल-बोधकेँ थोड़े रखि सकै छी। अनेरे लेनी-के-देनी पड़त। घरक सुख जहलमे भेटत। जँ सिआन राखब तँ तीन हजारसँ कम लेत? तहूमे कि कोनो स्कूल-कौलेज आकि मि‍ल-फैक्टरीक नोकरी हेतइ। घरमे काज करत तँ खाइले नै देबै से हएत? तहूमे नीक-निकुत बेसी वएह खाएत। तेहेन समए आबि गेल जे कहीं सम्‍पैते ने दुनू बेकतीक जानो लऽ लिअए! ..जानपर नजैर पड़िते शंकरक आँखि ढबढबाए लगलैन। जाने नइ तँ जहान की? ..जहिना वीणाक तार टुटलापर अवाज खनखना कऽ निकलै छै तहिना टुटल जिनगीक स्वरमे शंकर कुमार सरस्‍वतीकेँ कहलखिन-
अहाँक मन असकताइत अछि तँ पड़ू। कहुना-कहुना कऽ क्षुधा तृप्त करै-जोकर अपनेसँ टभका लइ छी।  
मने-मन सरस्वती बजली-  
केना जीब?”
¦¦
शब्‍द संख्‍या : 1039 
अर्द्धांगिनी लधु कथा संग्रहक दोसर संस्‍करणसँ साभार...।

Wednesday, October 19, 2016

जगदीश प्रसाद मण्‍डल :: संक्षिप्‍त परिचय (साहित्‍यिक)

जगदीश प्रसाद मण्‍डल :: संक्षिप्‍त परिचय (साहित्‍यिक)
जन्‍म : 5 जुलाई 1947., पिताक नाओं : स्‍व. ल्‍लू मण्‍डलमाताक नाओं :   स्‍व. मकोबती देवी। पत्नी : श्रीमती रामसखी देवी।
पता : मूलगाम- बेरमा, भाया- तमुरिया, प्रखण्‍ड- लखनौर, जिला- मधुबनी, (बिहार) पिन : 847410,
मो. 9931654742, 9570938611.
मातृक : मनसारा, भाया- घनश्‍यामपुर, जिला- दरभंगा
जीवि‍कोपार्जन : कृषि (मुख्‍यत: तरकारी खेती)
शिक्षा : एम.. द्वय (हिन्‍दी, राजनीति शास्‍त्र)
साहित्‍य लेखन : 2001 ईस्‍वीक पछाइतसँ...
सम्‍मान/ पुरस्‍कार : टैगोर लिटिरेचर एवार्ड’, ‘विदेह भाषा सम्‍मान’, विदेह बाल साहित्‍य पुरस्‍कार’, वैदेह सम्‍मान तथा कौशिकी साहित्‍य सम्‍मान।
मौलिक रचना :
गीत संग्रह : 1. गीतांजलि, 2. सुखाएल पोखरि‍क जाइठ, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता।
कविता संग्रह : 5. इंद्रधनुषी अकास, 6. राति‍-दि, 7. सतबेध।
एकांकी संचयन : 8. पंचवटी।
नाटक : 9. मिथिलाक बेटी, 10. कम्‍प्रोमाइज, 11. झमेलिया बिआह, 12. रत्नाकर डकैत, 13. स्‍वयंवर।
उपन्‍यास : 14. मौलाइल गाछक फूल, 15. उत्‍थान-पतन, 16. जिनगीक जीत, 17. जीवन-मरण, 18. जीवन संघर्ष, 19. नै धाड़ैए, 20. बड़की बहि, 21. भादवक आठ अन्‍हार, 22. सधबा-विधवा, 23. ठूठ गाछ।
एकांकी : 24. कल्‍याणी, 25. सतमाए, 26. समझौता, 27. तामक तमघैल, 28. बीरांगना।
विहैन कथा संग्रह : 29. तरेगन, 30. बजन्‍ता-बुझन्‍ता।
दीर्घ कथा संग्रह : 31. शंभुदास, 32. रटनी खढ़।
