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Saturday, March 16, 2013

उलबा चाउर :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल

अगहनक पूर्णिमाक दि‍न। काल्हि‍ पूस चढ़त। अदहा-अदहीपर जाड़ औत। महि‍ना दि‍न पछाति‍‍ पूर्णिमा औत। संक्रान्‍ति‍केँ पूर्णिमासँ कोनो सरोकार नै छै। सरोकारो केना रहतै, एकटा दि‍नक हि‍साबे चलै छै दोसर मासक हि‍साबे। ओना दुनू दि‍न-राति‍ संगे चलैए, संगे रहैए मुदा कखनि के अगुआ जाइ छै आकि‍ पछुआ जाइ छै से ओ जानए। मुदा आब अगहनुआँ जाड़ थोड़े रहल, तहूमे ऐबेरक अगहनमे तेहेन शीतलहरि‍ भेल जे माघोक कान काटए लगल। जहि‍ना कोनो खेल आकि‍ काजमे हानि‍-लाभ संगे चलै छै मुदा के कखनि अगुआइ छै आ के कखनि पछुआ जाइ छै से जानब सबहक काज थोड़े छी। जौं से रहैत तँ एक्के भैयारीमे कि‍यो वर-बिमारीक तर पड़ि‍ तरोटा बनि‍ जाइ छै आ कि‍यो बेटाक दहेज लऽ कऽ उपरोटा बनि‍ जाइ छै। एक कील रहने की‍ हेतै। तरोटा ने साधल रहत उपरौटा तँ छुट्टे रहत। तहि‍ना जाड़ोक भेल। अगहनक शीतलहरि‍, समैसँ पहिनहिए माघकेँ बजा अनलक। पूस तँ बिच्‍चेमे रहि‍ गेल। अगहन-माघकेँ भेँट भेने पूस हरा गेल। कि‍एक तँ जहि‍ना गोटे-गोटे गाएओ-महिंसकेँ आ मनुखोकेँ समैसँ पूर्ब‍ जुआनीक सभ वयकरन अपने आबि‍ जाइत तहि‍ना जाड़ोक भेल। पल-पल ओस पला पाला बनबै करत। लतड़ि‍-लतड़ि‍ गोरा रोपि‍ लतड़बे करत। अनुकूल अवसरो भेटलै। कश्मीरी वर्फवारी संगबे भऽ गेलै। समैसँ पूर्व भेनौं आम जकाँ ने कोलिफट्टू भेल ने रसफट्टू आ चोकरेबो नहि‍येँ कएल। मुदा एते तँ भेबे कएल जे पछि‍या अगते पकड़ने ओसो मोटा-मोटा पाला बनि‍ पलड़बे‍ करत। जे हवा संग चलै छल ओ ओसक बून बनि‍ टप-टप नाकपर होइत खसबे करत। मेघौन नै रहि‍तो सुरूज तेना झँपाएल रहैत जे दि‍नो राति‍ए जकाँ भऽ गेल। भरि‍सक दशतारक ने तँ छी!!
जाड़क बैसारी भेने घूरोक चलती आएल आ गपो-शपक, पोथीओ-पुरानक। पुरुखे जकाँ स्‍त्रीगणोक बीच शास्‍त्रार्थ चलए लगल। कि‍यो ग्रह कहैत तँ कि‍यो ग्रहक करतूत। मुदा गपक गरमी ओतए मद्धि‍म पड़ि‍ जाइत, जेतए ि‍नर्णए होइत, जौं अपना बड़दकेँ कुड़हरि‍एसँ कि‍यो नाथत तँ अनका की। तइले हम सभ अनेरे मुहाँ-ठुठी कऽ कऽ फूला-फुली किए करब। जाड़ेक मसि‍म छि‍ऐ ओकरो ति‍हाइ हि‍स्‍सा तँ छइहे। ओकरा जे मन फुरतै, जेना मन हेतै तेना अपन करत। अपने केने ने कि‍यो जीबैए‍। ओहि‍ना तँ नै कहल गेल अछि‍ जे अपने मुइने जग मरए।
बूढ़-बुढ़ानुसक बीच तेसरे झमेल ठाढ़ भेल। कि‍यो कहैत जे पूस-माघमे शीतलहरि‍ तँ देखैत एलौं, अगहनमे तँ नै देखने छेलौं। मुदा हि‍नको सबहक गप ओइठाम जा अँटकि जान्हि‍ जेतए जुग-जमानाक चर्च उठि‍ जाइत। बापेक-बेटाक सम्‍बन्‍ध जे बनि‍ गेल ओ केते उचित‍ छै, जखनि जुगे बदलि‍ गेल तखनि की‍ बदलत आ केते बदलत तेकर काेनो ठेकान छै। समुद्रक भँसियाएल नाव, लहड़ि‍क धक्का सहत तखनि ने कि‍नछरि‍ धड़त। नै तँ केकर मजाल छी जे नावकेँ बँचा लेत। मुदा गाम-घरक बात उठि‍ते सभ गप तर पड़ि‍ जाइत। समस्‍या ठाढ़ भऽ कहैत जे केना बाधक लक्ष्‍मी एहेन समैमे घर औती। नै औती तँ उसनि‍याँ केना हएत आ के करती। उसनि‍याँ नै हएत तँ उसना चाउर केना बनत। नै बनत तँ सुपच्‍च खेनाइ केना हएत। अरबा-अरवानि‍ तँ राजा-महाराजाक छि‍ऐ, कि‍सान परि‍वारक तँ उसने छि‍ऐ ने। भलहिं नोकरि‍या-चकरि‍या अपन्‍आ नेने हुअए। परि‍वारक ओ औरत जे जेते परि‍वार लेल करैत ओ ओते आेइ घरक गि‍रथानि‍ होइए कि‍ने। जहि‍ना खेतक धान, पानि‍क संग चुल्हि‍पर चढ़ि‍ अपन व्‍याकरण बदलि‍ उसनल धानसँ उसना चाउर बनि‍ उसना भात बनैत जे सुस्‍वादुक संग सुप्‍पचो होइत अछि‍, तहि‍ना ने घरक लक्ष्‍मीओ होइ छथि‍।
पनरह-बीस दि‍नक शीतलहरि‍ भरि‍सक छँटत। पोह फटि‍ते रवि‍या एकचारि‍क घूर लग बैस पीढ़ि‍एपर खुरपी लऽ कऽ तमाकुल मि‍लौल गाँजा कटैत। पनरह-बीस दि‍नक परता भेने खुरपीओ अधबिज्‍झू भऽ गेल। जहि‍ना चालि‍ कमने पएरक होइ छै तहि‍ना धार मोटा गेल। लेटाैल गाँजापर खुरपीक बेँटकेँ जोरसँ दबि‍ते मनमे उठलै। बुदबुदाएल-
केते दि‍नसँ नि‍आरै छी जे गुलाब-तख्‍ती आ प्रेमकटारी लेब से तेहेन ने समए भऽ जाइ छै जे की लेब। बुझै छि‍ऐ जे अपन प्रेमकटारी आ गुलाब-तख्‍ती खुरपीए-पीढ़ि‍या छी।
घूरसँ खड़ौआ जौड़क गूल नि‍कालि‍ चीलममे चढ़ा भोग लगबैत मंत्र पढ़लक-
जीवैत-मरैत जे जेतए छह आबि‍ जाह।
पढ़ि दमसा कऽ दम मारलक। जहि‍ना चारक वा भीतक दाबसँ घरक मुँहक चौकठि‍क केबाड़ कसकसा कऽ बन्न रहैत मुदा जोरसँ धक्का पाबि‍ खुजि‍ जाइत तहि‍ना रवि‍याक कपाट खुजल। बाजल-
दि‍लरामक माए, कनी एम्‍हर आउ?”