लघु कथा संग्रह : 33. गामक जिनगी, 34. अर्द्धांगिनी, 35. सतभैंया पोखरि, 36. गामक शकल-सूरत, 37. अपन मन अपन धन, 38. समरथाइक भूत, 39. अप्‍पन-बीरान, 40. बाल गोपाल, 41. भकमोड़, 42. उलबा चाउर, 43. पतझाड़, 44. लजबि‍जी, 45. उकड़ू समय, 46. मधुमाछी, 47. पसेनाक धरम, 48. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 49. फलहार, 50. खसैत गाछ, 51. एगच्‍छा आमक गाछ, 52. शुभचिन्‍तक, 53. गाछपर सँ खसला, 54. डभियाएल गाम, 55. गुलेती दास, 56. मुड़ियाएल घर

Saturday, October 15, 2016

पीरारक फड़ (चारिम संस्‍करण, गामक जिनगी लघु कथा संग्रहसँ)

गोल-गोल हरिअर-हरिअर भुआ जकाँ सोहरी लागल डारिमे, जेहने हरिअर पात तेहने फड़, छी पीरारक फड़। पाँचेटा पुरान गाछ गाममे, बड़का-बड़का आम, जामुन आ शि‍शो गाछक जन्‍म ओ पाँचो पीरारक गाछ देखने। साए बर्खक करियाबाबा बजैत-
जहियासँ मोन अछि ओ पाँचो गाछ ओहिना बुझि पड़ैए। एते ठनका खसल, बिहाड़ि आएल मुदा ओइ पाँचो गाछक रोइयाँ-भगन नइ भेलइ।
दस गजसँ नमहर नहि, ने मेघडम्मर जकाँ बहुत पसरल आ ने छिड़ियाएल। छोट-छीन बर्खाकेँ रोकि पानिक बूनकेँ माटिक मुँह नइ देखए दइत। घनगर पात सजा-सजा पाँचो गाछ सजल। सोहत केर कोथी सन चोखगर काँट सभ डारिकेँ पहरेदार जकाँ सजौने। छरगर-छरगर डारिमे चौरगर-चौरगर पात, जेना इन्द्रकमल वा तगर फूलक होइत। तहिना फूलो।
पाँचो पीरारक गाछ सैयो बिहाड़ि आ हजारो बर्खाक संग महरसँ छोट धरि सैयो बेर पाथरक चोट खेलक। तेतबे नहि, केतेको बाढ़ि-रौदीकेँ सेहो हँसैत-हँसैत सहलक। जहिना गामक उत्तरबरिया बाधमे एक्के आड़िपर पतियानी लगा पाँचो गाछ ठाढ़ तहि‍ना देखैयोमे पाँचो एक्के रंग। ने नमहर ने छोट डारि जे एक-दोसरसँ हक-हिस्सा-ले झगड़ैत। पाँचोमे अटुट प्रेम। जहन‍‍ पाँचो फूलसँ सजैत तहन‍‍ बुझि पड़ैत जे एक-दोसरक जुआनीक रंग देख हृदैसँ खिलखिला-खिलखिला हँसैत हुअए।
एतेक नमहर जिनगीमे ने कियो जड़िकेँ तामि-कोरि पानि देलक आ ने ठारिकेँ छकैड़-छुकैड़ गाछकेँ सुन्दर बनौलक। सोल्‍होअना देखभाल भगवानेक ऊपर। तँए पाँचो गाछ स्वाभिमानसँ भरल जे केकरो एहसान रूपी कर्ज जिनगीमे नै लेलौं। हरिदम पाँचो हँसैत-इठलाइत मन्द हवामे झूमैत...।
पहिने पाँचो गाछक फूल फुला फड़ बनि झड़ि जाइत, पछाइत फड़ पूर्ण जिनगीक सुख भोगि अन्‍तिम अवस्थामे आबि पवन रूपी नौतहारीकेँ पठा चिड़ै-चुनमुनीकेँ बजा-बजा अपन शरीर दान करैत, यएह पाँचो गाछक जिनगी भरिक धरम रहल।
ओइ गाछसँ हटिए कऽ लोक अपन खेतक जोत-कोर आदि करैत जे ओइ गाछपर सुगबा साँप रहैए। सुगबा साँप लोककेँ देखैमे अबिते ने छै किएक तँ ओ हरिअर-लत्ती जकाँ होइए। जेकरा कटलासँ स्वर्ग-नरकक द्वार अनेरे खुजि जाइ छइ। बीचमे केतौ कोनो रूकाबट‍ नै होइए।