जड़ाएल पति‍क अवाज सुनि‍ रूपनी सि‍ड़सि‍ड़ाइत आबि‍ आगूमे ठाढ़ भऽ गेली। ने दोहरा कऽ रवि‍या कि‍छु बजैत आ ने रूपनी। एक रंगक रोगी दोसराक की हाल-चाल पूछत। मुदा नहि‍योँ पुछने तँ नहि‍येँ हेतै। मुँहक काजे की छि‍ऐ। खाइए कालमे ने कनी, बाँकी तँ बैसारीए रहै छै कि‍ने। तहूमे बैसारीओ की एक रंगक होइ छै, केतौ खेलहा तँ केतौ बि‍नु खेलहा सेहो होइ छै। तैबीच तँ बीचमानि‍ तखने चलत कि‍ने जखनि दुनूकेँ नीके कहत। जौं से नै कहत तँ मुँहक मानि‍ए की भेल? मुदा वि‍हंगरो कम रहै तखनि ने जे दुनूकेँ अगल-बगल जोड़ि‍ओ कऽ चलत। जैठाम अकासे फटल छै तैठाम दरजीए बेचारा की करत, केते करत! कि‍यो खाइक रोगसँ पीड़ि‍त भऽ सुखाइत तँ कि‍यो भूखक रोगसँ। मुदा तहूसँ नम्‍हर बि‍हंगरा तँ ओतए उठैत जेतए भुखेलहासँ बेसी भुखाएल-खेलहाक खेल चलैए।
  दुनू परानी, रवि‍या-रूपनी एक दोसरपर आँखि‍ अँटकौने जेना आगू-पाछू दुनू दि‍स दुनू दुनूकेँ देखैत। मुदा गाँजाक चढ़ल मन रवि‍या अपन मौन तौड़ैत बाजल-
बुझलौं की, से कि‍ने से, आइ खि‍चड़ी खाइक मन होइए। ति‍लासंकान्‍ति‍क भरोसे की रहब।
पति‍क बात सुनि‍ रूपनी कि‍छु बाजल नै। मुदा रूपनीकेँ अनसोहाँत जकाँ रीब-रीब लगल। रीबरीबाइत बाजलि‍-
एना किए अहाँ तिलासकराँइतक खिदहाँस करै छी। सोझ मुहेँ कहू जे खि‍चड़ी खाएब।
पत्नी‍क बात रवि‍याकेँ कंठक नि‍च्‍चाँ नै उतरल। गल-गलबैत बाजल-
एकटा खि‍स्‍सा कहै छी। एगो रहै अन्‍हरा एगो रहै डि‍ठरा। दुनू मि‍लि‍ काति‍कमे एकटा खत्ता उपछलक। तइमे फँसल एकटा अन्‍है। डि‍ठरा कि‍ केलक जे नांगरि‍ दि‍ससँ अन्‍हराकेँ पकड़बैत जहाँ उधडरेड़पर आएल आकि‍ जोरसँ कहलकै। छोड़-छोड़ ने तँ धाए लेतौ साँप छि‍ऐ। ओ छोड़ि‍ देलकै। से हम थोड़े छी। अहीं कहू जे आब लोक दुरागमन करैए आकि‍ माल-जाल फड़ि‍छबैए छै। हे मानि‍ लेलौं जे बर-कनि‍याँक दुरागमन भेल। मुदा बेटा-बेटीक की हएत। घरेक काजमे एना दू रंग किए भेल जाइ छै?”
  रवि‍याक बात सुनि‍ रूपनी पघि‍ल गेली। वि‍स्‍मि‍त होइत बजली-
उसना चाउर अइछे कनी नून दऽ कऽ टभका लेब। कचका मि‍रचाइ चीर कऽ दऽ देबै। तइले अहाँ किए लल-वेकल छी।
जहि‍ना ठीकेदारकेँ बि‍ल-भुगतानक ि‍दन होइत जे रोहू लेब कि‍ मंुगरी, तहि‍ना रवि‍याकेँ भेल। गरीबक गोनरि‍ जहि‍ना दुनू कात चि‍कने होइ छै तहि‍ना दुनू परानीक भेल। रवि‍या बाजल-
अरबा चाउरक प्रेमी छि‍ऐ दूध-चीनी आकि‍ नून छि‍ऐ। मुदा अपन सबहक तँ नूने छि‍ऐ कि‍ने? जखनि खि‍चड़ि‍ए भेल तखनि चाउर, पानि‍, नून-मि‍रचाइ पड़बे कएल, एते जइमे पड़त से खि‍चड़ी केना नै भेल।
खाइक ओरियान देखि‍ रवि‍याक मन घूमल, गंभीरता देखबैत असथि‍रसँ बाजल-
बाध गेना बीस दि‍नसँ ऊपरे भऽ गेल। बाधमे की भेल हएत की‍ नै। तहूमे तेहेन ने सि‍ल्‍लीक उजैहि‍या आएल अछि‍ जे सभटा धान चाभि‍ देने हएत।
पति‍क बात सुनि‍ रूपनी अगुअबैत बजली-
पछिला बेर देखलि‍ऐ जे बीघा भरि‍ सोनाइ कक्काक सूर्यमुखी फूलकेँ सुग्‍गे खा गेलै। बेचारे केते आशा लगा खेती केने छेलखि‍न।
पत्नीकेँ भँसियाइत देखि‍ रवि‍या लोहछैत बाजल-
हमरा एते सौंसे गामक हि‍साब-बारी जोड़ैक काज नइए। हम माल-जालक ओगरवाहि करै छि‍ऐ आकि‍ चि‍ड़ैओ-चुनमुनीक। खेलकै तँ गि‍रहतक खेलकै। हमर बड़ खेलक तँ राखी।
साक्षात् वैरागी भेल िनर्विकार पति‍केँ देखि‍ रूपनी सुरूजक धाही देखि‍ते चड़ियबैत बाजलि‍-
हम चुल्हि‍क ओरि‍यानमे जाइ छी। अहाँ झब दनि बाध चलि‍ जाउ। नै तँ गि‍रहत अबलट जोड़त। जौं पहि‍ने चलि‍ जाएब आ गि‍रहतकेँ देखब तँ अगुआइए कऽ कहबै जे तेते ने सि‍ल्‍ली आबि‍ गेल छै जे एको कनमा धान नै होइबला अछि‍।
  पत्नीक ि‍वचार रवि‍याकेँ जँचल, मुदा भरल पेट जहि‍ना ओछाइन दि‍स तकैत तहि‍ना एक तँ घूरक अगि‍यासीक ताउ तैपर गाँजाक रंग, उठैक मन नै भेलै। मुदा अागि‍ओक तँ अपन गुण होइ छै, चाहे तँ उपयोग करू नै तँ घर जराैत। मुदा से रवि‍याकेँ नै भेल। मन छड़पलै। फुसफुसाएल-
कोनो गामक नइँर-गइँर नीक नै छै। कहू जे जखनि एक्के नाओं सबहक अछि गाम, तखनि किए कोनो गामक बाधक रखवारि‍ बीघामे दस धूर छै तँ कोनो गामक पाँच धूर। कोनो गामक चारि‍ धूर छै तँ कोनो गामक दू धूर। मन ठमकलै। अनेरे कोन चक्करमे चकराइ छी। ई तँ रखवारि‍क भेल। जेकरा ने माए छै आ ने बाप। मुदा माएओ-बापबला केँ तँ देखिते छि‍ऐ जे कोनो गामक लग्‍गी (खेत नपेबला लग्‍गा) साढ़े