उत्तरबारि बाधक रखबारि रतना करै छल। दू साल पहिनहि दुनू परानी रतना मरि गेल। दू सालसँ कि‍यो बाधक रखबारि करैले तैयारे ने होइत। डर होइ जे पीरारक गाछपर सुगबा साँप रहैए, के अपन जान गमौत, दू-चारि सेर अन्न सालमे हएत कि‍ नइ हएत।
साल भरि पहिने पिचकुन नोकरी करैले मोरंग गेल। रौदियाह समए भेने जखन‍‍ किसानो सबहक दशा नीक नहि, तखन‍‍ जन-बोनिहारक चर्चे की। साँझक-साँझ चुल्हि नै पजरैत। गरीब-गुरबा गाए-बकरी बेच-बेच कियो मोरंग, कियो सिलीगुड़ी, तँ कियो आसाम नोकरी करए गेल। पिचकुन सेहो रखबारीवाली नवकी कनियासँ पनरह रूपैआ कर्जा लऽ गेल। अखन धरि गाममे पिचकुनकेँ बकलेले-ढहलेल लोक बुझैत। जेते गोरेक मेड़िया नोकरी करए गेल छल ओइमे सँ किछु गोरे विराटनगर, किछु गोरे रंगैली, किछु गोरे सिलीगुड़ी आ किछु गोरे आसाम गेल। पिचकुनमाकेँ बकलेल बुझि सभ छोड़ि अपन-अपन गर लगबए लगल। असगरे पिचकुनमा इटहरी चौकसँ थोड़े आगू जा एकटा गाछक निच्चाँमे बैस चूड़ा आ घुघनी खाए लगल। खाइते छल आकि दू गोरे केँ उत्तर-मुहेँ जाइत देख चूड़ा-घुघनीकेँ गमछाक खोंचैड़मे लऽ खाइते पाछू-पाछू विदा भेल। खेबो करए आ गप्पो-सप्प करए।
जाइत-जाइत धनकुटाक करीब पहुँचल। जइ दुनू गोरेक संग रहए ओ दुनू किसान। ओहीमे सँ एक गोरे पिचकुनकेँ नोकरी रखि लेलक। मरद-मौगी मिला पचासोसँ बेसी जन मंगत राम खटबैत। मंगत राम सखुआ-लकड़ीक तीन महला घर बनौने। किछु खेत पहाड़ोपर छइ। जइमे मरूआ, सामी-कौनी इत्‍यादि उपजबैत, तैसंग नेबो समतोला सबहक गाछ सेहो रोपने अछि।
पहाड़क ऊपरमे चमकैत रौदकेँ पिचकुन उजड़ा पहाड़ बुझैत। छोट-छोट गाछसँ लऽ कऽ पैघ-पैघ गाछक जंगल। छोट-छोट पहाड़सँ लऽ कऽ नमहर-नमहर पहाड़ देख पिचकुन मने-मन सोचए जे दोसर दुनियाँमे चलि एलौं। मुदा रस्ताक ठेकान रहने भरोस रहै जे तीन दिनमे अपन गाम चलि जाएब। बड़का-बड़का बखाड़ी, नारक बड़का-बड़का टाल देख पिचकुन मने-मन खुशी होइत जे मालिक खूब धनिक अछि। कहियो नोकरीसँ हटौत नहि। जखन गाम जाइक मन हएत छुट्टी लऽ कऽ चलि जाएब आ फेरो चलि आएब। रस्तो तँ देखले अछि।
साल भरि नोकरी केला पछाइत‍‍ पिचकुनकेँ गाम अबैक मन भेलइ। जहियासँ पिचकुन नोकरी कऽ रहल छल तैबीच एक्को पाइ घर नै पठौलक। पठैबतए केना? ने डाकघरक ज्ञान रहै आ ने केकरो अबैत-जाइत देखइ।
एकटा थारूनसँ पिचकुनकेँ लाट-घाट भऽ गेलइ। अठारह-उन्नैस बर्खक ओ थारून। मंगते रामक जन। ओकर नाओं छल धनियाँ। पिचकुनक संग अबैले धनियाँ राजी भऽ गेल।
साल भरिक पछाइत‍‍ पिचकुन गाम जाएत तँए माए-ले ऊनी स्वीटर, चद्दैर आ अपना-ले फुलपेन्‍ट, भरि बाँहिक स्वीटर, चद्दैर किनलक। समाज सभ-ले समतोला किनलक। कपड़ा, समतोला आदि‍क मोटरी बान्हि, रूपैआकेँ फुलपेन्‍टक जेबीमे लऽ मोटरीमे रखि‍ बन्हलक। बटखर्चा-ले मुरही लऽ लेलक।