छह हाथक छै तँ कोनो गामक पौने सात हाथक। कोनो गामक साढ़े सात हाथक छै तँ कोनो गामक नअ हाथक। धूउ अनेरे अनकर रोग अपना सि‍र सि‍रजै छी। साबे बोझ जकाँ सदि‍काल गरमुराहे होइत रहैए तखनि तँ कहुना कऽ सम्‍हारि‍ खड़ि‍हाँन पहुँचू जे पसारि‍ कऽ सुखा लेब। बड़-बड़ लीला सभ छै। केते देखब। जखनि एक्के गामक एक्के आड़ि‍क खेतक मलगुजारी बढ़मोत्तर कहि‍ रेन्‍ट मुक्‍त अछि‍ तँ बगले बलाक ओते अछि‍ जे मलगुजारी भुगतानपर बटाइ खेत रहै छै।
अगि‍ला बात मनमे अबैसँ पहि‍ने रवि‍या फुड़फुड़ा कऽ उठल। शीतलहरि‍क चलैत अगते कुतरूमोमे फूलक कोढ़ी आबि‍ गेल, से रवि‍या देखने। पत्नीकेँ कहलक-
वाड़ीसँ कुतरूम आनि‍ लेब। बाध दि‍ससँ भेल अबै छी। कहि‍ रवि‍या बाधक रस्‍ता धेलक।
  करीब अस्‍सी बीघाक दछि‍नवरि‍या बाध। जेकर रखवारि‍ रवि‍या करैत। संयोग नीक भेल जे तीन साल पहि‍ने पछिला रखबार पंजाब गेल जे रवि‍याकेँ बाधक भार देने गेल। पचास बीघासँ ऊपर जमीन नि‍च्‍चाँ आ पच्‍चीस-तीस बीघा ऊपरक बाध रहए। तइमे बीघा पाँचेक उस्‍सर, जइमे भरि‍-भरि‍ जाँघक कुश उपजल। परदेशीया सबहक कि‍रदानीसँ पान-सात बीघा छाहेँ भऽ गेल। तैपर रौदी भेने उपराड़ि‍ खेत अबादे ने भेल। खोपड़ी लग पहुँचि‍ते रवि‍याक मनमे उठल, अनेरे एहेन ठंढ़ामे पएरमे बेमाए किए फटाएब। तइसँ नीक जे खोपड़ी अपन छीहे। आगि‍ सुनगा घूरे तापब। उपराड़ि‍ चौरक बीच परतीपर रवि‍याक रखवारि‍क खोपड़ी।
  घूर पजारि‍ रवि‍या बैस गेल हाथ-पएरक कन-कनी कमि‍ते रवि‍याक मनमे उठलै। अनका जे होउ, मुदा भगवान पक्षक काज केलनि‍। उपराड़ि‍ नै उपजल तँ नै उपजल, नि‍चला तँ उपजल अछि‍। नै साल भरि‍ तँ छबो मासक बुतात तँ हेबे करत। मुदा गामेमे देखै छी जे अही चौरीटा मे नहर नै भेनौं नहरक पानि‍ एलै। बाँकी गाम तँ रौदि‍याहे भऽ गेल अछि‍।
  सि‍ताएल नढ़ि‍या जकाँ सुरूज तँ उगल मुदा सि‍रसि‍राइत। नव वि‍हान देखि‍ गि‍रहस्‍तक बीच चलमली आएल। धान (पानि‍क धान)मे कनी ठंढ़े ने लगत मुदा सुरूजोक तँ धाही छइहे। हो-न-हो कहीं पूस-माघ अगुआएल अछि‍ जौं कहीं पछिला डेग नपलक तँ फेर ओहि‍ना भऽ जाएत। एक तँ रौदि‍याह समैक अन्न, तेकरो जौं जानि‍ कऽ छि‍जानैत करब तखनि तँ आरो केतौ भऽ कऽ नै रहब।
  कि‍सानक चलमली देखि‍ रूपनी हाँइ-हाँइ भानस केलक। आठ बजैत-बजैत हँसुआ नेने सभ नि‍कलि‍ गेल। जन-गि‍रहतसँ बाध भरि‍ गेल। अपने रूपनी दि‍लरामक संग खा पति‍ लेल बाधे खाएक लऽ वि‍दा भेल। सात बरखक बेटा दि‍लराम अँगनासँ नि‍कलि‍ते रूपनी बेटा -दि‍लराम- केँ कहलक-
बौआ, आइ उलबा चाउर खाएब।
आगू-आगू दि‍लराम आ पाछू-पाछू रूपनी बाध दि‍स वि‍दा भेल। कि‍छु दूर गेलापर रूपनीक मनमे उठल। भगवान कूह फेड़लनि‍। नै तँ कोनो दशा बाँकी नै रहि‍तए। जहि‍ना अन्नक गति‍ होइत तहि‍ना जारनिक। ओहो तँ माघ लेल रखने छेलौं जे पार लगल। नै तँ कठुआ कऽ मरैमे कोनो भांगठ छेलए।
  गाँजा पीऐत रवि‍या आगू-आगू बेटा आ पाछू-पाछू पत्नीकेँ अबैत देखि‍, बुदबुदाएल-
जे जीबए से खेलए फागु। हमरा सबहक जि‍नगीए की अछि‍ जे अगि‍ला आशापर जीब। जहि‍या हेतै ति‍लासकराँइत तहि‍या होउ। अपन तँ आइए छी।
मुदा लगले मन ठमकि‍ गेलै। आन पावनि‍ खीरक होइ छै आ ति‍लासंक्रान्‍ति‍ किए खि‍चड़ीक होइ छै। तहूमे उजरा अरबा चाउरक संग करि‍या ति‍ल-गुड़-पानि‍क संग परसाद किए बनै छै...?
आँखि‍ मूनि‍ रवि‍या वि‍चारि‍ते छल आकि रूपनी लगमे आबि‍ टोकलखिन-
जहि‍ना गामपर रहै छी तहि‍ना बाधोमे भकुआएले रहै छी?”
रवि‍याक बनल मन बाजल-
गामपर तँ अहाँ देखि‍ भकुआ जाइ छी मुदा बाधमे तँ अपने देखै छी कि‍ने।
  तैबीच बीघा दुइए हटि‍ धानक खेतमे कटनि‍हार सबहक बीच हल्‍ला भेल। हल्लाक कारण रहै एक भाग सि‍ल्‍ली धान चाभि‍ देने रहै। धान नै देखि‍ जन-सबहक बीच पाहि‍ धड़ैक हल्‍ला रहए। हल्‍ला देखि‍ रूपनी पति‍केँ कहलक-
कनी जा कऽ देखि‍यौ, जे किए झगड़ा होइ छै।
गाँजाक असकताएल मन रवि‍याक, बाजल-
हम बाधक रखबार छि‍ऐ आकि गामक पंच छी? अपन गि‍रहत फड़ि‍याबह...।
रवि‍याक बात रूपनीकेँ जँचलनि। आगूमे थारी बढ़बैत बजली-
बेटाकेँ आइ उलबा चाउर खुआइओ देबै आ मोटरीओ बान्हि‍ देबै।
उलबा चाउर सुनि‍ रवि‍या वि‍स्‍मि‍त भऽ गेल। मन पड़लै अपन माए। माए मन पड़ि‍ते मनमे उठलै ओ दि‍न, जइ दि‍न दियारी पावनि‍ रहै। धान अधपक्कू भऽ गेल रहै, मुदा सुभ्भर नै पाकल रहै। लक्ष्‍मी पूजा दि‍न रहने वएह अधपक्कू धान काटि‍, पएरसँ मीड़ि‍ खापड़ि‍मे भूजि‍ चाउर कूटि‍ भात खेने रही। हाथ-मुँह धोय रवि‍या दि‍लरामकेँ कहलक-
बौआ, अहूँ कनी खा लिअ।
भरल पेट दि‍लराम नकारैत बाजल-
नै, खि‍चड़ी नै खाएब, उलबा चाउर खाएब।
उलबा चाउर सुनि‍ रवि‍याक मनमे खीझ उठल। बाजल-
उलबा चाउर लगले केतएसँ औतै। बड़ अगुताएल छेँ। के तोरा मन पाड़ि‍ देलकौ?”