धनियोँ अपन धएल-धरल रूपैआ, कपड़ा सभ बान्हि रातिए-मे तैयार भेल। ..जंगल-झार दुआरे रातिमे नै निकलल। भुरूकबा उगिते दुनू गोरे अपन-अपन मोटरी लऽ चुपचाप विदा भेल। जही रस्तासँ पिचकुन गेल रहए ओही रस्ते चलल। इटहरी आबि दुनू गोरे बस पकड़लक। बससँ बथनाहा आबि पएरे विदा भेल। कोसीमे नावपर पार भऽ निर्मली तक पएरे आएल। निर्मलीमे टेन पकैड़ गाम आएल।
फुलपेन्‍ट कमीज आ पैरमे चप्पल पहिरने, बाबड़ी उनटौने, कान्हपर मोटरी नेने आगू-आगू पिचकुन आ पाछू-पाछू धनियाँ आबि माएकेँ गोड़ लगलक। टोल-पड़ोसक लोक पिचकुनकेँ चिन्हबे ने करैत। पिचकुन माएकेँ गोड़ लागि ओलतीमे चप्पल खोलि‍‍ माएकेँ घर लऽ जा मोटरी खोलि रूपैआक गड्डी चुपचाप देखौलक। देख‍ते बुझू ऊसरमे दुभि जनैम गेल। रूपैआक गड्डी देख माइक मोन उड़ि गेलइ। हँसोंथि-पसोंथि कऽ सभ कपड़ा समैट, रूपैआ तरमे घोंसिया मोटरी बान्हि मुनेसरी धरैनपर रखलक। धनियाँ ओसारपर बैसल। धनियाँक सम्बन्धमे माए पिचकुनकेँ पुछलक-
“ई कनियाँ के छेथि‍न?”
मुसकी दैत पिचकुन कहलक-
“तोरे पुतोहु। ओतै बिआह कऽ लेलौं।
एक्के-दुइए टोलक जनिजाति आबए लगली। पिचकुनक माए सभकेँ एक-एकटा समतोला देलक। एकटा दसटकही जेबीसँ निकालि पिचकुन माएकेँ दैत कहलक-
“माए, भूख लगल अछि, जो दोकानसँ बेसाहि सभ कि‍छु लऽ आन। पहिने भानस कर। ताबे हम नहा लइ छी। तीन दिनक रस्ताक झमारल छी, ओंघीसँ देह भँसियाइए।
पुतोहुकेँ देख मुनेसरी सौंसे टोल पुतोहु देखैले हकार देलक। तैसंग जातिक भोजो गछलक।
सातम दिन पिचकुन दुनू परानी साँझमे सोमनी दादीक ऐठाम गेल, आँगनमे बिछान बिछा सोमनी दादी पोता-पोती सभकेँ खेलबैत रहैथ।
दादीकेँ पिचकुन गोड़ लागि इशारासँ धनियाकेँ सेहो गोड़ लगैले कहलक। धनि‍योँ दादीकेँ गोड़ लगलकैन। ओछाइनिक कोणपर बैस पिचकुन आँखिक इशारासँ दादीकेँ जाँतैले सेहो कहलक। धनियाँ सोमनी दादीकेँ जाँतब शुरू केलक तखने पिचकुन सोमनी दादीकेँ कहए लगल-
“दादी, गाममे तँ सभ बकलेले-ढहलेल बुझै छेलए। साल भरि पहिनहि मोरंग गेलौं। कमेबो केलौं आ ओतै बिआहो कऽ लेलौं। आब गामेमे रहब। गाममे अहाँ सभसँ पैघ छी, दुनू परानीकेँ असिरवाद दिअ।
उत्तरबारि बाधमे, सभसँ बेसी खेत सोमनी दादीक, जइ बाधमे दू सालसँ रखबार नहि। पिचकुनकेँ दादी उत्तरबारि बाध रखबारि करैले कहलक। संगे पाँच कट्ठा खेत बटाइयो करैले कहलक। ..रोजी देख पिचकुन गछि लेलक। दादियो खोपड़ी बन्हैले दूटा बाँस, एक बोझ खढ़ आ एक मुट्ठी साबे गछि लेलखिन।