नि‍ष्‍कपट दि‍लराम बाजल-
माए कहलक।
माएक नाओं सुनि‍ रवि‍या ठमकि‍ गेल। जहि‍ना मंदि‍र जाइसँ पहिनहि ने भगवान आबि‍ राशि‍ लगा लऽ जाइ छथि‍न, तहि‍ना ने गाछोक पीपही रोपि‍ते-काल पाकल आम आगूमे आबि‍ जाइ छै।
  फेर दोसर खेतमे हल्‍ला उठल। पानि‍क तरमे आड़ि‍ डूमल। खाली आड़ि‍क खरही टि‍क-टि‍क करैत। मुदा सभ ठामक ओगरवाहि‍ की बन्‍दूके हाथे होइ छै। खरहोरि‍क कड़ची केना ओगरवाहि‍ करैए। झगड़ाक कारण रहै एकटा खेतक धान चतड़ि‍-लतड़ि‍ दाेसरा खेतमे चलि‍ गेल। पहि‍ने तँ रवि‍याकेँ सोझ-साझ बात बूझि‍ पड़लै, मुदा लगले मन ठमकि‍ गेलै। पानि‍क संग माटि‍क प्रश्न उठि‍ गेलै। ई केहेन होइ छै जे लोक कलम-गाछी लगबै-काल आड़ि‍क कातमे झमटगरहा गाछ लगा दइ छै जे नमड़ि‍ कऽ दोसरा खेतक उपजा खा जाइ छै। बूढ़-बुढ़ानुसक सेहो कहब छन्‍हि‍ जे घर लग बाँस नै लगाबी, एक तँ लत्ती-गाछक सीमापर बसल अछि‍ दाेसर तेहेन सि‍राह होइए जे जेते दूर ओकर छाँह जाइ छै तेते दूर ओकर सीरो जाइ छै। जौं जेबेटा करि‍तै तखनि तँ नै कोनो, मुदा तरे-तर तेहेन खच्‍चरपनी करै छै जे जेते दूर जाइ छै दोसराक बास नै हुअ दि‍अ चाहै छै। खि‍चड़ीसँ मन भरि‍ते रवि‍या पत्नीकेँ कहलक-
हमरा अङौस-मङौस करैक मन होइए, अहाँ बाध घुमने आउ।
पति‍क समरपन देखि‍ रूपनी बजली-
थाल-पानि‍मे बौआकेँ केना लऽ जेबै। एतै छोड़ि‍ दइ छि‍ऐ।
खेते-खेत रूपनी टहलि‍ घूमि‍ कऽ आबि पति‍केँ कहलक-
बलौकि‍या धान छोड़ि‍ सभ ऊपरा-ऊपरी छै।
बजैत-बजैत मनमे उठलै, घरमे कोठी-भरली तँ नहि‍येँ अछि‍ एते धान रखब केतए। आब कि‍ धान-चाउरक चोर रहल जे कि‍यो चोरा लेत। आब तँ हि‍स्‍सा-बखराक चोरि‍ देखाइओ आ छि‍पाइओ कऽ होइ छै।
रवि‍या पुआरक ओछाइन सेरियबैत नि‍नि‍याँ देवीक स्‍तुति‍ करि‍ते छल आकि पत्नीक बुदबुदाएल बात सुनि‍ गेल। मन मुरुछि‍ कऽ तुरुछि‍ गेलै-
बड़ लाल बुज्‍झकरि बनै छथि‍, अच्‍छा एकटा कहू जे जइ गाममे सभटा चाेरे रहत ओइ गाममे चोर के भेल?”