दोसर दिन पिचकुन दुनू परानी उत्तरबारि बाध जा कऽ खोपड़ी बन्हैक जगह टेबलक। एकटा ऊँचगर परती, जैपर बरसातोमे पानि नै अँटकैत। ओही जगहकेँ पिचकुन हियबैत रहए। आ एमहर धनियाँक नजैर पीरारक गाछपर पड़लै। गाछ लग जा फड़केँ तजबीज करए लगल। फड़ देख धनियाँ साड़ीक फाँड़ बान्हि गाछपर चढ़ि गेल। गाछमे लुबधल पीरारक फड़ देख धनियाँक मन चपचपा गेल। तीमन करैले दसटा तोड़ियो लेलक। जेना केकरो माटिमे गड़ल रूपैआक तमघैल भेटलासँ खुशी होइत तहिना धनियाँक मोन खुशीसँ चपचपा गेलइ। पिचकुन कोदारिसँ परतीकेँ छिलए-बनबए लगल। मने-मन धनियाँ एक मनसँ ऊपरे फड़ एक-एकटा गाछमे ठेकलक। खुशीसँ धनियाँक मुहसँ गीत निकलए लगल। गीत गुनगुनाइत धनियाँ पिचकुनकेँ हाक पाड़ि बाजल-
“तकदीर जागि गेल। देखै छिऐ गाछमे कोंकची लगल फड़! काल्हिसँ तोड़ि-तोड़ि हाट लऽ जाएब। खूब महग बिकाएत।
पिचकुनकेँ बुझले ने। धनियाँक बातपर बिसवासे ने करए। खिसिया कऽ पुछलक-
“अहाँ चिन्है छिऐ जे की छिऐ? जँ लोक खइतै तँ अहि‍ना लुधकी लगल रहितै?”
जहिना पीरार देख मने-मन धनियाँ अपन गरीबीकेँ खुशहाली दिस‍ बढ़ैत देखए‍, गरीबीक मनमे अमीरीक ज्योति अबैत देखए। तहिना सौंसे बाधक रखबारिक संग पाँच कट्ठाक बँटाइक खुशी पिचकुनक मनमे। तँए पत्नीक संग रक्का-टोकी नै करब उचित बुझि पिचकुन बाजल-
“हमरा हाट-बजार करैक लूरि‍ नै अछि, केना बेचब?”
धनियाँ नैहरमे हाटो-बजार करै छल। खेतीक सभ काजक लूरि‍ सेहो छेलइ। तेतबे नहि, हाँस-बत्तक पोसबो करए आ हाट जा बेचबो करए। निर्भीक भऽ धनियाँ बाजल-
“कड़चीक लग्गी बना कऽ सभ दिन तोड़बो करब आ हाट जा बेचबो करब। अहाँ संगमे रहब आ देखबै।
आसिन आबि गेल। बर्खा ठमकल। सवारी समए। अधिक बर्खा भेने खेत सभमे धान ऊपरा-ऊपरी। जेतए धरि नजैर जाइत तेतए धरि एकरंग हरिअर धान बुझि पड़ैत। बेर टगिते धानक पातपर ओसक बून चमकए लगैत। जहिना कोनो बाला हरिअर साड़ी, हरिअर आँगीक संग माथमे मंगटि‍का पहिर देखैमे लगैत तहिना खेत रूपी बाला देखैमे लगैत। मन्द-मन्द पुर्बा हवा चलए लगल। जेतै बैसू तेतै आलस आबि जाएत। बाधमे तीनठाम पानि बहैले कटारि। जइसँ ऊपरका खेतक पानि निचला खेत दिस‍ बहैत। पिचकुन तीनू कटारिकेँ दुनू भागसँ बान्हि अपियारी बनौलक। अपियारीक पानि उपैछते अनेरूआ माछ कुदि-कुदि ओइमे फँसए लगल। धनियाँ अपियारियो ओगरैत आ माछो बिछैत। पिचकुन छिट्टामे लऽ हाटो जा बेचैत आ गामोमे घुमि-घुमि बेचए लगल। दोसर-दोसर माछ बेचनिहार पिचकुनकेँ एकटा साइकिल कीनि लइले कहलक। माथपर माछक छिट्टा लऽ घुमने देहो महकै।
साइकिलक नाओं सुनि पिचकुनक सूतल मन फुरफुरा कऽ उठल। मुदा साइकिल चढ़ब नै अबैए! पिचकुन थतमतमे पड़ि गेल। थतमतमे पड़ल पिचकुनक मनमे थोड़े कालक पछाइत उठलै, जहन‍‍ साइकिल भऽ जाएत तहन‍‍ चढ़ब सिखबो करब आ जाबे सीखल नै हएत ताबे पैछला सीटपर छिट्टा रखि गुड़काइए कऽ घुमि-घुमि बेचब...
हाटसँ घुमैत काल पिचकुन धनियाकेँ कहलक-
“अधपुराने एकटा साइकिल कीनि लेब।
आमदनीक खुशी धनियाकेँ रहबे करए। मुस्‍कियाइत बाजल‍-
“जहन‍‍ साइकिले कीनब तँ अधपुरान किए कीनब? लबके कीनि लिअ।
जितिया पावैन। मरूआ रोटी माछक पावैन। एक दिन पहिनहि पिचकुनकेँ माछक बेना लोक सभ दऽ गेल। सुतली रातिमे पिचकुन चहा-चहा कऽ उठैत आ घरवालीकेँ कहैत-
“अपियारीक सभ माछ बीछि लेलक।
मुदा धनियाँ सपना बुझि फेर सुति रहए। ..अन्हरोखे दुनू परानी पिचकुन टौहकी-छिट्टा लऽ अपियारी लग गेल। अन्हार रहने माछ देखबे ने करए। एकटा अपियारी लग पिचकुन बैसल आ दोसर लग धनि‍याँ। बीड़ी लगा-लगा पिचकुन पिबैत। फरिच्छ होइते एकटा अपि‍यारीमे पिचकुन आ दोसरमे धनियाँ पैसल। दुनू गोरे माछ बिछए लगल।
जितिया छी, माछ हएत की नहि, तँए लोक दुआरे लोक अपियारीए लग पहुँचए लगल। तरजू-बैटखाड़ा नइ रहने पिचकुन अन्दाजेसँ बेचए लगल। छिट्टासँ ऊपरे माछ बीकि‍ गेलइ। बँचलाहा माछ दुनू परानी आँगन नेने आएल। अदहासँ बेसीए अँगनोमे बीकल। पावैनक दिन रहने हाटक भरोसे रहब पिचकुन नीक नै बुझि धनियाकेँ कहलक-
“झब-दे जलखै बनाउ, अखने माछ बेचए जाएब।
हाँइ-हाँइ कऽ धनियाँ रोटी पका माछक सन्ना बनौलक। खा कऽ पिचकुन साइकिलपर छिट्टा लादि अँगने-अँगने माछ बेचए विदा भेल। बारह बजैत-बजैत सभटा माछ बीकि‍ गेलइ।
रौद तीखर। पिचकुन माछ बेच पसि‍खाना पहुँच‍‍ गेल। पसि‍खाना ताड़ी पिआकसँ भरल। दुनू परानी पासी गहिंकी सम्हारैमे तंग-तंग। बैसैक जगह नहि। तँए पिचकुन पासी लग जा एक बम्मा ताड़ी लऽ ठाढ़े-ठाढ़ पीब कैंचा दऽ साइकिलपर चढ़ि विदा भेल। धनियाकेँ भाँज लगि‍ गेलै जे पिचकुन ताड़ी पीबैए। दूरेसँ पिचकुनकेँ साइकिलपर अबैत देख धनियाँ ओसारपर ओछाइन ओछा सुजनी ओढ़ि कुहरए लगल। ..आँगन अबिते पिचकुन धनियाकेँ कुहरैत देख लगमे जा पुछलक-
“की-इ-इ होइ-इ-इ अए-ए-ए?”