पति‍क बि‍गड़ैक कारण बूझि‍ रूपनी नहाएल आ बि‍नु नहाएल अवस्‍थामे पड़ल जकाँ बजली-
पड़ू-पड़ू। लाउ घुट्ठी दाबि‍ दइ छी।
पि‍याससँ पहि‍ने पानि,‍ भूखसँ पहि‍ने अन्न जहिना आगू एलासँ क्षुधाक धार रोकाइ छै तहिना दू-अढ़ाइ बजि‍ते धान कटनि‍हार सबहक शक्ति‍ सि‍हरए‍ लगल। एक तँ मरियाएल रौद तैपर जट्ठर पानिक संग पछबाक लहकी। एक्के-दुइए धानक बोझ लऽ लऽ खेतसँ नि‍कलए लगल। बोझ देखि‍ रूपनी पतिकेँ पुछलखिन-
हम राखी कटने अबै छी।
पेमेंट, वेतन, महि‍ना, पगार, तलब, तनखा आकि‍ दरमाहा उठैकाल जहि‍ना नोकरि‍याक मनमे तरंग उठै छै तहि‍ना रूपनीक मनमे उठए लगल। तेते खेत कटाएल जे एते राखी काटब पार लगत। तहूमे बेरो खसल आ जाड़ो बेसीयेबे करत। लगले मन मानि‍ गेलनि जे कोनो कि‍ जमा-जि‍गि‍र अछि‍ जे एते पुरेबे करत। जेतबे सम्‍हरत तेतबे काटब। बाँकी आन दि‍न काटब। एते दि‍न कि‍यो चोरेबे ने केलकै आ एक-दू दि‍नमे उनटन भऽ जाएत। सोचि‍ते-वि‍चारि‍ते पहि‍ल खेत रूपनी पहुँच‍‍ गेली। आँखि‍ उठा हि‍या कऽ देखलनि (पानि‍क दुआरे) जे कोन कोणमे राखी अछि‍। दुइए धूर हएत तइसँ की,‍ हएत तँ कोनो कोणेपर। मुदा नम्‍हर खेत रहने अदहोसँ कम खेतक धान कटाएल, तखनि राखी केना बनत। दोसर-तेसर-चारि‍मो खेत तहि‍ना। पाँचम-टामे राखी बेड़ाएल। धान देखि‍ रूपनीक मनमे सबुरक सबुरदाना छि‍ड़ि‍या गेलनि। पाँजो भरि‍ धानक आँटी बान्‍हि‍ माथपर उठौने धानक गदियाएल पानि‍ देहपर टघरैत रहनि। समुच्‍चा देह भीजल रूपनी खोपड़ी लग पहुँचली। अरामसँ पति आ पुत्रकेँ देखि‍ वि‍भोरसँ वि‍सरभोर भऽ गेली। मोने ने रहलनि जे माथपर धानक भारी आँटी अछि‍। धानक आँटी देखि‍ रवि‍या मुस्‍की दैत पुछलकनि-
एहेन जे अहाँ छी जे बेटा-दि‍लरामकेँ बाधे अबैकाल उलबा चाउर गछि‍ लेलि‍ऐ आ अखनिसँ जे छाल-छोड़ाैत से केहेन लगत।
बिहुँसैत रूपनी बजली-
जइ बेटाकेँ गछलि‍ऐ तेकरा पूरा कऽ छोड़बै। ऐठामसँ जाएब, एक पाट हएत मलि‍ लेब। चुल्हि‍ पजारि‍ गरमा लेब। साँझे परतै तँ कि‍ हेतै, कोनो कि‍ अनका आँगना जाएब जे भरली साँझ नै कुटए देत। अपने ढेकी अछि‍ जखनि पलखति‍ हएत तखनि कूटब। तँए कि‍ बेटाकेँ...।
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