पिचकुनक बोली सुनि धनियाँ आरो जोर-जोरसँ कुहरए लगल। धनियाँक मुँह उघारैत पिचकुन फेर पुछलक। तैपर नकियाइत धनियाँ बाजल-
“मरि जाएब! बड़का दुख पकैड़ लेलक! छाती दुखाइए! जाउ दोकानसँ करूतेल नेने आउ। सगरे देह मालिस करू, तखने छूटत।
लटपटाइते पिचकुन शीशी लऽ दोकानसँ तेल आनि धनियाकेँ मालिस करए लगल। कड़ घुमि-घुमि‍ धनियाँ पिचकुनसँ भरि पोख मालिस करौलक। जखन‍ पिचकुनकेँ हाथ दुखा गेलै तखन‍ धनियाँ बाजल-
“आब, कन्नी मन हल्लुक लगैए।
मन हल्लुक सुनि पिचकुनक मनमे आशा जगलै। फेर मालिस करए लगल। धीरे-धीरे पिचकुनोक निशोँ उतरै आ धनियोँक तामस कमइ। पिचकुन खुशी जे घरवाली बँचि गेल, आ धनियाँ खुशी जे ताड़ी पीबैक नीक सजा देलिऐन।
आसिन कातिकक आमदनीसँ पिचकुनक जिनगीक नींव पड़ल, पीरारसँ लऽ कऽ माछ तकमे नीक कमेलक। जइ पिचकुनक जिनगी गरीबीसँ जर्जर छल जे जानवरोसँ बत्तर जिनगी जीबैत रहए, ओ पिचकुन जहिना मनुख जानवरक विकसित रूप छी तहिना जानवरक जिनगी टपि मनुखक जिनगीमे प्रवेश केलक। जहिना हमर पूर्वज खोपड़ी बना रहै छला आ धीरे-धीरे आइ नीक मकानमे रहै छैथ‍ तहिना पिचकुन माटिक भीतक देबालक घर बनबैक विचार केलक। ओना पानि पीबैक अपना कोनो उपाय नइ छै जेकरा-ले आगू साल जोगार करैक विचार दुनू परानी मिलि केलक। ओना, खाली घरे आ पानियेँक दिक्कत पिचकुनकेँ नहि। ने घरमे सुतैले चौकी आ ने भानस करैले बरतन छै, मुदा सेहो सभ रसे-रसे जोगार करैक विचार केलक।
सौंसे बाधमे धान फुटि कऽ लबल। हरिअर-उज्जर-लाल-कारी शीशसँ बाध चमकए लगल। दुनू परानी पिचकुन घर-आँगन छोड़ि भरि-भरि दिन बाधेमे रहए लगल। जँ बाधमे नै रहैत तँ साँढ़-पाड़ाक उपद्रव, घसवहिनीक उपद्रवसँ गिरहस्तक-मुहेँ फज्झैत सुनैत।
साँझू-पहरकेँ धनियाँ सोमनी दादी लग जा खेतमे लुबधल धानक प्रशंसा करैत। सोमनी दादी हृदैसँ धनियाकेँ असिरवाद दइत। सामा पावैन भऽ गेल। गोटि‍-पँगरा खेतक धान सेहो पाकए लगल। बैसारी देख धनियाँ पिचकुनकेँ कहलक-
“पीरारक गाछक जड़िकेँ तामि-कोरि सेरिया दियौ जे आगू नीक-नहाँति फड़त।
धनियाँक बात सुनि पिचकुन बढ़ियाँ जकाँ पीरारक गाछक जड़िकेँ तामि
तामि बकरी भेराड़ी मिलल छाउर पाँचो गाछक जड़िमे चारि-चारि पथिया दऽ दू-दू घैल पानि सेहो देलक। ..पनरहे दिनक पछाइत‍‍ पाँचो गाछक रंग बदैल हरिअर-कचोर भऽ गेल। सभ मुड़ीमे नवका कलश सेहो कलशल। जहिना मनुख अपन बच्चाकेँ सेवा करैत तहिना दुनू परानी पिचकुन पीरारक गाछकेँ करए लगल।
अपन सेवा देख पाँचो पीरारक गाछ हृदैसँ दुनू परानी-धनियाकेँ असिरवाद देबए लगल।
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